सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्राची - अगस्त 2017 : निबंध तुम्हारी मां कहां है // रामदरश मिश्र

‘‘मां, मेरी मां कहां है?’’

स्कूल से लौटा हुआ छोटा बच्चा उदास-उदास-सा अपनी मां के पास आया और लिपट गया.

‘‘व्हाट ब्वाय, तू क्या बोलता है? हम तुम्हारी मम्मी है. और देखो डियर, गन्दे बच्चों की तरह मां-मां नहीं कहते, मम्मा या मम्मी कहते हैं.’’

‘‘नहीं मां, मेरी मां कहां है?’’ बच्चा सुबकने लगा.

‘‘ओ डियर, तुमको क्या हो गया है? हम तुम्हारा मम्मी है.’’ कहकर मां ने आया को पुकारा, ‘‘देखो, बेबी को ले जाओ, हाथ-मुंह धुलाओ और नाश्ता दो.’’ फिर उसने बच्चे को अपने से थोड़ा दूर करके साड़ी की क्रीज ठीक की, जूड़े पर हाथ फेरा, सेण्टेड रूमाल निकालकर धीरे-धीरे रूजभरे गालों पर फिराया.

आया आयी, लेकिन बच्चा उसके साथ नहीं गया, बस्ता पटककर जिद के साथ खड़ा और मां से बोला, ‘‘नहीं मां, ठीक-ठीक बोलो, तुम्हीं मेरी मां हो? आज हमारे स्कूल में एक स्पीकार आये थे, वे कह रहे थे कि तुम लोगों की माताएं तो गांवों में हैं, खेतों में काम करती हैं, पत्थर तोड़ती हैं, लोहा पीटती हैं और भूखों मरती हैं-पैदा होते ही उनकी संतानें उनसे छीन ली जाती हैं, और सात समुन्दर पार बैठी हुई एक अंगरेज औरत के इशार पर औरतें-जिन्हें तुम लोग माताएं समझते हो-तुम्हें असली माता को भूल जाने की शिक्षा देती हैं. वास्तव में वे माताएं नहीं, आयाएं हैं-जो उस अंगरेज महिला की सेवा के लिए तुम लोगों को तैयार करती हैं. वह अंगरेज महिला इन आयाओं और तुम सबकी मालकिन है. बच्चो! जानते हो, वह कौन है?-अंगरेजी!’’

‘‘व्हाट नॉनसेंस! दीज स्टुपिड हिन्दीवालाज ऑलवेज टॉक समथिंग वेरी फनी. आई एम योर मम्मी बेबी.’’

‘‘नहीं-नहीं, वे कह रहे थे कि तुम लोग आयाएं हो, और आया बनने में बहुत बड़े सम्मान का अनुभव करती हो.’’

‘‘ओह गॉड, तुम्हारे प्रिंसिपल साहब ऐसे-ऐसे रस्टिक लोगों को बोलने के लिए कैसे एलाउ करते हैं! तुम्हारे स्कूल में ये हिन्दी-फिन्दीवाले कैसे बोलने चले आते हैं? हम अपने बच्चों को इन स्कूलों, इतनी लम्बी-लम्बी फीस देकर इसलिए पढ़ाता है कि ये बच्चे देसी लोगों और देसी भाषाओं की गन्दगी से बचे रहें. इसके लिए हम लम्बा-चौड़ा डोनेशन भी देता है, क्या यह सब सीखने के लिए? कल हम तुम्हारे प्रिंसिपल से पूछता है कि यह सब क्या हो रहा है?’’

तब तक उसी स्कूल की बड़ी क्लास में पढ़नेवाला पड़ोसी लड़का एक इंगलिश गीत गुनगुनाता हुआ वहां आ पहुंचा, ‘‘आई लव यू, ऐण्ड यू लव मी.’’

‘‘अरे मुकी, तुम्हारे स्कूल में आज वह कौन हिन्दीवाला गाली बक गया? और तुम्हारे प्रिंसिपल साहब ने इस हिन्दीवाले को बोलने के लिए कैसे बुला लिया था? और बुला भी लिया तो निकाल क्यों नहीं दिया?’’

‘‘ओह आण्टी, वह हिन्दीवाला नहीं था, वह कोई रूसी स्कॉलर था, और यहां एम्बेसी में कल्चरल अटैजी है. प्रिंसिपल ने किसी खास ‘परपज’ से बुलाया होगा! उन्हें क्या मालूम था-वह स्कूल में आकर हिन्दी-हिन्दी चिल्लाने लगेगा! आण्टी, वह कितनी बढ़िया हिन्दी बोलता था! उससे लड़कों ने चिल्लाकर कहा, ‘...अंगरेजी में बोलो.’ तो बोला-‘मुझे या तो रूसी आती है, या हिन्दी. हमारे देश का कोई भी नागरिक अंगरेजी नहीं बोलता-जानता है तो भी नहीं बोलता! अंगरेजी बोलने में वह शर्म और अपमान अनुभव करता है.’ आण्टी, वह कहता था कि तुम लोग अमरबेल हो-जिसकी अपनी जड़ें नहीं होतीं, जो पेड़ों पर फैलकर उनका रस चूस-चूसकर हरी होती रहती हैं, अपनी जमीन से उसका कोई वास्ता नहीं होता.’’

‘‘व्हाट अमरबेल, मुकी?’’

‘‘अमरबेल नहीं जानती आप आण्टी? इसे अंगरेजी में डाडर कहते हैं.’’

‘‘ओ, आई सी, दैट ब्लडी प्लाण्ट?’’

‘‘हां आण्टी, वह भी उसे ब्लडी प्लाण्ट ही कह रहा था.’’

‘‘सारी ब्याय, वह ब्लडी प्लाण्ट नहीं है, आइडियल प्लाण्ट है.’’

‘‘हां आण्टी, वह भी कह रहा था कि वह प्लाण्ट, तुम्हारे वर्ग का आइडियल प्लाण्ट है.’’

‘‘ओह नो-नो ब्याय, लीव दिस अनवाण्टेड रेफरेन्स-ऐण्ड लेट दैट रशन स्कॉलर गो टू हेल! ऐण्ड गो टू स्वीटी, शी माइट बी वेटिंग फॉर यू.’’

‘‘ऑल राइट आण्टी.’’ कहकर मुकी मस्ती से गाता हुआ स्वीटी की ओर चल पड़ा...‘‘आइ लव यू, ऐण्ड यू लव मी...’’ अन्दर जाकर अपने हिप्पी-कट बालों को एक झटका देकर पुकारा-‘‘स्वी...टी!’’

‘‘हल्लो मुकी,’’ स्वीटी की आवाज थी, और मुकी सीटी बजाता हुआ अन्दर जा पहुंचा और जाकर ग्रामोफोन पर एक इंगलिश का रेकार्ड लगा दिया और दोनों रेकार्ड की धुन पर अलमस्त होकर ट्विस्ट करने लगे.

छोटा लड़का नाश्ता करने के बाद वहां आ गया और अपनी बहन से पूछने लगा, ‘‘जीजी, मेरी मां कहां है?’’

मुकी हंसने लगा, और स्वीटी ने डांटते हुए कहा, ‘‘यू कण्ट्री ब्वाय, काण्ट यू प्रोनाउन्स सिस्टर ऑर स्वीटी? जीजी...यह जीजी क्या होता है? और ऐसा उल्टा-पुल्टा सवाल क्यों पूछता है बाबा? मम्मी तो अपने घर पर ही हैं...?’’

मुकी ने हंसते हुए, स्कूल में घटी घटना बता दी; और उसके साथ स्वीटी भी हंसने लगी-फिर दोनों रेकार्ड की धुन पर कमर और सिर हिला-हिलाकर ट्विस्ट करने लगे. और वह लड़का उदास-सा दूसरी ओर भटक गया.

और ऐसे ही तमाम छोटे-बच्चे अपनी असली मां से कटे हुए, देश में भटक रहे हैं. वे पैदा होते ही सौंप दिये जाते हैं एक अप-टू-डेट आया के हाथ, जो पाल-पोसकर उन्हें समझाती है कि तुम देशी नहीं, विदेशी बच्चे हो. लेकिन यह लड़का विदेश का पूरा रंग चढ़ने के पहले ही अपनी मां की पूछताछ करने लगा. यही तो इसकी बेचैनी है, यही तो उसके भटकाव का कारण है.

उस रूसी विद्वान ने कहा था कि तुम्हारी मां तो भारत के गांवों में है, शहरों के कारखानों में है-खेतों में काम करती हुई, पत्थर तोड़ती हुई, मिट्टी की हंसी-हंसती हुई, मिट्टी की व्यथा रोती हुई. मिट्टी की ताकत उसकी ताकत है-वही अन्न पैदा करती है, जिसे तुम लोग खाते हो; और वही वस्त्र बुनती है, जिसे तुम लोग पहनते हो; वही वे सारे सामान बनाती है, जिसे तुम काम में लाते हो और जिससे अपने को सजाते हो. लेकिन तुम लोग उसे नहीं जानते. अंगरेजी के आदेश पर ये आयाएं तुम्हें सिखाती हैं कि तुम लोग उसे भूल जाओ; और तुम भूलते ही नहीं, उसका मजाक भी उड़ाते हो, उसे गाली देते हो; कोशिश करते हो कि वह भूखी मरती रहे. कितना अभागा होता है वह बच्चा, जो मातृविहीन होता है; और उससे भी अभागा वह होता है, जो दूसरे की मां को मां समझकर, अपनी मां के होने का अहसास ही नहीं कर पाता! तुम लोग अभी नशे में हो; जब कभी नशा टूटेगा और कभी वापस लौटोगे तो मालूम पड़ेगा कि तुमने और तुम्हारे देश ने कितना खोया है! गुलामी चाहे शारीरिक हो, चाहे मानसिक उसमें आदमी विकास नहीं कर सकता. यह सच है कि तुम्हारा देश आजाद हो गया है, लेकिन तुम्हारा मन अभी आजाद नहीं हुआ है-वह अभी अंगरेजी और अंगरेजियत की दासता से बुरी तरह जकड़ा हुआ है.

कितना सच कहा था, उस विद्वान ने! इसीलिए सारे समाजवादी देशों ने-और अन्य बहुत-से देशों ने भी आजादी के साथ-साथ भाषा के प्रश्न को अपरिहार्य भाव से जोड़ रखा है. भाषा की आजादी के बिना, देश की आजादी की कल्पना भी नहीं की जा सकती. भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है-वह हमारे चरित्र का एक अंग है; वह हमारी अनुभूति, हमारी चिन्तना और हमारे जीवन-संघर्ष में रसी-बसी होती है. वह अपने साहित्य में, देश की आत्मीयता का रस और अपनी मिट्टी की ऊर्जा संजोये रहती है इसलिए जो व्यक्ति अपनी भाषा से जुड़ता है, स्वभावतः उसका चरित्र देश के सन्दर्भ में निर्मित होता है. वह भाषा हमें अपने में निहित देश की धरती की गन्ध, ऊर्जा, सांस्कृतिक परम्परा, तत्कालीन जन-जीवन की सारी खुरदरी और स्निग्ध चेतना से जोड़ती है, और हमें एक राष्ट्रीय चरित्र प्रदान करती है. आज राष्ट्रीय चेतना से जोड़नेवाली इन भारतीय भाषाओं को गंवारू, मटमैली मानकर उपेक्षा की जाती है. राष्ट्रीयता की बुनियाद के बिना ही, एक अरूप अन्तरराष्ट्रीय या सार्वभौम चेतना का स्वांग भरनेवाली अंगरेजी की पूजा होती है. अंगरेजी का फटा ढोल देशवासियों के गले में लटका दिया जाता है. जो लोग इस ढोल को अप्रासंगिक और अनावश्यक बोझ समझकर बजाने में इनकार करते हैं, उनके लिए मान लिया जाता है कि उनकी अन्तरराष्ट्रीय चेतना की खिड़की नहीं खुली है और वे इस देश में बसने लायक नहीं हैं.

किन्तु चेतना और सभ्यता की बातें तो ऊपरी हैं; इन चेहरों के पीछे जो असली चेहरा है, वह है पैसे का चेहरा. एक विशेष सुविधाजीवी वर्ग का विकृत आर्थिक चेहरा सभ्यता और अन्तरराष्ट्रीय चेतना के नकली चेहरे से ढंका है. अंगरेजी कुछ गिने-चुने लोगों को पद देती है, और पैसा देती है. वर्तमान भारतीय समाज-व्यवस्था में रुतबा तो देती ही है किन्तु रुतबा तो अमूर्त वस्तु है; मूर्त और ठोस वस्तु तो है पद और पैसा! और अन्ततोगत्वा पद का भी सम्बन्ध अधिकार और अधिकार का सम्बन्ध पैसे ही से होता है. राष्ट्रीय चरित्र से हीन और अभी भी दास मानसिकतावाला एक वर्ग यह जानता जरूर है कि अंगरेजी में फिसलते रहने से, और अंगरेजी चाल-ढाल में ढलकर सामान्य जन से कटकर जीते रहने से फिलहाल गौरव तो प्राप्त होता है; किन्तु वह गौरव एक दिन में समाप्त हो जाए, उसकी सारी अभिजात संस्कृति और सभ्यता, नफासत और हवाई बड़प्पन का चोगा एक क्षण में सरककर उसे नंगा और निःसत्व कर दे, यदि अंगरेजी के द्वारा प्राप्त होनेवाली सुविधाएं और समृद्धि उसे प्राप्त न हों. अंगरेजी के आग्रह के पीछे कुछ लोगों की यह सुविधाभोगी और अर्थमूलक चेतना है और इस चेतना को बेशर्मी से जिलाने का प्रयत्न करती रहती है अपने को समाजवादी कहनेवाली सरकार, जनवादी कहे जानेवाले नेता और राष्ट्रीय ज्ञान, सभ्यता और चेतना की खिड़की खोलने के पीछे सुविधाजीवी वर्ग का एक विराट और कुत्सित षड्यंत्र काम कर रहा है; और इस षड्यंत्र में शामिल हैं मन्त्री, नेता, उच्च व्यवसायी, उच्च सरकारी अफसर और छोटे-बड़े शिक्षाशास्त्री. और विडम्बना यह है कि मंच पर भारतीय भाषाओं के हित का ढिंढोरा पीटनेवाले भारतीय भाषाओं के शिक्षक भी व्यवहार में अंगरेजी की हिमायत ही नहीं करते, अपने बच्चों की चाल-ढाल को भी अंगरेजियत में सराबोर करने की चेष्टा करते रहते हैं, ताकि वे तो भारतीय भाषाओं के नेता बनकर कमाएं, और बेटा अंगरेजी अफसर होकर पद-धन-लाभ करें. यह दोहरा चेहरा केवल भाषा के ही क्षेत्र में नहीं है, समस्त राष्ट्रीय समस्याओं के क्षेत्र में है. इसलिए पूरा देश बड़ी-बड़ी जनवादी घोषणाओं के बावजूद, निरन्तर समस्याओं में उलझता ही जा रहा है.

अंगरेजी विशेष वर्ग को पद और पैसा देती है, इसीलिए इस वर्ग ने (जो सरकार में है, प्रभावशाली उच्च समाज में है) अंगरेजी के ज्ञान को ही प्रतिभा या मेधा का पर्याय मान लिया है. यदि एक क्षण के लिए उसे मेधा का पर्याय मान लिया जाए, तो सामाजिक समानता का डंका पीटनेवाली इस समाजवादी सरकार से पूछा जा सकता है कि उसने देहातों में इस मेधा यानी अंगरेजी-शिक्षा और वातावरण की निर्मिति का क्या प्रयत्न किया है, और खेती-बारी, धूल-कीचड़, गरीबी और अभाव में चलकर पढ़नेवाले देहाती वातावरण के बच्चों को शहरी स्कूलों के निकट, और शहर के सामान्य स्कूलों को शहर के पब्लिक स्कूलों के निकट लाने का क्या प्रयत्न किया है? देश के इतने बड़े देहाती क्षेत्र ने क्या अपराध किया है कि उसे अंगरेजी ज्ञानवाली मेधा के वरदान से वंचित किया जा रहा है! सरकार, सुविधाओं और वातावरण की इतनी भयानक असमानता के होते हुए भी, प्रतियोगिताओं में दोनों के अंगरेजी ज्ञान का समान स्तर कैसे पाना चाहती है? क्या यह सरकार आई.ए.एस., पी.सी.एस. आदि प्रतियोगी-परीक्षाओं में इंगलिश को मेधा का पर्याय बनाकर, निहायत बेशर्मी के साथ इतने बड़े देश की विराट् किसान-मजदूर जनता का खुलेआम अपमान नहीं कर रही है? क्या यह उसका कुत्सित षड्यंत्र नहीं है कि अधिकांश किसानों और मजदूरों के बेटे नौकरी में चपरासी, क्लर्क, प्राइमरी या मिडिल स्कूल के शिक्षक, सिपाही, पहरेदार बनकर रह जाएं; और कलक्टर, कमिश्नर, राजदूत, राज्यपाल, सेक्रेटरी आदि अनेक उच्च पदों पर वे बच्चे आसीन हों, जिनमें से

अधिकांश को यह नहीं मालूम कि त्रिवेन्द्रम कहां है, उड़ीसा कहां है, विवेकानन्द कौन थे, हमारा रक्षामंत्री कौन है, हमारे भारतीय पर्व कौन-कौन हैं, कौन-कौन हमारे सांस्कृतिक और साहित्यिक नेता हुए हैं और गांव का वास्तविक जीवन क्या है, ‘कामसूत्र’ के वात्स्यायन और ‘शेखर : एक जीवनी’ के वात्स्यायन एक ही व्यक्ति हैं या दो हैं? लेकिन नहीं, अंगरेजी को मेधा का पर्याय मानना झूठ और न्यस्त स्वार्थवाले वर्गों का कुत्सित षड्यंत्र है. मेधा रचनात्मक होती है, और रचनात्मकता का सम्बन्ध अपनी भाषा और परिवेश से होता है-वह दूसरों की भाषा, साहित्य और जीवन-पद्धतियों की नकल से नहीं आती. अंगरेजी यदि ज्ञान मात्र देती तो भी गनीमत थी! वह हमें अंगरेजियत देती है-हमें अपने परिवेश और परम्परा से कटना ही नहीं, उनका मजाक उड़ाता सिखाती है; वह अपने परिवेश की मिट्टी से अपने देश के अनुकूल नयी रचना करने के स्थान पर, बने-बनाये विदेशी माल का आयात करना सिखाती है; और आयात पर कोई टैक्स नहीं लगता, इसलिए वह माल अप्रतिबन्धित रूप से बाजार में आता रहता है. कितने शर्म और दुख की बात है कि जब अनेक देश अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम से सोचने-विचारने और नयी रचना की शक्ति का अप्रतिहत भाव से विकास कर रहे हैं; तब हमारे देश में भारतीय भाषाओं को सोच-विचार और रचना में बाधक मानकर उनके समर्थकों को हीन और हेय दृष्टि से देखा जाता है. हिन्दी में शोध ग्रन्थ तथा तथा एम.ए. का प्रश्न-पत्र लिखनेवाले अन्य विषयों के छात्रों को दण्डित होना पड़ता है. जब एक ओर इस तरह के लोग अपनी भाषा के माध्यम से देश की रचनात्मक शक्ति के विकास के लिए जूझ रहे हैं; तब दूसरी ओर अंगरेजी के दत्तक पुत्र लोग शीशे के कमरे में बैठकर पद और पैसे का उपभोग कर रहे हैं, और खिड़की से झांककर, राह चलनेवाली देशी गंवार जनता के सिर पर मुस्कुराकर थूक देते हैं और थूकने के बाद भी सभ्य और सुसंस्कृत होने का अपना गौरव अक्षुण्ण रखते हैं.

मेधा या प्रतिभा क्या है?-आजाद भारत इतने वर्षों में भी इसकी सही परिभाषा नहीं बना सका; इसलिए एक छोटा-सा वर्ग असली प्रतिभा का उपहास कर; अपने प्रतिभाभास के सहारे विशाल जनसमूह का अपमान करता चला जा रहा है. प्रतियोगी परीक्षाओं में होंठ बना-बनाकर बोली जाती हुई अंगरेजी-और उसके साथ-साथ मुंह खोलने, बाल और टाई ठीक करने, चम्मच और कांटा उठाने, आंख मिचकाने, बात-बात में थैंक्स और सॉरी कहने की अदा प्रतिभा का प्रतीक बन गयी है, यहां तक कि फौजी प्रतियोगिताएं भी इस अदाकारी से मुक्त नहीं हो सकी हैं. प्रतियोगी की शारीरिक और मानसिक शक्ति कितनी है, संकट के समय वह क्या सोचता है, उनसे मुक्त होने या जूझने के लिए उसके मस्तिष्क में क्या योजनाएं उगती हैं, उन्हें कैसे क्रियान्वित किया जा सकता है, देश की जमीन के प्रति उसका अनुराग कितना झूठा या सच्चा है, अपने इतिहास-भूगोल और वर्तमान जीवन-यथार्थ का उसे कितना ज्ञान है, वह युद्ध की प्रणालियों से कितना परिचित है-आदि बातों से ही उसकी मेधा की पहचान हो सकती है, और फिर कितनी विचित्र बात है कि जीवन में अनेक संकटों से निरन्तर जूझते रहनेवाले संकट झेलने के अयोग्य, और शीशों के कमरों में से ताजा-ताजा निकले हुए अंगरेजी कुमार लोग योग्य मान लिये जाते हैं.

अजीब विडम्बना है कि अंगरेजी के माध्यम से पालित-पोषित और शिक्षित बालकों में अधिकांश का सम्बन्ध नगरों और विदेशी जीवन-पद्धतियों से होता है, उन्हें शुरू से ही देशीपन की उपेक्षा करना सिखाया जाता है. वे ही अंगरेजी की बैसाखी के सहारे जब जनता के अफसर बनते हैं, तो जनता के साथ उनका कितना लगाव हो सकता है-इसे समझा जा सकता है. गांव और सामान्य जनता को भुनाना और घृणा करना ही इनका चरित्र होता है. वे गांवों की जनता के दुःख-दर्द को समझने के स्थान पर उसका मजाक उड़ाते हैं, और बड़े बने रहते हैं. आखिर इस देश में यह सब कब तक चलता रहेगा? जनता के नाम की माला जपनेवाले वामपन्थी भी तो इस प्रश्न पर नहीं सोचते. जब रूसी-स्कॉलर इस देश में आकर इस देश की असली मां की तलाश करता है, तब हमारे देशी साम्यवादी, देश-विदेश दोनों में अपनी विदेशी मां या मालकिन का आंचल पकड़े घूमते हैं, इस देश के वामपन्थी हों या दक्षिणपन्थी, इस क्षेत्र में सबके चेहरे एक-से हैं, और अन्य देशों के स्वभाषा-प्रेम को देखते हुए भी उनके बीच में भी बेशर्मी से अपनी भाषा की उपेक्षा करते रहते हैं.

‘‘तुम्हारी मां कहां है?’’ पूछता है एक रूसी, एक चेक, एक चीनी, एक जापानी, एक जर्मन, एक फ्रेंच-और हमारा देशभक्त अंगरेजी की ओर इशारा करके कहता है, ‘‘ये रहीं मेरी मम्मी!’’ और दांत निपोर देता है.

और वह विदेशी हंसता हुआ कहता है, ‘‘...नहीं, यह तुम्हारी मां नहीं है, यह तो विदेशी मालकिन है. तुम्हारी मां तो खेतों में काम कर रही है, कारखानों में कोयला झोंक रही है, वह सुबह की लाली और सावन की हरियाली उगा रही है, वह गीतांजलि और गोदान लिख रही है; वह ट्विस्ट नहीं-गर्वा, भांगड़ा, भरतनाट्यम्, कथकली नाच रही है; वह पहाड़ों, जंगलों और समुद्रों के सौन्दर्य लिख रही है, ऊसरों और रेगिस्तानों की उजाड़ गाथा सुना रही है, वह भूख और बेकारी से घायल लोगों का दर्द गा रही है, वह कोटि-कोटि उठी हुई बांहों के समवेत संघर्ष की अटूट जिजीविषा चित्रित कर रही है...’’

‘‘नहीं-नहीं, वह गंवार देशी औरत मेरी मां नहीं हो सकती!’’ हमारा देशभक्त बेशर्मी से चिल्लाता है, वह विदेशी उपहास और करुणा भरी हंसी हंस देता है.

‘‘मां, मेरी मां कहां है?’’ वह बच्चा फिर लौट आया है और अपनी मम्मी से पूछ रहा है लेकिन उसे उत्तर नहीं मिलता, उसके स्वर में दर्द है और आंखों में असीम भटकाव...!

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