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मानवता के पुजारी संत गाडगे महाराज / डॉ.अनंत वडघणे

भारत देश अनेक संत परंपराओं और उनके विचारों से प्रेरित है। इस देश में जब-जब मानवता से हटकर धार्मिक कट्टरता या धर्म का साम्प्रदायिकीकरण हुआ। तब-तब संतों ने जन्म लिया और उस धर्म को तराशने का कार्य किया। उसमें जो-जो कुरीतियां है उसका कड़ा विरोध किया। मनुष्य में ही दैवत्व को तलाशा और भूले-बिसरे लोगों को सही राह दिखाई। इसके लिए राजसत्ता, धर्मसत्ता से भी लोहा मान लिया। इसमें हम कबीर का फक्कड़पन या ज्ञानेश्वर एवं तुकाराम का धर्म विद्रोह इसके पुख्ते सबूत देख सकते हैं। जिन्होंने केवल जनकल्याण की बात की। इसलिए इन सभी संतों के विचार हमें आज भी प्रासंगिक लगते हैं। संत गाडगे महाराज भी इसी विचारधारा की एक कड़ी है। जिन्होंने लोगों के दुःख, दर्द को देखा और उससे उभरकर जनकल्याण के मार्ग पर लोगों को अग्रेषित किया। वे जीवनभर जनसेवा के लिए कार्य करते रहे। उन्होंने भले ही महाराष्ट्र के विदर्भ विभाग में जन्म लिया किन्तु उनका कार्य सर्वदूर फैला हुआ है। वे जानते थे कि भारत अधिकतर गांवों में बसा हुआ है। हमें इस देश को उन्नत बनाना है, तो सर्वप्रथम गांवों का विकास करना होगा। उसमें जो-जो कुरीतियां है, अंधश्रध्दा है, उसका नाश करना होगा। जिसके लिए जीवनभर कार्य करते रहे। भूखे को खाना, प्यासे को पानी, नंगे को वस्त्र, गरीब को शिक्षा, बेघर को घर, अंधे, लूले एवं मरीज को दवा, बेकार को रोजगार, पशु, पक्षियों को अभय, गरीब युवक-युवतियों का विवाह, दुःखी एवं निराशों को हौसला आदि बातों को अपने कार्य का सूत्र बनाया और इसी सूत्र को पूर्णत्व देने का कार्य वे जीवन भर करते रहे।

गाडगे महाराज का पूरा नाम देवीदास झिंगराजि जानोरकर था किन्तु उनके घर में जो बचपन में नाम दिया वह 'डेबु' और समाज ने आगे चलकर जो नाम दिया वह 'गाडगे महाराज'। वे निरक्षर थे। पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे किन्तु उन्होंने किताब को नहीं बल्कि समाज को पढ़ा। उनमें व्याप्त विभिन्न रूढ़ियों को खोजकर उससे छुटकारा पाने के लिए जन प्रबोधन किया। सबसे पहले हाथ में झाडू लेकर गांवों में व्याप्त दुर्गंधी को साफ किया। जिससे किसी भी प्रकार के रोगों का प्रादुर्भाव न हो। तो दूसरी ओर अपने विचारों के माध्यम से लोगों में व्याप्त विभिन्न मानसिक अंधश्रध्दाओं एवं रूढ़ियों को बाहर निकाला। वे जिस किसी भी गांव में जाते, वहाँ वे पूरे गांव को साफ करते और रात में लोगों के मन को। अमरावती के 'ऋषमोचन' नामक गांव में घटित घटना इस रूप में है-''भीड़ को एकत्रित देखकर गाडगे महाराज बोले, आप मुझे इस तरह हैरत से क्यों देख रहे हैं? मैं कोई अजूबा नहीं हूं न ही मैं कोई अनोखा काम कर रहा हूं फर्क इतना है कि जिस सफाई को आप केवल अपने घरों तक सीमित रखना चाहते हैं, उसी सफाई को मैं पूरे देश में फैलाना चाहता हूं गंदगी के कारण महामारी और असंख्य बीमारियाँ पनपती हैं। इसमें हम सभी का हाथ होता है और बीमारी की चपेट में आनेवाले भी हम ही होते हैं। लेकिन हम जानते तभी हैं जब इसकी चपेट में आते हैं। मुझमें और आप में इतना अंतर जरूर है कि मैं पहले ही जागरूक हो गया हूं और यहाँ सफाई कर रहा हूं।''1 इस तरह समाज में लोग स्वच्छता के मंत्र को आत्मसात करे इसके लिए उन्होंने जीवनभर अपने कीर्तन के माध्यम से कार्य किया। वे पंढरपुर तो जाते थे किन्तु वहाँ विठ्ठल के दर्शन के लिए नहीं बल्कि वहाँ जो लोग गंदगी फैलाते हैं उसको साफ करने के लिए और उन्हें मनुष्य में ही ईश्वर का वास होता है, यह बताने के लिए। उन्होंने धार्मिक पाखण्ड का पर्दाफाश किया।''गाडगे बाबा साधुओं, संतो-महंतों और किस्म-किस्म के बाबाओं के पीछे हाथ धोकर पड़े रहे, उन्होंने उनके धार्मिक पाखण्डोें की धज्जियाँ उड़ा दी।...वह किसी तरह का गुरूमंत्र भी नहीं देते थे। ईश्वर, आत्मा पुनर्जन्म ब्राह्मधाम आदि बेकार की बातों पर उनका विश्वास नहीं था। आँखें मूंदकर राम नाम जपने को वे ढोंग मानते और ऐसे उपदेशकों को ढोंगी।''2 जिस तरह कबीर ने ईश्वर को मंदिर-मस्जिद या काबे कैलाश में नहीं माना उसी तरह गाडगे महाराज ने भी ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में न मानकर मनुष्य के आसपास माना। उसी तरह गाडगे महाराज भी ईश्वर को पत्थर में न मानकर मनुष्य के अन्तरमन में होने की बात करते हैं। जैसे-''देव पत्थर में न होकर मनुष्य में होता है, इसलिए मनुष्य बनाना ही अपना ध्येय हो। इसके लिए शिक्षा लेनी चाहिए, इस बात को वे बार-बार दुहराते जिन दलितों के बच्चे को शिक्षा नहीं मिलती उनके स्कूल लिए जगह देते। उन्होंने जगह-जगह गरीबों के लिए धर्मशालाओं का निर्माण किया। कीर्तन के प्रभावी शस्त्र द्वारा ईश्वर पत्थर में नहीं होता वह मनुष्य में होता है, उस मनुष्य की हमें सेवा करनी चाहिए यह बुध्दिप्रामाण्यावादी विचारों के सुसंस्कार गाडगे बाबा ने आम आदमी पर किये।''3 वे कहते हैं दुनिया का सबसे बड़ा धर्म अगर कोई है तो वह है 'दया'। वे कहते थे-''लोगों, दया यह दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है।''4

वर्तमान समय में सरकार शिक्षा के लिए कई सारी योजनाएँ चला रही है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा का महत्व प्रतिपादित किया जा रहा है। महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर आदि ने शिक्षा को मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण माना। इसी शिक्षा के महत्व को गाडगे महाराज ने जाना था। यथा-''शिक्षा पर उनका नितांत प्रेम था। वे नित डॉ. बाबासाहब के उदाहरण देते थे। शिक्षा की बिना मनुष्य अंधा होता है। परिस्थिति की वजह से व्यक्ति को शिक्षा नहीं मिलती, कई बच्चे शिक्षा से वंचित रहते हैं। गरीबों को शिक्षा कैसे मिलेगी इसकी गाडगे महाराज को सदैव चिंता रहती। इसलिए उन्होंने स्कूल, छात्रावास एवं आश्रम शुरू किये।''5 वे लोगों को सदा शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनका कहना था कि,''बच्चों को शिक्षा दो। उसके लिए खाने की थाली बेचो हाथ पर रोटी लो, पत्नी को सस्ती दामों में साड़ी लो, पर बच्चों को स्कूल भेजना न छोड़ो विद्या सबसे बड़ा धन है। सुभेदार रामजी को सुबुध्दि आयी और उन्होंने आंबेडकर साहब को स्कूल में भेजा। आंबेडकरजी ने कुछ छोटा-मोटा काम नहीं किया बल्कि देश का संविधान लिखा। यह बात वे अपनी टूटी-फूटी भाषा में शिक्षा का महत्व बताते हुए समझाते थे।''6

संत गाडगे महाराज ने अंधश्रध्दा के विरोध में संघर्ष किया। जो भी अंधश्रध्दा की गिरफ्त में फँस गया हैं उसको सही रास्ता दिखाया। यथा-''संत गाडगे महाराज जानते थे कि समाज में लोग अज्ञानी है, अंधश्रध्दा को मानते हैं, उन्हें पत्थर में देव दिखाई देता है किन्तु मनुष्य में नहीं। भूत-पिशाच, जादू-टोना इसपर लोगों का विश्वास है। समाज में कई सारी अंधश्रध्दा है। गरीबी का कारण केवल धुम्रपान एवं बीमारियां नहीं है बल्कि अशिक्षा, अंधश्रध्दा यही है। इसलिए बीमारी, गरीबी, अंधश्रध्दा इनके विरोध में वे जीवनभर लड़ते रहे। धुम्रपान खत्म हुआ कि गरीबी खत्म होगी, धुम्रपान खत्म हुआ कि बीमारी का अन्त होगा। इसलिए उन्होंने पशु हत्या न करो, कर्ज मत निकालो, भोंदू गुरू से मंत्र न लो, यह मंत्र उन्होंने दिया।''7

इस तरह गाडगे महाराज एक ऐसे संत थे जिन्होंने जनसेवा को ईश्वर सेवा माना। उसके लिए उन्होंने अपना घर का त्यागकर, गांव-गांव घूमते रहे हैं। इस संबंध समाज को ही अपना परिवार माना। जब उनके बेटे का देहांत हो जाता है तब का प्रसंग इस रूप में है-''गाडगे महाराज यह कीर्तन करते समय उन्हें उनके बेटे के मृत्यु का समाचार मिला। तब उन्होंने कहा कि 'मेले कोट्यानु कोटी रडू कोणासाठी?''8 अर्थात इस दुनिया में करोड़ों लोग मर गये हैं। अतः किस-किसके लिए रोउं। इस तरह उन्होंने परिवार एवं नाते-रिश्तों से ऊपर उठकर अपने-आपको समाज के लिए समर्पित किया था। प्रबोधनकार ठाकरे उनके संदर्भ में कहते हैं कि,''देववादी व्यक्ति से लेकर शहरी मस्तिष्क तक किसी भी आयु के लोगों को गाडगे महाराज ने अपने कीर्तन में सहजता से बांधकर रखा और अपने तत्वज्ञान से परिचित कराया। उनके जैसे कीर्तन में शब्दचित्र खड़े करना मेरे शक्ति के बाहर का काम है। ऐसा वक्तव्य उन्होंने किया।''9 गाडगे महाराज के जन्मशताब्दी के समारोह में मदर तेरेसा ने कहा कि,''ईश्वर ने संत गाडगे बाबा जैसा व्यक्ति निर्माण कर मानवता पर अनंत उपकार किये हैं। पर मानवतावादी गाडगे बाबा और उनके प्रभावी तत्वज्ञान को जैसा आत्मसात करना चाहिए वैसा देश ने, न उनके अनुयायियों ने, न ही इतिहास ने किया।''10

अतः कह सकते हैं कि संत गाडगे महाराज सही मायने में जनसेवक थे। जनसेवा को ही ईश्वर सेवा उन्होंने माना था। उनके विचार उस समय जितने प्रासंगिक है, उतने आज भी। भारत स्वच्छ अभियान हो, शिक्षा क्षेत्र में कार्य हो या अंधश्रध्दा उच्चाटन हो ऐसे विषयों की बात जब-जब होगी तब-तब संत गाडगे महाराज की याद सभी को आ जाएगी!

संदर्भ

1- http://navbharattimes.indiatimes.com/astro/holy-discourse/moral-
   stories/moral-sant of sant gadge maharaj/articleshow/44823678.cm
2. http://nirwanbodhi.blogspost.in/2012/01/blog-post.html
3. http://advajjadhav.blogspost.in/2012/08/blog-post_29.html
4. वही
5. http://vishvamarathi.blogspot.in/2012/11/blog-post_5.html
6. http://bahujanhitaysukhay.blogspost.in/2013/12/blog-post_20.html
7. http://advajjadhav.blogspost.in/2012/08/blog-post_29.html
8. http://bahujanhitaysukhay.blogspost.in/2013/12/blog-post_20.html
9. http://sunrisevwaghmare.blogspot.in/2015/10/sant-gade-baba.html
10. http://advajjadhav.blogspost.in/2012/08/blog-post_29.html   

 

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हिंदी विभाग,

डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा

विश्वविद्यालय, औरंगाबाद

dr.anantwadghane@gmail.com

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