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मेरे शहर में / आम – नाम ही काफी है / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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यूँ तो हमारा इलाहाबाद अमरुद के लिए मशहूर है, लेकिन मई से लेकर जुलाई तक यहाँ, देश के बाक़ी हिस्सों की तरह आम्र-ऋतु रहती है। आजकल आम का मौसम अपने शिखर पर है। लोग इन दिनों आम चूसते हैं, आम काट कर खाते हैं, आम का रस पीते हैं, आम की डकार लेते हैं और आम की बातें करते हैं।

हाल ही में यहाँ आम का दो-दिनी महोत्सव हुआ। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने इलाहाबादी आम पर अपना एक-तरफा निर्णय सुनाया। हुस्नआरा और मल्लिका पर उनकी नज़रें टिकी रहीं। अरुणिमा और आम्रपाली भी उपस्थित रहीं। एक ‘साहब पसंद’ आम भी था। वह भला साहब को पसंद कैसे न आता। आम यों तो नाज़ुक-बदन ही होते हैं, लेकिन ‘नाज़ुक बदन’ की त्वचा तो इतनी कोमल और पतली थी, छूते नहीं बनता था। ये सभी किरदार मूलत: मलिहाबाद की देन हैं किन्तु इन्हें स्थानीय चाका के बाग़ में तैयार किया गया है। वैसे भी आम का आकर्षण कम नहीं होता है, फिर उनके नाम अगर हुस्नआरा और मल्लिका जैसे हों तो क्या कहने ! चाका के डा. देवेन्द्र स्वरूप के बाग़ में कई देसी प्रजातियों के आम भी लगे हैं। इस महोत्सव में वे भी उपस्थित थे। यों प्रदर्शित तो कनाडा का ‘सेंसेशन’ और रूस का ‘प्राइड’ भी हुआ था, किन्तु मलीहाबाद की मोहतरमाओं के सामने वे पानी मांग गए थे।

आम महोत्सव का दूसरा दिन बच्चों के नाम रहा। ईदुलफित्र के दूसरे दिन टर के मेले में बच्चे धमाल कर ही चुके थे कि उन्हें एक और मौका मिल गया। सबके साथ आम खाने का मौक़ा। ‘आम खाओ प्रतियोगिता’ में स्कूल और कालेज के बच्चों ने बढ़ चढ़ के भाग लिया। सबसे कम समय में सबसे अधिक आम खाने वाले बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया। बड़े लोग ताकते ही रह गए। न आम मिला न पुरस्कार !

बसंत आते ही आम के बौर अपनी दिलकश महक से आम्र-फल की प्रतीक्षा करवाने लगते हैं। अमरूद अभी बहुत दूर है लेकिन आम बस आने ही वाला है, यही सोचकर इलाहाबाद बेसब्र होने लगता है। कब आम आएं और रसास्वादन हो। आखिर वो दिन भी आ ही जाता है कि आम-उत्सव, उत्सव नहीं महोत्सव, मनाया जाए और भिन्न भिन्न आमों के स्वाद और उनके नाम से परिचित हुआ जाए। स्वाद तो खैर सभी आमों का आम जैसा ही होता है लेकिन आम के नाम, जवाब नहीं ! आम इलाहाबाद में ही अपने खुश-नामों से नहीं जाना जाता दूसरी जगहों पर भी आम की अनेक किस्में और तरह तरह के नाम होते हैं। इलाहाबाद में ही सबसे पहले तो दक्षिण का ‘नीलम’ और ‘तोतापरी’ आम ही आता है। बेसब्र इलाहाबाद स्वाद तो खैर उनका भी लेता ही है, किन्तु जब तक ‘दशहरी’ और ‘लंगडा’ आम यहाँ नहीं आता, शहरियों का जी नहीं भरता। आप तो जानते ही हैं कि दशहरी का दशहरे से कोई सम्बन्ध नहीं होता और न ही लंगडा आम विकलांग होता है। इसी तरह ‘गुलाब ख़ास’ में गुलाब की गंध ढूँढ़ना भी निरर्थक है। हाँ ‘मालदा’ ज़रूर मोटा ताज़ा, माल से भरा हुआ होता हैं। ‘टिकारी’ बस कुछ दिनों का ही मेहमान होता है टिकता नहीं।

आम का नाम ज़रूर आम है लेकिन यह एक बहुत ही ख़ास फल है जिसे आम और ख़ास, सभी लोग बड़े चाव से खाते हैं। इलाहाबाद में इतनी मंहगाई के बावजूद भी आम आदमी भी आम का स्वाद ले लेता है। कोई ‘बेआम’ नहीं छूटता। जुलाई जाते जाते आम भी चला जाएगा, सोच कर ही अच्छा नहीं लगता। जहां जहां कद्र दां हैं, वहां वहां आम के मुरीद भी हैं। आम का नाम ही काफी है मुंह में पानी भर आने के लिए। आम तुझे सलाम !

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डॉ. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद – २११००१

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