पवन वैष्णव की कविताएँ

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डॉ. मीनल राजुरकर शिंदे की कलाकृति


1.अहंकार का चेहरा
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पैसा आते ही आदमी
भूल जाता है खुद के चेहरे को
उसे नजर आता है  आईने में
उसके चेहरे में
अहंकार का चेहरा।

अहंकार का चेहरा
बिना आँख , कान और मुँह का चेहरा
सख्त बेजान चेहरा
अहंकार के चेहरे पर आँखें नहीं होती
इसलिए वो रौंदता जाता है
कई जज्बातों को खुले सांड की तरह
उसके कान नहीं होते
इसलिये उसे सुनाई नहीं देती
दूसरों की चीखें,आहें और चीत्कारें,
उसके मुँह नहीं होने से
वह प्यार की भाषा भी नहीं बोल पाता
कुल मिलाकर जिन्दा लाश होता है।

अहंकार का चेहरा नहीं देखता
उसके पैसे देखते है
कि किसको कैसे देखना है
उसके पैसे सुनते है
कि किसको कैसे सुनना है
उसके पैसे बोलते है
कि किससे कैसे बोलना है!

अहंकार की धड़कन नहीं धड़कती
बल्कि खनकती है
पैसे की खनक।

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2.ये वही लोग हैं.....
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ये वही लोग हैं
जिन्होंने कभी अपनी गिरेबान
उठा कर नहीं देखी,
ये वही आसमान के फ़रिश्ते से बनते
घूमते लोग
कभी अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभा नहीं पाये,
ये वही लोग है जो सूरज को
उजाले की सिख देते घूमते रहते हैं,
ये वही लोग है जो किसी राज्य के दरबार में अपनी कुर्सियों के लिए
लड़ते झगड़ते पाये गए,
ये वही लोग है जो एक हाथ में
झूठ का झण्डा उठाये दूसरे हाथ से
सत्य को रास्ता दिखाते पाये गए,
ये वही लोग है जो अकेले में
दुनिया का सबसे घृणित कार्य करते
कर के
और भीड़ में चन्दन का टिका लगाये घूमते पाये गए।
ये वही लोग हैं जो दूसरों की कमजोरियों पर ठहाका लगाते हैं
और अपने गुनाहों को गुटखे की तरह
हलक में निगलते पाये गए,
ये लोग जो कि शकुनि-से महाभारत के
जन्म दाता
स्वयं को इतिहास के ठेकेदार कब से समझने लगे?
ये वही लोग है जिन्होंने,
हासिल किया या तो
नाक रगड़ कर,
या झूठ का आश्रय ले कर
या संयोग से
या दूसरे का छीनकर
हे! भाग्य विधाता
इन लोगों को अपने अधिकार मत दे देना,
ये वही लोग हैं
जो मौका मिला तो तुझको ही
तेरी कुर्सी से बेदखल कर देंगे।
ये वही लोग हैं..........!

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3.हिचकी
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कब हिचकियों की जगह
मोबाइल ने ले ली,
पता ही नहीं चला?
कब हमारी हिचकियाँ
हो गई हमारे कलेजे से दूर...
बहुत दूर?
पता ही नहीं चला!

कई दिनों से हिचकियाँ जब नहीं आई
तो मुझे लगा शायद अब कोई याद नहीं करता है,
पर किसी ने कहा हिचकियाँ तो आती है
गाँव के किसी कुएँ से,बावड़ी से,
खेत से, बरगद या पीपल के पेड़ से!
और....
इन सब को तो हमने भुला दिया है
शहर आकर,
हिचकियाँ नहीं बची
किसी भी कलेजे में
कभी कभार आती है
डकारे जरूर,

सूखे कुएँ की तरह
हमारा मन भरता जा रहा
पत्थरों और कूड़े कर्कट से
अब हिचकी के लिए
कोई जगह नहीं बची,
थोड़ी कही सम्भावना थी
वह भी सुख गई
पेंदे में बचे पानी की तरह!
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4. बूँद और समन्दर
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ओ समन्दर
किस बात का गुरूर है तुम्हें
मैं बूँदें हूँ
तो क्या हुआ
तेरा होने की वजह मैं हूँ।

मैं बूँद
होकर भी
किसी के होंठ की प्यास बुझाने
का माद्दा रखती हूँ
तू समन्दर है पर प्यास तो नहीं बुझा सकता?

मानती हूँ
तुझको सभी बादल सलाम करते हैं
पर उन बादलों के दिलोँ में मैं बसती हूँ
बादल तुझे सलाम करते है
मुझे प्यार करते है
प्यार में बड़ी ताकत होती है रे!

ओ समन्दर तुझसे टकराने की
कोई औकात नहीं रखती मैं
और टकराने की जरूरत भी तो नहीं
टकराकर भी बिखरना जो है तुझमें ही
पर तू जो कभी कभी इन हवाओं से
कहता रहता है कि मैं समंदर हूँ
मुझमें समाहित है
हजारों नदियां
हजारों बादल
हजारों दरिया
पर कभी तेरे मुँह से यह नहीं निकलता
कि मेरी आँखों में भी कुछ बूँदें हैं
तो तुझे बता दूँ
यह नदिया,बादल,झीलें
सब मुझसे ऐसे ही बनी जैसे
बीज से महावृक्ष बना हो।
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5.आओ हंसें कि...
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आओ हंसें कि
अभी मौका है हमारे पास
उस ख़ामोश आदमी की
बेबस चाल पर,
वह थक गया है
पाँव उसके जमीन पर टेढ़े पड़ते हैं
लगता है उसके जूते फट गए
कोई काँटा सा चुभ गया या फिर
पाँव में फोड़ा हो गया।
वह चलता है ऐसे जैसे नट चलता है
दो खंभों के बीच तनी हुई रस्सी पर
या कोई किसान खेतों में हल जोतते हुए
या कोई मजदूर ठेला खिंचते हुए
या......या कई सारे , चलते हैं
फ़ुटपाथ पर किनारे किनारे...!
आओ हंसें कि
अभी मौका है हमारे पास
पता नहीं कल
ये खामोश आदमी रहे भी या नहीं
अपनी टेढ़ी चाल के साथ !

अतः आओ हँसें कि
अभी मौका है हमारे पास।

(समाप्त)

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पवन वैष्णव
उदयपुर राजस्थान

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