रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

प्राची // जून 2017 // पुस्तक समीक्षाएँ

समीक्षा

सामाजिक विसंगतियों का दस्तावेज है ‘प्रभु का हिलाया पत्ता’

राजेन्द्र कुमार

दिनेश बैस तीन दशक से अधिक समय से व्यंग लिख रहे हैं. ‘दैनिक जागरण’ झाँसी, ‘प्राची’ मासिक जबलपुर से उनके व्यंग नियमित प्रकाशित हो रहे हैं. कुछ सामूहिक व्यंग-संग्रहों में भी उनके व्यंग लेख प्रकाशित हुये हैं.‘प्रभु का हिलाया पत्ता’ उनका पहला व्यंग-संग्रह है. संग्रह में कुल अठारह व्यंग संग्रहीत हैं.

‘कमरा मुक्त विद्यालय’ ग्रामीण शिक्षा का जीवंत दस्तावेज है, जिसमें राजनैतिक हनक और दबंगई के चलते प्रधान सरकारी भवन पर कब्जा करता है और अपने जर्जर मकान में विद्यालय धकेल देता है. आजादी के इतने वषरें बाद जो हमें कचोटता है, वह, सरकार तथा व्यवस्था को सहज स्वीकारने की मानसिकता है. इस व्यंग-लेख को यथार्थपरक् व्यंग रचना माना जा सकता है.

‘मेकअप के साइड इफैक्ट्स’ आधुनिक जीवन शैली और उपभोक्तावादी संस्कृति पर करारा तमाचा है. जो नहीं है, वह दिखाया जा रहा है और जो है, वह अदर्शनीय है.

[ads-post]

‘कुछ भी करूंगा जानू का रिवाज’ फिल्म-जगत की नायिका के जीरो फिगर और गर्ल-फ्रैंड के लिये कुछ भी कर डालने के कथ्य पर आधारित व्यंग है. बताया गया है कि गर्ल-फ्रैंड के लिये नवयुवक कुछ भी कर सकते हैं.

‘भक्तों के कंधों का परित्याग’ आधुनिक आध्यात्मिक गुरु घंटालों के द्वारा शारीरिक शोषण की कथा-व्यथा है. जिसमें धर्म की चाशनी में लपेट कर ब्रेन-वाश का वाजीकरण दर्शाया गया है.

‘जुकरबर्ग की तलाश में’ किन-किन रास्तों, गलियों, नालियों से गुजरना होता है और फेसबुक लाइक्स आदि कैसे खलनायकों को नायक बनाते हैं का संकेत करता, उम्दा व्यंग है.

‘मेन वर्क साइड वर्क’ संग्रह का सबसे अच्छा व्यंग है. इसका उल्लेख संग्रह के बैक-कवर पेज पर भी किया गया है. जबकि ‘प्रभु का हिलाया पत्ता’ संग्रह का शीर्षक व्यंग है. ‘वैलेन्टाइन डे बनाम रक्षा-बंधन’ भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण एवं देशी संस्कृति पर आधारित व्यंग रचना है.

‘श्रध्दांजलि समारोह के मुख्य अतिथि’ मानवीय वृत्तियों और लालसाओं पर आधारित व्यंग रचना है. करनी और कथनी के भेद का चित्रण किया गया है.

‘जब वे मायूस हुये’ देश-भक्ति का चोला ओढ़ कर जमाखोरी, मिलावट और कालाबाजारी के कारोबार पर आधारित व्यंग है. ‘कवि सम्मेलन के अध्यक्ष की योग्यता’, ‘भ्रष्ट आचरण निर्माण में पत्नी का योगदान’, ‘चोरों के काम में हस्तक्षेप नहीं’, ‘कृपाओं का कारोबार’, ‘ऊधो मन न भये दस बीस’, ‘हद तो यह हुई कि’, ‘ट्रकों की संस्कृति’, ‘सूखा था तो मुसीबत थी’ इत्यादि समस्या प्रधान व्यंग हैं.

दिनेश बैस घटना-परिघटना और चीजों को केवल ऊपरी तौर पर न देख कर, उनकी जड़ों में छिपे कारकों पर पकड़ रखते हैं. उनका पहला व्यंग-संग्रह पाठकों को निराश नहीं करता है. हाँ, संग्रह का आकार अर्थात व्यंग-रचनाओं की अधिकता पुस्तक को और रोचक बना सकती थी. व्यंग की भाषा, समझ, पकड़ और सम्प्रेषण में बैस को महारथ प्राप्त है.

पुस्तकः प्रभु का हिलाया पत्ता (व्यंग-संग्रह)

प्रकाशकः ए पी एन पब्लिकेशन,

डब्ल्यूजेड-87ए, स्ट्रीट नं. 4, हस्तसाल रोड,

उत्तम नगर, नई दिल्ली-110 009

मू. 120/- पृष्ठ-73

सम्पर्कः 282, राजीव नगर,

नगरा, झाँसी-284003

 

------------


समीक्षा

देह जुलाहा हो गई : दोहा संग्रह

सुनीता काम्बोज

पने शीर्षक की तरह बहुत प्रभावित करता है. संग्रह के सभी दोहे पढ़कर बहुत सुखद अनुभूति हुई. कवयित्री सुशीला जी की रचना शीलता अद्भुत है. वषरें बाद दोबारा कलम थाम कर उन्होंने जो कमाल कर दिखाया वह प्रेरणादायक व सरहानीय है. उन्होंने दोहा छंद में जीवन के अनेक आयामों को देखा है नीति दर्शन, सांस्कृतिक चेतना, देश प्रेम, प्राकृतिक सौन्दर्य, राजनीति, भक्ति रस पर उन्होंने बहुत शानदार दोहे रचे हैं. दोहों के प्रति सुशीला जी का समर्पण भाव देखकर लगता है कि यह दोहा संग्रह उन्हें साहित्य जगत में नई ऊँचाइयाँ प्रदान करेगा. संग्रह में अनेक विषयों पर दोहे लिखे गए हैं जो मन को मंत्रमुग्ध कर जाते हैं.

मंचों पर तुम ये कवि! महको बनकर फूल फूल.

कुसुमित शब्दों से हरो, मन से दुख के शूल.

वर्तमान युग में पथ से भटके कवि वर्ग को सही मार्ग अपनाने का संदेश देता ये दोहा थोड़े शब्दों में गहरा अर्थ सहेजे हुए है. कम शब्दों में बड़ी बात कहना ही दोहा छंद का चमत्कार है.

सर्व धर्म स्वभाव ही, भारत का पैगाम.

सबका मालिक एक है, भले अलग हैं नाम.

भारत सभी धमरें का सम्मान करता है, यही इस धरती के संस्कार हैं. कवयित्री भारत की पहचान को प्रस्तुत करने में सफल रही हैं.

लूले लंगड़े कायदे, अँधा है कानून.

घोटालों का राज है, सच भूखा दो जून.

वर्तमान राजनीति और कानून की दशा बहुत गम्भीर है. भ्रष्टाचार और घोटालों ने आम आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है. समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाते हुए उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की है.

बिन पानी बिन खाद के, कैसे पनपे बेल.

छूट गए रिश्ते सभी, खत्म हुआ सब खेल.

इस दोहे को पढ़कर यूँ लगा जैसे मन की पीड़ा उभर कर दोहे के रूप में अंकित हो गई है. रिश्तों का दिन प्रतिदिन गिरता मान-सम्मान एक दिन मानव की जिन्दगी वीरान कर देगा. गिरते मूल्यों को समेटने का कवयित्री का प्रयास अद्भुत है.

तेरी पीड़ा का यहाँ, कौन करे अहसास.

पत्थर के इस शहर में, कहाँ नमीं की आस.

शहर का अकेलापन मानव का चैन छीनता जा रहा है. इस दौड़ में किसी के पास भी एक दूसरे के लिए समय नहीं है. मनुष्य की उसी पीड़ा को यहाँ प्रकट किया गया है.

खून-पसीना एक कर, ऊँची दी तालीम.

बच्चे तो अफसर हुए, अब्बा हुए यतीम.

माँ बाप बच्चों के लिए अपना सारा जीवन निछावर कर देते हैं, परन्तु औलाद पढ़ लिख कर माँ बाप को ही बोझ समझने लगती है. कवयित्री ने समाज को दोहों के माध्यम से जो चेतावनी दी है अगर आज मानव ने उसे अनसुना कर दिया तो एक दिन सब संस्कार धमिल हो जाएँगे, फिर सिर्फ पछतावे के अलावा मनुष्य के पास कुछ शेष नहीं रहेगा.

चाँद बिना कटती नहीं, सीली सीली रात.

तारों से हो गुफ्तगू, आँखों से बरसात.

विरह का दर्द बहुत कष्टदायक होता है. जुदाई की रातें और दिन दोनों ही बेचैनी से भरे होते हैं. एक विरहन का दर्द बयाँ करते दोहे प्रीत के अनेक रंग दिखाते हैं.

जर्जर मेरी नाव है, भवँर कई मझधार.

मुझे भरोसा राम का, वो ही खेवनहार.

कवयित्री की आस्था का प्रतीक यह दोहा विश्वास की उर्जा से परिपूर्ण है. हर कठिन डगर आशा और विश्वास से पार की जा सकती है उनके दोहों में सूफियाना पैगाम है.

कवयित्री ने नारी के मन की पीड़ा को और बेटियों के प्रति समाज की मानसिकता को महसूस करके अपनी लेखनी से इस समाज को जगाने का सफल प्रयास किया है. कवयित्री सुशीला जी ने एक शिक्षक के रूप में समाज को नई दिशा प्रदान करने के उपरांत साहित्य समाज में भी बहुत प्रभावशाली आगमन किया है. माँ को समर्पित उनका ये संग्रह बधाई का पात्र है. दोहा-संसार में वे आस्था और विश्वास की नई परिभाषा अंकित करती हैं.

समीक्षक सम्पर्कः पत्नी श्री राजेश कुमार काम्बोज,

स्लाईट लोंगोवाल, मकान नं. 120, टाइप-3,

जिला- संगरूर, पंजाब-148106

-------------


समीक्षा

अंधेरे का मध्य बिंदु : उपन्यास

राकेश कुमार

वंदना गुप्ता का उपन्यास ‘अंधेरे का मध्य बिंदु’ यद्यपि रवि और शीना जैसे दो युगल जोड़ी के पात्रों के ताने-बाने से बुना हुआ लिव-इन-रिलेशनशिप पर केंद्रित करके लिखा गया है, तथापि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह एक तरह से आधुनिक दरकते विवाह संबंधों का एक लिखित दस्तावेज है.

विवाह परिवार का सदियों से आधार रहा है, किंतु विगत कुछ वषरें से युवाओं में विवाह के प्रति बढ़ती अनास्था ने लिव-इन रिलेशन जैसी नई व्यवस्था के प्रति नयी पीढ़ी का ध्यान आकृष्ट किया है. वंदना का पात्र रवि और शीना दोनों की ही सोच आधुनिक युवा पीढ़ी की सोच को प्रतिबिंबित करती है. विवाह के प्रस्ताव पर रवि अपने पिता के परंपरागत सोच को जब सिरे से खारिज करते हुये कहता है- मुझे इसमें विश्वास नहीं है कि एक अनजान के साथ सारी उम्र गुजार दो, फिर चाहे उसके तुम्हारे विचार उम्र भर मेल न खाएँ,’ तो हर युवा पीढ़ी अपने को इस सोच से स्वयं को इत्तफाक रखता प्रतीत होता है.

वंदना गुप्ता के उपन्यास की नायिका शीना आधुनिक युवतियों की इसी सोच को प्रतिबिंबित करते हुये कहती है- ‘मुझे तो शादी एक दकियानूसी ओढ़ा हुआ लिहाफ लगता है. वहाँ कोई स्वतन्त्रता नहीं, कोई अपनी जिन्दगी नहीं, कोई अपनी चाहत नहीं.’ दरअसल आज की स्त्री स्वाभिमानी है, उसे एक पुरुष से शृंगार, भोजन और वासना की पूर्ति मात्र नहीं, बल्कि उसके अलावा उसे सम्मान से जीने का हक भी चाहिये. वह सिर्फ एक भोग्या नहीं है, वह आज अपनी छवि को इससे इतर प्रस्तुत करना चाहती है और विवाह जैसी संस्था जब इसमें आड़े आती है तो उसे ठुकराते हुये लिव-इन जैसी नयी व्यवस्था को भी अपनाने में संकोच नहीं करती.

वंदना गुप्ता ने पूरे उपन्यास को स्त्री परिप्रेक्ष्य में दिखाने की चेष्टा की है, उन्होंने उन सभी बिन्दुओं पर विभिन्न स्त्री पात्रों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की है. चाहे वह शीला की कहानी हो या एडव्होकेट रमाकांत का नीता को दिया गया परामर्श. शीना के दुकान की कर्मचारी की बहन शीला की व्यथा चालीस पार अथवा उम्रदराज होती स्त्रियों की व्यथा है, जहां पुरुष अपनी वासना की तृप्ति के लिये उसकी इच्छाओं का सम्मान किये बिना पशुओं की तरह व्यवहार करता है. शीला अपने पति की व्यथा बताते हुये जब कहती है तो एकबारगी लगता है कि हर घर में एक औरत विवाह जैसी संस्था की सदस्या होने के बाद भी रोज अपने ही घर में बलात्कार की शिकार होती है.

वंदना गुप्ता इस पात्र की व्यथा के द्वारा अपने उपन्यास में पाठकों से यह प्रश्न पूछती प्रतीत होती हैं कि क्या यही विवाह का स्वरूप है? क्या इन शारीरिक संबंधों की जरूरतों में पत्नी की इच्छा का कोई मायने नहीं है? वंदना गुप्ता अपने पात्र शीला की व्यथा का वर्णन करते हुये जैसे विवाह और लिव-इन में अंतर बताना चाहती हैं. वे कदाचित् कहना चाहती हैं कि विवाह में एक पुरुष स्त्री के देह को समाज के समक्ष संपत्ति की तरह खरीद लेता है और उस पर आजीवन मालिकाना हक दिखाना चाहता है; जबकि लिव-इन में स्त्री अपने शरीर पर हक अंत तक कायम रखने में स्वयं को कामयाब हो तो पाती है, और यही कम से कम इसका उज्जवल पक्ष है.

वंदना गुप्ता ने अपने उपन्यास में इस धारणा को भी सिरे से खारिज करने की चेष्टा की है कि लिव-इन रिलेशनशिप दो अति कामुक विपरीत लिंगियों द्वारा एक अस्थायी संस्था के तले जीवन-यापन का एक माध्यम मात्र है. वंदना गुप्ता के उपन्यास का पात्र रवि कामुक नहीं है, वह वासना लोलुप भी नहीं है. जब रवि, शीना के साथ अपने रोमांच के क्षणों में उत्तेजना के उफान पर होता है, दोनों के बीच रोमांस की लहरें हिलोरें ले रही होती हैं, उसके धैर्य की सीमा पार्टी से लौटकर आने तक चरम पर पहुंच चुकी होती हैं, उस चरम आनंद के मध्य जब एक जोड़ा अपने वासनात्मक लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर होता है, तभी पड़ोस की सुरभि के बीमार पिता को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिये उन सुख के क्षणों का तत्क्षण परित्याग कर देना यह बताता है कि इस व्यवस्था को भी स्वीकारने वाले लोग, उसी तरह और उतने ही मानवीय होते हैं जितने विवाह जैसी संस्था को स्वीकारने वाले लोग, इसलिये समाज को उन्हें भी उतने ही सम्मानजनक नजरिये से देखना चाहिये.

वंदना गुप्ता ने पाठकों की ग्राह्यता, समस्याओं के चित्रण के मध्य उबाउपन से उबारने लिये रवि और शीना के मध्य कुछ रोमांस के पलों का भी सजीव चित्रण किया है, पढ़ते हुये दिलों की धड़कन में किसी वाद्ययंत्र सी ध्वनि का आभास होता है. पल भर को शरीर में एक सिहरन और कंपकपी सी गुदगुदाने वाला अहसास होने लगता है.

वंदना गुप्ता, लिव-इन रिलेशनशिप पर लिखी अपने इस उपन्यास में विवाह के मध्य आज के फंसते हुये पेंच की परतें खोलने का प्रयत्न करती हैं. वह पति-पत्नी के मध्य संबंधों में विश्वास और सम्मान को प्राथमिकता देते हुये जैसे कहना चाहती हैं कि एक स्त्री और पुरुष के मध्य यौन संबंधों को नियमित करने के लिये चाहे जिस संस्था का उपयोग किया जावे किंतु दोनों के मध्य आपसी सामंजस्य और एक स्पेस का होना नितांत आवश्यक है.

मेरा विचार है कि आज की युवा पीढ़ी को इस उपन्यास को वैवाहिक जीवन अथवा लिव-इन रिलेशनशिप की सदस्यता ग्रहण करने के पूर्व अथवा इसका सदस्य रहते हुये भी एक बार अवश्य पढ़ना चाहिये.

इस उपन्यास की सफलता के लिये मेरी अंनत शुभकामनायें.

उपन्यास : अंधेरे का मध्य बिंदु

लेखिका : श्रीमती वंदना गुप्ता

प्रकाशक : ए.पी.एन. पब्लिकेशन, नई दिल्ली

मूल्य : 140/- रुपये मात्र

समीक्षक सम्पर्क : प्रशासनिक कार्यालय, हिर्री डोलोमाईट माइंस, भिलाई इस्पात संयंत्र-495222, बिलासपुर (छ.ग.)

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget