बुधवार, 23 अगस्त 2017

जैन धर्म का इतिहास - 6 // सिद्धांताचार्य श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री

. गंगवंश

इस वंश की स्थापना ईसा की दूसरी शती में जैनाचार्य सिंहनन्दि- ने की थी। इस का प्रथम राजा माधव था, जिसे कोंगणी वर्मा कहते हैं। मुष्कार अथवा मुखार के समय में जैनधर्म राजधर्म बन गया था। तीसरे और चौथे राजाओं को छोड्‌कर उस के शेष पूर्वज निश्चय से जैनधर्म के सहायक थे। माधव का उत्तराधिकारी अवनीत जैन था। अवनीत का उत्तराधिकारी दुविनीत प्रसिद्ध वैयाकरण जैनाचार्य पूज्यपाद का शिष्य था।

ईसा की चौथी से बारहवीं शताब्दी तक के अनेक शिलालेखों से यह बात प्रमाणित है कि गंगवश के शासकों ने जैनमदिरों का निर्माण किया, जैन प्रतिमाओं की स्थापना की, जैन तपस्वियों के निमित्त गुफाएँ तैयार कराई और जैनाचार्यों को दान दिया।

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इस वंश के राजा का नाम मारसिंह द्वितीय था। इस का शासन काल चेर, चोल और पाण्डय वंशों पर पूर्ण विजय प्राप्ति के लिये प्रसिद्ध हए। यह जैन सिद्धान्तों का सच्चा अनुयायी था। इसने अत्यन्त ऐश्वर्य पूर्वक राज्य कर के राजपद त्याग दिया और धारवार प्रान्त के वारकापुर नामक स्थान में अपने गुरु अजित सेन के सन्मुख समाधि- पूर्वक प्राण त्याग किया। एक शिलालेख के आधार पर इस की मृत्यु तिथि ९७५ र्द्व० निश्चित की गई है।

चामुण्डराय राजा मारसिंह द्वितीय का सुयोग्य मंत्री था। उस के मरने पर वह उस के पुत्र राजा राचमल्ल का मन्त्री और सेनापति हुआ। इस मंत्री के शौर्य के कारण ही मारसिंह अनेक विजय प्राप्त कर सका। श्रवणवेलगोला (मैसूर) के शिलालेख में इस की बड़ी प्रशंसा की गई है, धरमधुरन्धर वीरमार्तण्ड, रणरगसिंह, त्रिभुवनवीर, वैरीकुत्नकालदण्ड, सत्ययुधिष्ठिर, सुभटचूड़ामणि आदि उसकी अनेक उपाधियाँ थी, जो उसकी शूरवीरता और धार्मिकता को बतलाती हैं। चामुण्डराय ने ही श्रवणवेलगोला (मैसूर के विन्ध्यगिरि पर गोमटेश की विशालकाय मूर्ति स्थापित कराई थी, जो मूर्ति आज दुनिया की अनेक आश्चर्यजनक वस्तुओं में गिनी जाती है। वृद्धावस्था में चामुण्डराय ने अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यों में बिताया। चामुण्डराय जैनधर्म के उपासक तो थे ही, मर्मज्ञ विद्वान् भी थे। उन का कनडी भाषा का त्रिषष्ठि-लक्षण महापुराण प्रसिद्ध है। संस्कृत में भी उन का बनाया हुआ चारित्रसार नामक ग्रंथ है। चामुण्डराय की गणना जैनधर्म के महान् उन्नायकों में की जाती है । इन के समय में जैन साहित्य की भी श्रीवृद्धि हुई। सिद्धान्त ग्रन्थों का सारभूत श्रीगोम्मटसार नामक महान् जैन ग्रंथ इन्हीं के निमित्त से रचा गया था। और इन्हीं के गोम्मटराय नाम पर इस का नामकरण किया गया था। यह कनडी के प्रसिद्ध कवि रत्न के आश्रयदाता भी थे।

गंगराज परिवार की महिलाएँ भी अपनी धर्मशीलता के लिए प्रसिद्ध हैं। एक प्रशस्ति में गंगदेवी को 'जिनेन्द्र के चरण कमलों में लुब्ध भ्रमरी' कहा है। यह महिला भुजबल गंग हेम्माडि मान्धाता भूप की पत्नी थी। राजा मारसिंह की छोटी बहन का नाम सुग्गिपव्व- रसि था। यह जैन मुनियों की बड़ी भक्त थी और उन्हें सदा आहार दान किया करती थी।

जब चोल राजा ने ई० स० १००४ में गंगनरेश की राजधानी तलकाद को जीत लिया, तब से इस वंश का प्रताप मन्द हो गया। बाद को भी इस वश के राजाओं ने राज तो किया, किन्तु फिर वे उठ नहीं सके। इससे जैनधर्म को भी क्षति पहुंची।

. होयसल वंश

इस वंश की उन्नति में भी एक जैनमुनि का हाथ था। इस वंश का पूर्वज राजा सल था। एक बार यह राजा अपनी कुलदेवी के मन्दिर में सुदत्तनाम के जैन साधु से विद्या ग्रहण करता था। अचानक वन में से निकलकर एक बाघ सल पर टूट पड़ा। साधु ने एक दण्ड सल को देकर कहा-'पोप सल' मारसल)। सल ने बाघ को मार डाला। इस घटना को स्मरण रखने के लिये उसने अपना नाम पोप सल' रखा, पीछे से यही 'होयसल' हो गया।

गंगवंश की तरह इस वश के राजा भी विट्टिदेव तक बराबर जैनधर्मीं रहे और उन्होंने जैन धर्म के लिये बहुत कुछ किया। 'दीवान बहादुर कृष्णस्वामी आयंगर ने विष्णुवर्द्धन विट्टिदेव के समय में मैसूर राज्य की धार्मिक स्थिति बतलाते हुए लिखा है-उस समय मैसूर प्राय: जैन था। गंग राजा जैनधर्म के अनुयायी थे। किन्तु लगभग ई० १००० में जैनों के .विरुद्ध वातावरण ने जोर पकड़ा। उस समय चोलों ने मैसूर को जीतने का प्रयत्न किया। फलस्वरूप गंगवाड़ी और नोलम्बवाडी का एक बडा प्रदेश चोलों के अधिकार में चला गया, और इस तरह मैसूर देश में चोलों के शैवधर्म और चालुक्यों के जैन धर्म का आमना सामना हो गया। जब विष्णुवर्धन ने मैसूर की राज नीति में भाग लिया उस समय मैसूर की धार्मिक स्थिति अनिश्चित थी। यद्यपि जैनधर्म प्रबल स्थिति में था फिर भी शैवधर्म और वैष्णव धर्म के भी अनुयायी थे। ई० १११६ के लगभग विट्टिदेव को रामानुजाचार्यने वैष्णव बना लिया और उसने अपना नाम विष्णुवर्धन रखा।' विष्णुवर्धन की पहली पत्नी शान्तलदेवी जैन थी। श्रवणवेलगोला तथा अन्य स्थानों से प्राप्त शिलालेखों में उस के धर्मकार्यों- - की बड़ी प्रशंसा की गई है। शान्तलदेवी का पिता कट्टर शैव और माता जैन थी। शांतलदेवी के मर जाने पर जब उस के माता-पिता

भी मर गये तो उन का जामाता अपने धर्म से च्युत हो गया। किन्तु फिर भी जैनधर्म से उस की सहानुभूति बनी रही। उसने अपनी विजय के उपलक्ष में हलेवीड के जिनालय में स्थापित जैन मूर्ति का नाम 'विजय पार्श्वनाथ' रक्खा। उस के मन्त्री गंगराज तो जैनधर्म के एक भारी स्तम्भ थे। उनकी धार्मिकता और दानवीरता का विवरण अनेक शिलालेखों में मिलता है। इन की पत्नी का नाम भी जैन- धर्म के प्रचार के सम्बन्ध में अति प्रसिद्ध है। उसने कई जिन मंदिरों का निर्माण कराया था जिन के लिये गंगराजने उदारतापूर्वक भूमि- दान दिया था। विट्टीदेव के पश्चात् नरसिंह प्रथम राजा हुआ। इस के मन्त्री हुल्लप्प ने जैनधर्म की बड़ी उन्नति की।

उसने जैनों के खोये हुए प्रभाव को फिर से स्थापित करने का प्रयत्न किया। किन्तु होयसल' राजाओं के द्वारा संरक्षित वैष्णव धर्म की द्रुत अम्युन्नति, रामानुज तथा कुछ शैव नेताओं का व्यवस्थित और क्रमबद्ध विरोध, और लिंगायतों के भयानक आक्रमण ने मैसूर प्रदेश में जैनधर्म का पतन कर दिया। किन्तु भूल कर भी यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि वहाँ से जैनधर्म की जड़ ही उखड़ गई। किन्तु वैष्णव तथा अन्य वैदिक सम्प्रदायों के क्रमिक अम्युत्थान के कारण उस का चैतन्य जाता रहा। यों तो जैनधर्म के अनुयायियों की तब भी अच्छी संख्या थी किन्तु फिर वे कोई राजनैतिक प्रभाव नहीं प्राप्तकर सके। बाद के मैसूर राजाओं ने जैनों को कोई कष्ट नहीं दिया। इतना ही नहीं, किन्तु उन की सहायता भी की। मुस्लिम शासक हैदर नायक तक ने भी जैन मन्दिरो को गाँव प्रदान किये थे यद्यपि उसने श्रवणबेलगोला तथा अन्य प्रदेशों के महोत्सव वन्द कर दिये थे।

३ राष्ट्रकूट ताश

राष्ट्रकुट राजा अपने समय के बड़े प्रतापी राजा थे। इन के आश्रय से जैनधर्म का अच्छा अम्युत्थान हुआ। इन की राजधानी पहले नासिक के पास में थी। पीछे मान्यखेट को इन्होंने अपनी राजधानी बनाया। इस वंश के जैनधर्मी राजाओं में अमोघवर्ष प्रथम का नाम उल्लेखनीय है। यह राजा दिगम्बर जैनधर्म का बड़ा प्रेमी था। अपनी अन्तिम अवस्था में इसने राजपाट छोड्‌कर जिन दीक्षा. ले ली थी। इन के गुरु प्रसिद्ध जैनाचार्य जिनसेन थे। जिन- सेन के शिष्य गुणभद्रने अपने उत्तरपुराण में लिखा है कि अमोघ वर्ष अपने गुरु जिनसेन के चरणकमलों की. वन्दना कर के अपने को पवित्र हुआ मानता था। इसने जैन मन्दिरों को दान दिया, तथा इस के समय में जैन साहित्य की भी खूब उन्नति हुई। दिगम्बर जैन सिद्धान्त ग्रन्थों की धवला और जयधवला नाम की टीकाओं का नाम करण इसी के धवल और अतिशय धवल नाम के ऊपर हुआ समझा जाता है। शाकटायन वैयाकरण ने अपने शाकटायन नामक जैन व्याकरण पर इसी के नाम से अमोघवृत्ति नामकीटी का बनाई। इसी- के समय में जैनाचार्य महावीर ने अपने गणितसारसंग्रह नामक ग्रंथ की रचना की, जिन के प्रारम्भ में अमोघवर्ष की महिमा का वर्णन विस्तार से किया गया है। अमोघवर्ष की महिमा का वर्णन विस्तार से किया गया है। अमोघवर्ष ने स्वयं भी 'प्रश्नोत्तर रत्नमाला' नाम की एक पुस्ति का रची। स्वामी जिनसेन ने भी अनेक ग्रंथ रचे। अमोघवर्ष ने जिनसेन के शिष्य गुणभद्र को भी आश्रय दिया। गुणभद्रने अपने गुरु जिनसेन के अधूरे ग्रंथ आदिपुराण को पूर्ण किया और अन्य भी अनेक ग्रंथ रचे। अमोघवर्ष का पुत्र अकालवर्ष भी जैनधर्म का प्रेमी था। इस के समय में गुणभद्रने अपना उत्तरपुराण पूर्ण किया। इसने भी जैनमन्दिरों को दान दिया और जैन विद्वानों का सम्मान किया। जब पश्चिम के चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों की सत्ता- का अन्त कर दिया तो इस वश के अन्तिम राजा इन्द्र ने अपने राज्य को पुन: प्राप्त करने का यत्न किया किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। अन्त में उसने जिन दीक्षा धारण कर के श्रवणवेलगोला में समाधिपूर्वक प्राणों का त्याग किया। लोकादित्य इन का सामत और वनवास देश का राजा था। गुणभद्राचार्य ने इसे भी जैनधर्म की वृद्धि करनेवाला और महान् यशस्वी बतलाया है।

४ कदम्ब वंश

यद्यपि यह वश ब्राह्मण धर्मानुयायी था, किन्तु इस के कुछ नरेशो की धार्मिक नीति बड़ी उदार थी और कुछ तो जैनधर्म के प्रतिपालक भी थे। इस वंश के पाँचवे राजा काकुत्स्थवर्मा ने अपने एक जैन मेनापति श्रुतकीर्ति को अर्हन्तो के लिए भूमिदान किया था। काकुत्स्थवर्मा के पौत्र मृगेशवर्मा ने अपने राज्य के तीसरे वर्ष में अर्हन्तदेव के पूजनादि के लिए भूमिदान किया था। तथा अपने राज्य के चतुर्थ वर्ष में एक गाँव को तीन भागों में विभाजित कर के एक भाग जिनेन्द्र के लिए, दूसरा भाग श्वेताम्बर श्रमणसंघ को तीसरा भाग दिगम्बर श्रमण संघ के लिए प्रदान किया था। आठवें वर्ष में उसने पलासि का नामक स्थान में एक जिनालय बनवाकर कुछ भूमि यापनीयों के तथा निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय के कृर्चकों के लिये प्रदान की थी।

मृगेशवर्मा के तीन बेटों में से रविवर्मा उस का उत्तराधिकारी हुआ। सेनापति श्रुतकीर्ति के पौत्र जयकीर्ति ने कदम्ब राजाओं के द्वारा परम्परा से प्राप्त पुरुखेट गाँव रविवर्मा की आज्ञा से यापनीय संघ के कुमारदत्त प्रमुख आचार्यों को दान में दे दिया। रविवर्मा का राज्यकाल साधारणत: सन् ४७८ से ५१३ ई० के लगभग माना जाता है।

रविवर्मा का उत्तराधिकारी उस का पुत्र हरिवर्मा हुआ। उसने अपने राज्य के चतुर्थ वर्ष में अपने चाचा शिवरथ के उपदेश से पला- शिका में सिंहसेनापति के पुत्र मृगेशवर्मा के द्वारा निर्मापित जैन मन्दिर की अष्टाह्नि का पूजा के लिए तथा सर्वसंघ के भोजन के हेतु कूर्चकों के वारिषेणाचार्य संघ के हाथ में वसुन्तवाटक ग्राम दान में दिया। तथा अपने राज्य ने पाँचवे वर्ष में राजा भानुवर्मा की प्रार्थना पर अहिरिष्ट नामक दूसरे श्रमण संघ के लिये मरदे नामक गाँव दान में दिया। हरिवर्मा का राज्यकाल सन् ५१३ से ५३४ ई. में माना जाता है।

५ चालुक्य वंश

इस वंश की एक शाखा, जिसे पश्चिमी चालुक्य कहा जाता है, पातापी (वादामी) नामक स्थान में ६वीं ई० से ८वीं ईस्वी तक राज्य करती रही। पीछे दो शताब्दी बाद १ ०वीं से १२वीं तक कल्याणी नामक स्थान से शासन करती रही। पूर्वी चालुक्य नाम से प्रसिद्ध दूसरी शाखा आन्घप्रदेश के वेगी नामक स्थान से ७वीं शताब्दी से १ ११२वीं शताब्दी तक राज्य करती रही।

पश्चिमी चालुक्य

इस वंश का सब से प्राचीन दानपत्र शक सब; ४१११४४० का आड़ते से मिला है। यह सत्याश्रय पुलकेशी का है। उस के अनुसार राजा पुलकेशी ने चोल, चेर, केरल, सिंहल और कलिंग के राजाओं को अपना करद बना लिया था। तथा पाण्डय आदि राजाओं को दण्डित किया था। लेख का मुख्य उद्देश्य यह है कि राजा पुलकेशी ने शासनकाल में सेन्द्रकवंशी सामन्त सामियारने अलक्तक नगर में एक जैन मन्दिर बनवाया था, और राजाज्ञा लेकर चन्द्र ग्रहण के समय कुछ जमीन और गाँव दान में दिये थे।

पुलकेशी प्रथम का उत्तराधिकारी उस का पुत्र कीर्तिवर्मा था। उसने कुछ सरदारों के निवेदन पर जिन मन्दिर की पूजा के लिए कुछ भूमिदान दी थी। कीर्तिवर्मा प्रथम का पुत्र पुलकेशी द्वितीय हुआ। इस के कालका एक प्रसिद्ध लेख एहोले से प्राप्त हुआ है उसे जैन कवि रविकीर्ति ने रचा है। भारतवर्ष का तत्कालीन राजनीतिक इतिहास जानने के लिये यह लेख बड़े महत्व का है। लेख के अनुसार पुलकेशी उत्तर भारत के सम्राट हर्षवद्धन का समकालीन था। उसने दक्षिण की ओर बढ़ते हुए हर्षवद्धन का हर्ष विगलित कर दिया था। रविकीर्ति पुलकेशी का आश्रित था और उसने शक स० ५५६ में एक जैन- मन्दिर बनवाया था।

इसी वंश के विक्रमादित्य द्वितीय ने पुलिगेर नगर में धवल जिनालय की मरम्मत तथा सजावट कराई थी। तथा मूलसंघ देव- गण के विजयदेव पण्डिताचार्य के लिये जिनपूजा प्रवन्ध के हेतु भूमि- दान दिया 'था ।

विक्रमादित्य द्वितीय के बाद चालुक्य वंश के बुरे दिन आये। गंग और राष्ट्रकूट राजाओं ने उस का साम्राज्य नष्ट भ्रष्ट कर डाला। लगभग २०० वर्षों तक यह फिर पनप न सका। इस काल मेँ उस का स्थान राष्ट्रकूट वंश को मिला ।

सन 974 लगभग तैलप द्वितीय ने इस वंश पुनरुद्धार कर के कल्याणी को अपनी राजधानी बनाया । यह तैलप द्वितीय महान् कन्नड जैन कवि रन्न का आश्रयदाता था। यह धारा नरेश मुन्ज और भोज का समकालीन था। इस के हाथ से ही मुल्क की मृत्यु हुई थी । इस के पुत्र और उत्तराधिकारी सत्याश्रय इरिववेंडेंग के जन गुरु द्रविडसंघ कुन्दकुन्दान्वय के विमलचन्द्र पण्डितदेव थे इसने ९९७ ई० से १००९ ई० तक राज्य किया।

तैलप द्वितीय का पौत्र तथा सत्याश्रय का भतीजा जयसिंह तृतीय था । यह नरेश अनेक जैन विद्वानों का आश्रयदाता था। इसकेसमय के प्रमुख जैन विद्वान थे वादिराज, दयापाल एवं पुष्पषेण सिद्धान्त देव। वादिराज की एक उपाधि जगदेकमल्लवादी थी। यह उपाधि जयसिंह तृतीय ने अपने दरबार में उन्हें दी थी।

इस राजा का पुत्र एत्रं उत्तराधिकारी सोमेश्वर प्रथम था। इस की उपाधियाँ आहवमल्ल और त्रैलोक्यमल्ल थी। इसने 1०४२ ई० से १०६८ तक राज्य किया। इस की रानी केतलदेवी के अधीन चौकिराजने त्रिभुवनतिलक जिनालय में तीन चेदियाँ बनवाईं। इस राजा ने अजित सेन भट्टारक को शब्दचतुर्मुख की उपाधि दी थी। अजित सेन भट्टारक को अन्य उपाधियाँ वादीभसिंह और तार्किक चक्रवर्ती थीं।

इस राजा के ज्येष्ठपुत्र सोमेश्वर द्वितीय ने भी जैनधर्म का संरक्षण किया था। इसने सन् १ ०७४ में शान्तिनाथ मन्दिर के लिए मूलसंघान्वय तथा काणूरगण के कुलचन्द्रदेव को भूमिदान किया था।

सोमेश्वर द्वितीय के भाई विक्रमादित्य षष्ठ ने सन् १०७६ से ११२६ तक राज्य किया। यह बड़ा प्रतापी राजा था। इसी को लेकर कवि विल्हड़ ने विक्रमांकदेव चरित काव्य लिखा है। इस की एक उपाधि गंगपेर्मानडि थी क्योंकि उस की माँ गंगवश की राजकुमारी थी। उसने चालुक्य गगपेर्मानडि चैत्यालय बनवाया था। और उस के प्रबन्ध के लिए एक गाँव मूलसब, सेनगण और पोगरि- गच्छ के रामसेन मुनि को दान में दिया था। इस राजा ने बेल्गोला प्रदेश में कई जिनालय बनवाये थे जिन्हें राजाधिराज चोल ने जला दिया।

पूर्वीय चालुक्य वंश की शाखा की परम्परा पुलकेशो द्वितीय के भाईकुब्ज विष्णुवर्द्धन से चलती है। इसने सन् ६१५ से ६२३ ई० तक राज्य किया था। इस वंश के कुछ राजाओ ने जैनधर्म का अच्छी तरह संरक्षण किया था। अम्माराज विजयादित्य ने कटकाभरण जिनालय की पूजादि के हेतु यापनीयसंघ नन्दिगच्छ के एक मुनि को गाम दान में दिया था। तथा सर्वलोकाश्रय जिन भवन की मरम्मत आदि के लिए बलहारिगण, अडुकलि गच्छ के अहनन्दि मुनि को कल- चुम्बरु नामक ग्राम दान में दिया था।

६ कालाचुरि राज्य में जैनों का विनाश

चालुक्यों का राज्य बहुत थोड़े समय तक ही रहा; क्योंकि उन्हें कालाचूरियों ने निकाल बाहर किया। यद्यपि कालाचूरियों का राज्य भी बहुत थोड़े समय तक ही रह सका किन्तु जैनधर्म के विनाश की दृष्टि से वह स्मरणीय है।

महान कालाचूरि नरेश विज्जल जैन था। किन्तु उस का समय लिंगायत सम्प्रदाय के उद्‌गम और शिवभक्ति के पुनरुज्जीवन की दष्टि से उल्लेखनीय है। विज्जल के अत्याचारी मन्त्री बसव के नेतृत्व मेँ इस सम्प्रदाय ने जैनों को बहुत कष्ट दिया।

विज्जलराज चरित के अनुसार वसव ने अपने स्वामी जैन राजा विज्जल की हत्या के लिए क्या-क्या नहीं किया। फलत: उसे देश से निकाल दिया गया और निराश होकर वह स्वयं एक कुएँ में गिर गया। किन्तु उस के अनुयायिओं ने उस के इस प्राणत्याग को 'धर्मपर बलिदान' का रूप दिया और लिंगायत सम्प्रदाय के विषय में ललित और सरल भाषा में साहित्य तैयार कर के देश में सर्वत्र वितरित किया। तथा जिन लिंगायत नेताओं ने कालाचूरि साम्राज्य के अन्दर जैनों के विनाश में बहुत बड़ी सहायता की उन के नामों के चारों ओर अनेक कपोल कल्पित कथाएं जुट गई। ऐसी एक कथा जो उस समय के शिलालेख में अंकित है यहाँ दी जाती है-

शिव और पार्वती' एक शैव सन्त के साथ कैलास पर्वतपर विचर रहे थे। इतने में नारद आये, उन्होंने जैनों और बौद्धों की बढ़ती हुई शक्ति की सूचना दी। शिव ने वीरभद्र को आज्ञा दी कि तुम संसार में जाकर मानव योनि में जन्म लो और इन धर्मों को नष्ट करो। आज्ञानुसार वीरभद्र ने पुरुषोत्तम पट्ट नाम के व्यक्ति को स्वप्न दिया कि मैं तुम्हारे घर में पुत्ररूप में जन्म लूँगा। स्वप्न सत्य हुआ। बालक का नाम राम रखा गया और शैव के रूप में उस का लालन पालन हुआ। शिव का भक्त होने से उसे एकान्तद रामैय्या कहते थे। किंवदन्ती के अनुसार यह रामैय्या ही उस देश में जैनधर्म के विनाश- के लिए उत्तरदायी है।

कथा में लिखा है कि एक दिन रामैय्या शिव की पूजा करता था। उस समय जैनों ने उसे चैलेंज दिया कि वह अपने देवता का देवत्व सिद्ध करे। रामैय्या ने चैलेंज स्वीकार कर लिया। यह तय हुआ कि रामैय्या अपना सिर काटकर फिर जोड़ दे। यदि वह ऐसा कर सका तो जैनों ने अपने मन्दिर खाली कर के उस देश को छोड़

देने का वचन दिया। रामैय्या ने सिर काटकर फिर जोड़ लिया और जैनों से अपना वादा पूरा करने के लिए कहा। जैनों ने अस्वीकार कर दिया। यह सुनते ही रामैया ने जैनों के मन्दिरों को नष्ट- भ्रष्ट करना प्रारम्भ किया। जैनों ने विज्जल से जाकर शिकायत की विज्जल शैवों पर बहुत क्रुद्ध हुआ। किन्तु रामैया ने विज्जल- को अपना चमत्कार दिखाकर शैव बना लिया। विज्जल ने जैनों को आदेश दिया कि वे शैवों के साथ शान्तिपूर्वक बर्ताव' करे।

कल्चुरी राज्य में जैनों के विनाश की साक्षी देने वाली इस तरह की कथाएँ और घटनाएँ शैव ग्रन्थों में अनेक मिलती हैं।

७ विजयनगर राज्य

इस तरह दक्षिण भारत में यद्यपि जैनधर्म राजाश्रय विहीन हो गया फिर भी गुणग्राही राजा लोग जैन गुरुओं, विद्वानों और नेताओं का यथोचित आदर करते थे। ऐसे राजाओ में विजयनगर साम्राज्य कगे शासकों का नाम उल्लेखनीय है। यह राज्य वैदिक धर्म का पोषक था किन्तु इस के राजा विभिन्न मत वालों के प्रति उदारता का व्यवहार करते थे। तथा इस राज्य के उच्च पदस्थ कर्मचारियों में अधिकांश जैनधर्मावलम्बी थे। इसलिए राजाओं को भी जैनधर्म का विशेष ख्याल रखना पड़ता था।

हरिहर द्वितीय के सेनापति इरुगप्प कट्‌टर जैन धर्मानुयायी थे। उन्होंने ५९ वर्ष तक विजयनगर राज्य के ऊँचे पदों को योग्यता पूर्वक निबाहा और जैनधर्म की उन्नति के लिए बराबर प्रयत्न करते रहे। इरुगप्प के अन्य सहयोगियों ने भी जैनधर्म की पूरी सहायता की और उस के प्रचार में काफी योगदान दिया।

विजयनगर की रानियाँ भी जैनधर्म पालती थी। श्रवणवेलगोला के एक शिलालेख से देवराय महाराज की रानी भीमादेवी का जैन होना प्रकट है।

१३६८ के एक शिलालेख से. पता चलता है कि जैनों ने चुनना, राय प्रथम से प्रार्थना की कि वैष्णव लोग जैनों के साथ अन्याय करते हैं। राजा ने काफी जाँच पड़ताल के बाद जैनों और वैष्णवों में मेल करा दिया तथा यह आज्ञा प्रकाशित की-

''यह जैन दर्शन पहले की ही भाँति पन्च महानन्द और कलश का अधिकारी है। यदि कोई वैष्णव किसी भी प्रकार जैनियों को क्षति पहुंचा, तो वैष्णवों को उसे वैष्णव धर्म की क्षति समझना चाहिए। वैष्णव लोग जगह-जगह इस बात की ताकीद के लिए शासन कायम करें। जब तक सूर्य और चन्द्र का अस्तित्व है तब तक वैष्णव लोग जैन दर्शन की रक्षा करेंगे। वैष्णव और जैन एक ही है उन्हें अलग-अलग नहीं समझना चाहिये। ... वैष्णवों और जैनों से जो कर लिया जाता है उस से श्रवणवेलगोला के रक्षकों की नियुक्ति की जाय और यह नियुक्ति वौष्णवों के द्वारा हो। तथा उस से जो द्रव्य बचे उस से जिनालयों की मरम्मत कराई जाये और उन पर चूना पोता जाये। इस प्रकार वे प्रतिवर्ष धनदान देने से न चूकेंगे और यश तथा सम्मान प्राप्त करेंगे। जो इस आज्ञा का उल्लंघन करेगा वह राजद्रोही और सम्प्रदायद्रोही होगा।' '

एक दूसरे शिलालेख से जैनों और वीर शैवों के विवाद का पता चलता है। यह लेख १६३८ ई० का है, यह जैनधर्म की प्रशंसा से शुरू होता है और शिव की प्रशंसा से इस का अन्त होता है।

मामला यह था कि किसी वीर शैव ने विजयपार्श्व वसदि के खम्भे पर शिवलिंग की स्थापना कर दी और विजयप्पा नाम के एक धनी जैन व्यापारी ने उसे नष्ट कर दिया। इस से बड़ा क्षोभ फैला और जैनों ने वीर शैव मत के नेताओं के पास इस मामले के निपटारे- के लिए प्रार्थना की। यह निश्चय किया गया कि जैन लोग पहले विभूति और वेलपत्र शिवलिंग को चढ़ाकर अपना आराधना पूजन करें। इस के उपलक्ष्य में वीर शैव ने जैनियों के प्रति अपना सौहार्द प्रदर्शित करने के लिये उक्त निर्णय में इतना जोड़ दिया-जो कोई भी जैनधर्म का विरोध करेगा वह शिवद्रोही समझा जायेगा। वह विभूति रुद्राक्ष तथा काशी और रामेश्वर के शिवलिंगों का द्रोही समझा जायेगा। शिलालेख के अन्त में जिन शासन की जय हो' इस आशय का वाक्य लिखा हुआ है।

इस तरह चौदहवीं शती में आकर साम्प्रदायिक द्वेष कुछ कम हुआ और जैनधर्म का दक्षिण भारत से यद्यपि समूल नाश तो नहीं हो सका, फिर भी वह क्षीणप्रभ हो गया।

(समाप्त)

संपादकीय टीप -

श्री जयकुमार जैन के सौजन्य से यह पुस्तक जैन धर्म प्राप्त हुआ था, जिसमें से इतिहास संबंधी अध्याय को यहाँ यूनिकोड में स्कैन-कन्वर्ट कर आमजनहिताय प्रस्तुत किया गया है. पुस्तक में अन्य और भी अध्याय हैं, यथा - सिद्धान्त, चारित्र, जैन साहित्य, जैनकला और पुरातत्व, सामाजिक रूप, विविध आदि, जिन पर यय़ासंभव संसाधन उपलब्ध होने पर डिजिटाइजेशन कर प्रकाशित किया जाएगा. जयकुमार जैन जी जो कि स्वयं एक जैन मंदिर स्थित ग्रन्थ भंडार व पाण्डुलिपि संग्रह पुस्तकालय के संरक्षक हैं, ने पुस्तक के साथ एक पत्र प्रेषित किया है जिसमें उन्होंने लिखा है कि किस तरह से प्राचीन समय में श्रमसाध्य ढंग से साहित्य व इतिहास को संरक्षिक किया जाता था, और किसी एक पाण्डुलिपिकार को उसका मेहनताना नहीं मिला था तो उसने अपनी पीड़ा उस पाण्डुलिपि के अंत में लिख दी थी. पत्र निम्न है -

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इस इतिहास के डिजिटाइजेशन व इंटरनेट पर प्रकाशन में भी श्रमसाध्य कार्य हुआ है और संसाधनों का उपयोग हुआ है. सुधीजन समझेंगे, आग्रह है.

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