गुरुवार, 1 जून 2017

संस्मरण : तुम बेसहारा हो तो, किसी का सहारा बनो / गीता दुबे

हम अंडमान की सैर पर निकले थे. अंडमान में स्टीमर बोट(फेरी) द्वारा सैलानियों को एक टापू से दूसरे टापू पर ले जाया जाता है. हम ‘रॉस आइलैंड’ स्टीमर बोट से जा रहे थे. हमारे बोट पर लगभग 20-22 सैलानी थे. बोट से उतरते समय एक हादसा हो गया, एक बुजुर्ग सैलानी जिनकी उम्र 65-70 के बीच रही होगी, उनका पैर बुरी तरह फिसल गया और वे गिर पड़े.हम सबने मिलकर उन्हें उठाया, देखा कि उनके दाहिने पैर की पिंडली में कांच गड़ जाने की वजह से काफी खून बह रहे थे. मैं यात्रा के दौरान हमेशा अपने पास ‘फर्स्ट ऐड किट’ रखती हूँ, मैंने उनकी मरहम पट्टी की, थोड़ी ही देर में खून का बहना थम गया और वे बुजुर्ग सामान्य हो गए.

  हम कुछ देर तक उनके साथ रहे, उनसे बातें करते रहे. मैंने पूछा आपके साथ कौन है? उनका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गई. उन्होंने बड़े ही सहज भाव से कहा, कोई नहीं मैं अकेले ही अंडमान की सैर करने निकला हूँ. मैंने कहा नहीं कोई तो होगा आपके साथ, इस उम्र में अकेले सैर के लिए निकला, जोखिम लेने जैसा है. इसपर उन्होंने कहा- ऐसा कुछ भी नहीं है, यह आपकी सोच पर निर्भर करता है, अकेले होने से कोई जोखिम लेना नहीं होता है. अब देखिए  मैं गिर पड़ा तो आपलोग मुझे मिल गए, आप न होते तो कोई और मिल जाता. लोग मिल जाते हैं, हम यूँ ही नकारात्मक सोच लिए दुनिया को दोष देते रहते हैं, अभी दुनिया इतनी खराब नहीं हुई है जितना कि लोग मानने लगे हैं.

अभी भी अच्छे लोगों की तादाद ज्यादा है, बुरे लोग भी समाज में हैं जरुर जो आपको हानि पहुँचा सकते हैं लेकिन उनकी संख्या बस मुट्ठी भर ही है, और मुट्ठी भर लोगों के लिए पूरे समाज को दोषी मानना  गलत है. उनसे बातें करते हमें अच्छा लगने लगा. हमने उनसे और कुछ उनके बारे में जानना चाहा. उन्होंने अपने बारे में कहा  कि मैं पेशे से डॉक्टर हूँ, कोलकाता में रहता हूँ, पत्नी नहीं रही, दो बेटे हैं, विदेश में सेटल हैं. उनका अपना संसार है, कभी कभार आते हैं.

मैं यहाँ खुश हूँ, घर के पास एक बस्ती है,उस बस्ती में ही मेरा एक क्लिनिक है, मैं बस्ती के लोगों का मुफ्त में इलाज करता हूँ, उन्हें दवाइयां देता हूँ, और बदले में वे मुझे जितना प्यार, मान सम्मान देते हैं उसे मैं उन्हें लौटा नहीं सकता. वे जितना मेरा ख्याल रखते हैं उतना घर वाले भी नहीं रख पाते. मुझे यदि एक खरोंच लग जाएतो पीड़ा उन्हें होती है, और क्या चाहिए इंसान को..

मैं क्या करता हूँ उनके लिए, बस उनका इलाज करता हूँ, थोड़ी बहुत उनकी मदद कर पाता हूँ, आज बस्ती के लोग ही मेरे जीने का सहारा हैं. अनुरोध फिल्म का वो गाना सुना है आपने.. तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो, अपने आप ही तुम्हें सहारा मिल जाएगा. उनकी बातें सुन मैं सोचती रही मैं जिसे अकेला जानकर असहाय और बेचारा समझ रही थी वह मुझे कितनी बड़ी सीख दे गया. 

गीता दुबे

जमशेदपुर,   झारखण्ड         

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