प्राची // जून 2017 // पुस्तक समीक्षाएँ

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समीक्षा सामाजिक विसंगतियों का दस्तावेज है ‘प्रभु का हिलाया पत्ता’ राजेन्द्र कुमार दि नेश बैस तीन दशक से अधिक समय से व्यंग लिख रहे हैं. ‘दैन...

समीक्षा

सामाजिक विसंगतियों का दस्तावेज है ‘प्रभु का हिलाया पत्ता’

राजेन्द्र कुमार

दिनेश बैस तीन दशक से अधिक समय से व्यंग लिख रहे हैं. ‘दैनिक जागरण’ झाँसी, ‘प्राची’ मासिक जबलपुर से उनके व्यंग नियमित प्रकाशित हो रहे हैं. कुछ सामूहिक व्यंग-संग्रहों में भी उनके व्यंग लेख प्रकाशित हुये हैं.‘प्रभु का हिलाया पत्ता’ उनका पहला व्यंग-संग्रह है. संग्रह में कुल अठारह व्यंग संग्रहीत हैं.

‘कमरा मुक्त विद्यालय’ ग्रामीण शिक्षा का जीवंत दस्तावेज है, जिसमें राजनैतिक हनक और दबंगई के चलते प्रधान सरकारी भवन पर कब्जा करता है और अपने जर्जर मकान में विद्यालय धकेल देता है. आजादी के इतने वषरें बाद जो हमें कचोटता है, वह, सरकार तथा व्यवस्था को सहज स्वीकारने की मानसिकता है. इस व्यंग-लेख को यथार्थपरक् व्यंग रचना माना जा सकता है.

‘मेकअप के साइड इफैक्ट्स’ आधुनिक जीवन शैली और उपभोक्तावादी संस्कृति पर करारा तमाचा है. जो नहीं है, वह दिखाया जा रहा है और जो है, वह अदर्शनीय है.

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‘कुछ भी करूंगा जानू का रिवाज’ फिल्म-जगत की नायिका के जीरो फिगर और गर्ल-फ्रैंड के लिये कुछ भी कर डालने के कथ्य पर आधारित व्यंग है. बताया गया है कि गर्ल-फ्रैंड के लिये नवयुवक कुछ भी कर सकते हैं.

‘भक्तों के कंधों का परित्याग’ आधुनिक आध्यात्मिक गुरु घंटालों के द्वारा शारीरिक शोषण की कथा-व्यथा है. जिसमें धर्म की चाशनी में लपेट कर ब्रेन-वाश का वाजीकरण दर्शाया गया है.

‘जुकरबर्ग की तलाश में’ किन-किन रास्तों, गलियों, नालियों से गुजरना होता है और फेसबुक लाइक्स आदि कैसे खलनायकों को नायक बनाते हैं का संकेत करता, उम्दा व्यंग है.

‘मेन वर्क साइड वर्क’ संग्रह का सबसे अच्छा व्यंग है. इसका उल्लेख संग्रह के बैक-कवर पेज पर भी किया गया है. जबकि ‘प्रभु का हिलाया पत्ता’ संग्रह का शीर्षक व्यंग है. ‘वैलेन्टाइन डे बनाम रक्षा-बंधन’ भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण एवं देशी संस्कृति पर आधारित व्यंग रचना है.

‘श्रध्दांजलि समारोह के मुख्य अतिथि’ मानवीय वृत्तियों और लालसाओं पर आधारित व्यंग रचना है. करनी और कथनी के भेद का चित्रण किया गया है.

‘जब वे मायूस हुये’ देश-भक्ति का चोला ओढ़ कर जमाखोरी, मिलावट और कालाबाजारी के कारोबार पर आधारित व्यंग है. ‘कवि सम्मेलन के अध्यक्ष की योग्यता’, ‘भ्रष्ट आचरण निर्माण में पत्नी का योगदान’, ‘चोरों के काम में हस्तक्षेप नहीं’, ‘कृपाओं का कारोबार’, ‘ऊधो मन न भये दस बीस’, ‘हद तो यह हुई कि’, ‘ट्रकों की संस्कृति’, ‘सूखा था तो मुसीबत थी’ इत्यादि समस्या प्रधान व्यंग हैं.

दिनेश बैस घटना-परिघटना और चीजों को केवल ऊपरी तौर पर न देख कर, उनकी जड़ों में छिपे कारकों पर पकड़ रखते हैं. उनका पहला व्यंग-संग्रह पाठकों को निराश नहीं करता है. हाँ, संग्रह का आकार अर्थात व्यंग-रचनाओं की अधिकता पुस्तक को और रोचक बना सकती थी. व्यंग की भाषा, समझ, पकड़ और सम्प्रेषण में बैस को महारथ प्राप्त है.

पुस्तकः प्रभु का हिलाया पत्ता (व्यंग-संग्रह)

प्रकाशकः ए पी एन पब्लिकेशन,

डब्ल्यूजेड-87ए, स्ट्रीट नं. 4, हस्तसाल रोड,

उत्तम नगर, नई दिल्ली-110 009

मू. 120/- पृष्ठ-73

सम्पर्कः 282, राजीव नगर,

नगरा, झाँसी-284003

 

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समीक्षा

देह जुलाहा हो गई : दोहा संग्रह

सुनीता काम्बोज

पने शीर्षक की तरह बहुत प्रभावित करता है. संग्रह के सभी दोहे पढ़कर बहुत सुखद अनुभूति हुई. कवयित्री सुशीला जी की रचना शीलता अद्भुत है. वषरें बाद दोबारा कलम थाम कर उन्होंने जो कमाल कर दिखाया वह प्रेरणादायक व सरहानीय है. उन्होंने दोहा छंद में जीवन के अनेक आयामों को देखा है नीति दर्शन, सांस्कृतिक चेतना, देश प्रेम, प्राकृतिक सौन्दर्य, राजनीति, भक्ति रस पर उन्होंने बहुत शानदार दोहे रचे हैं. दोहों के प्रति सुशीला जी का समर्पण भाव देखकर लगता है कि यह दोहा संग्रह उन्हें साहित्य जगत में नई ऊँचाइयाँ प्रदान करेगा. संग्रह में अनेक विषयों पर दोहे लिखे गए हैं जो मन को मंत्रमुग्ध कर जाते हैं.

मंचों पर तुम ये कवि! महको बनकर फूल फूल.

कुसुमित शब्दों से हरो, मन से दुख के शूल.

वर्तमान युग में पथ से भटके कवि वर्ग को सही मार्ग अपनाने का संदेश देता ये दोहा थोड़े शब्दों में गहरा अर्थ सहेजे हुए है. कम शब्दों में बड़ी बात कहना ही दोहा छंद का चमत्कार है.

सर्व धर्म स्वभाव ही, भारत का पैगाम.

सबका मालिक एक है, भले अलग हैं नाम.

भारत सभी धमरें का सम्मान करता है, यही इस धरती के संस्कार हैं. कवयित्री भारत की पहचान को प्रस्तुत करने में सफल रही हैं.

लूले लंगड़े कायदे, अँधा है कानून.

घोटालों का राज है, सच भूखा दो जून.

वर्तमान राजनीति और कानून की दशा बहुत गम्भीर है. भ्रष्टाचार और घोटालों ने आम आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है. समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाते हुए उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की है.

बिन पानी बिन खाद के, कैसे पनपे बेल.

छूट गए रिश्ते सभी, खत्म हुआ सब खेल.

इस दोहे को पढ़कर यूँ लगा जैसे मन की पीड़ा उभर कर दोहे के रूप में अंकित हो गई है. रिश्तों का दिन प्रतिदिन गिरता मान-सम्मान एक दिन मानव की जिन्दगी वीरान कर देगा. गिरते मूल्यों को समेटने का कवयित्री का प्रयास अद्भुत है.

तेरी पीड़ा का यहाँ, कौन करे अहसास.

पत्थर के इस शहर में, कहाँ नमीं की आस.

शहर का अकेलापन मानव का चैन छीनता जा रहा है. इस दौड़ में किसी के पास भी एक दूसरे के लिए समय नहीं है. मनुष्य की उसी पीड़ा को यहाँ प्रकट किया गया है.

खून-पसीना एक कर, ऊँची दी तालीम.

बच्चे तो अफसर हुए, अब्बा हुए यतीम.

माँ बाप बच्चों के लिए अपना सारा जीवन निछावर कर देते हैं, परन्तु औलाद पढ़ लिख कर माँ बाप को ही बोझ समझने लगती है. कवयित्री ने समाज को दोहों के माध्यम से जो चेतावनी दी है अगर आज मानव ने उसे अनसुना कर दिया तो एक दिन सब संस्कार धमिल हो जाएँगे, फिर सिर्फ पछतावे के अलावा मनुष्य के पास कुछ शेष नहीं रहेगा.

चाँद बिना कटती नहीं, सीली सीली रात.

तारों से हो गुफ्तगू, आँखों से बरसात.

विरह का दर्द बहुत कष्टदायक होता है. जुदाई की रातें और दिन दोनों ही बेचैनी से भरे होते हैं. एक विरहन का दर्द बयाँ करते दोहे प्रीत के अनेक रंग दिखाते हैं.

जर्जर मेरी नाव है, भवँर कई मझधार.

मुझे भरोसा राम का, वो ही खेवनहार.

कवयित्री की आस्था का प्रतीक यह दोहा विश्वास की उर्जा से परिपूर्ण है. हर कठिन डगर आशा और विश्वास से पार की जा सकती है उनके दोहों में सूफियाना पैगाम है.

कवयित्री ने नारी के मन की पीड़ा को और बेटियों के प्रति समाज की मानसिकता को महसूस करके अपनी लेखनी से इस समाज को जगाने का सफल प्रयास किया है. कवयित्री सुशीला जी ने एक शिक्षक के रूप में समाज को नई दिशा प्रदान करने के उपरांत साहित्य समाज में भी बहुत प्रभावशाली आगमन किया है. माँ को समर्पित उनका ये संग्रह बधाई का पात्र है. दोहा-संसार में वे आस्था और विश्वास की नई परिभाषा अंकित करती हैं.

समीक्षक सम्पर्कः पत्नी श्री राजेश कुमार काम्बोज,

स्लाईट लोंगोवाल, मकान नं. 120, टाइप-3,

जिला- संगरूर, पंजाब-148106

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समीक्षा

अंधेरे का मध्य बिंदु : उपन्यास

राकेश कुमार

वंदना गुप्ता का उपन्यास ‘अंधेरे का मध्य बिंदु’ यद्यपि रवि और शीना जैसे दो युगल जोड़ी के पात्रों के ताने-बाने से बुना हुआ लिव-इन-रिलेशनशिप पर केंद्रित करके लिखा गया है, तथापि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह एक तरह से आधुनिक दरकते विवाह संबंधों का एक लिखित दस्तावेज है.

विवाह परिवार का सदियों से आधार रहा है, किंतु विगत कुछ वषरें से युवाओं में विवाह के प्रति बढ़ती अनास्था ने लिव-इन रिलेशन जैसी नई व्यवस्था के प्रति नयी पीढ़ी का ध्यान आकृष्ट किया है. वंदना का पात्र रवि और शीना दोनों की ही सोच आधुनिक युवा पीढ़ी की सोच को प्रतिबिंबित करती है. विवाह के प्रस्ताव पर रवि अपने पिता के परंपरागत सोच को जब सिरे से खारिज करते हुये कहता है- मुझे इसमें विश्वास नहीं है कि एक अनजान के साथ सारी उम्र गुजार दो, फिर चाहे उसके तुम्हारे विचार उम्र भर मेल न खाएँ,’ तो हर युवा पीढ़ी अपने को इस सोच से स्वयं को इत्तफाक रखता प्रतीत होता है.

वंदना गुप्ता के उपन्यास की नायिका शीना आधुनिक युवतियों की इसी सोच को प्रतिबिंबित करते हुये कहती है- ‘मुझे तो शादी एक दकियानूसी ओढ़ा हुआ लिहाफ लगता है. वहाँ कोई स्वतन्त्रता नहीं, कोई अपनी जिन्दगी नहीं, कोई अपनी चाहत नहीं.’ दरअसल आज की स्त्री स्वाभिमानी है, उसे एक पुरुष से शृंगार, भोजन और वासना की पूर्ति मात्र नहीं, बल्कि उसके अलावा उसे सम्मान से जीने का हक भी चाहिये. वह सिर्फ एक भोग्या नहीं है, वह आज अपनी छवि को इससे इतर प्रस्तुत करना चाहती है और विवाह जैसी संस्था जब इसमें आड़े आती है तो उसे ठुकराते हुये लिव-इन जैसी नयी व्यवस्था को भी अपनाने में संकोच नहीं करती.

वंदना गुप्ता ने पूरे उपन्यास को स्त्री परिप्रेक्ष्य में दिखाने की चेष्टा की है, उन्होंने उन सभी बिन्दुओं पर विभिन्न स्त्री पात्रों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की है. चाहे वह शीला की कहानी हो या एडव्होकेट रमाकांत का नीता को दिया गया परामर्श. शीना के दुकान की कर्मचारी की बहन शीला की व्यथा चालीस पार अथवा उम्रदराज होती स्त्रियों की व्यथा है, जहां पुरुष अपनी वासना की तृप्ति के लिये उसकी इच्छाओं का सम्मान किये बिना पशुओं की तरह व्यवहार करता है. शीला अपने पति की व्यथा बताते हुये जब कहती है तो एकबारगी लगता है कि हर घर में एक औरत विवाह जैसी संस्था की सदस्या होने के बाद भी रोज अपने ही घर में बलात्कार की शिकार होती है.

वंदना गुप्ता इस पात्र की व्यथा के द्वारा अपने उपन्यास में पाठकों से यह प्रश्न पूछती प्रतीत होती हैं कि क्या यही विवाह का स्वरूप है? क्या इन शारीरिक संबंधों की जरूरतों में पत्नी की इच्छा का कोई मायने नहीं है? वंदना गुप्ता अपने पात्र शीला की व्यथा का वर्णन करते हुये जैसे विवाह और लिव-इन में अंतर बताना चाहती हैं. वे कदाचित् कहना चाहती हैं कि विवाह में एक पुरुष स्त्री के देह को समाज के समक्ष संपत्ति की तरह खरीद लेता है और उस पर आजीवन मालिकाना हक दिखाना चाहता है; जबकि लिव-इन में स्त्री अपने शरीर पर हक अंत तक कायम रखने में स्वयं को कामयाब हो तो पाती है, और यही कम से कम इसका उज्जवल पक्ष है.

वंदना गुप्ता ने अपने उपन्यास में इस धारणा को भी सिरे से खारिज करने की चेष्टा की है कि लिव-इन रिलेशनशिप दो अति कामुक विपरीत लिंगियों द्वारा एक अस्थायी संस्था के तले जीवन-यापन का एक माध्यम मात्र है. वंदना गुप्ता के उपन्यास का पात्र रवि कामुक नहीं है, वह वासना लोलुप भी नहीं है. जब रवि, शीना के साथ अपने रोमांच के क्षणों में उत्तेजना के उफान पर होता है, दोनों के बीच रोमांस की लहरें हिलोरें ले रही होती हैं, उसके धैर्य की सीमा पार्टी से लौटकर आने तक चरम पर पहुंच चुकी होती हैं, उस चरम आनंद के मध्य जब एक जोड़ा अपने वासनात्मक लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर होता है, तभी पड़ोस की सुरभि के बीमार पिता को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिये उन सुख के क्षणों का तत्क्षण परित्याग कर देना यह बताता है कि इस व्यवस्था को भी स्वीकारने वाले लोग, उसी तरह और उतने ही मानवीय होते हैं जितने विवाह जैसी संस्था को स्वीकारने वाले लोग, इसलिये समाज को उन्हें भी उतने ही सम्मानजनक नजरिये से देखना चाहिये.

वंदना गुप्ता ने पाठकों की ग्राह्यता, समस्याओं के चित्रण के मध्य उबाउपन से उबारने लिये रवि और शीना के मध्य कुछ रोमांस के पलों का भी सजीव चित्रण किया है, पढ़ते हुये दिलों की धड़कन में किसी वाद्ययंत्र सी ध्वनि का आभास होता है. पल भर को शरीर में एक सिहरन और कंपकपी सी गुदगुदाने वाला अहसास होने लगता है.

वंदना गुप्ता, लिव-इन रिलेशनशिप पर लिखी अपने इस उपन्यास में विवाह के मध्य आज के फंसते हुये पेंच की परतें खोलने का प्रयत्न करती हैं. वह पति-पत्नी के मध्य संबंधों में विश्वास और सम्मान को प्राथमिकता देते हुये जैसे कहना चाहती हैं कि एक स्त्री और पुरुष के मध्य यौन संबंधों को नियमित करने के लिये चाहे जिस संस्था का उपयोग किया जावे किंतु दोनों के मध्य आपसी सामंजस्य और एक स्पेस का होना नितांत आवश्यक है.

मेरा विचार है कि आज की युवा पीढ़ी को इस उपन्यास को वैवाहिक जीवन अथवा लिव-इन रिलेशनशिप की सदस्यता ग्रहण करने के पूर्व अथवा इसका सदस्य रहते हुये भी एक बार अवश्य पढ़ना चाहिये.

इस उपन्यास की सफलता के लिये मेरी अंनत शुभकामनायें.

उपन्यास : अंधेरे का मध्य बिंदु

लेखिका : श्रीमती वंदना गुप्ता

प्रकाशक : ए.पी.एन. पब्लिकेशन, नई दिल्ली

मूल्य : 140/- रुपये मात्र

समीक्षक सम्पर्क : प्रशासनिक कार्यालय, हिर्री डोलोमाईट माइंस, भिलाई इस्पात संयंत्र-495222, बिलासपुर (छ.ग.)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: प्राची // जून 2017 // पुस्तक समीक्षाएँ
प्राची // जून 2017 // पुस्तक समीक्षाएँ
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