370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

जीवन का स्वर्णिम काल है वृद्धावस्था // डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

1 अक्टूबर अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर विशेष...

कंपकंपाते हाथों से केवल आशीर्वाद बरसता है

० जीवन का स्वर्णिम काल है वृद्धावस्था

अभिषेक तरोने की कलाकृति

जीवन की जिम्मेदारियों को ईमानदारी के साथ निभाने के बाद एक समय ऐसा भी आता है जब प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह सेवाकाल से निवृत्त हुआ हो या अपनी याददास्त कमजोर होने के बाद खुद के व्यवसाय से पृथक होते हुए आराम की जिंदगी बिताना चाह रहा हो, इसे संपूर्ण जीवनकाल का स्वर्णिम समय माना जाना चाहिए। यह वह उम्र होती है जो हर प्रकार के अनुभवों को संग्रहित करने के बाद अपनी पीढ़ी का मार्गदर्शन करना चाहती है। जीवन संघर्ष के अच्छे और कड़वे अनुभव की तरह की पूरी लाईब्रेरी एक बुजुर्ग के अंतःकरण और बाह्यकरण में सुंदरता के साथ समायी होती है। उम्र के इस पड़ाव में मनुष्य की कार्यक्षमता, शारीरिक क्षमता अन्य लोगों की अपेक्षा कम से कमतर होने लगती है। जैसे ही एक कामकाजी सेवानिवृत्त घोषित कर दिया जाता है, उसकी मानसिकता तेजी से परिवर्तित होने लगती है, और वह खुद को नकारात्मक भरे माहौल में देखने लगता है। मैं यदि अपने विचार और दृष्टिकोण की बात करूं तो बुढ़ापा जीवन का परिवक्व फल है। इसी फल में जीवन की पूर्णता, मिठास, उपयोगिता और विशिष्टता का रस भरा होता है। पारिवारिक सदस्यों सहित बच्चों से लेकर युवावस्था में खड़े लोग इसका रसपान कर अपना जीवन कंटकमय बना सकते है।

वृद्धावस्था को नीरसता अथवा कटुता भरा समय नहीं माना जाना चाहिए। अधिकांश लोग बुढ़ापे को मौत का पैगाम जीवन का अनुपयोगी समय, अक्षमता, अशक्ति का सूचक मानकर जिंदगी के बचे हुए दिनों को गिन-गिनकर काटने लगते है। ऐसे बुजुर्गों को धीरे धीरे अपनी शुक्तियां क्षीण महसूस होने लगती है। कोई महत्वपूर्ण कार्य करने की ललक मन में नहीं रह जाती है। ऐसे लोग अपने बुढ़ापे को एक प्रकार से पराधीनता, शरीर शैथिल्यता, बीमारी, असमर्थता आदि के आगे आत्म समर्पण की तरह मान लेते है। इस प्रकार की कल्पना करने वाले वृद्धों का जीवन वास्तव में अभिशाप बनकर नारकीय यंत्रणा की तरह हो जाता है। मैं ऐसे नकारात्मक विचार रखने वाले वृद्धजनों से कहना चाहता हूं कि वे इस कहावत को चरितार्थ कर ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ अपना बचा हुआ बहुमूल्य समय आनंद और उल्लास में बिता सकते है। भारत वर्ष के धर्म ग्रंथों में घर घर पूजा जाने वाला रामचरित्र मानस जैसा धर्म ग्रंथ हमें गोस्वमी तुलसीदास जी द्वारा दिया गया है। हमारे बुजुर्गों को याद रखना चाहिए कि गोस्वामी जी ने इस महान ग्रंथ की रचना युवावस्था में नहीं वरन उम्र के सातवें-आठवें दशक में शुरू किया। साहित्य लेखन और सृजनात्मक कार्य के लिए वृद्धावस्था को सर्वथा उचित समय माना जाना चाहिए। इस प्रकार का कार्य जहां समाज को एक अच्छा संदेश दे जाता है, वहीं दूसरी ओर भरपूर समय होने से साहित्य सेवा के साथ मन में उपजने वाली चिड़चिड़ाहट भी कोसों दूर रहती है।

यदि परिवारों में वृद्धों को उचित मान सम्मान प्रदान किया जाये, उनकी बातों का महत्व समझा जाये, उनके अनुभवों को महससू किया जाये तो यह शाश्वत सत्य है कि वे परिवार के लिए अत्यंत उपयोगी और जरूरी सदस्य सिद्ध हो सकते है। वृद्धों की हर बात में दिशा निर्देश का पुट छलकता है। अपने लंबे जीवन के अनुभव से वे परिवार को उचित मार्गदर्शन दे सकते है। विपत्ती के क्षणों में, दुर्भाग्य और समय के काले साये को अपने स्नेह, साहस और दृढ प्रतज्ञ जैसे विचारों से दूर कर सकते है। बड़े बुजुर्गों की सांत्वना और उम्मीद भरे स्वर बड़े से बड़े कष्टों को हंसते हुए सह जाने की शक्ति प्रदान कर जाते है। हम समाज में एक और सच्चाई को देख रहे है कि जिंदगी की इस ढलती शाम में वृद्धों को केवल सम्मान, सहानुभूति ही नहीं बल्कि बहुत से अन्य साधनों की जरूरत होती है, जो उन्हें नहीं मिल पा रहे है। यही कारण है कि उनका जीवन उदास हो जाता है। दौड़ती भागती जीवन की इस रफ्तार में प्रत्येक बेटे को अपने बूढ़े माता-पिता को भोजन अथवा दवाई उपलब्ध कराने तक ही सीमित नहीं मान लेना चाहिए। अपने बुजुर्ग माता-पिता के पास दिन में कुछ समय उन्हें सहलाते हुए बिताना उनके लिए किसी भी औषधि से कहीं अधिक सुकुन देने वाला व्यवहार हो सकता है। ऐसा करने से बुजुर्गों का मन प्रफुल्लित हो उठता है और जीवन के कुछ क्षण उन्हें जीवन संध्या में अमृत जैसा असर दिखा जाता है। वृद्धों की पारिवारिक स्थिति के संबंध में मुझे वृद्धाश्रम से जुड़ा एक कथानक याद आ रहा है-

‘एक व्यक्ति ने एक महात्मा से सवाल पूछा, वृद्धाश्रम में रहने वाले माता-पिता के मृत्यु होने पर परिवार वालों को कितने दिन का सूतक लगता है? महात्मा ने बड़ा सुंदर जवाब दिया, जिस व्यक्ति ने अपने माता पिता को वृद्धाश्रम भेज दिया है, उसे तो जीवनभर का सूतक लग गया है। वह न तो मंदिर जाने लायक है और न ही शुभ कार्य करने लायक।’

बड़े बड़े विद्वानों और मनोवैज्ञानिकों ने भी वृद्धावस्था को सृजनात्मकता से जोड़कर देखा है। बर्नार्ड शॉ का कहना है कि बुढ़ापा एक सिद्धी है, पूर्णता की मंजिल है। वह एक सामाजिक धरोहर है। इसी तहर ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल ने भी एक स्थान पर कहा था। बुढ़ापा पके हुए फल की तरह है, उसका अपना महत्व है, जिंदगी चालीस वर्ष से शुरू होती है, यदि हम इन दोनों विश्लेषकों की बातों पर विश्वास करें तो वृद्धावस्था जीवन का नवनीत सार भाग ही माना जा सकता है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कि झुर्रियों वाला शरीर और कंपकंपाते हाथ केवल और केवल आशीर्वाद के लिए ही उठते है। समय की रफ्तार के साथ समाज में नये-नये परिवर्तन आने लगे है। नयी पीढ़ी के लोग पुराने विचारों के लोंगों को अपने जीवन में प्रवेश नहीं करने देना चाहते है। किसी भी वृद्ध को समाज व परिवार में मान सम्मान की अपेक्षा होती है किंतु आज की पाश्चात्य संस्कृति ने वृद्धों का अनादर शुरू कर दिया है। प्रत्येक युवक को यह हमेशा अपनी रूमृति में रखना चाहिए कि उम्र का यह पड़ाव हर किसी की जिंदगी में आना ही है। जानते सब है परंतु मानता कोई नहीं है। सभी को चिर यौवन चाहिए। बुढ़ापा अभिशाप या वरदान नहीं बल्कि उम्र की एक छेड़खानी है। ईश्वर का अवदान है। किसी ने इस संबंध में खूब लिखा हैः-

जिंदगी एक कहानी समझ लीजिए,

इसे दर्द की रानी समझ लीजिए,

शरीर पर खींचे यह अक्षांश-देशांश,

इसे उम्र की छेड़खानी समझ लीजिए।

आज समाज के बदलते हुए मानकों ने बुढ़ापे को शापित अवस्था जैसा बना दिया है। फिर भी हमारे वृद्धजन अपनी समझ से इस अवस्था में होने वाले तनावों से छुटकारा पा सकते है। जीवन के अंतिम चरण को सुख पूर्वक भोग सकते है। मैं तो आज की पीढ़ी से यही कहना चाहूंगा कि अशेष स्नेह राशि लुटाने वाले हमारे माता पिता ने जो हमारे शैशव काल में हमारे लिए अपना सर्वस्व लगा दिया है, हमें उनकी हर अभिलाषाओं को पूरा करने का संकल्प लेना चाहिए। आज का नवीन समाज वृद्धों के अनुभव को आदेश या अनुदेश समझने लगता है। इस संबंध में प्रसिद्ध शायर निदा फाजली ने अच्छी लाईनें लिखी हैः-

वक्त-ए-पीरी दोस्तों की बेरूखी का क्या गिला, बच के चलते है सभी ढहती हुई दीवार से...

---

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

आलेख 3831590109463236644

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव