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शब्द संधान // रंज की गुफ्तगू // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

दिलीप माली की कलाकृति

रंज की जब गुफ्तगू होने लगी

आप से तुम, तुम से तू होने लगी

मतलब साफ़ है। रंज या तकलीफ एक दूसरे को नज़दीक लाता हैं। बात करते समय तब कोई औपचारिकता नहीं रहती। हम सामान्यत: जिनसे औपचारिकता निभाते हैं अपने अपने रंजोगम को परस्पर सुनाते हुए अधिक आत्मीय हो जाते हैं। अज्ञेय ने एक बार कहा था दुःख मांजता है। कष्ट, क्लेश, गम, तकलीफ, दुःख और शोक, सब रंज के ही तो नाम हैं।

अपने परस्पर बरताव में हम रंज का कितनी ही तरह से इस्तेमाल करते हैं। हम रंज उठाते हैं, झेलते हैं। रंज देते हैं, पहुंचाते हैं। रंज जो हम तक पहुंचता है, उसे सहते हैं। हम रंज करते हैं और रंज होता तो है ही। और कभी कभी तो लगातार इतना होता है कि हम उसके आदी हो जाते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब कहते हैं –

रंज से खूगर हुआ इंसां तो मिट जाता है रंज

मुश्किलें मुझपर पडीं इतनी कि आसां हो गईं

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रंज है तो रंज पैदा करने वाला ‘रंजज़ा (रंजज़:)’ है. रंज उठाने वाला ‘रंजदीदा (रंजदीद:)’ भी है। जो ‘रंजीदा’ है, उसे ‘रंजीदगी’ है। रंजीदगी कहें या रंज, बात एक ही है। ‘रंजिश’ भी रंज से ही अक्सर पैदा होती है- रंजिश यानी नाराजी, अप्रसन्नता, या वैमनस्य। रंजिश हो जाने के अनेकानेक कारण हो सकते है, लेकिन कभी कभी अकारण भी रंजिश पाल ली जाती है और हम निरर्थक क्रोध करने लग जाते हैं। जी हाँ, इसी को तो कहते है, ‘रंजिशे बेजा’।

इंसान ने न जाने कितनी तरह के रंज पाल रखे हैं। किसी को बेटा न होने का रंज है तो किसी को बेटे का आवारा हो जाने का गम है। प्रेम की पीड़ा सबसे दुःखदाई है। प्रेम पीड़ा यानी, ‘रंजे उल्फत’।

रंजे उल्फत में भी हँस हँस के सहर करते हैं

हम हैं वह फूल जो काँटों में बसर करते हैं !

रंज ज्यादह्तर अकेला नहीं आता। ‘रंजोअलम’ या ‘रंजोगम’ साथ साथ आते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है, “ज़िंदगी की राहों में रंजोगम के मेले हैं।” ऐसे में लोग एक दूसरे के हमदर्द हो जाएं तो नामुमकिन नहीं। बात भले ही फिल्मी हो लेकिन गीत तो यही कहता है, “तुम अपने रंजोगम, अपनी परेशानी मुझे दे दो।”

‘रंज’ हिन्दी भाषा में ऐसा रच बस गया है कि हम यह भूल ही गए हैं कि यह शब्द मूलत: फारसी से हिन्दुस्तानी ज़बान में आया है। इसी रंज से ‘रंजक’ बना है। रंजक तोप या बंदूक की उस प्याली को कहते हैं जिसमे बारूद भरी जाती है। इसीलिए उर्दू में ‘रंजक’ शब्द तीखी या उत्तेजक-बात के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। खाने की तीखी वस्तु भी, जैसे चटपटा चूर्ण, भी रंजक ही है। यह ‘रंजक’ ज़ाहिर है शब्द, ‘रंज’ से ही बना है। लेकिन ठेठ हिन्दी का भी इक शब्द ‘रंजक’ है जिसका ‘रंज’ से दूर दूर तक कोई लेना- देना नहीं है।

हिन्दी शब्द,‘रंजक’ की व्युत्पत्ति और अर्थ बिलकुल फर्क है। रंजक हिन्दी में रंज देने वाला व्यक्ति नहीं है, जैसा की गलती से सोचा जा सकता है, बल्कि वह व्यक्ति है जो रंगता है। या रंगी जाने वाली वह वस्तु है, जैसे कपड़ा, जिसे रंगा जाता है। महिलाएं तीज-त्योहारों पर अपने हाथों और पैरों को मेंहदी, आलता आदि से रंगती हैं। अत: मेंहदी भी ‘रंजक’ कही गई है। ‘रंजक’ शब्द की व्युत्पत्ति इसप्रकार ‘रंग’ से हुई है न कि ‘रंज’ से। वह जो रंगता है, यानी रंगरेज़, तो ‘रंजक है ही, ‘रंजक’ वह भी है जो ‘रंजन’ करता है। मनोरंजक मन को प्रसन्न करने वाली वस्तु है। रंजनकारी साहित्य वह हल्का-फुल्का साहित्य है जो मन बहलाता है। रंज का अर्थ दुःख और तकलीफ है, रंजक वह है जो प्रसन्नता दे।

--

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद – २११००१

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रंज से रंजक तक का मनोरंजक सफर।बहुत अच्छा लगा।

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