शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

व्यंग्य // बाढ़ की पीड़ा और प्रसन्नता // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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भारत जैसे अपने देश में हर साल किसी न किसी जगह बाढ़ ज़रूर आती है। कुछ इलाके तो बाढ़ को बहुत ही प्रिय हैं। वहां तो प्रतिवर्ष यह पधारती ही है, जैसे उत्तर-प्रदेश का पूर्वी इलाक़ा और बिहार। बाढ़ आती है तो स्थानीय लोगों पर मानो कहर टूट पड़ता है, ख़ास तौर पर गरीब-गुरबा जनता पर। बाढ़ के भुक्त्तभोगियों की पीड़ा बस वे खुद ही जानते हैं। पैसे वाले तो अपना कोई न कोई ठिकाना तलाश ही लेते हैं।

लेकिन बाढ़ केवल पीड़ा ही नहीं लाती। प्रसन्नता भी लाती हैं। जितनी भी प्राकृतिक आपदाएं हैं उन सबकी एक सी फितरत है। बाढ़ हो, सूखा हो, या ज़लज़ला – ऐसी सभी स्थितियों से निबटने के लिए सरकार अरबों खरबों रुपया लुटा देती है। सरकारी अफसर धड़ल्ले से अपनी और थोड़ी-बहुत बाढ़ की स्थिति को सुधारने के लिए उसका बेहतर उपयोग करते पाए जाते हैं। आप उन्हें देखकर सहज ही अंदाज़ लगा सकते हैं की वे अपने काम में कितने मशगूल और मगन हैं। खुशी उनकी छिपाए नहीं छिपती। साल भर बाद बड़ी मुश्किल से उन्हें मौक़ा मिला है कि अपनी ऊपरी कमाई में थोड़ी बढ़ोतरी (पढ़ें, बाढ़) ला सकें।

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बाढ़ का शाब्दिक अर्थ वृद्धि से है। अधिक वर्षा से नदियों में बाढ़ आ जाती है, पानी से लबालब वे अपने तट तोड़ने लगती हैं। बाढ़ ग्रस्त लोगों पर दुःख का पहाड़ टूटने लगता है। बाढ़ का ‘आना’ तो कष्टप्रद होता ही है, उसका लौटना तो और भी तबाही लाता प्रतीत होता है। उसकी विनाशकारी लीला तब और भी रंग लाती है। संक्रामक बीमारियाँ बाढ़ की तरह फ़ैल जाती हैं।

किन्तु बाढ़ का कल-कल करता पानी दूसरों की पीड़ा से लापरवाह अपनी असीम प्रसन्नता को ज़ाहिर करता है। उसी प्रसन्न अनुभूति को प्राप्त करने के लिए अफसरों की पत्नी और बच्चे गदगद होकर बाढ़ “देखने” जाते हैं। नेता लोग ज़मीन पर पानी के सैलाब का जायज़ा लेने “हवाई सर्वे” करते हैं। पत्रकार घर बैठे ‘खबर-कथाएँ’ बना लेते हैं। व्यंग्यकार (बिना मांगे) एकाध व्यंग्य घसीट मारते हैं। सभी का वक्त अच्छा गुज़र जाता है। विरोधी पक्ष को भड़ास निकालने के लिए खासा मसाला हाथ लग जाता है। बाढ़ में अपनी-अपनी तरह से सभी बह जाते हैं।

किसी ने एक किताब लिखी है। नाम है, ‘एवरी बडी लव्ज़ अ गुड ड्राउट’ (एक भरपूर सूखा हर किसी को पसंद है)। मुझे पूरी उम्मीद है कि कोई न कोई एक पूरक किताब ‘एवरी बडी लव्ज़ अ गुड फ्लड’ (हर किसी को एक भरपूर बाढ़ पसंद है), भी ज़रूर लिखेगा। नेता, अफसर, उनकी पत्नियां, बच्चे, दलाल आदि सभी बड़ी बेकरारी से बाढ़ का इंतज़ार करते हैं।

बाढ़ की स्थितियों को स्थाई रूप से समाप्त करने, या नियंत्रित करने में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती। विज्ञान काफी आगे बढ़ गया है और बाढ़ को स्थाई रूप से नियंत्रित करना अब बेशक संभव है। लेकिन अंडा देने वाली मुर्गी को भला कौन मारना चाहेगा ? बाढ़ है तो उसके नाम पर पैसा मिलता है। उसे मिल-बाँट कर खाया जाता है। बाढ़ का ही स्थाई रूप से खात्मा कर देंगे तो क्या खाएंगे और क्या कमाएंगे ?

बाढ़ के रूप अनेक हैं। अति वर्षा से नदियों में पानी की बाढ़ तो आती ही है, लेकिन जहां जहां जिस किसी भी वस्तु की बेरोक-टोक वृद्धि होने लगती है, उसकी भी मानो बाढ़ आ जाती है। कुछ लोगों के पास रूपए-पैसे की इतनी बाढ़ होती है कि संभाले नहीं संभलती। भोग करते करते वे अघा जाते हैं। ऊपर की कमाई है, खुलासा उसका कर नहीं सकते। दान कर नहीं सकते। बड़ी जुगत से कमाया है, बेवकूफों को क्यों बाँट दें? अंतत: सारी धन-दौलत बाढ़ में ही बह जाती है ! यही उसकी नियत हैं।

बाढ़ आती है, बाढ़ होती है, बाढ़ रुकती है, बाढ़ बढ़ती है, बाढ़ चढ़ती है, बाढ़ घटती है – क्या नहीं करती है बाढ़ ? बाढ़ भाँति-भाँति के करतब करती है। करतब दिखाती है। होशियारी बरतने की मांग करती है बाढ़ !

-- डा.सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

-१, सर्कुलर रोड, / १०, एच आई जी

इलाहाबाद -२११००१

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  1. वाह रे बाढ़ जो झेले वो जाने बाकियों की मस्ती |

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