व्यंग्य : फेल, पास, फर्स्ट क्लास और टॉपर्स / शेफाली पाण्डे

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आज नंबरों की इस आपा - धापी के बीच अगर मुझे अपना ज़माना याद आ रहा है तो बच्चे मेरी हंसी उड़ाने लग जा रहे हैं | उस ज़माने में फर्स्ट आना ही मुश्क...

आज नंबरों की इस आपा - धापी के बीच अगर मुझे अपना ज़माना याद आ रहा है तो बच्चे मेरी हंसी उड़ाने लग जा रहे हैं | उस ज़माने में फर्स्ट आना ही मुश्किल होता था और नब्बे प्रतिशत अंक तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे | पर मेरा ज़माना इन अर्थों में अलग था कि कोई बच्चा कम नंबर आने या फेल होने की वजह से समाज में नीचा या ऊंचा नहीं सिद्ध होता था |

मेरे ज़माने में फर्स्ट आने वाले को दूसरे ग्रह का प्राणी मान लिया जाता था | फर्स्ट के घर कोई एक आध ही बधाई देने जाता था | अधिकतर लोग रास्ते चलते ही 'बधाई' उछाल देते थे |

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सेकण्ड या थर्ड वाले गठबंधन वाली सरकार की तरह मिल - जुल कर रहते थे | थर्ड वाला भी कम सम्माननीय नहीं होता था, शान से कहता था '' दो - दो बॉडीगार्ड मिले हैं अगल - बगल | फर्स्ट का क्या है कोई इधर से पिचकाएगा तो कोई उधर से'' | 

बच्चों को आजकल की तरह नंबरों से कोई नहीं तोलता था कि, 'वह देखो उसके 89 % हैं या उसके 92 %आए हैं | बस ' पास हो गए' कह देने भर से ही काम बन जाता था | पूछने वाला समझ जाता था कि फर्स्ट डिवीज़न विथ टू बॉडीगार्ड मिले होंगे | सेकेण्ड आने वाला ज़रूर इत्तिला देता था, 'मैं सेकण्ड आया हूँ''| पचपन प्रतिशत वाला गर्व से सर उठाए कहता था '' गुड़ सेकेण्ड आई है, एक नंबर से फर्स्ट क्लास रुक गई''|  

पूरा मोहल्ला फेल होने वाले को सांत्वना देने आता था | तब लगता था कि फेल होना कितना कठिन काम है | फर्स्ट आने वालों को तो आता ही होगा | वो बिना पढ़े ही फर्स्ट आ जाते होंगे | लेकिन फेल होने वाला, फेल होने के लिए बहुत मेहनत करता होगा | फेल होने वाला भी शान से बताता था, ''बस एक ही नंबर से रह गया'' | अधिकतर फेल होने एक ही नंबर से फेल होते थे |

एक नंबर हमारे समय का महत्वपूर्ण नंबर हुआ करता था |

हमारे समय में फेल होने वाले के लिए बहुत सुविधा थी | घरवाले ढाल बन जाते थे | रिश्तेदार मरहम होते थे | पड़ोसी कवच का कार्य करते थे | 

फेल होने वाले बच्चों की माएँ मिल - जुलकर दुःख साझा करती थीं |

पहली माँ - ''आजकल तो रट के आ जाती है फर्स्ट क्लास | हमारा मुन्ना रट नहीं सकता इसीलिए रह गया | रटना भी किस काम का हुआ जब समझ में ही नहीं आ रहा है | रटने वाला तो तोता होता है | हमारा मुन्ना पाठ को अच्छी तरह समझने में यकीन रखता है | वैसे इंटेलीजेंट तो बहुत है हमारा मुन्ना | बस मेहनत ही नहीं करता | ज़रा मेहनत कर लेता तो सीधे टॉप करता | कौन सी बड़ी बात है टॉप करना''|

''हाँ हाँ बहिन! तुम बिलकुल सही कह रही हो | जिसको देखो उसके ही ढेर सारे नंबर आ जा रहे हैं | भला यह भी क्या बात हुई ? नंबर न हुए मुफ्त का माल हो गया | हमारे ज़माने में तो दस - दस साल तक फर्स्ट क्लास नहीं आती थी किसी की | सेकेण्ड आने वाले को ही फर्स्ट की जैसी इज़्ज़त मिलती थी''|

दूसरी माँ - ''नक़ल हो रही थी खुलेआम |  हमारे मुन्ना ने बताया | मुन्ना सीधा - साधा हुआ | नक़ल नहीं करूँगा कहा उसने चाहे फेल हो जाऊं |

प्रेक्टिकल में भी कम नंबर दिए टीचर ने | थियोरी में तो फुल थे | मुन्ने से चिढ़ता था टीचर | ट्यूशन नहीं पढ़ा इसीलिए कम नंबर दिए''|

''सही कहती हो बहिन ! नक़ल का सहारा कब तक लेंगे | इस साल नहीं तो अगले साल लुढ़क जाएंगे | ऊपर वाला कहीं न कहीं हिसाब बराबर कर ही देता है'' |

सारी माएं ऊपर की ओर देखने लगती थीं | ऊपर वाला निश्चित रूप से इतनी जोड़ी आँखों को अपनी ओर ताकता देखकर डर जाता होगा कि अभी तो हिसाब - किताब का पिछला बैकलॉग ही नहीं निपटा और नया काम आ गया | 

तीसरी माँ - ''अपना मुन्ना तो ऐन एग्जाम के समय बीमार पड़ गया था | उसकी बचपन से ही किस्मत खराब हुई | मैंने तो मना भी किया कि मत देने जा पेपर | माना ही नहीं | अरे ! तबीयत ज़्यादा ज़रूरी है कि एग्जाम | लड़खड़ाते हुए एग्जाम देने गया | दो जनों ने इसे पकड़ा और कुर्सी पर बैठाया | अब ऐसे में क्या पास होता ? हमने भी कहा '' कम से कम एग्जाम तो देने की हिम्मत तो की तूने | हमारे लिए तो यही बहुत बड़ी बात है | हमारा मुन्ना तो चलो बीमार हो गया था लेकिन मार्किन इतनी हार्ड हुई कि मुन्ना के आगे पीछे की सारी लाइन गायब है | सब लुढ़क गए | मुन्ना बता रहा था कि क्लास का सबसे होशियार लड़का, सब जवाब देने वाला भी फेल हो गया ''| 

'' शर्म की बात है बहिन ! मार्किंग करने वालों के अपने बच्चे नहीं होते होंगे क्या जो दूसरों के बच्चों को ऐसे फेल कर दिया''|

चौथी माँ - ''हमारे जेठ की साली का लड़का है बहुत्ती होशियार | बचपन से टॉपर | नौकरी लगी विदेश चला गया | ऐसा हाई - फाई हो गया की माँ - बाप को ही नहीं पूछता | शक्ल भी नहीं दिखाता | फोन भी बहुत मुश्किल से करता है | कहता है काम बहुत है | कम्पनी ने बांड भरवा रखा है कि इतने साल तक यहीं रहना है | मैं तो कहती हूँ कि बच्चों को ज़्यादा अक्लमंद नहीं होने चाहिए | बेवकूफ बच्चा सदा माँ - बाप के साथ रहता है | बुढ़ापे में सेवा करता है | अपना राजू दो बार और फेल हो जाए तो परचून की दुकान खुलवा देंगे उसके लिए | जब मन चाहे बैठे | किसी की धौंस नहीं है कि मन हो न हो काम करना ज़रूरी है |

''बिलकुल सही कह रही हो बहिन | क्या चाहिए हो रहा फिर ऐसा होशियार लड़का | इससे तो अपना बेवकूफ ही भला '' | 

पांचवी माँ -- ये जो मेरा चचेरा देवर है ना ! पता है... यह हाईस्कूल में तीन बार फेल हुआ था | आज कितना बड़ा अफसर बन चुका है, और मेरी जेठानी का छोटा भाई है न वह तो लगातार हर साल हर क्लास में दो - दो साल फेल होता था | रिकॉर्ड हुआ उसका | आज कितना सफल बिज़नसमैन है | इससे भी बड़ा एक और उदाहरण है | मेरे हसबैंड के साथ स्कूल में एक बहुत ही होशियार लड़का होता था | फर्स्ट से नीचे कुछ आता ही नहीं था | आज वह उसी बैंक में कैशियर है जहाँ मेरे हसबैंड रोज़ हज़ारों रुपया जमा करने जाते हैं | बेचारा उन्हें देख कर खिसिया जाता है''|

छठी माँ --बहुत होशियार बच्चों को बाद में डिप्रेशन हो जाता है | बच्चों को ज़्यादा बुद्धिमान नहीं होना चाहिए | याद है न हमारे पड़ोस वाले गिरजा कक्का का सुरेश ! हमेशा हर क्लास में टॉप करता था | बाद में किसी कम्पटीशन में नहीं निकला तो डिप्रेशन में आ गया | मानसिक अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | बाद में कुछ ठीक हुआ तो घर ले आए लेकिन वह घर से भी भाग गया | बीस साल हो गए अभी तक न अता न पता | अब क्या करना हुआ ऐसे टॉपर का ? बताओ तो |

'आग लगे ऐसी फर्स्ट क्लास'' |

सातवीं माँ एक फेल लड़की की --''फर्स्ट आए चाहे थर्ड, पकानी सबको रोटियां ही हैं | वैसे भी ज़्यादा होशियार या फर्स्ट आने वाली लड़की ससुराल में हमेशा दुखी रहती है | फेल होने वाली बुद्धू लड़कियां ठाठ करती हैं पति उनकी मुट्ठी में रहता है | सास चूं नहीं करती | ममता को ही देख लो तिवारी जी की, तीन बार में पास हुई हाईस्कूल में | आज देखो ! क्या मज़े से कट रही है | हर महीने नया ज़ेवर खरीदती है और नई साड़ी खरीदती है | अरे ! लड़कियों को तो घर के काम में एक्सपर्ट होना चाहिए'' |

''ससुराल में जो पूछ रहा फर्स्ट क्लास को ''|

''ही ही ही ही'' 

''हा हा हा हा''

''हो हो हो हो''

''खी खी खी खी''


सारी माओं की समवेत हंसी चारों ओर घुल जाया करती थी  |

मोहल्ले के फेल हुए सारे बच्चों की माएँ मिलकर निम्न बिंदुओं पर सहमति की मोहर लगाती थीं -----

'कोई बात नहीं | इस साल रह गया तो अगले साल पास हो जाएगा' | 

'जो होता है अच्छे के लिए होता है | इस साल इसीलिए फेल हुआ होगा ताकि अगले साल फर्स्ट आ पाए' |


'पास - फेल तो लगा ही रहता है'| 

'ज़िंदगी के इम्तहान में फेल नहीं होना चाहिए' |

'फर्स्ट डिवीज़न को चाटना हो रहा क्या ? पास हो जाना चाहिए' |

'सभी पास हो जाएंगे तो फेल कौन होगा' ?

'फर्स्ट आने से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है अच्छा इंसान बनना' |

'फर्स्ट आने वाले या टॉप करने वाले कम्पटीशन में नहीं निकल पाते हैं' |

'जो बचपन में बहुत होशियार होता है बाद में गधा हो जाता है'

'जो शुरू में गधे होते हैं बाद में सफलता के झंडे गाड़ देते हैं'|  

'फर्स्ट आने वाले का मन जल्दी ही पढ़ाई से ऊब जाता है' |

'कौन पूछता है बाद में फर्स्ट आया था कि थर्ड' |

'फर्स्ट आने वाले कौन सा कद्दू में तीर मार देते हैं' ?


माओं की ऐसी बातें सुनकर, आत्महत्या किस चिड़िया का नाम होता है तब के समय में कोई बच्चा नहीं जानता था |

(शेफाली पाण्डे के ब्लॉग से साभार)

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रचनाकार: व्यंग्य : फेल, पास, फर्स्ट क्लास और टॉपर्स / शेफाली पाण्डे
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