शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

व्यंग्य // राष्ट्र ऋषियों के सम्मान-अपमान का प्रश्न और पुलिसिया डंडे // डॉ. प्रदीप उपाध्याय

आखिर पुलिसिया डंडे से उनका  साक्षात्कार हो ही गया और साक्षात्कार भी हुआ तो शिक्षक दिवस पर जबकि उनके पाद पूजन होना थे और खाकी के खौफ में दूसरी ही पूजा करवा बैठे!वे तो  माड़साब हैं,शिक्षक दिवस पर उत्तर प्रदेश की राजधानी और नजाकत के शहर लखनऊ में डंडे चल जाएं,ऐसी तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता,आखिर यह कैसे हो गया!क्या लोकतंत्र के मंदिर में अपनी आवाज नहीं उठायी जा सकती! अपनी बात रखने,एक अदद ज्ञापन देने और थोड़ी बहुत नारेबाजी पेलने  गुरुजी समूह में नहीं जा सकते!गुरुजी भी कौन से वाले हैं जिन्होंने देश-प्रदेश को बड़े ही ज्ञानवान नेता शिक्षित कर दिये हैं, जिनके पढ़ाये-सिखाये छात्र आज मंत्री-संत्री हैं,आई.ए.एस,आई.पी.एस. हैं। डॉक्टर हैं,इंजीनियर हैं,वैज्ञानिक हैं। देश-विदेश में बड़े-बड़े पदों पर हैं। ऐसे महान गुरुवरों पर पिद्दे पुलिसकर्मियों ने लाठी भांज दी!

[ads-post]

माना कि पुलिस वालों का काम ही यही है, पुलिस वाले दिमाग से कम जुबान और डंडे से ज्यादा काम लेते हैं लेकिन क्या यह सही है कि गुरुजनों पर ही डंडे चलाये जाएं!क्या उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं कि शिक्षकों का भी कोई दिवस होता है जिसमें उन्हें हार-फूल मिलते हैं, प्रशस्ति पत्र मिलता है, सम्मान मिलता है। अब वह जमाना तो रहा नहीं कि गुरु-गोविन्द दोनों सामने खड़े दिख जाएं तो शिष्य पसोपेश में पड़ जाए कि किसके चरणों में धोंक दे । अब धोंक देने का जमाना नहीं रहा,वह तो शिक्षक जगत अपने शिष्यों का आभारी है कि उनके लिए निर्धारित दिवस पर शिष्यगण कुछ फूल ,कुछ कलियाँ,कुछ पुष्प गुच्छ तो कुछ फूल मालाऐं उनपर अर्पित कर देते हैं। दिन उनके सम्मानित होने का था और उधर पुलिस गुरुजी को लाठी दिखा रही थी, कम से कम एक दिन तो बख्श देते। वे तो वैसे भी एक दिन के सम्मान में पूरा साल निकालने की क्षमता रखते हैं!वैसे उनका दिवस सितम्बर मास में आता है तो सम्पूर्ण सितम्बर मास में ही उन्हें गुरु होने का आभास होने देना था लेकिन यह क्या किया पुलिस वालों ने कि गुरुजियों पर डंडे बरसा दिये।

छोटे गुरुजियों को अपने कम वेतन में घर चलाना मुश्किल हो रहा है और तिसपर तीन वर्ष से वेतन का अकाल! क्या उनको अपनी फरियाद  नहीं करना चाहिए, शायद नहीं ,उन्हें जंगलों में रहकर कंदमूल खाकर गुजारा करना चाहिए। यह सनातन काल की परम्परा रही है।  कुछ वर्ष पूर्व बड़े और छोटे दोनों स्तर के गुरुजी की पुलिस ने अच्छी खासी पूजा कर दी थी फिर भी उन्होंने शिक्षा नहीं ली। आखिरकार वे शिक्षक हैं, गुरुजी हैं। जो खुद शिक्षा ग्रहण न कर सके वे दूसरों को क्या ज्ञान देंगे। शिक्षा प्रेरक संघ के बहकावे में आकर डंडे खा बैठे। गुरुजनों को एक शिकायत है कि उन्हें अपने वेतन भत्तें बढ़ाने और समय पर नियमित भुगतान की मांग पर तो डंडे खाना पड़े लेकिन क्या सांसद-विधायकों को या अफसरों को अपने वेतन भत्ते बढ़ाये जाने की मांग पर कभी डंडे पड़े हैं, नहीं न!तब फिर बेचारे इन निरीह मास्टरों पर यह सितम क्यों किया गया!क्या किसी पुलिस वाले के बच्चे ने शिकायत कर कहा हो कि हमारे टीचर हमारे कान खींचते हैं, बेंत मारते हैं, दिन-दिन भर क्लास में खड़ा रखते हैं, स्कुल नहीं आते हैं, स्कुल का ताला नहीं खुलने देते हैं या फिर उनके हिस्से का मध्यान्ह भोजन भी डकार जाते हैं।

हो सकता है कि पुलिस वाले के बच्चे ने इस तरह की शिकायत की हो और उसने अपने साथियों के साथ मिलकर उन्हें सबक दे डाला हो; इनमें से शिकायत कुछ भी हो सकती है तथापि इन छोटी-छोटी बातों का बदला लाठी चटकाकर तो नहीं लिया जाना चाहिए!

और फिर ये कैसे पुलिस वाले हैं, इन्होंने कैसी शिक्षा पाई है, क्या इन्हें नहीं पता कि गुरुजनों का मान-सम्मान करना चाहिए, आदर सत्कार करना चाहिए। वैसे गुरुजन तो अपमानित होते रहे हैं और यह कोई आज की बात तो है नही,पहले डंडे खाये कि नहीं,यह तो ज्ञात नहीं लेकिन हाँ,मगध साम्राज्य में कौटिल्य उर्फ चाणक्य को अवश्य ही भरी सभा में अपमानित होना पड़ा था और उन्होंने मगध साम्राज्य के अन्त करने की कसम खाकर अपनी चोटी की गांठ तबतक के लिए खुली रखी थी। यह सिर्फ चाणक्य की ही बात नहीं, इनके पूर्व तथा पश्चात भी कई ऋषि मुनि हुए हैं जिन्हें सत्ता पक्ष से किसी न किसी रुप में अपमानित होना पड़ा था और यह सब इसलिए होता है कि गुरु गुड़ रह जाते हैं और चेले शक्कर हो जाते हैं। गुरु अपने मान अभिमान के कारण पिछड़ जाते हैं।

गुरुजन अपने एक दिन के मान सम्मान से संतुष्ट होते आये हैं, डंडे खाकर भी वे अपने गिले-शिकवे भूला देंगे,यदि उन्हें  वेतन-भत्ते और सुविधाऐं देने की घोषणा सुनाई दे जाए। इन राष्ट्र ऋषियों के सारे घावों पर मरहम लग जाएगा और वे अपने दर्द को भूल जायेंगे। उन्हें डंडे की चोट के बाद भी उम्मीद है कि  मुखिया जी पिघलेंगे और राष्ट्र ऋषियों के प्रति जो अपमानजनक व्यवहार पुलिस ने किया है, उसकी निंदा करेंगे। उम्मीद पर दुनिया कायम है, फिर सुबह तो कभी आएगी ही।

बावजूद इसके एक यक्ष प्रश्न तो खड़ा ही है कि आखिर यह डंडा बना ही क्यों है!मास्टर साहब लोग भी अपने शिष्यों पर डंडे का उपयोग छड़ी रुप में करते ही आये हैं और उन्हीं के शिष्य ये पुलिस वाले मौके-बेमौके डंडे का हर कहीं प्रयोग कर बैठते हैं। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे और राष्ट्र ऋषियों उर्फ राष्ट्र निर्माता को वेतन भत्ते!

डॉ प्रदीप उपाध्याय,१६,अम्बिका भवन,बाबुजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------