शनिवार, 23 सितंबर 2017

उद्गार-४(हरदेव'शतक) // डॉ०'कुसुमाकर' आचार्य

चंचल मुखर्जी की कलाकृति
प्रभु तेरा नाम सारे जग को आराम देता,
                काम देता ,धाम देता,सुयश घनेरे हैं।
नाम की ये दौलत जो झुका सिर थाम लिया ,
                   उस को न कोई दु:ख-दर्द दरेरे है।
बैठते-उठतेऔर खाते-पीते सोते नाथ!
                 एक तेरी सूरत ए तारों चहुँफेरे है।
नाहि जप, तप बलऔर नाहिं बाहुबल,
              'कुसुमाकर' अब तो भरोसे नाथ तेरे है।१।


इसका स्वरूप कोई समझ न पाया कभी ,
             जब तक स्वयम्‌ ये हमें समझाये ना।
माया का हटा परदा सन्त सज्जनों के हित ,
                जब तक स्वयं ये सम्मुख आये ना।
जलवा अनोखा त्रिभुवनपति का  है जिसे ,
           कोई देख पाये नहीं ,जब तक दिखाये ना।
माया के  जामे में खुद ब्रह्म सद्गुरु बना ,
         मिले 'कुसुमाकर' कैसे जबलौं मिलाये ना। २।


द्वैत भावना ये करे कभी परेशान नहीं ,
                   बस रब पर एतबार होना चाहिये।
इसके ही हाथों करे जीवन समर्पित ये ,
              दिल माहि इसकी ही आस होनी चाहिये।
इसका स्वरूप हर एक में निहार कर,
              मुहब्बत हरेक संग यार होनी चाहिये ।
'कुसुमाकर' सन्त सद्गुरु हितकारी सदा ,
            इनके दरश की पियास होनी चाहिये। ३।


तेरी ही दया से हे दयानिधान कृपासिन्धु,
               सारे कामकाज जग के है सदा चलते।
सूरज सितारे चांद धरा जल आग सभी ,
                 तेरी ही आज्ञा को मान छुपते निकलते।
मूरख अबोध माया माहि हैं भुलाने प्रभु ,
           भक्त हो प्रसन्न तेरी आज्ञा में चलते।
'कुसुमाकर' चरण शरण तेरी आया दास,
             प्रभु करो रक्षा जग तापमें हैं जलते। ४।


जो कुछ दिखायी दे रहा है , वह झूठही है,
           कुटुम्ब-कबीला झूठ महल अटारी है I
बेटी - बेटे झूठ , इनसे   प्रीति लगाना झूठ ,
           जगत में आना-जाना झूठ ही सवारी है।

झूठ कर्म धर्म सब पढ़ना पढ़ाना झूठ     
             झूठी शान में फँंसा जो वह संसारी है।
सद्गुरु कृपा से जो सच पहचान लिया,
           'कुसुमाकर' दुनिया में वही निरंकारी है। ५।


सुन्दर सलोना रूप सुघर जवानी पाके,
           माया में पड़ा है निज मूल बिसराया है।
ऊँची - ऊँची महल अटारी देख मान करे ,
           एक  फूँक में ही फूला प्रभु बिसराया है।

पाँचों से फँंसा के पंजा.सब कुछ भूल गया,
               हरि ने गजब यह खेल रचाया हैं।
दाता तेरे साथ खड़ा 'कुसुमाकर' भूल गया ,
     सद्गुरु से जो भी मिला , वह मुक्ति पाया है। ६ ।


इसका स्वरूप कोई समझ न पाये यहाँ ,
            जब तक दाता खुद उसे समझाये ना।
माया का ये परदा हटा के जगदीश खुद ,
            जब तक इन्सां के सम्मुख आये ना।
माया के जामे में स्वयं ब्रहम भक्त हित,
           सद्गुरु बन यह जब तक आये ना। ७ ।


कुछ भी बनेगा नहीं सुन मेरे प्यारे भाई ,
             चाहे यहाँ करम तू कितने कमाये जा ।
पुण्यदान चाहे तुम लाखहूँ   करोड़ करो ,
            चाहे धन दौलत भाई खूब लुटाये जा ।
कुछ ना बनेगा अश्मा आगे सिर झुकाने से ,
             भले ही तू मस्तक इसी पे घिसाये जा ।
'कुसुमाकर' घण्टा बजाने से न होगा लाभ ,
        लाभ होगा सद्‌गुरु से सच ये जो पाये जा। ८ ।


गुरुसिख वही जो गुरु की हर बात माने ,
           सम माने हर्ष - शोक , मान-अपमान को।
दुःख-सुख , हानि - लाभ यश और अपयश ,
          एक-सा ही समझे वो सब भुगतान को ।
दुनिया के हर इनसान को समान माने ,
             'कुसुमाकर'सम माने राजा दरबान को।

पल-पलबोले सब कुछ तेरा भगवन,
           ऐसा जन प्राप्त होता नित कल्याण को। ९ ।


कोई - कोई सूरज को रब मानते हैं यहाँ ,
            सूरज को जल चढ़ा माँगते सहारा हैं।
कोई इनसान नभ जल को ही माने रब,
            इनके भरोसे वह करता गुजारा है।
'कुसुमाकर' कोई मसानों को झुकाये शीश,
           कोई जण्डी पीपल चढ़ाये जलधारा है।
जिसका पसारा सारा , लिखा वेद ग्रन्थों में,
         रूप- रंग नैन-नख्श सबसे ही न्यारा है। १०।


देखो जग वाले आज भरम भुलाये घूमे ,
          पूज रहे मढ़ियों को और श्मशानों को।
सबसे ही उत्तम मानव योनि पाके भूले
             और पूज  रहे देखो आज वे हैवानों को।
असल ज्ञान की तो पोथी कर दिये बन्द अब ,
            पूज रहे वेदों कुरान औ' पुरानों को।
रमे राम को सद्गुरु से 'कुसुमाकर' पायेगा ,
       मिलता रहा है ज्ञान इन्सां. से इन्सानों कोI११।


गुरुसिख वह ही कहाता यहाँ जगमाहि,
              होठों पर जिसके गुरु की ही कहानी हो।
प्यार से भरा हो दिल नाम हो जुबांँ पे सदा.
            ऐसे सन्त सज्जन की यही जिन्दगानी हो।
गुरु के नैन से देखे कान से गुरू के सुने ,
             ज्ञान सर से चुनता वो मोती लासानी हो।
गुरु मूर्ति मनधार , सबसे ही करे प्यार ,
           .'कुसुमाकर' गुरु गुणगान मनमानी हो। १२ ।


प्रभु का किया है जिन - जिन ने दरश यहाँ ,
              प्यारे बन्धु इनका सदा तू सत्कार कर।
प्रभु नित बोलता है बैठा इन के ही बीच ,
            चाहते भला तो इन्हें नित नमस्कार कर।
नकल के भीतर है बैठा ये असल छिप ,
           'गर चाहो कल्याण , इसको तो प्यार कर।
वक्त है अभी भी मिल सद्गुरु    से जानो प्रभु,
    'कुसुमाकर' व्यर्थ में न जिन्दगी ए ख्वार कर।१३।


यदि हम सब हिल मिल के रहें यहाँ, जो -
                प्यार से , ए बसुधा ही स्वर्ग बन जायेगी।
हर मानव मानव को अपना जो समझे ,
               तो मानवता सारे ही जग में दिखायेगी।
जन -जन मन में पवित्रता निवास करे ,
              प्रेममयी दृष्टि सबके ही मन भायेगी।
'कुसुमाकर' दिलों में प्रसन्नता का वास होगा ,
            चहुँओर प्रभु की ये सृष्टि सरसायेगी। १४ ।


पूरे सद्‌गुरु से जो अंग -सँग रब जाने ,
           गुरुसिख वही इस जग में कहाता है।
अहंकार त्याग जो विनम्रता को धारे नित ,
           सच्ची राह पर जिसे चलना ही भाता है।
गुरु के बताये पर एतबार सच्चा होवे,
             रजायसु मानता औ' बचन निभाता है।
ऐसे गुरुसिख की करे है   रखवाली रब ,
      'कुसुमाकर' लाखहूँ को पार ये लगाता है । १५ ।


किसने दिया है तुझे सुन्दर स्वरूप यह,
            यह खुशनुमा जग किसने रचाया है।
किसने बनाये सूरज, चाँद, सितारे सब ,
          किसने महान आसमान ये बनाया है'।
छत्तीस भोजन तुझे किसने प्रदान किये,
            'कुसुमाकर' याद कभी क्या यह आया है।
यह जग फानी , यहाँ रहना हमेशा नहीं ,
      कभी तूने सोचा यहाँ किस लिये आया है। १ ६ I


एक गुरुसिख दूजे गुरुसिख से जो मिले ,
        देखते ही प्रेम बढ़ , चाव चढ़ जाते हैं।
एक दूसरे के चरणों में अति प्रेम साथ,
           प्रभु का शुकर मना शीश वे झुकाते हैं।
भक्तों की चाल यही, भक्ति की सार यही ,
          बाल से भी सूक्ष्म असि धार बतलाते हैं।
जिसे गुरुसिख  आगे झुकना न याद रहा,
        'कुसुमाकर' गुरु वा के पास नहीं पाते हैं। १७ ।


जलती हुई ये आग आग से बुझेगी नहीं,
           'आग से बुझाना' इसे और भी बढ़ाना है।
फिरकों में एकता का खोजना है व्यर्थ बन्धु ,
                 इसमें समय देना मगज़ खपाना है।
नफरत से नफरत जीतना असंभव (है ),
            ऐसे दावे करना महज बहकाना है।
'कुसुमाकर' एकता न बिन एक जाने होगी ,
      किसी ने भी गुरु बिना रब नहीं जाना है। १८।


दीन मतिहीन, रहे मन से मलीन उन्हें ,
          तूने ही उठा के बड़े प्रेम से सँवारा है।
आकण्ठ माया में जो डूबे हुये पापी रहे ,
          क्षण में उबारा   ज्यूँ ही प्यार से निहारा है।
बड़े -बड़े पाहन हृदय भी तू ने मोम किये ,
           सन्त सज्जनों ने देखा , सारा ये नजारा है।
तेरी महिमा का गान 'कुसुमाकर' कैसे करे ,
            काम सब तेरा प्रभु नाम ये हमारा है। १९ ।


धरती ये थर-थर काँपने लगे जो यहाँ ,
           और गगन  छम-छम आँसू बहाता है।
पापों का धरती पर होता है बसेरा जब ,
             नम्रता औ' प्यार जगती से उड़ जाता है।
निन्दा नफरत और कलह कलेश बढ़े ,
              शान्ति का नाम धरती से मिट जाता है।
रूह घबराये  'कुसुमाकर' हाहाकार सुन ,
        प्रभु नर रूप धर जग. माँहि आता है।२०I


नाम धन जिसने न जीवन में प्राप्त किया,
                    वह अन्त काल में बहुत पछताता है।
नाम धनहीन लोभी , पापी , सोगी , अहंकारी ,
                     बदकिस्मत नित रोता - चिल्लाता है।
'कुसमाकर'सद्गुरु से नाम सुधारस पाया ,
               उसका तो लेखा पाप सब मिट जाता है।
सन्तजनों की पग धूलि 'गर मिल जाये ,
     पापी से भी पापी क्षण माहि तर जाता है। २१ ।


रमे राम की तलाश जंगलों में जाके करें,
         कोई - कोई अँग में भभूती भी रमाते हैं।
कोई योग साधना तो सुन्न समाधि कोई ,
           कोई - कोई गंगा जमुना में जा नहाते हैं।
कोई पूजा पाठ नित करते-कराते यहाँ ,
           'कुसुमाकर'पीर- फकीर भी मनाते हैं।
अहंकार चतुराई तज सन्त शरण आये,
          गुरु की कृपा से निज घर डेरा पाते हैं। २२ I


तन का ये घर तेरा नाश वान हैओ बन्दे,
               बन के तू यहाँ रह रहा मेहमान है।
इस तन घर माहि काम का न कुछ तेरे ,
            देखो भरा इसमें ये काँटों का सामान है।
मेहमान बन आया , निज घर मान बैठा ,
            और इसका ही कर रहा अभिमान है ।
'कुसुमाकर'तेरा घर जहाँ काल खाये नहीं,
         मौत नहीं आये जहाँ सद्गुरु की शान है।२३।


अजर-अमर तेरा घर दिखलाये गुरु ,
               जहाँ दोपहर ,रात, सुबह न शाम है।
मंजिल तुम्हारी बड़ी कीमती है जान लो ये ,
                 सूरज न चाँद न ही ताप है न घाम है।
'कुसुमाकर' अगिनी न धरती न संताप ,
             नहीं दुःख शोक है न क्रोध है न काम है।
अनुपम , अनश्वर , है मंजिल तुम्हारी जिसे ,
             सद्‌गुरु दिखाये, कहाये परमधाम है।२४ ।


प्रभु नहि मिलता है मन्दिर-मस्जिद माहि,
            न तो यह मिले काबा और काशी जाने से।
योग कर-कर यहाँ लाखों योगी हार गये,
              मिले नहीं प्रभु यूँ समाधि के लगाने से।
सोये,जागे प्रभु ना मिले,न किये सजदा है,
              और ना मिले ये गंगा जमुना नहाने से।
लोगों प्रभु मिलता है, 'कुसुमाकर'प्यार संग,
              सद्गुरु शरण आ के शीश झुकाने से।२५।


सर्वव्यापी प्रभु मेरा अगम, अगोचर है ये,
            कोई भी जगह नहीं इससे जो खाली है।
पत्ता - पत्ता देख लिया कण-कण हेर लिया,
          खोज डाली सबने यहाँ पे डाली -डाली है।
उधर उखाड़े और इधर लगाये सदा,
          'कुसुमाकर' यह इक अद्‌भुत माली है।
रूप, रँग, वेश हीन, प्रभु ने सजाये रूप ,
             हर मुखड़े पे देखो अद्‌भुत लाली है। २६ ।


मन्दिर न मस्जिद माहि रब मिलता है ,
              ना ही मिलता है रब जंगलों में जाने से I
नहीं ईश्वर मिलता है , बैठे अकेले माहि ,
            और ना मिले ये भीड़-भाड़ माहि जाने से।
भूखे-नंगे रहे कभी, कोई प्रभु पाये नहीं ,
             नहीं पाये कोई गंगा-जमुना नहाने से।
सद्‌गुरु चाहे झट पर्दा हटाये यह ,
   'कुसुमाकर' प्रभु  मिले गुरु शरण आने से I२७ ।


मानव समझता है पूजा पाठ काम आये ,
            यही पूजा पाठ हमें पार भी लगायेंगे।
जन्म-मरण के भयंकर इस चक्कर से ,
             यही कर्मकाण्ड आके मुझको बचायेंगे।
व्रत नेम रोजा औ' नमाज लोग रखते हैं,
            है ये विश्वास कि वे सँग मेरे जायेंगे।
'कुसुमाकर' काबा, काशी हज तीर्थ लाख किये ,
         गुरु से रब जाने बिना , पार नहीं पायेंगे। २८ I


तन मन धन सब तूने ही प्रदान किया,
          इसका तो एकमात्र तूही अधिकारी है।
दुनिया में बड़े-बड़े पातकी अधम तारे,
            गिनती तो इनकी, लाखहूँ  हजारी है।
बड़े भाग्यशाली 'कुसुमाकर' आज हम सब ,
             जो कि प्रभु आये खुद नर तन धारी है।
आसरा तुम्हारा नाथ, तेरे ही भरोसे हम,
             हाथों में तेरे नाथ, हुरमत हमारी है। २९ ।


शान्त है आकार , सारी सृष्टि का सृजनहार,
              पावन, पुनीत प्रभु तेरा जग सारा है।
सब तुझ में हैं और सबमें समाया तूहीं,
          सबको ही प्रेम से सजाया औ' सँवारा है।
'कुसुमाकर' सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान तू ही ,
           सन्तजनों का एक मात्र तू सहारा है I
साँस - साँस मेरी प्रभु तेरी ही अमानत है ,
            जगत में जगन्नाथ तेरा ही सहारा है। ३० I


जगत का पालन है करता जगत पाल ,
             अटल अचल जो  त्रिकालसत्य दाता है।
पावन पुनीत प्रभु प्रेम है सुहाना तेरा ,
            दीन हीन बिछुड़े हुओं को अपनाता है ।
करुणानिधान 'कुसुमाकर' कृपा से तेरी ,
              निर्धन जन धनवान बन जाता है ।
सबको ही ढेर सारी खुशियाँ प्रदान करे ,
           सब सुख प्रदाता सद्गुरु कहलाता है।३१।


इनसानियत से ही गिर जाये जो भी यहाँ,
                पशु से भी बदतर धरती का भार है।
सन्त महापुरुषों ने सबको चेताया क्योंकि ,
              आज पथ भूल गया सब संसार है I
सत्य को भूला 'कुसुमाकर' हर  व्यक्ति यहाँ ,
                  मान रहा अपने को अति होशियार है।
होगा भला तेरा ,चतुराई तज शरण आजा ,
            खुला हुआ सदा यह गुरुदरबार है। ३२ ।


सद्गुरु से जो पहचान लिया निरंकार ,
              योनियों मेंं वो फिर दुबारा नहीं आयेगा।
हरदम मस्त रहे, हों  बलायें दूर सभी,
             मौत का दुःख कभी उसे न सतायेगा।
भय किसी भांति का न उसे भयभीत करे',
               दुःख -दर्द, रोग कभी निकट न आयेगा।
अहं चतुराई तजे फिर हरि रँग मिले ,
        'कुसुमाकर'प्रभु सन्त संग मिल जायेगा।३३।


पूरे सद्गुरु से जो रब पहचान करे ,
              बीच योनियों के वह कभी नहीं जाता है।
हरदम रहता है वह मसरूर यहाँ,
           दुःख दारिद्र्य, मृत्यु भय नहीं पाता है।
सारी बलायें 'कुसुमाकर' क्षण माहि भागें,
              कोई रोग दोष वा के निकट न आता है।
चतुराई तज हरि रँग में   रमा जो जन ,
           साधु सँग पाते ही ए प्रभु मिल जाता है।३४।


निरंकार को जो निज मन में बसाये  वा के,
               चेहरे पे हरदम छाया हुआ नूर हो।
इसकी करे जो याद मन पर जीत होवे ,
              उससे दुःख और दरिद्रतायें दूर हों।
जब तक धरती है और ये जहाँन यहाँ ,
              सन्तजनों का नाम सदा मशहूर हो।
'कुसुमाकर'जिसको है एक का सहारा यह ,
           वा की पगधूली माथे लगाये जरूर हो। ३५ ।


सारी ही धरा का भले चक्कर लगा ले प्यारे ,
                तीरथ नहाये सारे , घूमे जग सारा है।
जीते जी उठाये कष्ट , जान कुरबान करे ,
                तन ए दरिन्दे खायें , दान रक्त धारा है।
साधन संयम लाख करें, रास्ते बदल के ,
            जतन अनेक करें हो न भवपारा है।
निरंकार सी चीज न कोई 'कुसुमाकर' यहाँ ,
          गुरु से जो नाम जाने पार वो उतारा है। ३६।     

       

गुरु पीर और कहलाते जग अगुवा जो ,
              जगत को बाँटने की किये तइयारी है।
अपनी चौधराई हेतु फूट डाल बन्दों में ,
               आपस में लड़ाकर कर रहे ख्वारी हैं।
जात मजहब और वर्ण आश्रम की ये,
           खींचना दीवार ऊँची कर दिये जारी हैं।
घर-घर में जो शोले भड़क रहे हैं आज ,
           'कुसुमाकर' इनकी ही कारगुजारी है। ३७ ।


कानों सुनकर के तू, आँखों देखो मेरे भाई ,
               फिर विश्वास करो ,तम में टटोलो ना ।
कथनी औ' करनी में अन्तर रहे न  कोई ,
           जीवन को इकसार करो फिर तोलो ना ।
पूर्ण सँग मिल बैठो , छोड़ दो अपूर्ण को तू ,
       सोचो ,समझो,फिर मानो, मानो तो डोलो ना।
'कुसुमाकर'सत्य पाके, सद्‌गुरु शरण छोड़ ,
            हरगिज गन्दगी में फिर से टटोलो ना।३८।


लोग कहें दुनिया में रहकर प्रभु पाना ,
                 सरल नहीं है या में बड़ी कठिनाई है।
बीवी -बच्चे , भाई-बन्धु गृहस्थ निभाते हुये ,
                   जगत में भगत कहाना कठिनाई है।
बिना ही तपस्या औ' समाधि के लगाये बिना ,
              दुनिया माहि योग कमाना कठिनाई है।
'कुसुमाकर' बलि - बलि जाऊँ सद्गुरु पर,
          जिससे सहज सूझ प्रभुजी की पाई है। ३९ ।


जनम हुआ जब प्राणी तेरा इस जग माहि,
                  तेरा मजहब या कोई ईमान नहीं था।
धरती पे आया तो तू पाक साफ बन्दा रहा ,
              पास कर्मकाण्ड का कोई सामान नहीं था।
जन्म के समय मोह माया ना तनिक रही,
               प्यारे मन माहि  कोईअहंकार नहीं था।
'कुसुमाकर' दृश्यमान सब नि:सार भ्रम ,
              पर तुझे इस पर एतबार नहीं था। ४० ।


पर उपकार की प्रवृति मन माहि होवे ,
               उर में उदारता भी सहज समाई हो।
सकारात्मक सोच , सादगी का जीवन हो ,
               सन्त सज्जनों से हमेशा आशनाई हो।
किसी की बुराई 'कुसुमाकर'भूल से भी न हो ,
              हो सके तो दूसरों की सदा ही भलाई हो।
सद्‌गुरु तेरी ही दया में जी रहे हैं सभी  ,
            ऐसा करो नाथ हर मुख पे ललाई हो। ४१ ।


अंग सँग रहता है प्रभु जो हमारे साथ ,
               यही एकमात्र यहाँ अपना हमारा है।
मन्दिर मस्जिद तीर्थ काबा काशी यही मेरा ,
               यही धन-दौलत औ' खजाना हमारा है।
सर्वसमर्थ सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान,
                  सन्तजनों का एकमात्र ए सहारा है।
सब इसमें है ए है सब में समाया हुआ ,
           'कुसुमाकर' यही जग सिरजनहारा है। ४२ ।


गुरु वो नहीं जो केवल कर्म बतलाये नित ,
           परमपिता का जो कि दरश कराये ना।
भाषण तो देवे गुरुसिखी पर ढेर सारा ,
             मगर वो गुरुसिख एक भी बनाये ना।
औरों को नितउपदेश देता रहे मगर ,
            अमल में खुद एक बात भी वो लाये ना।
'कुसुमाकर'ऐसे जन दर-दर धक्के खायें ,
          चौरासी से पर एक भी उबर पाये ना'।४३।


निष्काम हो के सन्त सेवा जो हमेशा करे ,
            प्रतिश्वाँस प्रभु सद्गुरु का ही ध्यान हो।
निसदिन चित्त लगा रहे सतसंगति में ,
               मन बच कर्म से जो एक ही समान हो।
मन में पवित्रता हो , वाणी सुमधुर बोले ,
               शुभकर्म ,मन में न जरा अभिमान हो।
'कुसुमाकर' मन में न भावना हो बदले की ,
           निन्दा और अस्तुति मानता समान हो। ४४ ।


गुरु करे कृपा तो ये पापी भी पुनीत बने ,
          पल भर में ही नृप रंक को बनाता है।
गुरु किरपा से सारे सुख दुनिया के मिलें ,
            रोग, दोष, दुःख कभी निकट न आता है।
होवे गुरु की कृपा हैवान इनसान बने ,
             सन्त सज्जनों को मिल, गले से लगाता है।
'कुसुमाकर' सबको ही खुशियाँ प्रदान करे  ,
              सद्गुरु सन्तों को सुख बरसाता है। ४ ५ ।


अगर गुरु का मिले ,तनिक इशारा प्यारे ,
            तेरा अविनाशी घर तुझे मिल जायेगा।
गुरु के इशारे से ही आत्मा स्वतन्त्र होवे ,
           अगम ठिकाना शाद तुम्हें मिल जायेगा।
गुरु कृपा से रामकृष्ण कामिल पीर बने ,
         'कुसुमाकर' सज्जनों का दिल खिल जायेगा।
तज अभिमान जो भी गुरू की शरण आये ,
          रब जान , चौरासी से वह बच जायेगा। ४६ ।


अगम , अगोचर , अलौकिक , त्रिकालसत्य,
                  अटल , अचल तेरी महिमा अपार है।
संगी- साथी बीवी-बच्चे माता-पिता, भाई-बन्धु ,
                    जितने हैं नाते सब निपटअसार हैं।
घट-घटबासी प्रभु करुणानिधान तेरी ,
              कृपा से ही पातकी तरत भवपार है।
तेरा आदि है न अन्त , तेरी लीला है अनन्त ,
         'कुसुमाकर' तू ही अविनाशी करतार है। ४७ ।


कण-कण , तृण-तृण माहि तू दिखायी  देता,
             दिशा विदिशानहूंँ के तूहीं प्रभु पार है।
तीनों काल एक रस तूँ ही है सदैव सत्य,
            तेरे बिना यह संसार ही असार है।
सर्वदुःख हारी प्रभु सर्व सुख कारी सदा ,
             तू ही सारे जगत का सिरजनहार है।
'कुसुमाकर' जिस पर होय तेरी दया दृष्टि ,
            घोर पातकी भी होता झट भवपार है। ४८ ।


बिन देखे मन यह माने नहीं , माने बिन,
              होता नहीं मेरे बन्धु दुनिया में प्यार है।
बिना प्यार होती नहीं , सपने हुँ भक्ति यहाँ ,
             और बिन भक्ति बेड़ा होता नहीं पार है।
गुरु ही दिखाता और गुरु ही मनाता यहाँ ,
            गुरु ही सिखाता कैसे किया जाता प्यार है।
बिना गुरु भक्ति नहीं , 'कुसुमाकर' शक्ति नहीं ,
            गुरु कर दया ये   दिखाता करतार है। ४९ ।


सूरज सितारे चाँद आसमान माहि नित ,
            बिना रुके निसदिन आते और जाते हैं।
पानी अग्नि धरती भी निसदिन घूमा करें ,
               किसके हुकुम से ये चक्कर लगाते हैं।
आसमान वायु जीव कोई भी अमर नहीं ,
              अचल, अडोल कभी रह नहीं पाते हैं।
'कुसुमाकर'निरंकार जिसका न रूप रँग,
            सद्गुरु दयालु  झट दरश कराते हैं। ५० ।


नाम धन दुनिया में आके जिन पाया नहीं ,
             अन्तकाल उसको पड़ेगा पछताना ही।
लोभी अहंकारी यहाँ रोता चिल्लाता भी है ,
              कहलाता दीन हीन मलिन बेदाना ही।
नाम धन हीन सब धन से विहीन मानो,
              वह बदकिस्मत चाण्डाल अनजाना ही।
'कुसुमाकर 'सद्गुरु से जिन नाम धन पाया ,
       उनका तो मिट गया आना और जाना ही। ५१ ।


तज अभिमान गुरु चरण शरण आये ,
         और गुरु कृपा से जो  रब पहचान ले।
कुछ भी असंभव नहीं है यहाँ मेरे भाई ,
          'गर इनसान निज मन माहि ठान ले।
सन्त सद्गुरु की कृपा है अति मूल्यवान ,
             तनिक सी सेवा करे , ज्यादा वरदान ले।
प्रभु हर ओर 'कुसुमाकर' विराजमान ,
      सुखी होगा वही जो गुरू की बात मान ले। ५२ ।


हर पशु प्राणी जीव जन्तु की सहेज करे ,
           सबकी सँभाल देखभाल खुद करता।
इनमें भी मानव है सबसे अधिक प्रिय ,
            सिर पर जा के प्रभु निज कर धरता।
नित चित्त हो पुनीत , मन में हो पर हित ,
                हर सन्त सज्जन यही तो नित करता।
जीत होवे चाहे हार , 'कुसुमाकर' करे प्यार ,
          यही प्यार सब के दिलों में घर करता।५३।


सत्य सद्गुरु ने है सत्य ही दिखाया हमें ,
             खुद को समझ के सहज बन जाइये।
दिल में बसायें सत्य ,सत्य के ही गायें गीत,
               सत्य के सहारे निज जीवन बिताइये।
सत्य व्यवहार और सत्य का प्रचार करें ,
                 जीवन सरल सदाचार अपनाइये।
'कुसुमाकर' सन्त सद्गुरु सम्मान करें ,
               मन माहि नित सद्भावना जगाइये।५४।


प्रभु का मिलन होवे तीरथ नहाने से ना ,
                जप तप करने या पाठ ही कराने से।
सुनेगा न तेरी यह ऊँचा स्वर बोल बोले ,
                खुश न खुशामद के सुनने सुनाने से।
जागरण से ना, ना समाधि से प्रसन्न होवे ,
                खुश होवे गुरु पद शीश के झुकाने से।
गुरु हो. प्रसन्न'कुसुमाकर' दिखाये रब,
             गुरु महिमा भव  जल पार लगाने से! ५५ ।


मधुर बचन बोले , नम्रता को धारे नित,
              मुर्शद यही तो हर एक को सिखाता है।
पर उपकार की ही भावना भरी हो यहाँ ,
                मुर्शद भलाई का ही पाठ पढ़ाता है '।
हर  इक आत्मा जो भटकी हुई है उसे ,
               जगत में घूम-घूम प्रभु से मिलाता है।
पहुँच गये जो निज घर माहि' कुसुमाकर' ,
        रब की रजा में रोज रहना सिखाता है। ५ ६ ।


कितने भी सुख में हो ,चाहे धनवान  होवे,
           राजा भी हो जगत का , करे लाखों दान है।
भीड़ हो भिखारियों की ,शान हो लासानी भले ,
              दीनों औ' अनाथों पे भले मेहरबान है।
दान करे पुण्य माने, तरस भी खाता रहे,
             जो भी माँगे सबको देवे ये वाकी शान है।
जग की शोभा जग माहि आगे न आये काम,
          आगे बस 'कुसुमाकर' एक भगवान है। ५७ ।


जिसका तू पक्ष करे , उसकी तो मौजही है ,
            उसकी जहाँ में कभी, होती नहीं हार है।
तेरी ही कृपा से उसे पूजे संसार सारा ,
               क्षण माहि उसका तो होता बेड़ा पार है।
परम दयालु तू ही उसके सँवारे काम ,
              बख्श दिया तूने उसे नाम भण्डार है।
कोई सके ना मार ,करें सब जै जयकार ,
             'कुसुमाकर' भक्तों के वश करतार है। ५८ ।


करम तमाम कर - कर सब हार गये ,
          निज कर्मों से यहाँ कोई रब पाये ना।
पाँच वक्त पढ़ते नमाज रब रिझाने को ,
             पर अब तक कोई रब रिझा पाये ना।
माला मनका को फेर - फेर भाग्य फेरते हैं ,
           मन का मगर फेर कभी फेर पाये ना।
'कुसुमाकर' तब तक कुछ भी न होगाबन्धु
           जब तक समय के गुरु को रिझाये ना। ५९ I


बिना ज्ञान कर्म कमाना सब व्यर्थ यहाँ,
             जैसे बिन मालिक के करे मजदूरी है।
बिना ज्ञानमंजिल से बिपरीत जाये जा से ,
             और बढ़ती ही जाती मंजिल से दूरी है।
रोटी-रोटी जपने से और भूख बढ़ती है,
              मिटती नहीं है यह ,बड़ी मजबूरी है।
'कुसुमाकर'यदि भवपार जाना चाहते हो ,
             शीश गुरु चरणों में झुकना जरूरी है। ६० I


भेष बना के उपदेश देते सबको जो,
              पाठ करवाते और दान दिलवाते हैं।
माथा टिकवाते और घण्टा बजवाते यहाँ ,
             तीरथों में भेज अस्नान करवाते हैं।
गृहस्थ छुड़ा के रात जागरण कराते और ,
              तप करने के लिये बनमें पठाते है।
स्वाद के मारे पड़ जन्म मरण चक्कर में ,
           'कुसुमाकर'घोर नरक महँ जाते हैं। ६१i


सतयुग माहि इसने ही भक्त हेतु यहाँ ,
             आ कर प्रहलाद को जीवन बचायो है।
त्रेता माहि राम बन रावण को नाश कियो ,
              द्वापर में कृष्ण बन कंस बध करायो है।
कलयुग में नानक फिर बूटा बन आये यहाँ,
               अवतार गुरु बचन सब के मनभायो हैं।
'कुसुमाकर' हरदेव माहि हर देव मिले ,
              माता सविन्दर वात्सल्य बरसायो हैं। ६२ ।


मेरा रब दाता ऐसा  रहे सब अंग - सँग ,
              पूरा सदगुरु मिल परदा हटाता है।
निज अभिमान त्याग पल-पल याद करे ,
              प्रभु सुमिरण सारी चिन्तायें भगाता है।
मान छोड़ सन्तों का जन जो सत्कार करे ,
             और सन्त चरणों में शीश जो झुकाता है।
'कुसुमाकर'प्रभु सद्गुरु पगधूलि लेवे ,
             वह क्षण माहि भवजल तर जाता है। ६३ I


समय जो बीत गया फिर हाथ आये नहीं ,
               अन्त  समय बस पड़े पछताना है।
धर्मराज ने जो तेरे पास भेजे यमराज ,
               उस वक्त पड़े तुझे रोना चिल्लाना है।

माता-पिता, भाई-बन्धु , बीवी - बच्चे , यार - दोस्त ,
              इनमें से कोई तेरे काम नहीं आना है ।
गोरी चिट्टी सूरत न काम आये' कुसुमाकर'
        सद्गुरु से रब जानो यही काम आना है। ६४ ।


जिसका न आदि अन्त , कोई पारावार मिले ,
             जो न बताये उसे सद्गुरु न मानिये।
कण-कण बीच है समाया निरंकार यही ,
            जो न बताये उसे सदगुरु न जानिये।
जग का सृजनहार, पालक है ए दातार ,
             जोन दिखाये उसे सद्गुरु न मानिये।
बेअन्त ए बेशुमार , धरा नभ का आधार ,
           'कुसुमाकर'सद्गुरु से यह पहचानिये। ६५ ।


एक दो नहीं हैं यहाँ भूला है जहांँन सारा ,
            नामी पहचान बिना रट रहे नाम हैं ।
मन के पीछे लग बुद्धि उल्टे चले है राह,
              गढ़ लिये देखो भगवान ए तमाम हैं '
रवि शशि बना जा ने सबको दिखाया दीप ,
             चिढ़ा रहे प्रभु को ये सुबह - ओ -शाम है।
खुशबू के स्वामीआगे 'कुसुमाकर'धूप जला ,
            सन्त सज्जनों को ये करे बदनाम हैं। ६६ ।


प्रभु तेरा हाथ होवे जिसके भी ऊपर वो,
            दुनिया में किसी से भी नहीं नाथ डरता।
अदना भी तेरी किरपा से यहाँ आला बने ,
         बड़ा - बड़ा काम एक तुच्छ व्यक्ति करता।
तेरी मरजी से प्रभु एक छोटी चींटी से भी,
              भारी भीमकाय हाथी क्षण माहि मरता।
'कुसुमाकर' एक बार गुरु पद में जो मरा ,
            वह फिर अमर है , कभी नहीं मरता। ६ ७ ।


अमर अचल अविनाशी सुखराशी प्रभु ,
             सर्व निवासी, जग सिरजनहार है।
परम दयालु दयासिन्धु तू कृपालु नाथ ,
             तेरी ही दया से भक्त होता भव पार है।
जगत का पालक तू घालक आतताइयों का ,
                     जग का उद्धार करे बन साकार है।
बिना तेरी मर्जी न पत्ता हिले 'कुसुमाकर' ,
                   सर्वसमर्थ इक तूहीं निरंकार है। ६८ ।


एकमात्र कर्त्ता है दुनिया का निरंकार ,
                जिस घट में ये घर अपना बनाता है।
मौत भी जो चाहे तो ना उसका बिगाड़ सके ,
              धर्मराज भी ना उसके करीब आता है।
दुनिया में भाग्यशाली 'कुसुमाकर' कोई - कोई,
                       सद्गुरु से यह अमृतरस पाता है।
माया मद चूर करे, सब भ्रम दूर करे ,
            रब से मिलाता यह सद्गुरु दाता है। ६९ ।


निरंकार अटल अचल गुणातीत यही ,
           साथ -साथ यह ही हरेक गुण वाला है।
हर एक शै माहि, हरदम निवास करे ,
            पर यह हर एक शै से  सदा बाला है।
इसकी है लीला तीनों लोक से निराली प्यारे ,
               सारी दुनिया से ही ए खुद भी निराला है।
रंग बिरंगी तेरी कुदरत है लीलाधारी ,
       ' कुसुमाकर समझे जो किस्मत वाला है'। ७० ।


सन्तजनों की करे संगत हमेशा जो भी,
           रब की जो सोच औ' बिचार रहे करता।
गुरु का बचन नित दिल माहि धारे और ,
             एक के सहारे  रहे रोज ही विचरता।
जगत के उपचार जतन भी सारे झूठे ,
             माया में फँसा जो मन डगमग करता।
सद्गुरु शरण में तज अभिमान आये ,
          'कुसुमाकर' जग माहि अभय विचरता। ७१ ।


परम कृपालु दीनबन्धु दयालु नाथ ,
             तुम्हरे गुणों का प्रभु कोई नहीं अन्त है।
एक ही जुबाँसे कैसे तेरे सारे गुणगायें ,
          तुझ सा जहाँ में नहीं और भगवन्त है।
सभी दातों का है दाता , स्वयं तू न पीता खाता,
             काल के न वश आता, महिमा अनन्त है।
सद्गुरु  चरणों में आया 'कुसुमाकर' जो ,
         रब पा के खुशहाल हो गया वो सन्त है। ७२ ।


सारे संसार का सृजन हार, करतार,
            सकल ए सृष्टि जिन स्वयं संँवारा है।
सारी सृष्टि में है नरतन धारी सर्वप्रिय,
             प्रभु ने भी सारा स्नेह इस पे उतारा है।
गफलत में ए जग जनक न जान पाया  ,
             हीरा जनम इन व्यर्थ ही गुजारा है।
जीवन सफल यहाँ उसी का है 'कुसुमाकर',
           गुरू से जनक जान जीवन सँवारा है। ७३ ।


प्रभु ना मिले हैं कभी तीरथ  स्नान किये
            नहीं यह मिले कभी धूनी के  रमाने से ।
न हीं जपकर के न तप कर पाये कोई,
              नहीं प्रभु मिले कभी पाठ के कराने से।
कभी नहीं प्रभु तक पहुँचे आवाज तेरी ,
           सुनेगा ये नहीं ऊँचे स्वर माहि गाने से।
खुश नहीं होता कभी सुन के प्रशंसा प्रभु,
      'कुसुमाकर'खुश गुरु शरण में आने से। ७४ ।


नाम सब रोगों की दवाई एकमात्र यहाँ ,
              सारे दुःख दरद ये क्षण में मिटाये है।
इतनी है शान्ति यामें लोग सोच पाते नहीं,     
               बिगड़ी हुई भी बात तुरत बनाये है।
जिसके नयन में ना नूर होवे मेरे बन्धु ,
         उसको भी सीधी सच्ची राह ये दिखाये है।
स्वर्ग बन जाता है वो  घर  'कुसुमाकर' जहाँ ,
       जिस घर माहि प्रभु नाम बस जाये है।७५।


सारी दुनिया का करतार यही जगन्नाथ ,
             रात दिन जगत की करे रखवाली है।
प्रभु के लिये न प्यार जिनके दिलों में वह ,
               सोच और समझ से एकदम खाली है।
घट-घट अन्दर विराजमान आठोंयाम,
            खलकत सारी भूली ऐसी मतवाली है।
'कुसुमाकर' उसका जनम है सफल यहाँ,
   जिसने ये नाम निधि सद्गुरु से पा ली है।७६।


सद्गुरु महिमा का गान ऐसे करें हम ,
           चढ़ी रहे निसदिन नाम की खुमारी है।
निर्मल हो तन मन , निर्मल ए वाणी हो वे ,
            दूर होवे अहं की, मान की बीमारी है।
सकल पदार्थ मिले, दिलों के कुसुम खिले ,
               महक उठेगी यह जग फुलवारी है।
सद्‌गुरु  रीझ जाये , रूह ब्रह्म मिल जाये,
       गुरु चरणों पे, 'कुसुमाकर' बलिहारी है ७७ ।


बसा  ये अनूप रूप कण-कण माहि तेरा,
         दिशा-विदिशाओं के भी तूहीं आर पार है।

तूहीं है त्रिकाल सत्य , परम पुनीत तूहीं ,
            तूहीं सारे जगत का सिरजनहार है।
रह घट-घट माहि , सबकी सहाय करे ,
             हरे दुःख - दारिद तूहीं तो करतार है।
'कुसुमाकर' जिस पर मेहर-ए-नजर हुई ,
         देखते ही देखते हुआ वो भवपार है। ७ ८ ।


परम दयालु जगदीश्वर तेरी आज्ञा ही ,
            चला रही है ए नित रवि शशि तारों को।
तेरा ही हुकुम मान , रुका है ए धरातल, 
            चला रहा नित चुपचाप जलधारों को।
अन्दर ही अन्दर बनाई ऐसीआग नाथ,
           मात करे 'कुसुमाकर' जलते अँंगारों को ।
वायु जीव आसमान सब को चलाये तूहीं ,
    लीलाधारी तू ही घुमा रहा नव द्वारों को। ७९ ।


जिसके   है नूर से ए सारा जग पैदा हुआ ,
            पवित्र इलाही उस नूर को तू जानले।
जिस जगदीश्वर का अंश ज्योति मानव तू ,
            उस महा ज्योति की तो कर पहचान ले'।
कतरें भरे हैं लाखों लाख जिस सागर में,
            जिसमें है मिलना उसे तो अब जान ले।
निरंकार का तू अंश , रूप 'कुसुमाकर' है ,
       गुरु पद शीश झुका , कर पहचान ले । ८० ।


पूर्ण सद्गुरु दर आये को न ठुकराये ,
             गुण-दोष , ऐब न शबाब चित्त धरता।
कर्म धर्म  पूजा पाठ का नहीं हिसाब कोई ,
          खान-पान वस्त्र से न नफरत करता।
मानव के हित हेतु गुरु का विशाल दिल ,
           सबके ही दुःख दर्द प्रभु खुद हरता।
'कुसुमाकर'सद्गुरु भक्त हितकारी सदा ,
          हर इक मानव को खुशहाल करता। ८१ ।


पूर्ण सद्गुरु निज भक्तों के हित हेतु ,
               हर मुश्किल को ए करता आसान है ၊
भक्तों की देखभाल , खुद करता कृपाल ,
              कृपा भक्तों पे करता है, एहसान है |
भक्तों की झोली भरता है प्रभु क्षण माहि ,
             हर आई विपत्ति दूर करता ,महान है।
.'कुसुमाकर' लाभ , जीत मिले हर ओर उसे ,
             धन्य गुरुदेव तेरी महिमा महान है। ८२ I


गाफिल ओ मानव सचेत हो जा दुनिया में ,
              मंजिल तुम्हारी प्यारे बड़ी मूल्यवान है।
सुबह दोपहरी औ' शाम देर रात तक ,
           माया माहि भूला रहता है जो , नादान है। 
दुःख शोक सन्ताप, अग्नि धरती भी नहीं,
              और न मंजिल तेरी खुला आसमान है।
गुरु चरणों में 'कुसुमाकर'सारा भेद मिले,
           मिले क्षण माहि तुझे अमर मकानहै।८३।


तूही निरंकार इक तूही निरंकार प्रभु,
           तूही निरंकार इक तूही निरंकार है।
तूही निरंकार तेरे नाम काआधार नाथ,
            तूही निरंकार नहीं तेरा वारा पार है।
तूही निरंकार तेरा सारा कारबार प्रभु,
             तूही निरंकार तेरी महिमा अपार है।
तूही निरंकार इक सद्गुरु का प्यार,
         'कुसुमाकर'चरणों पे नत बारम्बार है।८४।


प्रभु इस दुनिया में तेरे सिवा कौन मेरा,
          किसको सुनाऊँ हाल-ए-दिल प्रभुअपना।
माता-पिता भाई बन्धु यार दोस्त स्वार्थरत,
           इन से तो सुख सोचना भी हुआ सपना।
मुख में है राम और बगल में छूरी लिये,
             राम नाम जपना पराया माल अपना।
सच्चा सद्गुरु दर जब मिला 'कुसुमाकर',
       चरणों पे स्वयं शीश झुक गया अपना।८५।


परम प्रभु है यह जगत का स्वामी एक ,
               रात दिन करता ये जग रखवाली है।
प्यार नहीं जिनके मनों में इसके लिये है,
       वो तो बस सोच औ' समझ से ही खाली है।
घट-घट अन्दर निवास जिसका है यहाँ ,
          सबको प्रदान करता जो खुशहाली है।
गुरु चरणों में 'कुसुमाकर' जिन राज जाना ,                            ,    

उनकी तो दिन ईद,रात को दिवाली है। ८६I


एक ही पिता की यह सब सन्तान यहाँ,
       छोटी बड़ी जात का  न कहीं भी निशान है।
जन्म तो सभी ने लिया एक सा ही दुनिया में ,
            छोटा बड़ा बना के न भेजा भगवान है।
प्रभु परमेश्वर जगत्पाल साझा ही है ,
              इस दर कोई राजा है न दरबान है।
प्रभु सद्गुरु देखे एक सा ही 'कुसुमाकर',
             भेद नहीं यहाँ निरधन धनवान है। ८७ ।


झूठी दुनिया है झूठी नगरी , हैं झूठे लोग,
             झूठा यहाँ राजा और झूठा संसार है।
झूठे बेटी बेटे झूठे , झूठे कुटुम्ब कबीले सारे,
         झूठा खाना पीना झूठा, झूठा कारोबार है।
झूठी सारी महल अटारी झूठा गुमान है,
        झूठा सोना चाँदी , झूठा लोभ अहंकार है।
       श्वाँस का भाँडा झूठा जिस पर गुरूर करे,
          'कुसुमाकर'जिस पे तू करे एतबार है।८८।


'गर इनसान को गुरु का ज्ञान मिल जाये ,
            वह क्षण माहि रब घर दिखलाता है।
इनसान घूमता है भरम भुलेखेे  पड़,
             गुरु इन्हें मुक्ति का पथ बतलाता है।
जिसका न रूप और रंग कुछ भी है यहाँ ,
             गुरु इस रँग में ही सब को रँगाता है।
ज्ञान गुरु का यही सन्तों की पूँजी प्यारे ,
'कुसुमाकर' पाया जोवो आताहै न जाताहै।८९।


जितना सयाना बन्दा हो वे इस जग माहि,
          उतनी ही मौत उस बन्दे को डराती है।
जैसे-जैसे कदम बढ़ाती जाये करनी ए,
           प्यास भी वैसे-वैसे बढ़ती ही जाती है।
दिल में लगी है आग हबस बड़ाई की जो ,
             दरिया के जल से वो बुझ नहीं पाती है।
नाम 'कुसुमाकर' सन्त सद्गुरु का जो लेवे,
          मौत उस बन्दे के निकट न आती है। ९० ।


निर्धन जन का तो दाता धन तूहीं एक ,
            माल खजाना बस इक तेरा नाम है।
जिस बेघर का जमाने में न घर कोई ,
           उसका तो केवल ठिकाना तेराधाम है।
जिस मानव के है मन में   न मान कोई,
            उसको तो तू ही देता खुद ए स्वनाम है।
तेरी बड़ाई कैसे करे 'कुसुमाकर' नाथ ,
       गुरु बख्शिश है और लाखों प्रणाम है। ९१ ।


जिनके गुनाहों का है कोई भी शुमार नहीं ,
             तेरी किरपा से झट होता भवपार है।
लकड़ी का होवे अम्बार चाहे जितना ही ,
          तनिक-सी आग से वो होता जल छार है।
तेरी बख्शिश के प्रताप , निष्पाप बने ,
             अपना स्वरूप जान करता विहार है।
'कुसुमाकर'तेरी ही कृपा से सब लोग तरे ,
       तेरा नाम ही तो प्रभु मुक्ति का द्वार है।९२।


गुरुदर आया तन मन धन मान त्याग,
           सदगुरु किरपा से पाया निजधाम है।
शाहों का है शाह, नित देता है पनाह यही ,
           देता ए इलाही दात दाता सुख धाम है।

कृपा से तुम्हारी नाथ मँगतों की झोली भरे ,
           मिटे दुःख  दारिद  और पाये विश्राम है।
लोक ए सुखी हो परलोक हो सुहेला नाथ ,

  सुख पाया 'कुसुमाकर' लाख हूँ प्रणाम है। ९३ ।


परम कृपालु कृपा सिन्धु दयानाथ प्रभु ,
            तेरे दर आके सारा दुःख मिट जाता है।
मैं हूँ भिखारी तेरे दर का हमेशा नाथ,
            युगों - युगों से  तू् प्रभु सर्व सुखदाता है।
बड़ा खुशनसीब है वो , भूल से भी आया जो,
                   तेरी कृपा से भव जल तर जाता है।
'कुसुमाकर' चरणों में तेरे नित रह सके ,
      इतना दो वरदान , तू ही पिता माता है। ९४ ।


एक ही यहाँ है सारे जगत का स्वामी एक ,
             निज मन को ए एक बात बतलाई है।
' और झमेले सब दुनिया के खत्म करो' ,
             बात ए गुरु से एक तूने यही पाई है।
एक ही की पूजा एक ही का नित सुमिरन ,
                 एक यही सद्गुरुअलिफ पढ़ाई है।
जिस एक को है बाकी रहना जगत माहि,
     'कुसुमाकर' गुरु ने वो राह दिखलाई है। ९५।



परम कृपालु कृपा सिन्धु    नररूप हरि ,
           फाड़कर खम्भा प्रहलाद को बचायो है।
रावण को जब अत्याचार बढ़ गयो नाथ ,
            राम बन कुल सह उसे निबटायो है।
तव भक्तों पे जब कंस अत्याचार कियो ,
            कृष्ण रूप धर उसे क्षण में मिटायो है।
कितना खुशकिस्मत आज' कुसुमाकर' जग ,
         माता सविन्दर हरदेव आज आये हैं। ९६ ।


प्रभु तुम परम प्रतापी औ' त्रिकालसत्य,
            अलख निरंजन तू, तूहीं करतार है।
दीन बन्धु दयासिन्धु, भक्तों  के रक्षक तू,
          तेरी ही दया से भक्त होता भव पार है।
पालन जगत का तू करता है निरंकार ,
           सबको ही देता दात, दाता तू  दातार है।
रसना समर्थनहीं कैसे तेरा यश गाये ,
     'कुसुमाकर' महिमा तुम्हारी ए अपार है।९७।


निष्काम होके सन्त सज्जनों की सेवा करें,
             प्रभु सद्‌गुरु का लें नाम हर साँस में |
निस दिन ध्यान ये लगायें सतसंगति में ,
             मन वाणी कर्म गुरु आज्ञा की आस में I
तन और मन में पवित्रता हमेशा रखें ,
           और कभी भी न फँसें व्यर्थ बकवास में।
'कुसुमाकर' मीठे बोल औषधि का काम करें ,
    सारा जग जीत लेवें वाणी की मिठास में।९८।


मन हो उदार उपकार के हों भाव नित,
            सन्त सज्जनों से मेल भाव ही बढ़ाइये।
आदमी हमेशा सोच सकारात्मक  राखें ,
             दिल से दुई की भाई भावना भुलाइए।
जहाँ - जहाँ जायें , प्रभु सद्गुरु की चर्चा करें ,
                  तन मन धन सन्त सेवा में लगाइये।
सब जग प्रभु का स्वरूप' कुसुमाकर' यह ,
     हाथ जोड़ सबको ही शीश झुकाइए। ९९ ।


तन तेरा मन तेरा धन भी तुम्हारा नाथ,
             जगत तुम्हारा , जगजीवन तुम्हारा है।
मान तज जो भी तेरी, चरण शरण आया ,
            उसके तो जीवन का एक तू सहारा है।
एक दो की बात नहीं , लाख हूँ करोड़ यहाँ ,
                सन्तजन ऐसे जिन्हें तुमने उबारा है I
'कुसुमाकर'तेरा एहसानमन्द सदानाथ,
   आड़े वक्त तुमने ही दिया ए सहारा है। १००၊


X           x           x             X               X
             ०     इति हरदेव शतक ०

             ------ = e-------।_,

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