गुरुवार, 31 अगस्त 2017

लाल पान की बेगम - फणीश्वर नाथ रेणु

संजुलता साहू की कलाकृति

दृश्य:- 1

बिरजू:- माँ, एक शकरकंद खाने को दो ना।

माँ: - एक दो तमाचा मारती है

ले ले शकरकंद और कितना शकरकंद लेगा?

बिरजू मार खाकर आँगन में लोट रहा है, सारा शरीर मिट्टी से गंदा हो रहा है।

माँः- चँपिया के सिर भी चुड़ैल मंडरा रही है, आध आँगन धूप रहते जो गई है सहुआइन की दुकान छोवा गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया बाती की बेला हो गई। आए आज लौट के जरा।

बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह रहकर कूद फाँद कर रहा था, बिरजू की माँ बागड़ पर मन का गुस्सा ढ़ूँढ़कर निकाल चुकी थी, पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ। बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा। बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी।

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मखनी फुआ:- क्यों, बिरजू की माँ , नाच देखने नहीं जाएगी क्या?

माँ:- बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया हो तब न फुआ।

गरम गुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू की मां ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया। बिरजू ने लेटे ही लेटे बागड़ को एक डंडा लगा दिया।

माँ:-ठहर तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्टा बना दिया है तुझे। बड़ा हाथ चलता है लोगों पर ठहर।

मखनी फुआ:- पनभरनियों से जरा देखो तो इस बिरजू की मां को! चर मन पाट का पैसा क्या हुआ है? धरती पर पाँव नहीं पड़ते! इनसाफ करो! खुद अपने मुँह से आठ दिन पहले सक ही गाँव के अली गली में कहती फिरी है, हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है, बैलगाड़ी पर बिठाकर बलरामपुर का नाच दिखा लाउँगा, बैल अपने घर है , तो हजार गाड़ी मँगनी मिल जाएगी। सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखनेवाली सब तो औन पौन कर तैयार हो रही है, रसोई पानी कर रही है। मेरे मुँह में आग लगे, क्यों मैं टोकने गई! सुनती हो , क्या जवाब दिया बिरजू की माँ ने?

अर- र्रे - हाँ - हाँ! बि-र - रज्जू की मैं--या के आगे नाथ औ- र्र पीछे पगहिया न हो, तब्ब ना - आ - आ।

जंगी की पुतोहूः- फुआ - आ ! सरवे सित्तलमिंटी के हाकिम के बासा पर फूल छाप किनारीवाली साड़ी पहन के यदि तू भी भंटा की भेटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा धनहर जमीन का परचा कट जाता! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बैल खरीदता! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ों पगहिया झूलती।

सूत्रधारः- जंगी की पुतोहू मुँहजोर है। रेलवे स्टेषन के पास की लड़की है।

तीन महीने हुए गौने की नई बहू होकर आई है और सारे कुर्मा टोली की सभी झगड़ालू सासों से एक आध मोरचा ले चुकी है,। उसकी ससुर जंगी दागी चोर है, सी किलासी है। उसका खसम रंगी कुर्मा टोली का नामी लठैत । इसीलिए हमेशा सींग खुजाती फिरती है जंगी की पुतोहू।

माँः- अरी चंपिया-या-या, आज लौटे तो मुड़ी मरोड़कर चूल्हे में झोंकती हूँ। दिन रात बेचाल होती जाती है। गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गाने वाली पतुरिया पुतोहू सब आने लगी है। कहीं बैठके बाजे न मुरलिया सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई। अरी चंपि-या-या-या।

जंगी की पतोहूः- कमर में घड़ा संभालती है चल ददिया चल! इस मोहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है। नहीं जानती , दोपहर दिन और चैपहर रात बिजली की बत्ती भक भक कर जलती है।

सभी हँसती हैं।

मखनी फुआ:- शैतान की नानी।

सूत्रधारः- बिरजू की मां की आँखों पर मानो किसी ने तेज टॉर्च की रोषनी डालकर चैंधिया दिया। भक् भक् बिजली बत्ती। तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलन डाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी। चंपिया के माँ आँगन में रात भर बिजली बत्ती भुक भुकाती थी। चंपिया की माँ आँगन में नाक वाले जूते की छाप, घोड़े की टाप की तरह। ----जलो , जलो! और जलो! चंपिया की माँ के आँगन में चाँदी जैसे पाट सूखते देखकर जलने वाली सब खलिहान पर सोनोली औरतें धान के बोझों को देखकर बैंगन का भुरता हो जाएँगी।

चंपिया गुड़ को चाटती हुई आती है, माँ तमाचा मारती है

चंपिया:- मुझे क्यों मारती है ए -ए- ए! स्हुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है- एँ-एँ-एँ।

माँ:- सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी,! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़कर बैठी हुई थी। बोल, गले पर लात देकर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो कभी बाजे न मुरलिया गाते सुना! चाल सीखने जाती है, टीशन की छोकरियों से।

बिरजू:- ए मैया ,एक उँगली गुड़ दे दे, दे न मैया एक रत्ती भर।

माँः- एक रत्ती क्यों! उठाके बरतन को फेंक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना। नहीं बनेगी मीठी रोटी। मीठी रोटी खाने का मन होता है।

उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चंपिया के सामने रखते हुए

बैठ के छिलके उतार, नहीं तो अभी!

चंपिया:- मन ही मन माँ गालियाँ देगी पाँव फेलाकर क्यों बैठी है बेलज्जो।

बिरजू:- मैया मैं भी बैठकर शकरकंद छीलूँ?

माँ:- नहीं! एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में। जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घंअे के लिए कड़ाही माँगकर ले गई तो फिर लौटाने का नाम नहीं। जा जल्दी।

चंपिया माँ से नजर बचाकर एक शकरकंद बिरजू की ओर फेंक देती है, बिरजू जाता है।

माँ:- सूरज भगवान डूब गए। दीया-बत्ती का बेला हो गई। अभी तक गाड़ी---।

चंपियाः- कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया। बप्पा बोले , मां से कहना, सब ठीक ठीक करके तैयार रहे। मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।

माँ:- कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नहीं दी, तब मिल चुकी गाड़ी ! जब अपने गाँव के लोगों की आँखों में पानी नहीं तो मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी का क्या भरोसा! न तीन में, न तेरह में! क्या होगा शकरकंद छीलकर! रख दे उठाके।-- यह मर्द नाच दिखाएगा। बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच दिखाने ले जाएगा। चढ़ चुकी बैलगाड़ी पर, देख चुकी जी भर नाच----। पैदल जानेवाली सब पहुँचकर पुरानी हो चुकी होंगी।

बिरजूः- कड़ाही को सिर पर रखकर देख दिदिया, मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने से भी कुछ नहीं होता।

चंपिया:- चुप

माँ:- बागड़ को भगाती हुई कल ही तुझे पंचकौड़ी कसाई के हवाले करती हूँ राक्षस तुझे। हर चीज में मुँह लगाएगा। चंपिया, बाँध दे बगड़ा को। खोल दे गले की घंटी। हमेशा टुनुर टुनुर। मुझे जरा नहीं सुहाता है।

बिरजू:- झुनुर झुनुर बैलों की झुनकी, तुमने सु---।

चंपिया:- बागड़ के गले की झुनकी खेलते हुए बेसी बक बक मत करो।

माँ:- चंपिया ! डाल दे चुल्हे में पानी! बप्पा आए तो कहना कि अपने उड़नजहाज पर चढ़कर नाच देखने आएँ! मुझे नाच देखने का शौक नहीं! मुझे जगाइयो मत कोई! मेरा माथा दुःख रहा है।

बिरजूः- क्यों कर दी, नाच में उड़नजहाज भी उड़ेगा?

चंपिया:- इशारे से कहती है, चुप चाप रह मुफ्त में मार खाएगा बेचारा।

बिरजू:- चुपचाप, हम लोग नाच देखने नहीं जाएँगे? गाँव में ऐ पंछी भी नहीं है। सब चले गए।

चंपियाः- पलकों में आँसू आता है एक महीने पहले ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पेंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़कर---।

बिरजूः- गाछ का सबसे पहला बैंगन जिन बाबा आप पर चढ़ाउँगा, जल्दी से गाड़ी लेकर भेज दो जिन बाबा।

माँ:- उँह पहले से किसी बात का मंसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को। भगवान ने मंसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस बात का फल दे रहे हो भोले बाबा। अपने जीते उसने किसी देवता- पित्तर की मान-मनौती बाकी नहीं रखी।सर्वे के समय जमीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं----। ठीक ही तो! म्हावीर जी का सेट तो बाकी ही है। हाय रे देव--! भूल चुक माफ करो बाबा! मनौती दुनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ। चोरी चमारी करने वाली की बेटी जलेगी नहीं। पाँच बीघा जमीन क्या हासिल की है बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाईखौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देखकर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़कर पाट लगा है, बैशाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे!तो अलान तो फलान। इतनी आँखों की धार भला फसल सहे। जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ दसमन पाट कटा।पर तौल के ओजन हुई रब्बी भगत के यहाँ।

इसमें जलने की क्या बात है भला! बिरजू की बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक एक आदमी को समझा के कहा था, जिनदगी भर मजदूरी करते रह जाओगे, सर्वे का समय आ रहा है। लाठी कड़ी करो तो दो चार बीघे जमीन हासिल कर सकते हो। सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबू साहेब के खिलाफ खाँसा भी नहीं। बिरजू की बप्पा को कम सहना पड़ा है, बाबू साहेब गुससे से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया। आखिर बाबू साहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। मुझे मौसी कहके पुकारा, यह जमीन बाबूजी ने मेरे नाम से खरीदी थी। मेरी पढ़ाई्र लिखाई उसी जमीन की उपज से चलती है। और भी कितनी बातें। खूब मोहना जानता है उत्ता जरा सा लड़का। जमीदार का बेटा है कि ------- चंपिया बिरजू सो गया क्या? यहाँ आ जा बिरजू अंदर। तू भी आ जा चंपिया। भला आदमी आए तो एक बार आज।

दोनों आते हैं

माँः- ढिबरी बुझा दे --- बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना, खपच्ची गिरा दे। भला आदमी रे, भला आदमी। मुँह देखो जरा इस मर्द का। बिरजू की माँ दिन रात मंझा न देती रहती तो ले चुके थे जमीन। रोज आकर माथा पकड़ के बैठ जाएँ, मुझे जमीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मजूरी ही अच्छी। छोड़ दो जब तुम्हारा कलेजा ही थिर नहीं होता है तो क्या होगा । जोरू जमीन जोर के, नहीं तो किसी और के।

बिरजू के बाप पर बहुत तेजी से गुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है। बिरजू की माँ का भाग ही खराब है।जो ऐसा गोबरगनेश घरवाला उसे मिला। कौन सा सौख मौज दिया है उसके मर्द ने । कोल्हू के बैल की तरह खटकर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ। कभी एक पैसे की जलेबी भी लाकर दी है उसके खसम ने। पाट के दाम भगत के से लेकर बाहर ही बाहर बैल हट्टा चले गये।बिरजू की मां को एक बार नमरी लोट देखने भी नहीं दिया आँख से---। बैल खरीद लाए। उसी दिन गाँव में ढिढोंरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़कर जाएगी नाच देखने। दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा।

माँ:- अपने आप से वह खुद भी कुछ कम नहीं , उसकी जीभ में आग लगे, बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच देखने की लालसा किस कुसमय में उसके मुँह से निकली थी। भगवान जाने! फिर आज सुबह से दोपहर तक किसी न किसी बहाने अठारह बार बैलगाड़ी पर पाच देखने जाने की चर्चा छेड़ी है। लो खूब देखे नाच! वाह रे नाच! क्ािरी के नीचे दुशाला का सपना। कल भोरे पानी भरने के लिए जब जाएगी, पतली जीभ वाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएँगी। सीाी जलते हैं दससे, हाँ भगवान दाढ़ीजार भी। दो बच्चों की माँ होकर भी वह जस की तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी जमीन है, है किसी के पास एक घूर जमीन भी अपनी इस गाँव में। जलेंगे नहीं , तीन बीघे में धान लगा हुआ है है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे, तब तो।

बाहर बैलों की घंटियाँ सुनाई पड़ीं।

माँ:- अपने ही बैलों की घंटी है , क्यों री चंपिया?

चंपिया और बिरजूः- हूँ-उँ-उँ।

माँः- चुप! शायद गाड़ी भी है, घड़घड़ाती है न?

चंपिया और बिरजूः- हूँ-उँ-उँ।

माँ:- चुप! गाड़ी नहीं है,। तू चुपके से टट्टी में छेद करके देख तो आ चंपी, भाग के आ चुपके चुपके।

चंपिया:- हाँ मैया, गाड़ी भी है।

बिरजू हड़बड़ाकर उठ बैठा। मां ने उसे सुला दिया । बोले मत। चंपिया गुदड़ी के नीचे घुस गई।

बाहर बैलगाड़ी खोलने की आवाज।

बाप:- हाँ! हाँ! आ गए घर। घर आने के लिए छाती फटी जाती थी। चंपिया-ह! बैलों को घास दे दे, चंपिया-ह!

बिरजू पूरे पाँच मिनट तक खाँसता रहता है।

बापः- बिरजू! बेटा बिरजमोहन! मैया गुस्से के मारे सो गई क्या?अरे अभी तो लोग जा ही रहे हैं।

माँ:- मन ही मन नहीं देखना है नाच! लौटा दो गाड़ी।

बापः- चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? ले , धान की पँचसीस रख दे।

धान के बालियों को ओसारे पर रखकर

दीया बालो।

मांः- डेढ़ पहर रात को गाड़ी लाने की क्या जरूरत थी? नाच तो अब खत्म हो रहा होगा।

बाप:- नाच अभी शुरू भी नहीं हुआ होगा,। अभी अभी बलरामपुर के बाबू की कंपनी गाड़ी मोहनपुर होटल बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है। इस साल आखिरी नाच है। पँचसीस टट्टी में खोस दे। अपने खेत का है।

माँः- अपने खेत का ? पक गए धान?

बापः- नहीं, दस दिन में अगहन चढ़ते चढ़ते लाल होकर झुक जाएँगी, सारे खेत की बालियाँ। मलदहिया टोली पर जा रहा था, अपने खेत में धान देखकर आँखे जुड़ा गईं। सच कहता हूँ, पंचसीस तोड़ते समय उँगलियाँ काँप रही थी मेरी।

बिरजू ने एक धान लेकर मुँह में डाल लिया।

माँ:- कैसा लुक्कड़ है तू रे। इन दुश्मनों के मारे कोई नेम धरम जो बचे।

बाप:- क्या हुआ! डाँटती क्यों है?

माँ:- नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया, देखते नहीं?

बापः- अरे! इन लोगों का सब कुछ माफ है, चिरई चिरमुन है ये लोग।

दोनों के मुँह में नवान्न से पहले नया अन्न न पड़े।

चंपियाः- धान को दाँतों में चबाकर ओ! इतना मीठा चावल।

बिरजू:- और गमकता भी है न दिदिया?

बाप:- रोटी पोटी तैयार कर चुकी क्या?

माँः- नहीं! जने का ठीक ठिकाना नहीं और रोटी बनती है।

बापः- वाह! खूब हो तुम लोग। जिसके पास बैल है ,उसे गाड़ी मँगनी नहीं मिलेगी भला? गाड़ीवालों को भी कभी बैल की जरूरत होगी। पूछूँगा! त्ब कोयरीटोलों वालों से।--- ले जल्दी से रोटी बना ले ।

माँः- देर नहीं होगी।

बापः- अरे, टोकरी भर रोटी तो तू पलक मारते बना लेती है, पाँच रोटियाँ बनाने में कितनी देर लगेगी?

बिरजूः- मैया बेकार गुस्सा हो रही थी न।

माँः- चंपी, जरा धैलसार में खड़ी होकर मखनी फुआ को आवाज दे तो।

चंपियाः- फुआ-आ! सुनती हो फुआ! मैया बुला रही है।

मखनी फुआः- हाँ फुआ को क्यों गुहारती है? सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ पगहियावाली।

माँः- अरी फुआ! डस समय बुरा मान गई थी? नाथ पगहिया वालों को आकर देखो, दोपहर रात में गाड़ी लेकर आया है। आ जाओ फुआ! मैं मीठी रोटी पकाना नहीं जानती।

मखनी फुआ:- खाँसती हुई आई इसी से घड़ी पहर दिन रहते ही कुछ पूछ रही थी कि नाच देखने जाएगी क्या? कहती तो मैं पहले से ही अपनी अँगीठी यहाँ सुलगा जाती।

माँः- घर में अनाज दाना वगैरह तो कुद है नहीं । एक बागड़ है और कुछ बरतन-बासन । सो रात भर के लिए यहाँ तंबाखू रख जाती हूँ,। अपना हुक्का ले आई हो न फुआ?

मखनी फुआः- फुआ को तंबाखू मिल जाए तो रात भर क्या पाँच रात बैठकर जाग सकती है। ओ हो हाथ खेलकर तंबाखू रखा है बिरजू की माँ ने, य वह सहुआइन, राम कहो! डस रात अफीम की गोली की तरह एक मटर भर तंबाखू रखकर चली गई गुलाब-बाग मेले और कह गई कि डिब्बा भर तंबाखू है।

बिरजू की मां चुल्हा सुलगाने लगी, चंपिया शकरकंद को मसलने लगी, बिरजू सिर पर अपने बाप को दिखलाने लगा

बिरजूः- मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने से कुछ नहीं होगा।

सभी हँसने लगे

माँः- ताखे पर तीन चार मोटे शकरकंद हैं, दे दे बिरजू को चंपिया, बेचारा शाम से ही----।

चंपियाः- बेचारा मत कहो मैया, खूब सचारा है, तुम क्या जानो, कथरी के नीचे मुंूह क्यों चल रहा था, बाबू साहब का।

बिरजूः- ही ही ही बिलैक मारटिन में पाँच शकरकंद खा लिया, हा हा हा।

सभी हँस पड़े

माँ:- एक कनवा गुड़ है। आधा दूँ फुआ?

मखनी फुआः- अरी शकरकंद तो खुद मीठा होता है, इतना क्यों डालेगी।

बैल दाना घास खाकर परस्पर देह चाटे, बिरजू की माँ तैयार हो गई, चंपिया छींट की साड़ी पहनी, बिरजू बटन के अभाव में पैंट में पटसन की डोरी बँधवाने लगा।

माँ:- उँहूँ इतनी देर तक भला पैदल चलने वाले रूके रहेंगे।

बिरजू की बप्पा बिरजू की माँ को एकटक देख रहा है। मानो नाच की लाल पान की ---------।

गाड़ी में बैठते ही बिरजू की माँ के देह में अजीब गुदगुदी लगने लगी।

माँ:- गाड़ी पर अभी बहुत जगह है, जरा दाहिनी सड़क से गाड़ी हाँकना।

बिरजूः- उड़नजहाज की तरह उड़ाओ बप्पा।

माँ:- जरा जंगी से पूछो न , उसकी पुतोहू नाच देखने चली गई क्या?

बापः- रोने की आवाज सुनकर अरे जंगी भाई काहे कन्ना रोहट हो रहा है आँगन में?

जंगी:- क्या पूछते हो , रंगी बलरामपुर से लौटा नहीं, पुतोहिया नाच देखने कैसे जाए? आसरा देखते देखते उधर गाँव की सभी औरतें चली गईं।

माँः- अरी टीशनवाली तो रोती है काहे ! आ जा झट से कपड़ा पहनकर सारी गाड़ी पड़ी हुई है। बेचारी!आ जा जल्दी।

सुनरीः- गाड़ी में जगह है ? मैं भी जाउँगी।

लरेना की बीबी भी आती है

माँः- आ जा! जे बाकी रह गई है , सब आ जाएँ जल्दी।

तीनों आती हैं बैल ने पिछला पैर फेंका।

बापः- साला! लताड़ मारकर लँगड़ी बनाएगी पुतोहू को।

सभी हँसते हैं

माँ:- रोटी देती हुई खा ले एक एक करके, सिमराहा के सरकारी कूप में पानी पी लेना। अच्छा अब एक बैसकोप का गीत तो गा तो चंपिया। डरती है काहे? जहाँ भूल जाओगी, बगल में मास्टरनी बैठी ही है।

बाप:- चल भैया ! और जरा जोर से! ग रे चंपिया , नही ंतो मैं बैलों को धीरे धीरे चलने को कहूँगा।

चंपिया:- चंदा की चाँदनी ----------।

बिरजू की माँ जंगी की पुतोहू को देखकर सोच रही है, गौने की साड़ी से एक खास किस्म की गंध निकलती है,

माँ:- मन ही मन ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लालपान की बेगम! यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ वह सचमुच लाल पान की बेगम है।

बिरजू की माँ के मन में अब कोई लालसा नहीं। उसे नींद आ रही है।

नाट्य रूपांतरण - सीताराम पटेल

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  1. प्रयास अच्छा है पर कुछ सुधार की आवस्यकता है जैसे पात्र के अभिनय वाले हिस्से को कोष्ठक में नही रखा गया है वह संवाद का ही हिस्सा होगया है . सूत्रधार को बहुत कम अवसर दिया है जबकि कहानी को आत्मसात करनाने के लिये उसकी बहुत जरूरत है क्योंकि यह एक आंचलिक कहानी है . वहाँ के परिवेश व देशकाल को स्पष्ट करने के लिये सूत्रदार की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण है

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