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शब्द संधान / समय समय की बात है / डा. सुरेन्द्र वर्मा

समय, काल, वक्त – कोई ऐसा नहीं जो इससे परिचित न हो। हम अपनी भाषा में “समय” शब्द का उपयोग वक्तन-फवक्तन करते ही रहते हैं। लेकिन यदि कोई हमसे समय या काल को परिभाषित करने के लिए कहे तो हम बगलें झांकने लगते हैं। बड़े बड़े दार्शनिकों और भौतिक-शास्त्रियों ने समय को समझाने और उसे परिभाषित करनी की कोशिश की लेकिन अभी तक कोई सहमति नहीं बन सकी। किसी ने समय की सत्ता पर ही संदेह किया तो किसी ने देश-काल को सापेक्ष बताकर देश और काल दोनों की ही स्वतन्त्र सत्ता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया। भारत में वैशेषिक दर्शन ने नौ द्रव्यों में से काल को छाता द्रव्य माना है। लेकिन समय, कैसे भी हम इसे परिभाषित क्यों न करें, हमारे रोजमर्रा के जीवन में भाषाई तौर पर बहुत महत्त्वपूर्ण है।

हमारे लिए समय एक अवसर है। इसे यदि हमने गँवा दिया तो फिर यह वापस आने वाला नहीं है। समय बड़ा बलवान है। उसे चूकना नहीं चाहिए, बल्कि उसका लाभ हमें उठाना चाहिए। तभी तो रहीम कहते हैं,

“समय लाभ सम लाभ नहिं समय चूक सम चूक

चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक !”

कहा गया है, समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी किसी को कुछ नहीं मिलता। पुन: रहीम को ही याद करते हुए कहता हूँ –

“समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात

सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछताय !”

आप कोई काम नहीं कर रहे हैं, तो आपके पास फुरसत है – समय है। आपका ‘समय आता है’ तो आपकी सफलता असंदिग्ध है। आप सौभाग्यशाली हैं। “समय प्रताप भानु कर जानी।” लेकिन समय हमेशा प्रतापी नहीं रहता। विपरीत समय भी आ सकता है। समय-विद्या (फलित ज्योतिष) वह शास्त्र है जो हमें विपरीत समय और अनुकूल समय के बारे में संकेत दे सकती है। मोटे तौर पर हमारे सभी कार्य समयोजित ही होते हैं, हम समयानुकूल ही, अवसरानुकूल ही काम करने का प्रयत्न करते हैं। फिर भी बहुत कम लोग हैं जो समय के पाबंद होते हैं, समय-निष्ठ होना एक सद्गुण माना गया है। परन्तु भारत में रेलगाड़ी तक अपनी ‘समय-सारणी’ के अनुसार नहीं चल पाती।

समय का एक पक्ष ‘अचानक’ है जो कभी कुछ भी दिखा सकता है। अचानक ही एक ऐसा समय आ जाता है की हम भौचक रह जाते हैं। सब कुछ अप्रत्याशित, अकल्पनीय घट जाता है।

समय का एक रूप ‘कवि-समय’ भी है। कवि-समय कवियों की वे मान्यताएं हैं जिनका कवि लोग प्राचीन काल से वर्णन करते चले आए हैं। स्त्री के पदाघात से अशोक का पुष्पित होना एक ऐसा ही ‘कवि-समय’ है।

समय कहें या काल, बात एक ही है। काल को हमने तीन भागों में विभाजित कर दिया है – भूत-काल, वर्तमान-काल और भविष्य। “काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होवेगी, बहुरि करेगा कब?” काल को प्रहरों में भी विभाजित किया गया है। प्रात:-काल, दोपहर, सांध्य-काल तथा रात्रि। काल घड़ी, घंटा, मिनट, सेकण्ड आदि, में भी विभक्त किया गया है। मौसम के भी अनेक काल हैं – वसंत काल, ग्रीष्म काल, वर्षा काल; तथा शरद, शिशिर और हेमंत काल। काल के ये सारे विभाजन, ज़ाहिर है, काल की निरंतर गति को बाँधने के प्रयत्न हैं, अन्यथा काल तो रुकता ही नहीं है, उसे बांधा ही नहीं जा सकता। भवभूति ने काल को ‘निरवधि’ कहा है। काल निरवधि है और पृथ्वी बड़ी है – कालो हि अयं निरवधि: विपुला च पृथ्वी।

शिव महाकाल हैं। शनि को भी काल कहा गया है। यह प्रारब्ध है। भागवत में काल मृत्य का वाचक है, हर प्राणी के जीवित रहने की एक निश्चित अवधि होती है, अंतत: उसका काल आ जाता है। काल मृत्यु है। कभी कभी जीवित व्यक्ति असमय ही काल का ग्रास बन जाता है। काल कलवित हो जाता है। किन्तु अधिकतर तो काल ‘दस्तक’ देकर ही आता है। हम भले ही उसकी दस्तक को, काल-संकेत को, समझ न पाएं। कुछ जघन्य अपराधी अपनी मौत नहीं मरते। उन्हें मौत की सज़ा दी जाती है। और जबतक फांसी नहीं लगती वे ‘काल-कोठारी’ में डाल दिए जाते हैं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १,सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद, २११००१

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