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शशांक मिश्र भारती के पन्‍द्रह हाइकु

प्रणव सोनी की कलाकृति

01-

एक-दो-तीन

ताड़ना है सहती,

मौन न तोड़े।


02-

आरोप लगे

अवैध व्‍यापार के,

हंसा गुलाब।


03-

चरित्र हीन

कांच सा बिखरता,

हंसते सब।

04-

शहर हंसा

कांच टूटता देख,

रोया बुधुआ।


05-

दानवता है

विजय श्री पा रही,

मूल्‍य गिरते।


06-

भड़क जाते

उठती उंगली देख,

चार किधर।


07-

विश्‍वास घात

इतिहास की हत्‍या,

स्वयं हंसता।

08-

दूर दृष्‍टि

शून्‍य में हैं ताकते,

न कि धरती।


09 -

उड़ते खग

मचलते हैं बच्‍चे,

वृद्ध तो नहीं।


10 -

होता पतन

नैतिक मूल्‍यों का,

न कि मानवता।


11-

मन का जले

अगर रावण तो

हो दशहरा।


12-

पुतले जले

हैं हंसते रावण

घर- घर।


13 -

स्‍वार्थ उनका

हम सब पिसते

हर चुनाव।

14 -

पाक है साफ

उनके लिए अब

लोभ सप्रा का।


15 -

गधे गैंडे भी

प्रचार पा गये हैं

इस चुनाव में।


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शशांक मिश्र भारती

सम्‍पादक देवसुधा

हिन्‍दी सदन बड़ागांव

शाहजहांपुर -242401 उ0प्र0

ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com

कविता 1646847140751063264

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