गुरुवार, 1 जून 2017

कहानी- ‘इंतज़ार’ / प्रमोद यादव

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मैडम को देखते ही न जाने क्यों ऐसा लगा कि शायद पहले भी कभी इस खूबसूरत चेहरे को कहीं देखा है..उन्हें नमस्ते किया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाकर अभिवादन का जवाब दिया फिर रिया का फ़ाइल देखते बोली-‘ महाराष्ट्र के किस शहर से बिलोंग करते है आप ?’

‘ जी..नागपुर से..मेरी बिटिया नागपुर यूनिवर्सिटी से एम.एस.सी.कर रही है..इनके सर ने प्रोजेक्ट के लिए आपके यहाँ का एड्रेस दिया है–चंडीगढ़ का..शायद चार महीने लगेंगे यहाँ..क्या आसपास बोर्डिंग की कोई व्यवस्था है मैडम ?’ मैंने जवाब के साथ सवाल भी किया.

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‘ हाँ..उसकी चिंता न करें..एकदम पास ही एक बिल्डिंग है..वहां बतौर पेईंग गेस्ट रहना होगा.. बहुत सारी लड़कियां रहती हैं वहां..किसी को आपके साथ भेज दूंगी..वैसे नागपुर के किस इलाके से हैं आप ?’

‘ जी..गोकुल पेठ से..’

‘गोकुल पेठ ? ‘ वह एकदम से चौंकते हुए बोली.

‘ आप जानती हैं मैडम ? ‘ मैंने धीरे से पूछा.

‘ हाँ....लगभग बीस-बाईस साल पहले नागपुर में चार-पांच महीने रही थी..अपने बड़े पापा के पास अभ्यंकर नगर में रहती थी पर नागपुर के पुराने इलाकों में भी अक्सर आना –जाना होता था..कभी बर्डी तो कभी गोकुल पेठ..कभी रामदास पेठ तो कभी तिलक नगर..गोकुल पेठ तो प्रायः जाती ही थी..’

‘ क्या कोई रिश्तेदार रहता था वहाँ ?’

‘ रिश्तेदार तो नहीं..पर कुछ फ्रेंड्स थे..इसलिए..’

‘ मुझे तो आपको देखते ही लगा था कि कहीं देखा है..इन बीस-बाईस सालों में आप ज्यादा कुछ नहीं बदली..अब याद आ गया कि कहाँ और किसके साथ देखा..जब भी आपको देखा ,बाइक में ही देखा है..’ कहना भर था कि उसके चहरे पर एक विचित्र भाव तैरने लगा..वह अकचका सी गई और तुरंत ही बात को बदलते हुए बोली-‘ चलिए..बातें तो होती ही रहेगी..पहले यहाँ फीस जमा कर रिया को सेटल कर आईये..वैसे अभी तो आप यहाँ रुकेंगे न ? ‘

‘ बस..कल भर ही मेम..परसों निकल जाऊँगा..रिया के रहने-खाने का सेट हो जाए तो काम ख़तम..’

‘ठीक है जोशीजी..ये मेरा कार्ड रखिये..आज रात का डिनर मेरे घर रहेगा..रिया आना चाहे तो उसे भी ले आईयेगा..मैं आपका इन्तजार करूंगी..’ उसने “रिया आना चाहे तो..” वाले वाक्य को कुछ इस अंदाज में बोली कि मैं समझ गया..

टैक्सी वाले ने सेक्टर-22 के पते पर उतारा तो सामने एक छोटे से सुन्दर काटेज के बाहर बने हरे-भरे लान पर वह पीले रंग की गाऊंन पहनी टहल रही थी..शायद मेरा ही इंतज़ार कर रही थी..देखते ही गर्मजोशी के साथ वह लपकी और स्वागत करती बोली- ‘ रिया नहीं आई ? ‘

‘ आपने तो उसके बगैर आने कहा था मैडम..अब इस उम्र में भी इतना न समझ सकूँ तो लानत है ऐसी उम्र को..चलिए छोडिये इन बातों को..आप बताइये और कौन-कौन है आपके घर में ? मैंने काटेज में घुसते हुए पूछा.

‘ कोई भी नहीं..अकेली रहती हूँ.. बस..एक लेडी सर्वेन्ट है जो सुबह-शाम नाश्ता-खाना आदि बना देती है..कपडे धो देती है..घर की साफ़–सफाई कर देती है..और रात नौ बजे अपने घर चली जाती है..आईये.. डायनिंग टेबल पर बैठते हैं.. खाना लगा हुआ है..’

शुद्ध पंजाबी खाने की खूशबू से महक रहा था डायनिंग हाल.. एक तंदूरी रोटी उठा राजमें की प्लेट की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि वह बोली-‘ हाँ..जोशीजी..आपने किसके साथ मुझे देखा था..’

‘ शायद रजत के साथ..गलत भी हो सकता हूँ..’ मैंने आहिस्ते से कहा.

‘ नहीं.. बिलकुल गलत नहीं..लेकिन आप उसे कैसे जानते हैं ? वह पूछ बैठी.

‘ अरे..अपने लंगोटिया यार को मैं नहीं जानूंगा तो भला और कौन जानेगा ? वो..मेरे साथ पढ़ा-लिखा..खेला-कूदा..हम दो जिस्म एक जान थे..हममें इतनी अंतरंगता थी कि एक दूसरे के सारे राज जानते..हमारे बीच कोई दुराव-छिपाव न था.. ’

‘ लेकिन उसने तो कभी मुझसे आपके बारे में कुछ नहीं बताया..’ वह हैरत से बोली.

‘ हाँ..और उसने भी कभी मुझे आपके बारे में नहीं बताया..इस बात का तो मुझे भी आश्चर्य हुआ ..वैसे जिन दिनों आप उसके साथ थी,मैं शहर से बाहर था..लेकिन कभी –कभार एकाध दिनों के लिए आता तो उसे आपके साथ इधर-उधर सरपट बाइक में भागते-दौड़ते देखता..सोचता कि इस बारे में पूछूँगा..किन्तु कभी वह पकडाया ही नहीं..’

‘ हाँ..उसे पकड़ना आसान न था..वह बहुत तेज भागता था..और एक दिन मेरी जिंदगी से वह ऐसे भागा कि बस.. उसे ढूँढती रह गई..एकाएक ही लापता हो गया..तीन महीने का ही उसका साथ था..और इस तीन महीनों में मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं कि कौन है उसके परिवार में ?..कौन उसके दोस्त हैं ?..और कहाँ रहता है वो ? बस हर दिन वह गोकुल पेठ में लक्ष्मी बाई गर्ल्स हाईस्कूल के पास बाइक लिए मिलता और मैं उसके साथ हो एक नई दुनिया में खो जाती..मैं तो सीधे-सीधे उसे शादी के लिए कहती थी लेकिन हर बार उसका जवाब होता- ‘ एक प्राब्लम है..वो साल्व हो जाए तो देखेंगे..’ कभी नहीं बताया कि आखिर प्राब्लम क्या है ? और एक दिन मेरी जिंदगी में प्राब्लम खड़ी कर वह गायब हो गया..मेरे पापा ने इस बीच मेरी शादी कर दी..पर शायद मेरे जीवन में सूनापन ही लिखा था कि शादी के दो महीने बाद ही एक एक्सीडेंट में वो मारे गए और मैं फिर तनहा हो गई..वैसे शादी करके भी तनहा ही थी..रजत को भुलाए न भूल पा रही थी..लेकिन मेरे जीवन की ये अबूझ पहेली आज भी अबूझ है कि एकाएक वो बेईमान आखिर मुझे छोड़ चला कहाँ गया ? ‘ एक सांस में वह वेदना और गुस्से के मिले-जुले स्वरों में बोल गई.

‘ क्या आप सचमुच नहीं जानती कि वो कहाँ गया ? ‘ मैंने संजीदगी से पूछा.

‘ अरे हाँ भई..झूठ क्यों बोलूंगी ? क्या आपको पता है वो कहाँ है ? ‘ उसने उलटे मुझे ही प्रश्न किया.

‘ हाँ..बिलकुल पता है..लंगोटिए यार को पता नहीं होगा तो और किसे होगा ? अब वो यहाँ रहता है... ‘ मैंने अपनी दाई हथेली अपने दिल पर रखते हुए कहा.

‘ नहीं....’ वो चीख सी पड़ी- ‘ ये क्या कह रहे हैं आप ?’

‘ ठीक कह रहा हूँ मैडम..वह कहीं लापता नहीं हुआ था..एकाएक उसे आनन्-फानन में मुंबई के के.ई.एम. हॉस्पिटल में दाखिल करना पड़ा था..वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था..डाक्टरों ने तो एलान कर दिया था कि केवल एक-डेढ़ महीने का मेहमान है..उसके दिल के दो वाल्व पूरी तरह डेमेज हो चुके थे और तीसरे पर भी असर होने लगा था..परिवार वाले भला उसे इस तरह आँखों के सामने मरते कैसे देखते ? सबने एडी-चोटी की जोर लगा ढेर सारे रूपये इकट्ठे किये और अमेरिका से दो आर्टिफिसियल वाल्व मंगाकर ओपरेट करवाने की सोचने लगे..मुंबई के डाक्टर तो तैयार थे पर उसके शरीर में आपरेशन के लायक खून भी न था..उन्हें डर था कि स्वास्थ्य आते तक वह जियेगा भी या नहीं ..चार दोस्तों ने वहाँ भर्ती होते ही खून दिया..इलाज शुरू हुआ..उसकी एक बहन जो दशकों पहले इंटरकास्ट मैरिज करने के कारण घर से हमेशा के लिए कट गई थी ,वहीँ मुंबई में रहती थी..उसने उसकी खूब सेवा-सुश्रुआ की..और धीरे-धीरे उसके स्वास्थ्य में सुधार दिखने लगा..एक महीने में वह इस लायक हो गया कि आपरेशन किया जा सके..’

‘ फिर क्या हुआ ? ’

‘ जैसे-जैसे वह स्वस्थ होता गया,उसका आत्म-विश्वास लौटता गया..वह मुझे चिट्ठियाँ भी भेजा करता...पहले की चिट्ठियों में अक्सर वह नहीं बच पाने का ही जिक्र करता..निराशा और दुःख-विषाद से सराबोर रहता था उसका पत्र..फिर कुछ दिनों बाद उसने कुछ ख़त जीने की ललक लिए लिखा..कहता- लगता है, अब मैं बच जाऊँगा यार..दो-तीन दिन के भीतर ही अमेरिका से वाल्व आनेवाला है.. फिर जल्द ही आपरेशन होगा..कुछ ही दिनों के बाद मैं तुम सबके बीच रहूँगा..’

‘ क्या उसने कभी मेरा जिक्र नहीं किया ? ‘ अचानक वह पूछ बैठी.

‘ नहीं..बिलकुल ही नहीं..मैं जरूर पूछना चाहता था तुम्हारे विषय में .पर इस डर से नहीं पूछा कि चिट्ठी वहां कोई और न पढ़ ले..और फिर कुछ निश्चिन्त भी हो गया था कि अब तो यार लौटेगा ही.. तभी पूछ लेंगे..’

‘ फिर ? ‘ वह थरथराते शब्दों से बोली.

‘ अमेरिका से दो वाल्व आ चुके थे..आपरेट करने का दिन भी तय हो गया था..सोमवार को होना था कि रविवार को एकाएक सब कुछ गड़बड़ा गया..नर्सिंग स्टाफ ने बताया कि अचानक ही वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि उसे तुरंत कापी-कलम दिया जाए..वह कुछ लिखना चाहता है..और पागलों की तरह वह अपने बदन में लगे तारों को नोचने-खसोटने लगा..नर्स इधर-उधर दौड़ने लगी..उसे मना करने लगी पर उसे तो जैसे पागलपन का भूत सवार था..वह शरीर में लगे सब तारों को फेंकने लगा..इसी बीच इत्तेफाक से उसकी बहन आ गई जो उस दिन उसके लिए उसकी फरमाईश का स्पेशल खाना लेकर आई थी..यह दृश्य देख वह भी घबरा गई..समझ ही नहीं आया कि क्या करे क्या न करे ? कोई डाक्टर भी मौजूद नहीं था..बहन को देखते ही वह कुछ बोलने को हुआ और मुंह खोला ही था कि जोरों की खून की उलटी हो गई..पूरा केबिन गहरे लाल रंग से सन गया..खून के छींटो से दीवाल तक रंग गए.. और वह कुछ ही सेकंडों में हमेशा-हमेशा के लिए शांत और स्थिर हो गया...’

मैडम सुबकने लगी थी..उसकी आँखों से अविरल आंसू बहने लगे..वह बुदबुदा रही थी.. ‘माफ़ करना रजत..तुम्हारे प्राब्लम को समझना दो दूर उलटे तुम्हें बेईमान,धोखेबाज ,दगाबाज और बेवफा समझ हर पल तुम्हे कोसती और गाली देती रही..प्लीज..मुझे माफ़ कर दो..’

‘ मैडम..अपने आपको सम्हालिए..मेरे कारण नाहक ही आपको दुःख पहुंचा है..माफ़ी चाहता हूँ..’

‘ नहीं..जोशी जी..आपने तो मेरे भीतर के हलचल को हमेशा के लिए शांत कर दिया है..अब चैन से रहूँगी..अब किसी का मुझे इन्तजार नहीं रहेगा..इन्तजार रहेगा तो सिर्फ मौत का..’ इतना कहते वह फफक पड़ी.

बड़ी मुश्किल से उसने मुझे विदा दी..उसकी इच्छा थी कि रात वहीं ठहर जाऊं..पर मुझे मालूम था..यह न उसके हित में ठीक होगा न मेरे हित में..पुराने दिनों को याद कर मेरा मन भी भारी हो चला था..मैं टैक्सी पकड़ रिया के पास लौट आया..उस रात नींद ही नहीं आई..

नागपूर आये तीन-चार दिन ही हुए थे कि एक दिन अचानक दोपहर को रिया का फोन आया- ‘पापा..मैं अपनी सहेली के साथ नागपुर लौट रही हूँ..तीन-चार दिनों के लिए इंस्टीट्यूट बंद है..हमारी मेम का अचानक निधन हो गया इसलिए..’

‘ क्या..? ‘ एकबारगी मैं चौंक गया, पूछा- ‘ कैसे हुआ ? कब हुआ ?’

‘ कैसे हुआ ये तो पता नहीं..बताते हैं कि सोये-सोये नींद में ही चल बसी..पी.एम. रिपोर्ट में साधारण मौत बताया गया है..’

‘ रिया..कब हुआ ये हादसा ? ‘ मैंने जिज्ञासा से पूछा.

‘ जी पापा.. सात नवम्बर मंगलवार की सुबह..’

रिया के “ सात नवम्बर मंगलवार “ कहते ही मुझे रजत का ख्याल आ गया..वो भी तो इसी दिन और इसी तारीख को गुजरा था... सात नवम्बर मंगलवार को..

’ उफ़...’ मेरे मुंह से निकला.

‘क्या हुआ पापा..?’ रिया उधर से पूछने लगी..

‘ कुछ नहीं बेटा..कुछ नहीं..सुबह तुम्हें लेने आऊंगा..फोन करना..’ और मैंने फोन काट दी.

फोन काटने के बाद भी रिया के शब्द कानों में गूँज रहे थे..” सात नवम्बर मंगलवार..”

मुझे लगा कि उस दिन उसके पास रूक जाता तो शायद वह बच जाती..एक अपराध-बोध मुझ पर हावी होने लगा..मैंने आँखें भींच ली..बंद आँखों में भी कभी मैडम दिखती तो कभी रजत..

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प्रमोद यादव

गयानगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

E mail-ptamodyadav1952@gmail.com

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