शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

ज्योत्स्ना प्रदीप की कविताएँ

नेहा राजपाल की कलाकृति

1-
राम की चरण पादुकाएँ

मै बनना   चाहूँ तरु ऐसा, जो शीघ्र से ही  सूख जाए
फिर उस  लकड़ी से बनें मेरे राम की  चरण पादुकाएँ ।|

श्री राम  मुझे ही पहने तो, चरणों में मैं दबी रहूँगी
क्या  जाने सुख राम  मेरा, मैं तो  सुखों से लदी रहूँगी

श्रीराम मुझ बिन न रह पाएँगे हर क्षण अपने पास धरे
राजमहल में रहे रामजी या फिर  वन में वास करें ।

जब लेंगें जल- समाधि राम ,सरयू तट मुझे रख जाएँगे
बाट युगों -युगों देखूँगी मैं  ,राम जल से अब आएँगे ।
-0-

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2

-जल  (चौपाई)

कितना प्यारा निर्मल जल है
वर्तमान है ,इससे कल है ॥
घन का देखो मन  उदार  है
खुद मिट जाता जल अपार  है ॥

ज्यों गुरु माता ज्ञान छात्र को
नदियाँ भरती  सिन्धु-पात्र को ।।
सागर कितना तरल -सरल था
निज सीमा में  इसका जल था।।

मानव   की जो थी   सौगातें 
  अब ना करती मीठी बातें  ॥
सागर झरनें , नदी ,ताल   ये 
कभी सुनामी कभी काल ये ॥

दुख  से भरती भोली अचला
कैसा जल ने चोला बदला ।।
धर्म -कर्म   हम भुला रहे है
सुख अपनें खुद सुला रहे है।।

मिलकर सब ये काम करें हम
आओ इसका मान करे हम।।
जल को फिर से  सुधा बनाओ
जल है जीवन , सुधा  बचाओ
-0-


     क्षणिकाएँ
1
लहूलुहान

दुल्हन की
हथेली पर
सुबह की लाली
   थी मेहरबान
जबकि मेहंदी ....
लहूलुहान !

2
  दुर्ग

वो बुज़ुर्ग है !
नहीं......,
उसकी छत्र-छाया में
बैठो तो सही
आज के तूफानों से  बचाने वाला
वो ही तो
  दुर्ग मज़बूतहै ।

3
रिश्ते

कुछ !रिश्ते
कितने आम हो गए  !
बस हस्ताक्षर से ही.…
  तमाम हो गए !

4
छोटी- सी लड़की

महानगर की
वो छोटी- सी लड़की
पता भी न चला.…
जाने कब
बड़ी हो गई ?
किसी विरोध में
भीड़  के साथ
वो भी खड़ी   हो गई !

5
शर्म

विषैले सर्प
शर्म से
कम  नज़र आने लगे
देखकर आज के इंसान को
जो स्वयं ही
विष उगाने  लगे ।

6
बस एक   दिया ।

केक के चारों ओर
इतनी मोमबत्तियाँ !
कुछ रौशनी
उस झोपड़ी में भी पहुँचा दो
जो बंगले के पीछे
लेकर खड़ी  है
बस एक   दिया ।

7
मुजरिम

वो उसके अरमानों का
  गला घोंट कर
फरार हो गया,
  मुजरिम न कहलाया
मगर किसी की
‘नाकामयाब हत्या’
  की कोशिश में
फ़ौरन गिरफ्तार हो गया ।

8
भेड़िया

गुलाबो का कहना था -
जो कल गुज़र गया ,
वो आदमी नहीं था
भेड़िया था
  ,बस........
  मेमने का लिबास
पहना था

9-
घाव एक शब्द का

    
हमारे अपने ही...
एक शब्द से भी,
घाव दे जाते है।
उन्हे पता भी नहीं ,
वो जन्मों का अलगाव दे जाते है।
-0-

10
  अन्तर

नागफनी..
काँटों से भरी ...पर सीधी,
उसे छूने से हर कोई कतराता है।
वो छुई -मुई....
हया से सिमटी,
तभी तो ,जो चाहे उसे
यूँ ही छू जाता है।
-0-
 

ज्योत्स्ना  प्रदीप

जालंधर -पंजाब

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