मंगलवार, 30 मई 2017

कबीर और नज़ीर अकबराबादी के काव्य में विचारात्मक समानताएँ / डॉ. शमाँ


हिन्दी साहित्य-इतिहास के मध्यकाल में कबीर और नज़ीर अकबराबादी का अपना-अपना पृथक् स्थान है। यद्यपि कबीर और नज़ीर अकबराबादी के समय में काफी अंतराल है तथापि दोनों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में पर्याप्त समानताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। कबीर के व्यक्तित्व में सरलता, सहजता, निस्पृहता, स्वाभिमान, धार्मिक सहिष्णुता, मानवीयता, एवं आस्था इत्यादि का जो समावेश देखने को मिलता है, वही नज़ीर अकबराबादी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में हमें देखने को मिलता है।

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    कबीर ने अपने समय में समाज को एक आदर्शात्मक रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, विसंगतियों, बाह्याचारों, अनाचारों का पुरजोर विरोध किया। समाज में जो वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था व्याप्त थी उसका भी डटकर विरोध किया उन्होंने जन्मगत जाति भेद, कुल, मर्यादा का भी विरोध किया। कबीर की दृष्टि में सभी मनुष्य एक समान हैं, उनमें कोई अंतर नहीं है। सभी जन्मजात एक जैसे हैं, न कोई छोटा है न कोई बड़ा, न कोई ब्राह्मण है और न ही कोई शूद्र है। उनका मानना है कि सब एक ही ईश्वर के बंदे हैं सबको उसी ने पैदा किया है। 

कबीर की ही भाँति नज़ीर अकबराबादी ने भी अपने काव्य में मानवता को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। वे भी मनुष्य, मनुष्य में अभेद मानने के पक्ष में हैं-

याँ आदमी नकीब हो बोले है बार-बार।

और आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवार।

हुक्का सुराही, जूतियाँ दौड़े बगल में मार।

काँधे पर रखके पालकी है दौड़ते कहार।

और उसमें जो पड़ा है सो है वह भी आदमी॥1


कबीर में सरलता एवं सहजता का पुट है। जहाँ एक ओर वे सामाजिक विडंबनाओं के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर वे एक सरल, मस्तमौला, फक्कड़ाना आचरण करते दिखाई देते हैं।

इसी प्रकार कविवर नज़ीर भी इधर-उधर भ्रमण करते हुए, सबको अपना बनाकर एवं अपने को सबका बनाकर चलते हैं। ककड़ी बेचने वाले, मेले, ठेले वाले के कहने पर कविता बना देते हैं। इसी तरह एक बार बाजार की गली में एक कोठे वाली (वैश्या) के कहने पर कि मियाँ कुछ हमारे लिए भी कह दो इसी पर नज़ीर का सरलता, सहजता एवं स्वाभाविकता देखिये-

लिखे हम ऐश की तख्ती पे किस तरह ऐ जाँ।

कलम जमीन पर, दवात कोठे पर॥2


कबीर ने समूचे समाज को सचेत करते हुये बताया कि एक दिन ऐसा आने वाला है, जब संसार की विविध प्रकार की ऐश्वर्यता, शालीनता, ठाठ-बाट सब यही पड़ा रह जायेगा और व्यक्ति इस संसार से विदा हो जाएगा-

एक दिन ऐसा होइगा, सब सूँ पड़े बिछोइ।

राजा राँणा छत्रपति, सावधान किन होइ॥3


कविवर नज़ीर ने भी अपने काव्य के माध्यम से लोगों को सतर्क रहने के उपदेश दिये कि अंतिम समय में कुछ भी शेष नहीं रहेगा केवल एक असीम, अमर, अजर सत्ता रहेगी जो शाश्वत है- सर्वशक्तिशाली है यथा-

दुनिया में कोई खास, न कोई आम रहेगा।

न साहिबे मकदूर, न नाकाम रहेगा।

जरदार न बेज़र न बद अंजाम रहेगा।

शादी न गमे गंर्दिशे अय्याम रहेगा।

आखिर वही अल्लाह का एक ना रहेगा।4


कबीर ने जीवन पर्यंत लोगों को धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया। उनका मंतव्य है कि हिंदू ओर मुसलमान दोनों पृथक्-पृथक नहीं है अपितु वे एक ईश्वर के बनाये हुये हैं

हिंदू मुये राम कहि, मुसलमान खुदाइ।

कहै कबीर सो जीवता, दुइ में कदैन जाइ॥5

कविवर नज़ीर के काव्य में हमें धार्मिक सहिष्णुता एवं समन्वयवादिता के दर्शन होते हैं। नज़ीर भी पारस्परिक द्वेष, कलह को समूलतः उखाड़ने के पक्ष में दृष्टिगत होते हैं।

झगड़ा न करे मिल्लतों मजहब का कोई याँ।

जिस राह में जो आन पड़े खुश रहे हर आँ।

जुन्नार गले हो या कि बगल बीच हो कुरआँ।

आशिक तो कलंदर है हिंदू न मुसलमाँ॥6


कबीर के संबंध में यह विचारणा कि वे अहंकारी थे, दंभी थे ऐसा नहीं है। हाँ यह बात अवश्य है कि समाज में विसंगतियों को देखकर वे तिलमिला जाते हैं और फिर उनके व्यंग्य बाण उनके मुख से प्रस्फुटित होने लगते हैं जिनमें कचोटने, कसकने की अपार सामर्थ्य होती है। परन्तु उस अर्थ में कबीर को अभिमानी मानना उनके साथ न्याय संगत नहीं होगा। हाँ उनके व्यक्तित्व में स्वाभिमान कूट कूट कर भरा हुआ है। वे अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए दूसरों के समक्ष हाथ नहीं  फैलाते अपितु स्वयं इतने स्वावलंबी है कि वे अन्य पर आश्रित नहीं होते वे दूसरों के सामने माँगने वालों को मृतवत मानते हैं यथा-

माँगना भरण समान है, विरला बंचे कोइ।

कहै कबीर रघुनाथ सूँ, मतिर मँगावें मोइ॥


कबीर की भाँति कविवर नज़ीर अकबराबादी ने जीवन भर किसी की दासता स्वीकृत नहीं की। यद्यपि नज़ीर का समय रीतिकालीन था, जिसमें, सुरा, सुंदरी का बोलबाला था। अधिकांश कवि राजा के आश्रय में रहकर अपना जीवन यापन करते थे किंतु नज़ीर को यह पसंद नहीं था। उनका स्वाभिमान इतना गिरा हुआ नहीं था। उन्होंने अपने स्वाभिमान को जीवंत बनाये रखा। ‘खुशामद‘ कविता में उनका स्वाभिमान देखने को मिलता है।

संसार नश्वर है। उसे एक दिन नष्ट होना है इस बात को कबीर भली भाँति जानते थे। इस बात से कबीर ने लोगों को अवगत भी कराया कि लोगों धन उतना ही एकत्र करो जो तुम्हारे कल्याणार्थ हो, अधिक धन संचित करने से कोई भी लाभ नहीं होने वाला। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो धन एकत्रित करके अपने सिर पर रखकर ले गया है। जैसा कबीर की साखी से स्पष्ट हैै

कबीर सो धन संचिए, जो आगे कूँ होइ।

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात ने देख्या कोइ॥


नज़ीर के काव्य में भी हमें कबीर की ही तरह आदर्शमयी संतोष वृत्ति दिखाई देती है-

नेमत मिठाई शीरी शक्कर नान उसी से माँग।

कौड़ी की हल्दी मिर्च भी हर आन उसी से माँग।

कम ख्वाब ताश गाड़ी गजी हाँ उसी से माँग।

जो तुझको चाहिए सो मेरी जाँ उसी से माँग।

गैर अज खुदा के किसमें कुदरत जो हाथ उठाये।

मकदूर क्या किसी का वही दे वही दिलाये॥


कबीर ने सादगीभरा जीवन व्यतीत किया। उनकी दृष्टि में विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन, स्त्री-सुख इत्यादि एक दिन सब कुछ समाप्त हो जायेगा। फिर तू अच्छे कर्म करने के लिये मात्र पश्चाताप ही करेगा-

नाना भोजन स्वाद दुख, नारी सेती रंग।

बेगि छाँड़ि पछताइगा, हबै है मूरति भंग॥


कविवर नज़ीर अकबराबादी ने भी ऐशो-इशरत अथवा भोग विलासी जीवन को निरर्थक सिद्ध करते हुए लोगों को सचेत किया है-

जो शाह कहाते है कोई उनसे यह पूछो।

दाराओ सिंकदर वह गये आह किधर को ।

मगरुर न हो शोकतो हशम पे वजीरों।

इस दौलतो इकबाल पे मत भूलों अमीरो।


निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कबीर और नज़ीर अकबराबादी का युग यद्यपि भिन्न-भिन्न है तथापि दोनों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में जो समानता दिखाई देती है। इससे यही विदित होता है कि जो महत्ता भक्तिकाल में कबीर की थी वही गरिमा नज़ीर की अपने समय में थी और आज भी हैै। दोनों ही कवि अपने समय के समाज से जुड़े हुए थे तभी तो उन्होंने अपने समय की विसंगतियों को अपने काव्य में उठाया है। इससे तो यही विदित होता है कि जो समस्याऐं चौदहवीं पंद्रहवीं शती में थी वहीं रीतिकाल यानि 17 वीं शती में भी बनी हुई थी। तभी तो कबीर की भाँति नजीर अकबराबादी को भी अपने समाज को सचेत करना पड़ा।


संदर्भ-

1- गुलजारे नज़ीर, पृष्ठ, 162, सलीम जाफर, हिंदुस्तानी ऐकेडमी, इलाहाबाद, 1951, पृष्ठख् 162।

2- संपादक राशुल हक उस्मानी, नज़ीर नामा, सुबूही पब्लिकेशन बल्लीमारान, दिल्ली, 1997, पृश्ठ 35.

3- संपादक, डा0 श्यामसुंदरदास, कबीर ग्रंथावाली, प्रकाशन संस्थान नई दिल्ली, संस्करण, 2014, पृष्ठ, 77

4- डॉ0 अब्दुल अलीम, नज़ीर अकबराबादी और उनकी विचारधारा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम और संस्करण, 1992 पृष्ठ 215.

5- सं0 डॉ0 श्यामसुंदरदास, कबीर ग्रंथावली, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण, 2014 पृष्ठ 106.

6- सलीम जाफ़र, गुलजोर नज़ीर, हिंदुस्तानी ऐकेडमी, इलाहाबाद, 1951, पृष्ठ, 151.

7- संपादक, डॉ0 श्यामसुंदरदास, कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ, 110.

8- संपादक, डॉ0 श्यामसुंदरदास, कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ, 88.

9- संपादक, प्रोफेसर नज़ीर मुहम्मद, नज़ीर गंथावली, हिंदी संस्थान, उत्तर प्रदेश, लखनऊ, पृष् 139.

10- संपादक, डा0 श्यामसुंदरदास क0ग्रं0, पृष्ठ, 93.

11- डॉ0 अब्दुल अलीम, नज़ीर अकबराबादी और उनकी विचारधारा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- प्रथम संस्करण 1992, पृष्ठ, 216.


डॉ. शमाँ

सहायक प्रोफेसर

डिपार्टमेन्ट हिन्दी

एस0एस0डी0 कन्या

महाविद्यालय डिबाई, बुलन्दशहर

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