शनिवार, 2 सितंबर 2017

व्यंग्य // कबीर का स्वर्ग से निकाला जाना // विनोद शंकर शुक्ल

गोकुल सुरलकर की कलाकृति

कबीर ही थे वे। हर काम दुनिया से उल्टा करने वाले। जिएं काशी में और मरे मगहर में जाकर। मगहर नरक के भय से जहां पशु भी मरना पसंद नहीं करते।

देखते ही मैं पहचान गया। कमर में लंगोटी थी, हाथ में तानपूरा और कंधे पर रामनामी चादर। मस्ती में रामधुन अलाप रहे थे-

हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या,

हमारा यार है हममें, हमन को इंतजारी क्या?

रामाऽऽ हो!

मैंने नमन किया तो बोले-बच्चा, कैसे पहचाना?

मैंने कहा-आपका फक्कड़ आलाप और साफ-सुथरी चादर देखकर। आजकल साधुओं की चादर साफ कहां होती है? जतन से ओढ़ना सबने छोड़ दिया है।

कबीर साहब हँसे, बोले-साधु चादर धुलवा क्यों नहीं लेते। धोबियों ने क्या कोई दूसरा धंधा पकड़ लिया है?

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मैंने कहा-सतगुरू, धोबी और गधे वाला जमाना गया। अब मनुष्य नहीं मशीनें कपड़े धोती है। बड़ी-बड़ी लांड्रियां खुल गई है। रोज नए-नए डिटरजेन्ट याने साबुन ऐसे पैदा हो रहे हैं, जैसे वर्षाकाल में मच्छर और युद्धकाल में मंचीय कवि पैदा हो जाते हैं।

कबीर चकित हुए, बोले-फिर चादरें साफ क्यों नहीं होती?

मैंने कहा-आधुनिक साधु-संतों के चादरों के दाग-धब्बे बड़े पक्के होते हैं। उनके सामने अच्छी से अच्छी लांड्री और तेज से तेज डिटरजेन्ट की हवा निकल जाती है।

वर्तमान साधुओं में कबीर साहब की दिलचस्पी बढ़ी। उन्होंने कहा-वत्स, तुम्हारे साधु क्या नन्हें-मुन्हें बच्चे हैं जो चादरें गंदी कर देते हैं?

मैंने कहा-गुरूदेव, आज के संतों का काम भगवत-भक्ति और भजन-कीर्तन तो है नहीं कि चादरें साफ रहें। उनके कार्यकलाप दूसरे हैं, जिनसे चादरें मैली हो जाती है।

कबीर थोड़ा झल्लाए, बोले-बच्चा, उलटबाँसियों में बात मत करो। साधु भजन नहीं करेगा तो क्या भालू नचाएगा?

मैंने उत्तर दिया-महात्मन, क्षमा करें। आज के अधिकांश संत तस्कर उद्योग में धुनी रमाएं बैठे हैं। मठों में ब्राउन शुगर, अफीम, चरस, गाँजा आदि का उद्योग चला रहे हैं। कई नेताओं के गुरू बनकर बैठ गए हैं। छद्म ज्योतिष के माध्यम से उन्हें उल्लू बना सोने-चाँदी की फसल काटते रहते है। अनेकों ने प्रवचन इंडस्ट्री खोल ली है। लोगों को भोग-विलास से दूर रहने की शिक्षा देते हैं और खुद गले तक व्यभिचार में डूबे रहते हैं।

कबीर साहब अविश्वास से बोले-बहुत विरोधाभासी बातें करते हो बच्चा। संत और तस्करी? साधु और नेताओं की संगत? महात्मा और व्यभिचार? ये सब तो विपरीत ध्रुव है!

मैंने कहा-कभी हुआ करते थे। अब चोर-चोर की तरह मौसेरे भाई हैं।

कबीर के चेहरे से खिन्नता झलकने लगी। उन्होंने क्षुब्ध स्वर में कहा-नेताओं से गठबंधन कर साधुओं को मिलता क्या है? यह तो वैसा ही हुआ, जैसे गंगाजल की गटर के पानी से मित्रता हो जाए।

मैंने कहा-गुरूवर, परस्पर अदान-प्रदान का सौदा है यह। साधुओं से नेताओं को धार्मिक संरक्षण मिलता है, बदले में नेता उन्हें आर्थिक और राजनीतिक संरक्षण प्रदान करते हैं।

कबीर बोले-धार्मिक संरक्षण मतलब? क्या धर्म भी अधर्म का संरक्षक हो सकता है?

मैंने कहा-साधुओं ने संभव कर दिखाया है, नेताओं का कुर्सी मोह विख्यात है। वे कुर्सी से वैसे ही चिपके रहना चाहते हैं, जैसे सरकारी अस्पताल के रोगी से बीमारियां। साधु उनके लिए नाना प्रकार के अनुष्ठान कराते हैं। जैसे कुर्सी सलामत महायज्ञ, विरोधी विनाश महापूजा, हाईकमान आशीर्वाद महा आरती, भ्रष्टाचार उपार्जित सम्पत्ति रक्षा महाहवन, आतंकवाद प्राण रक्षा तंत्र साधना, पुत्र-पद प्रतिष्ठार्थ देवी आराधना आदि।

कबीर साहब को मेरी बातों पर विश्वास होने लगा। उन्होंने कहा-अच्छा तो यही धार्मिक संरक्षण है?

मैंने कहा-नेताओं को ज्योतिष पर अखंड विश्वास होता है। साधु उनका उस क्षेत्र में भी मार्गदर्शन करते हैं। उन्हें यहां तक बताना पड़ता है कि हँसने के लिए कौन-सी घड़ी शुभ है और रोने के लिए शुभ नक्षत्र कौन सा है। नेता छींकते और खांसते भी हैं तो मुहूर्त देखकर। ऐसे नेता भी मिल जाएंगे, जो पेशाब भी बिना मुहूर्त निकलवाए नहीं करते ।

कबीर साहब को हँसी आ गई। उन्होंने कहा-प्रसाद के रूप में नेता क्या देते है, साधुओं को?

मैंने बताया-पद, परमिट, प्रमोशन, ट्रांसफर आदि रत्नों से उनकी झोली भर देते हैं। साधु इनकी नीलामी से मालामाल हो जाते हैं। उन्हें नेताओं से कानून को अंगूठा दिखाने का लायसेंस भी मिल जाता है। कानून साधुओं के सामने वैसा ही अपंग हो जाता है, जैसे कट्टरपंथ के सामने कट्टरपंथियों की बुद्धि और विवेक।

सुनकर कबीर साहब हरे राम!--हरे राम!! बोलने लगे।

मैंने अपनी ज्ञानराशि का पूरा कोश खोलते हुए कहा-गुरूदेव, संतो की लीलाएं अखण्ड है। ऐसे पुरूषार्थी महंतों की संस्था भी काफी है, जो हत्या या डकैती का शौक रखते हैं। चेलों को बकायदा इन कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाता है। मठों और मंदिरों की सम्पत्ति को लेकर भीषण गैंगवार होता है। सुपारियां ली और दी जाती है। अपहरण किए और कराए जाते हैं। सुन्दरियां भोगी और भगाई जाती है।

कबीर साहब बहुत विचलित हो गए। उन्होंने दोनों कानों पर हाथ रखकर कहा-शांतं पापम्--! शांतं पापम्--!!

मैंने साधुओं की एक और झांकी प्रस्तुत करते हुए कहा-गुरूवर, अनेक संत-महंतों को संसद और विधान सभा रूपी मेनकाओं ने मोहित कर रखा है। पचासों प्रकार के पाखंड करके वे चुनाव जीतते हैं और लोकतंत्र की मंदिरों में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यहां नित्य प्रति होने वाली सिर-फुटौव्वल और पगड़ी उछाल गतिविधियों में जमकर भाग लते हैं। उनके आचरण से संसद और अखाड़े में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

कबीर साहब बोले-बस करो बच्चा! यह तो पतन की पराकाष्ठा है। साधु शैतान में बदल गए हैं।

उन्हें व्यथित और व्याकुल देखकर मैंने निवेदन किया-मुझे क्षमा करें गुरूदेव! लेकिन यही आज का सत्य है। असली साधु दिखाई ही नहीं देते। वे ऐसे गायब है जैसे न्याय के मंदिरों से न्याय और शिक्षा के मंदिरों से शिक्षा।

कबीर बोले-हां बच्चा! बड़ी देर से प्यास लगी है। तुम्हारे शहर में तो दूर-दूर तक कुओं और ताल दिखाई नहीं देते। मैं खोज-खोजकर थक गया।

मैंने कहा-कैसे दिखाई देंगे। वे शहरों से निर्वासित हो गए हैं। उनकी जगह मल्टीफ्लेक्सों ने ले ली है। मल्टीरफ्लेक्स याने बहुमंजिला बाजार!

कबीर साहब इस बात पर भी चकरा गए, बोले-शहर वालों ने क्या पानी पीना छोड़ दिया है?

मैंने बताया-अब वे कोला-पेप्सी पीते हैं। ये विदेशी पेय है। शहर वाले विदेशी वस्तुएं ही पसंद करते हैं। पानी भी मिलता है पर बोतल बंद। खरीदकर पीना पड़ता है।

कबीर साहब मुझे देखते रह गए। उन्हें विश्वास नहीं हुआ, बोले -पानी की भी बिकने की नौबत आ गई? तब तो हवा की भी खैरियत नहीं। तुम्हारी सभ्यता उसे भी बंदी बना लेगी।

मैंने कहा-आदरणीय! शुद्ध हवा तो शहरों में पारस पत्थर की तरह दुर्लभ हो ही गई है। नागरिक कारखानों की विषैली हवाओं में जी रहे हैं।

विदेशी की तरह यहां भी आक्सीजन सिलेन्डर लटका कर चलने की नौबत जल्दी ही आने वाली है।

कबीर बोले-बच्चा! बोतल का पानी ही ले आओ। कंठ वैसे ही सूख रहा है जैसे जेठ में जमीन की नमी।

मैंने दौड़कर बोतल खरीद लाया। साथ में कुछ केले भी कबीर साहब ने उलट-पुलट कर बोतल देखी और बोले-बच्चा, इसमें तो मछलियों की तरह इल्लियां तैर रही हैं। इल्लियां क्या पानी शुद्ध करने के लिए डाली गई हैं?

बोतल देखकर मैं भी हैरान हो गया । शर्मिन्दा होते हुए मैंने कहा- शायद महीनों पुरानी बोतल है। गनीमत है, इसमें कुछ पानी भी है वरना दुकानदार कोरी इल्लियां पकड़ा देता है। मैं ताजी बोतल ले आता हूँ।

मैंने केला दिया तो वे मुँह में पहला टुकड़ा रखते ही थू-थू करने लगे, बोले-ये केला है या करेला? क्या अब केले भी कड़ुवे होने लगे?

मुझे बड़ी ग्लानि हुई। मैं चाहने पर भी इतने बड़े महात्मा की कोई सेवा नहीं कर पा रहा था। मैंने कहा-माफ कीजिए। कृत्रिम रूप से पकाए गये केले लगते हैं। समय से पहले पका लिए गए हैं।

कबीर हँसे-यह समय से पहले पकाना क्या होता है?

मैंने कहा-गुरूवर! सब बाजार की माया है। बाजार को पैसा कमाने की उतनी ही जल्दी रहती है, जितने तीर्थों के पंडों को जजमानों को ठगने की। अब रासायनिक क्रिया से कच्ची अवस्था में झटपट फल, अनाज व सब्जियां पका ली जाती है। रासायनिक खाद देकर पेड़ों को समय से पहले फल देने के लिए मजबूर किया जाता है। आम, अमरूद, अंगूर, अनार आदि पर आप जो रंग देखेंगे, सब नकली है। बाजार ने प्रकृति पर बाजी मार ली है।

कबीर साहब ने माथा पीट लिया। बोले-बच्चा, मुझे फल-फूल ही नहीं, मुझे तुम्हारी पूरी सभ्यता ही आप्रकृतिक नजर आ रही है।

मैंने कहा-सच कहा आपने। अप्राकृतिकता के साथ इधर सभ्यता को आतंकवाद के रोग ने भी आ दबोचा है। गली-गली बम विस्फोट हो रहे हैं और लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मारे जा रहे हैं।

कबीर साहब बोले- अच्छा! सड़क बनाने के लिए विस्फोटों से सड़क उड़ाने की बात तो सुनी थी, अब पूरी आबादियां भी उड़ाई जाने लगी है? सभ्यता विकास की बुलंदियों पर पहुँच गई है।

मैंने कहा-मुझे अचरज हो रहा है। स्वर्ग जैसी जगह को छोड़कर आप इस नरक तुल्य जगह पर कैसे आए? यहां जल, थल, नभ सभी प्रदूषण से पीड़ित है। पर्यावरण असंतुलन से धरती भीषण बुखार में तप रही है। आतंकवाद आदमी की नस्ल मिटाने पर तुला हुआ है।

कबीर साहब जोर से हँसे, बोले-आदम की तरह मैं भी स्वर्ग से निकाल दिया गया हूँ। वैसे ही बेआबरू होकर। निर्वासन भोगने पुराने घर चला आया हूँ।

सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। आप जैसे रामभक्त का निष्कासन? अपराध क्या था आपका? आप ठिठोली तो नहीं कर रहे हैं?

कबीर गंभीरता से बोले-नहीं बच्चा, राजद्रोह का आरोप है, मुझ पर। स्वर्ग में भी स्वभाव नहीं बदल सका। पाखण्डों पर प्रहार की आदत गई नहीं मेरी। मैंने देवराज इन्द्र के भ्रष्ट आचरण पर हमला बोल दिया। मेरे कवित्त से वे कुपित हो गए। दस वर्ष के निर्वासन का दंड दे दिया।

मुझे दुख हुआ। मैंने कहा-कैसी विडंबना है कि कबीरों को मौत के बाद भी चैन नहीं मिलता। देवराज को नाराज करने वाला ऐसा क्या लिख दिया था आपने?

कबीर साहब मुस्कराए, बोले- आयुष्मान, जन्नत की हकीकत भी धरती से भिन्न नहीं है। इन्द्र की तानाशाही वहां वैसे ही चलती है, जैसे तुम्हारे कथित लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की हाईकमानों की। इन्द्र के सभा में चापलूसी की तूती वैसे ही बोलती है, जैसे यहां मंत्रालयों के मंत्रणा कक्षों में चमचों की। विरोधियों के विरूद्ध षडयंत्र वैसे ही रचे जाते हैं, जैसे यहां परस्पर गठबंधन करने के बाद भी राजनीतिक दल एक-दूसरे के खिलाफ रचते रहते हैं।

मैंने कहा-मतलब पृथ्वी भी स्वर्ग का दूसरा संस्करण है। स्वर्ग की आबोहवा भी अच्छे व्यक्तियों के रहने लायक नहीं है। तब तो आपका विद्रोह गलत नहीं है। ऐसे कौन से कवित्त थे, जिन्हें निर्वासन का आधार बनाया गया?

कबीर बोले-कई थे, जिन्होंने इन्द्र को तिलमिला दिया। एक तो यही था-

सुरपति सम खल और न कोऊ

तपसिन मग मँह कांटा बोऊ।

मैंने कहा- सत्य वचन। विश्वामित्र और उनके जैसे कितने तपस्वियों का पतन इन्द्र के षडयंत्रों का ही परिणाम था।

कबीर बोले-वत्स, देवराज नारियों का बड़ा नारकीय उपयोग करते हैं। इस बात से मुझे पीड़ा पहुँची। इन्द्र ने अप्सराओं की एक फौज ही बना रखी है, जिसका एक मात्र धर्म तपस्वियों का तप खंडित करना है। मैंने इसका विरोध किया और लिखा-

सुरबालन संग कैसी छलना,

भ्रष्टकरण क्या जन्मी ललना?

मैंने समर्थन में सिर हिलाया, कहा-बिल्कुल ठीक। अप्सरा होने से दूसरा अभिशाप स्वर्ग में दूसरा नहीं है।

कबीर बोले-एक दोहे में मैंने कहा-

इन्द्रासन प्रानन तें प्यारा, जेही कारण अपराध अपारा।

मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा-गुरूदेव, कुर्सी भवानी यहाँ भी अपराधों की महाजननी है। कुर्सी के योद्धाओं ने लोकतंत्र को अपराध तंत्र में बदल दिया है। संसद से सड़क तक उन्हीं का शासन है।

कबीर बोले-जब मैंने लिखा-

देवराज नहीं सुरपति लायक

चुनें देव उत्तम सुरनायक।

तो मुझ पर देवताओं को विद्रोह के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया। इन्द्र पहले मुझे नर्क में निर्वासित करना चाहता था परन्तु चापलूस सलाहकारों ने कहा कि अपराध नर्क की नहीं, महानर्क की कोटी का है, इसे पृथ्वी पर भेज दिया जाना चाहिए।

मैंने कहा-धन्य है आप। कोई कबीर ही सुरनायक को नालायक करार दे सकता है। आगे क्या इरादा है?

कबीर बोले-बच्चा, हमारे लिए क्या स्वर्ग ओर क्या नर्क? जैसे काशी वैसे मगहर। हम तो जहां रहेंगे पाखण्डों के पहाड़ तोड़ते रहेंगे। तुम्हारी बातों से साफ लगता है यहां पाखण्डों के हिमालय खड़े हो गए है। धर्म, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, नौकरशाही, चिकित्सा, संस्कृति कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जिससे दुर्गन्ध न उठ रही हो। सबकी शल्यक्रिया जरूरी है। अन्यथा वे फोड़े समाज को शव में बदल देंगे।

मैंने कहा-सतगुरू, वक्त को कबीर की सख्त जरूरत है। श्रीगणेश कहां से करेंगे?

कबीर मुस्कराए, बोले-घर से करेंगे। धर्म हमारा घर है। सबसे ज्यादा दुर्गन्ध यहीं है। सभी धर्मों में कठमुल्लापन ऐसे बढ़ गया है जैसे हवा की शै पाकर जंगल में आग बढ़ती है। समाज को तोड़ने में धर्म सबसे आगे है। सच्चे धर्म का काम तो जोड़ना है। शुरूआत मैं जोड़ने से ही करूंगा। सबको प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ाऊंगा। भरोसा है आज भी घर जलाकर साथ देने वाले साथी मिल ही जाएंगे। अब चलता हूँ। जय सियाराम।

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35, संस्कृति, मेघ मार्केट के सामने

केतवाली मार्ग, बूढ़ापारा रायपुर

492001

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लेखक परिचय

जन्म-रायपुर, 30 दिसम्बर 1943

व्यसाय- सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष, हिन्दी एवं पत्रकारिता

शासकीय स्नातकोत्तर छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर

मूलतः-व्यंग्कार, स्तंभकार

प्रकाशित व्यंग्य संग्रह- मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं

कबिरा खड़ा चुनाव में

अस्पताल में लोकतंत्र

51 श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं

सम्पादित पुस्तकें- एक बटे ग्यारह, विविधा, गद्यरंग

सम्पादन-व्यंग्य त्रैमासिकी ‘व्यंग्यशती‘ का अनेक वर्षों तक संपादन, प्रकाशन

सम्मान- मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी सम्मान, सृजन सम्मान, वसुंधरा सम्मान

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(प्रस्तुति - बीरेन्द्र साहू )

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