गुरुवार, 6 जुलाई 2017

जीवन एक अंतहीन यात्रा / / सुशील शर्मा

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जीवन एक महान कैनवास है, और आपको उसे विभिन्न रंगों से सजाना चाहिए।

- डैनी काये

मनुष्यों और पशु-पक्षियों की तुलना करते हुए शास्त्रकार ने लिखा है-”ज्ञानं हि तेषाँधिको विशेषः।” अर्थात् आहार-विहार, भय, निद्रा, कामेच्छा की दृष्टि से मनुष्य और पशु में कोई विशेष अन्तर नहीं पाया जाता ।पर मनुष्य में कुछ विशेषतायें इन प्राणियों से भिन्न हैं। उसकी रहन-सहन की रुचि, उचित-अनुचित का भय, भाषा-भाव आदि कितनी ही विशेषतायें यह सोचने को विवश करती हैं कि वह इस सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी है। उसकी रचना किसी उद्देश्य पर आधारित है।

वेद का मत है-”आरोहणमाक्रमण जीवतो जीवतोऽनम्” जीवन के लिए सबसे आवश्यक बात यह है कि उसे रुकना नहीं चाहिए। उन्नत होना और आगे बढ़ना जीवन का स्वाभाविक धर्म है। जीवन एक अंतहीन यात्रा है; बीज बीज की तरह बढ़ेगा; लेकिन इसे  पानी और पोषण चाहिए; इसे प्रेरित किया जाना चाहिए और हमेशा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जीवन को एक सबक के रूप में देखा जा सकता है; जीवन को एक परीक्षण के रूप में देखा जा सकता है; जीवन एक आशीर्वाद के रूप में देखा जा सकता है; इसलिए हमें अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए; फिर हमारे परिणामों को प्रस्फुटित होते देख हमारा जीवन आनंद से भर जाता है। संसार की प्रत्येक वस्तु में एक ही आध्यात्मिक प्राण-शक्ति परमात्मा,विद्यमान है। प्रकृति अपनी सम्पूर्ण पार्थिव शक्तियों के साथ निश्चित योजना के अनुसार जीवन का निर्माण करती हुई आगे बढ़ती दिखाई देती है। प्रकृति में न तो आलस्य है न स्तब्धता। मनुष्य की अन्तः प्रकृति भी यही चाहती है कि हम रुकें नहीं।

हमारा जीवन एक अंतहीन यात्रा है; यह एक व्यापक राजमार्ग की तरह है जो दूरी में अनन्त रूप से फैली हुई है। ध्यान का अभ्यास उस सड़क पर जाने के लिए एक वाहन प्रदान करता है। हमारी यात्रा में लगातार उतार-चढ़ाव होता है। यदि जीवन की यात्रा अंतहीन है, तो इसका लक्ष्य क्या है? इसका उत्तर है, यह हर जगह है हम एक महल में हैं, जिसका कोई अंत नहीं है, लेकिन हम जहाँ तक पहुंचे हैं। इसे तलाश कर पहुंचे और इसके साथ हमारे संबंधों को हम और अधिक  विस्तारित करके  इसे और अधिक से अधिक खोज का प्रयास कर रहे हैं। चीजें गलत हो जाती हैं और फिर ठीक हो जाएंगी,जीवन बीत  जाता है और ह्रदय टूट जाते हैं 'यही कारण है कि जीवन इतना वास्तविक है,लोग आते हैं और चले जाते हैं। हर दिन आप प्रगति कर सकते हैं। आपका हर कदम मंजिल की और बढ़ता है  फिर भी, आपके सामने एक लंबा-अंतहीन, मार्ग पड़ा है जिस पर आपको हमेशा चलते रहना है । आप जानते हैं कि आपकी इस  यात्रा का कब और कहाँ  अंत होगा लेकिन इस बात से आप हतोत्साहित नहीं होते बल्कि आप दूने उत्साह से इस अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ते हैं। जीवन हमें दुःख देता जीवन हमें दर्द देता है लेकिन अगर हम एक बार इनसे पार निकल गए तो जीवन हमें खुशियों का खजाना भी देता है। चलने का अर्थ है अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर उद्योग करना, विकास की ओर उन्मुख होना और एक ऐसा सुव्यवस्थित जीवन बिताना जिसमें प्राण हों, शक्ति हो और सामञ्जस्य हो। यह विकास सत्य का विकास हो, यह राह ज्ञान की राह हो तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि हमारे पाँव ठीक दिशा में बढ़ रहे हैं।  हम जो भी दिशा चुनते हैं; हमेशा ; सबक के रूप में हमारी दैनिक चुनौतियां हमारे पास हों , और जीवन में सकारात्मक रुख का क्रियान्वयन जीवन को आनन्दित करता है। मानव-जीवन की महत्ता इस पर है कि हम वर्तमान साधनों का उपयोग अंतर्दर्शन या आत्म-ज्ञान प्राप्ति के लिए करें। उद्देश्य का मार्ग बहुधा किसी विशिष्ट दिशा की ओर ही होता है। प्रकृति जिस ओर ले जाना चाहे उधर ही चलते रहें तो इन प्राप्त शक्तियों की सार्थकता कहाँ रही? जैसा जीवन दूसरे प्राणी जीते हैं वैसा ही हम भी जियें तो विचारशीलता का महत्व क्या रहा? बुद्धि की सूक्ष्मता, आध्यात्मिक अनुभूतियाँ, विराट की कल्पना आदि, ठीक वायुयान का मार्ग-दर्शन करने वाले कुतुबनुमा की सुई के समान है, जिससे मनुष्य चाहे तो अपना उद्देश्य पूरा करने का निर्देशन प्राप्त कर सकता है। उद्देश्य कभी श्रमहीन और मात्र साँसारिक नहीं हो सकते।

विचार श्रेष्ठ हों एवं कल्पनाएँ सुखद हों तो भी ऊर्जा न होने से ये पंखविहीन होकर फड़फड़ाने लगते हैं एवं अपने इर्द- गिर्द घूमते रहते हैं। ऊर्जा ही है जो इसे अपनी सीमित सीमाओं से निकालकर अनंत आसमान की ओर उछाल देती है। फिर वहाँ से विचार अपने समधर्मी विचारों के संग मिलकर पुष्ट होते हैं, बलशाली होते हैं एवं इन सकारात्मक विचारों का सघन बादल बन जाते हैं।

हम सब कुछ हासिल करने के लिए कुछ न कुछ कर रहे हैं।  कोई  डिग्री ले  रहा है, दूसरा नौकरी पाने के लिए दौड़ रहा है, किसी को  पदोन्नति पाने की इच्छा है। कोई साहित्य लिख रहा है ,कोई राजनीति कर रहा है  लेकिन वांछित चीजों को प्राप्त करने से पहले क्या  हमने कभी सोचा है कि इस प्राप्ति का वास्तविक परिणाम क्या होगा ? इसका उतर है लालच "। हम सभी को वांछित चीजें प्राप्त करने का  लालच है हालाँकि कुछ समय के लिए हमारे दिल की इच्छा संतुष्टि की होती है , लेकिन मन हमेशा अधिक मांगता है। अधिक पाने की चाह हमेशा हमारे मन में मौजूद होती है और मन व दिल के बीच यह लड़ाई जारी रहती है।

हम सभी  आत्मा हैं, ईश्वर की चेतना का एक विकसित दैवीय स्वरुप । हमारा जीवन धरती पर ईश्वर का  उपहार है। हमारे विचार और अनुभव इस धरती पर जीवन के प्रति और ईश्वर के प्रति हमारी समझ को बढ़ाते हैं। हमारी यही समझ जीवन में  दिव्य प्रेम, आंतरिक शांति, खुशी और सभी अर्थों के लिए अधिक अर्थपूर्ण अस्तित्व पाने की दिशा में एक अनोखा मार्ग प्रदान करती है और हमें जीवन के भीतर भगवान की तलाश करने के लिए प्रेरित करती है।

सकारात्मक विचार जीवन का आधारभूत मर्म है। इस मर्म में अनेक तथ्य सन्निहित हैं, जिनके प्रकटीकरण से जीवन सुरभित, सुगंधित एवं सौंदर्य से अभिमंडित हो जाता है। सकारात्मक विचार सौंदर्य का प्रतीक एवं पर्याय बन जाता है। सकारात्मक विचार जीवन को एक नया आधार प्रदान करने के साथ बहुआयामी विकास की राह खोलते हैं। इससे मन प्रकाशित हो उठता है और प्रकाशित मन के अंदर शंका, संदेह, भ्रम आदि की कोई गुंजाइश नहीं होती है।

मनुष्य जीवन में जो अधिकार एवं विशेषताएं प्राप्त हैं वह किसी विशेष प्रयोजन के लिये हैं। इतनी सहूलियत अन्य प्राणियों को नहीं मिली। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसको सुन्दर शरीर, विचार, विवेक, भाषा आदि के बहुमूल्य उपहार मिले हैं, इनकी सार्थकता तब है जब मनुष्य इनका सही उपयोग कर ले। मनुष्य देह जैसे अलभ्य अवसर प्राप्त करके भी यदि वह अपने पारमार्थिक लक्ष्य को पूरा नहीं करता तो उसे अन्य प्राणियों की ही कोटि का समझा जाना चाहिए। जन्म-जन्मान्तरों की थकान मिटाने के लिये यह बहुमूल्य अवसर है जब मनुष्य अपने प्राप्त ज्ञान और साधनों का उपभोग कर ईश्वर-प्राप्ति की चरम शान्ति-दायिनी स्थिति को प्राप्त कर सकता है।

जीवन को पिछले अनुभवों से  समझा जा सकता है; लेकिन यह आगे आगे रहने के लिए इसे सही तरीके से जीना आना चाहिए। चलते रहना, क्रियाशील बने रहना सृष्टि का सनातन नियम है। जहाँ रुके वहीं मौत है, वहीं जड़ता है। चलना जीवन का प्रतीक है, रुक जाना ही मृत्यु है।

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