मानवता के पुजारी संत गाडगे महाराज / डॉ.अनंत वडघणे

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भारत देश अनेक संत परंपराओं और उनके विचारों से प्रेरित है। इस देश में जब-जब मानवता से हटकर धार्मिक कट्टरता या धर्म का साम्प्रदायिकीकरण हुआ। त...

भारत देश अनेक संत परंपराओं और उनके विचारों से प्रेरित है। इस देश में जब-जब मानवता से हटकर धार्मिक कट्टरता या धर्म का साम्प्रदायिकीकरण हुआ। तब-तब संतों ने जन्म लिया और उस धर्म को तराशने का कार्य किया। उसमें जो-जो कुरीतियां है उसका कड़ा विरोध किया। मनुष्य में ही दैवत्व को तलाशा और भूले-बिसरे लोगों को सही राह दिखाई। इसके लिए राजसत्ता, धर्मसत्ता से भी लोहा मान लिया। इसमें हम कबीर का फक्कड़पन या ज्ञानेश्वर एवं तुकाराम का धर्म विद्रोह इसके पुख्ते सबूत देख सकते हैं। जिन्होंने केवल जनकल्याण की बात की। इसलिए इन सभी संतों के विचार हमें आज भी प्रासंगिक लगते हैं। संत गाडगे महाराज भी इसी विचारधारा की एक कड़ी है। जिन्होंने लोगों के दुःख, दर्द को देखा और उससे उभरकर जनकल्याण के मार्ग पर लोगों को अग्रेषित किया। वे जीवनभर जनसेवा के लिए कार्य करते रहे। उन्होंने भले ही महाराष्ट्र के विदर्भ विभाग में जन्म लिया किन्तु उनका कार्य सर्वदूर फैला हुआ है। वे जानते थे कि भारत अधिकतर गांवों में बसा हुआ है। हमें इस देश को उन्नत बनाना है, तो सर्वप्रथम गांवों का विकास करना होगा। उसमें जो-जो कुरीतियां है, अंधश्रध्दा है, उसका नाश करना होगा। जिसके लिए जीवनभर कार्य करते रहे। भूखे को खाना, प्यासे को पानी, नंगे को वस्त्र, गरीब को शिक्षा, बेघर को घर, अंधे, लूले एवं मरीज को दवा, बेकार को रोजगार, पशु, पक्षियों को अभय, गरीब युवक-युवतियों का विवाह, दुःखी एवं निराशों को हौसला आदि बातों को अपने कार्य का सूत्र बनाया और इसी सूत्र को पूर्णत्व देने का कार्य वे जीवन भर करते रहे।

गाडगे महाराज का पूरा नाम देवीदास झिंगराजि जानोरकर था किन्तु उनके घर में जो बचपन में नाम दिया वह 'डेबु' और समाज ने आगे चलकर जो नाम दिया वह 'गाडगे महाराज'। वे निरक्षर थे। पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे किन्तु उन्होंने किताब को नहीं बल्कि समाज को पढ़ा। उनमें व्याप्त विभिन्न रूढ़ियों को खोजकर उससे छुटकारा पाने के लिए जन प्रबोधन किया। सबसे पहले हाथ में झाडू लेकर गांवों में व्याप्त दुर्गंधी को साफ किया। जिससे किसी भी प्रकार के रोगों का प्रादुर्भाव न हो। तो दूसरी ओर अपने विचारों के माध्यम से लोगों में व्याप्त विभिन्न मानसिक अंधश्रध्दाओं एवं रूढ़ियों को बाहर निकाला। वे जिस किसी भी गांव में जाते, वहाँ वे पूरे गांव को साफ करते और रात में लोगों के मन को। अमरावती के 'ऋषमोचन' नामक गांव में घटित घटना इस रूप में है-''भीड़ को एकत्रित देखकर गाडगे महाराज बोले, आप मुझे इस तरह हैरत से क्यों देख रहे हैं? मैं कोई अजूबा नहीं हूं न ही मैं कोई अनोखा काम कर रहा हूं फर्क इतना है कि जिस सफाई को आप केवल अपने घरों तक सीमित रखना चाहते हैं, उसी सफाई को मैं पूरे देश में फैलाना चाहता हूं गंदगी के कारण महामारी और असंख्य बीमारियाँ पनपती हैं। इसमें हम सभी का हाथ होता है और बीमारी की चपेट में आनेवाले भी हम ही होते हैं। लेकिन हम जानते तभी हैं जब इसकी चपेट में आते हैं। मुझमें और आप में इतना अंतर जरूर है कि मैं पहले ही जागरूक हो गया हूं और यहाँ सफाई कर रहा हूं।''1 इस तरह समाज में लोग स्वच्छता के मंत्र को आत्मसात करे इसके लिए उन्होंने जीवनभर अपने कीर्तन के माध्यम से कार्य किया। वे पंढरपुर तो जाते थे किन्तु वहाँ विठ्ठल के दर्शन के लिए नहीं बल्कि वहाँ जो लोग गंदगी फैलाते हैं उसको साफ करने के लिए और उन्हें मनुष्य में ही ईश्वर का वास होता है, यह बताने के लिए। उन्होंने धार्मिक पाखण्ड का पर्दाफाश किया।''गाडगे बाबा साधुओं, संतो-महंतों और किस्म-किस्म के बाबाओं के पीछे हाथ धोकर पड़े रहे, उन्होंने उनके धार्मिक पाखण्डोें की धज्जियाँ उड़ा दी।...वह किसी तरह का गुरूमंत्र भी नहीं देते थे। ईश्वर, आत्मा पुनर्जन्म ब्राह्मधाम आदि बेकार की बातों पर उनका विश्वास नहीं था। आँखें मूंदकर राम नाम जपने को वे ढोंग मानते और ऐसे उपदेशकों को ढोंगी।''2 जिस तरह कबीर ने ईश्वर को मंदिर-मस्जिद या काबे कैलाश में नहीं माना उसी तरह गाडगे महाराज ने भी ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में न मानकर मनुष्य के आसपास माना। उसी तरह गाडगे महाराज भी ईश्वर को पत्थर में न मानकर मनुष्य के अन्तरमन में होने की बात करते हैं। जैसे-''देव पत्थर में न होकर मनुष्य में होता है, इसलिए मनुष्य बनाना ही अपना ध्येय हो। इसके लिए शिक्षा लेनी चाहिए, इस बात को वे बार-बार दुहराते जिन दलितों के बच्चे को शिक्षा नहीं मिलती उनके स्कूल लिए जगह देते। उन्होंने जगह-जगह गरीबों के लिए धर्मशालाओं का निर्माण किया। कीर्तन के प्रभावी शस्त्र द्वारा ईश्वर पत्थर में नहीं होता वह मनुष्य में होता है, उस मनुष्य की हमें सेवा करनी चाहिए यह बुध्दिप्रामाण्यावादी विचारों के सुसंस्कार गाडगे बाबा ने आम आदमी पर किये।''3 वे कहते हैं दुनिया का सबसे बड़ा धर्म अगर कोई है तो वह है 'दया'। वे कहते थे-''लोगों, दया यह दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है।''4

वर्तमान समय में सरकार शिक्षा के लिए कई सारी योजनाएँ चला रही है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा का महत्व प्रतिपादित किया जा रहा है। महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर आदि ने शिक्षा को मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण माना। इसी शिक्षा के महत्व को गाडगे महाराज ने जाना था। यथा-''शिक्षा पर उनका नितांत प्रेम था। वे नित डॉ. बाबासाहब के उदाहरण देते थे। शिक्षा की बिना मनुष्य अंधा होता है। परिस्थिति की वजह से व्यक्ति को शिक्षा नहीं मिलती, कई बच्चे शिक्षा से वंचित रहते हैं। गरीबों को शिक्षा कैसे मिलेगी इसकी गाडगे महाराज को सदैव चिंता रहती। इसलिए उन्होंने स्कूल, छात्रावास एवं आश्रम शुरू किये।''5 वे लोगों को सदा शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनका कहना था कि,''बच्चों को शिक्षा दो। उसके लिए खाने की थाली बेचो हाथ पर रोटी लो, पत्नी को सस्ती दामों में साड़ी लो, पर बच्चों को स्कूल भेजना न छोड़ो विद्या सबसे बड़ा धन है। सुभेदार रामजी को सुबुध्दि आयी और उन्होंने आंबेडकर साहब को स्कूल में भेजा। आंबेडकरजी ने कुछ छोटा-मोटा काम नहीं किया बल्कि देश का संविधान लिखा। यह बात वे अपनी टूटी-फूटी भाषा में शिक्षा का महत्व बताते हुए समझाते थे।''6

संत गाडगे महाराज ने अंधश्रध्दा के विरोध में संघर्ष किया। जो भी अंधश्रध्दा की गिरफ्त में फँस गया हैं उसको सही रास्ता दिखाया। यथा-''संत गाडगे महाराज जानते थे कि समाज में लोग अज्ञानी है, अंधश्रध्दा को मानते हैं, उन्हें पत्थर में देव दिखाई देता है किन्तु मनुष्य में नहीं। भूत-पिशाच, जादू-टोना इसपर लोगों का विश्वास है। समाज में कई सारी अंधश्रध्दा है। गरीबी का कारण केवल धुम्रपान एवं बीमारियां नहीं है बल्कि अशिक्षा, अंधश्रध्दा यही है। इसलिए बीमारी, गरीबी, अंधश्रध्दा इनके विरोध में वे जीवनभर लड़ते रहे। धुम्रपान खत्म हुआ कि गरीबी खत्म होगी, धुम्रपान खत्म हुआ कि बीमारी का अन्त होगा। इसलिए उन्होंने पशु हत्या न करो, कर्ज मत निकालो, भोंदू गुरू से मंत्र न लो, यह मंत्र उन्होंने दिया।''7

इस तरह गाडगे महाराज एक ऐसे संत थे जिन्होंने जनसेवा को ईश्वर सेवा माना। उसके लिए उन्होंने अपना घर का त्यागकर, गांव-गांव घूमते रहे हैं। इस संबंध समाज को ही अपना परिवार माना। जब उनके बेटे का देहांत हो जाता है तब का प्रसंग इस रूप में है-''गाडगे महाराज यह कीर्तन करते समय उन्हें उनके बेटे के मृत्यु का समाचार मिला। तब उन्होंने कहा कि 'मेले कोट्यानु कोटी रडू कोणासाठी?''8 अर्थात इस दुनिया में करोड़ों लोग मर गये हैं। अतः किस-किसके लिए रोउं। इस तरह उन्होंने परिवार एवं नाते-रिश्तों से ऊपर उठकर अपने-आपको समाज के लिए समर्पित किया था। प्रबोधनकार ठाकरे उनके संदर्भ में कहते हैं कि,''देववादी व्यक्ति से लेकर शहरी मस्तिष्क तक किसी भी आयु के लोगों को गाडगे महाराज ने अपने कीर्तन में सहजता से बांधकर रखा और अपने तत्वज्ञान से परिचित कराया। उनके जैसे कीर्तन में शब्दचित्र खड़े करना मेरे शक्ति के बाहर का काम है। ऐसा वक्तव्य उन्होंने किया।''9 गाडगे महाराज के जन्मशताब्दी के समारोह में मदर तेरेसा ने कहा कि,''ईश्वर ने संत गाडगे बाबा जैसा व्यक्ति निर्माण कर मानवता पर अनंत उपकार किये हैं। पर मानवतावादी गाडगे बाबा और उनके प्रभावी तत्वज्ञान को जैसा आत्मसात करना चाहिए वैसा देश ने, न उनके अनुयायियों ने, न ही इतिहास ने किया।''10

अतः कह सकते हैं कि संत गाडगे महाराज सही मायने में जनसेवक थे। जनसेवा को ही ईश्वर सेवा उन्होंने माना था। उनके विचार उस समय जितने प्रासंगिक है, उतने आज भी। भारत स्वच्छ अभियान हो, शिक्षा क्षेत्र में कार्य हो या अंधश्रध्दा उच्चाटन हो ऐसे विषयों की बात जब-जब होगी तब-तब संत गाडगे महाराज की याद सभी को आ जाएगी!

संदर्भ

1- http://navbharattimes.indiatimes.com/astro/holy-discourse/moral-
   stories/moral-sant of sant gadge maharaj/articleshow/44823678.cm
2. http://nirwanbodhi.blogspost.in/2012/01/blog-post.html
3. http://advajjadhav.blogspost.in/2012/08/blog-post_29.html
4. वही
5. http://vishvamarathi.blogspot.in/2012/11/blog-post_5.html
6. http://bahujanhitaysukhay.blogspost.in/2013/12/blog-post_20.html
7. http://advajjadhav.blogspost.in/2012/08/blog-post_29.html
8. http://bahujanhitaysukhay.blogspost.in/2013/12/blog-post_20.html
9. http://sunrisevwaghmare.blogspot.in/2015/10/sant-gade-baba.html
10. http://advajjadhav.blogspost.in/2012/08/blog-post_29.html   

 

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हिंदी विभाग,

डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा

विश्वविद्यालय, औरंगाबाद

dr.anantwadghane@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ 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रचनाकार: मानवता के पुजारी संत गाडगे महाराज / डॉ.अनंत वडघणे
मानवता के पुजारी संत गाडगे महाराज / डॉ.अनंत वडघणे
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