रविवार, 20 अगस्त 2017

जैन धर्म का इतिहास - 2 // सिद्धांताचार्य श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री

भारतीय धर्म और अहिंसा

एक अध्ययन

नाभिपुत्र ऋषभ और ऋषभपुत्र भरत की चर्चा प्राय: सभी हिन्दू पुराणों में आती है। मार्कंडेय पु० अ० ९०, कर्म पु० अ०- ४१, आ० पु० अ० १०, वायुपुराण अ०-३३, गरुण पुराण अ० १, ब्रह्माण्ड पु अ० १४, वाराह पु० अ० ७४, लिंगपुराण अ० ४७, विष्णु पु० र०, अ० १ और स्कन्द पुराण वुभार खण्ड अ० ३७ में ऋषभदेव का वर्णन आता है। इन सभी में ऋषभ को नाभि और मरुदेवी का पुत्र कहा है। ऋषभ से सौ पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें से बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर ऋषभ ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इसी भरत से इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यथा-

नाभि स्त्बजनपत पुत्र मस्देव्यां महाद्युति:।

ऋषभ पार्थिव श्रेष्ठं सर्वेक्षत्रस्य पूर्वजम्।।

ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीर: पुत्रशतोशुज:।

सो5 भिषिच्यर्षभ: पुत्र महा प्रावाज्यमास्थित:।।

हिमाह्व' दक्षिणं वर्ष तस्य नाम्ना विंदुर्बुधी:।

उक्त श्लोक थोड़े से शाब्दभेद के साथ प्राय: उक्त सभी पुराणों में पाये जाते हैं। श्री मद्‌भागवत. में तो ऋषभावतार का पूरा वर्णन है, और उन्हीं के उपदेश से जैन धर्म की उत्पत्ति बतलाई है। यथा-

बर्हिषि तस्मिन्ने विष्णुदत्त भगवार परमर्षिभिः प्रसादितो नामे:

प्रियविकीर्षया तद वरोधावने मस्देज्या धर्मान् दर्शायेतुकाभौ

वातरशनाना श्रमणानाम षोणार्म्ध्वमन्धिंना शुक्क्लया

तनुवावततार '२०' स्व. पू. अ. ३१।

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उक्त कथन में बातरशन (नग्न) श्रमणों के धर्म से स्पष्ट ही जैन धर्म का अभिप्राय है क्योंकि आगे ऋषभदेव के उपदेश से ही आर्हत धर्म (जैन धर्म) की उत्पत्ति बतलाई है।

भारत के राष्ट्रपति और प्रसिद्ध दार्शनिक स्व० डल राधाकृष्णन् ने अपने भारतीय दर्शन के इतिहास (जि. प.- पृ १८७) में लिखा है- 'जैन परम्परा ऋषभदेव से अपने धर्म की उत्पत्ति का कथन करती है। जो बहुत सी शताब्दियों पूर्व हुए हैं। इस बात के प्रमाण पाये जाते हैं कि ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेवजी की पूजा होती थी। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जैनधर्म वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी पहले प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ, और अरिष्टनेमि इन तीन तीर्थंकरों के नाम आते हैं। भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता है कि ऋषभदेव जैनधर्म के संस्थापक थे।

भागवत्कार ने ऋषभदेवजी का जो वर्णन किया है वह जैन मान्यता के ही अनुरूप है। वह योगी थे। उन का योग कर्म सन्यास रूप था जन धर्म में कर्म सन्यास रूप योग की ही साधना की जाती है ऋषभदेव से लेकर महावीर पर्यन्त सभी तीर्थंकर योगी थे। मौर्यकाल से लेकर आज तक की सभी जैन मूर्तियाँ योगी के रूप में ही प्राप्त होती हैं।

योग की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। वैदिक आर्य उस में परिचित नहीं थे। किन्तु सिन्धु घाटी सम्यता योग से अछूती नहीं थी। योग शास्त्रों के अनुसार योग के लिये तीन वस्तुएँ आवश्यक हैं- आसन, मस्तक, ग्रीवा और धड् का सीधा रहना तथा अर्धनिमीलित नेत्र या नासाग्रदृष्टि। जैसा कि भगवद् गीता में भी कहा है -

सम कायशिरोगीवं धारय.:: चलास्थिर:।

संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्व दिशाश्चानवलोकयर।। ५-१३

स्व० श्री रामप्रसाद चन्दा के अनुसार मोहेन्जोदडों से प्राप्त पत्थर की मूर्ति, जिसे मि. मैके, पुजारी की मूर्ति बतलाते थे, योगी की मूर्ति है।

श्री चन्दा ने मार्डर्न रिव्यू जून १९३२ में एक लेख प्रकाशित कराया था। उस में उन्होंने भारतीय धर्मों में योग की स्थिति का चित्रण कर के लिखा है-सिन्धुघाटी से प्राप्त मोहरों पर बैठी अवस्था में अंकित देवताओं की मूर्तियाँ ही योग की मुद्रा में नहीं हैं किन्तु खड़ी अवस्था में अंकित मूर्तियाँ भी योग की कार्योत्सर्ग मुद्रा को बतलाती हैं। मथुरा म्यूजियम में दूसरी शती की कार्योत्सर्ग में स्थित एक वृषभदेव जिन की मूर्ति है, इस मूर्ति की शैली से सिन्धु से प्राप्त मोहरों पर अंकित खड़ी हुई देवमूर्तियों की शैली बिल्कुल मिलती है। ... ऋषभ या वृषभ का अर्थ होता है बैल और ऋषभदेव तीर्थंकर का चिह्न बैल है। मोहर नं० ३ से ५ तक के ऊपर अंकित देवमूर्तियों के साथ बैल भी अंकित है जो ऋषभ का पूर्वरूप हो सकता है। शैवधर्म और जैनधर्म जैसे दार्शनिक धर्मों के प्रारम्भ को पीछे ठेलकर ताम्रयुगीन काल में ले जाना किन्हीं को एक अवश्य ही साहस पूर्ण

देवताओं को पूजते थे। सिन्धुघाटी से प्राप्त मूर्तियों को देखते हुए यही अर्थ ठीक प्रमाणित होता है क्योंकि मोहेन्जोदड़ो से प्राप्त योगी की मूर्ति तो नग्न है ही, किन्तु जिसे शिवजी की मूर्ति माना जाता है उस में भी लिंग अंकित है। इस पर से यह अनुमान किया गया है कि मोहन्जोदड़ो के निवासियों में लिंग सहित शिव को पूजने की प्रथा थी।

मोहन्जोदड़ो की तरह हड़प्पा से प्राप्त मूर्तियाँ भी नग्न हैं जिन में से एक शिव की मूर्ति मानी गई है और दूसरी को भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन संयुक्त निर्देशक श्री टी० एन० रामचन्द्रन् ऋषभ तीर्थंकर की मूर्ति मानते हैं। उन्होंने भी अपने एक लेख में शिश्नदेव का अर्थ नंगे देवता किया है। इस तरह सिन्धु सभ्यता से प्राप्त नग्न मूर्तियों के प्रकाश में ऋगवेद के शिश्नदेवाः का अर्थ शिश्नयुत देव अर्थात नग्नदेव करना उचित प्रतीत होता है। जो उन के उपासक थे वे भी उससे लिये जा सकते हैं। यह अर्थ लिंगपूजकों में और लिंगयुत नग्नदेवों के पूजकों में समान रूप में घटित होता है।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अपने चिह्न लिंग पूजा को लिये हुए शिव निश्चय ही अन-आर्य देवता हैं। बाद में आर्यों के द्वारा उन्हें अपने देवताओं में सम्मिलित कर लिया गया। किन्तु लिंग पूजा का प्रचलन, आर्यों में बहुत काल के पश्चात हुआ है क्योंकि भाष्यकार पतंजलि ने अपने भाष्य में पूजा के लिये शिव की प्रतिकृति का निर्देश किया है शिव लिंग का नहीं। तथा चीनी यात्री हयुनत्सांग के यात्रा विवरण में शिव की मूर्ति का तो वर्णन है किन्तु लिंगपूजा का वर्णन नहीं मिलता। डा., भण्डारकर ने लिखा है कि उस समय में भी लिंगपूजा अज्ञात थी ऐसा लगता है, क्योंकि उस के सिक्के के दूसरी और शिव की मानवमूर्ति, अंकित है, जिस के हाथ में त्रिशूल है तथा बैल का चिह्न बना है। (शै० बै० पु० १६४)

उक्त कथनों के प्रकाश में हमारा ध्यान ऋषभ और शिव की ओर जाता है। मोहन्जोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त नग्न योगी की मूर्ति जिसे श्री रामप्रसाद चन्दा और डॉ० रामचन्द्रन ऋषभ की मूर्ति होने की संभावना व्यक्त करते हैं, तथा शिव की मूर्ति का पाया जाना और उस पर डॉ० राधाकुमुद मुखर्जी का यह लिखना कि यदि उक्त मूर्ति या ऋषभ का ही पूर्व-रूप है तो शैव धर्म का मूल भी ताम्रयुगीन सभ्यता तक जाता है और इस से सिन्धु सम्यता एवं ऐतिहासिक भारतीय सभ्यता के बीच की खोई हुई कड़ी का भी एक उभय साधारण सांस्कृतिक परम्परा के रूप में कुछ उद्धार हो जाता है, विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उभय शब्द से ऋषभ और शिव को लेने पर दोनों के मध्य एक साधारण साँस्कृतिक परम्परा का रूप सामने आता है, क्योंकि दोनों के कुछ वाह्य रूपों में, आँशिक समानता है। ऋषभ देव का चिह्न बैल है जो मोहन्जोदड़ो से प्राप्त सील न!, ३ से ५ तक पर अंकित है तथा कार्योत्सर्ग मुद्रा में अंकित प्रकृतियों के साथ भी अंकित है। उधर शिव का भी वाहन बैल है। इधर ऋषभदेवा का निर्वाण कैलास पर्वत से माना जाता है, उधर शिव भी कैलासवासी माने जाते हैं।

इस पर से यह कल्पना होती है कि दोनों का मूल एक तो नहीं है अथवा एक ही मूल पुरुष को दो परम्पराओं ने अपने-अपने रूप में स्वीकार तो नहीं किया ।

डा० भण्डारकार शिव के साथ उमा के योग को उत्तरकालीन बतलाते हैं, उमा का नाम तो उपनिषद में आया है और उसे हैमवती-हिमवत् की पुत्री बतलाया है किन्तु शिव या रुद्र की पत्नी नहीं बतलाया है।

इस विषय पर विशेष प्रकाश डालने के लिये वेदों की ओर आना होगा। ऋगवेद में २—33-15 रुद्रसूक्त में एक ऋचा है।

एव वस्त्रो वृषभ चेकितान यथा देव न हणोणे न हँसी।

हे वृषभ! ऐसी कृपा करो कि हम कभी नष्ट न हों।

आगे चलकर वैदिक देवता रुद्र ने शिव का रूप ले लिया और वे पशुपति कहलाये। किन्तु तांडय और प्राजपथ ब्रह्मा में ऋषभ को पशुपति कहा है। यथा-

ऋषमेवा पशुनामधिपति (तां.ब्रा.- १४-२-५)

ऋषमेवा पशुनां प्रजापति: (प्रजा. प्रा. ५,२-५-१७

पशु शब्द का अर्थ प्रात: बा. ६-२-१-२ में इस प्रकार किया है-

(अग्नि) एतान् पन्वच् पशूनपश्चत्। पुरुषमश्चं भविमजमं। यदपश्यत्तरुमादेजे पशव:।

अर्थात् अग्नि ने (प्रजापति ने) पुरुष, अश्व, गौ, भेड़ बकरी को देखा। क्योंकि इन को देखा, इसलिये ये पशु कहलाये।

संस्कृत में देखना अर्थवाली दृश् धातु के स्थान में पश्य', आदेश होता है। बाह्य ग्रन्थों में पशु शब्द के अर्थ इस प्रकार पाये जाते हैं-

श्री वै पशान. (ता. बा. १३-२-३)

पशवो यश: (प्रात. ब्रा. १-८-१-३८)

शान्ति: पशव: (ता. ४-५-१८)

पशवो वै राय: (प्रात. ब्रा ३, ३-1-8)

आत्मा वै पशु: (कौ स्यब्रा १२-7)

अर्थात् श्री, यश, शान्ति. धन, आत्मा आदि अनेक अर्थो में पशु शब्द का व्यवहार वैदिक साहित्य में हुआ है। अत: पशुपति का अर्थ हुआ-पूजा, श्री, यश, धन, आत्मा आदि का स्वामी। और ऋषभ पशुपति हैं। इसी तरह महाभारत, अनु- शासन पर्व में महादेव के जमों में शिव के साथ ऋषभ नाम भी है। यथा ऋषभत्वं पवित्राणां योगिनां निष्कल: शिव:। (अ.१४, श्रलो १८)

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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