शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 14 महल का चूहा और खेत का चूहा // सुषमा गुप्ता

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14 महल का चूहा और खेत का चूहा[1]

एक बार महल रहने वाला एक चूहा महल के भंडारघर में चीज़[2] खा रहा था कि घर में रहने वाले एक बिल्ले ने उसको डरा दिया। असल में वह बिल्ला किसी तरह से महल के बागीचे में से महल के अन्दर आ गया था।

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वह तो चूहे ने अपना सिर एक लैटस के पत्ते[3] के पीछे छिपा लिया वरना तो वह बिल्ला उस दिन उसको खा ही जाता।

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लैटस के पत्ते के पीछे छिपा छिपा वह कुछ सोचने लगा। काफी सोचने के बाद उसको याद आया कि उसके पिता ने, भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे, एक बार उससे एक खेत के चूहे के बारे में कुछ कहा था। वह खेत का चूहा बागीचे में एक अंजीर के पेड़ के नीचे रहता था।

सो उसने उस खेत वाले चूहे से मिलने की सोची। वह बागीचे की तरफ दौड़ गया और चारों तरफ उसका बिल ढूँढने लगा। कुछ देर तक इधर उधर घूमने के बाद उसको उस चूहे का बिल मिल गया। बिल मिल जाने पर वह उसमें घुस गया।

महल वाले चूहे के पिता का दोस्त तो मर गया था पर उसका बेटा वहाँ था। दोनों ने आपस में एक दूसरे को अपना परिचय दिया और खेत वाले चूहे ने उसकी दो दिन तक इतनी खातिरदारी की कि महल का चूहा अपने महल की सारी चीज़ और बढ़िया खाना भूल गया।

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पर तीसरे दिन उसने इतने सारे शलगम खाये कि अब उसको उसकी खुशबू से भी नफरत हो गयी।

वह बोला — “तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद, मेरे दोस्त। पर अब मुझे तुम्हारे ऊपर ज़्यादा बोझ नहीं बनना चाहिये इसलिये अब मैं चलता हूँ।”

खेत वाला चूहा बोला — “क्यों भाई, जाने की इतनी भी क्या जल्दी है कम से कम एक दिन तो और ठहर जाओ।”

“नहीं दोस्त, घर पर मेरा सब लोग इन्तजार कर रहे हैं। अब मुझे चलना ही चाहिये।”

“घर पर तुम्हारा कौन इन्तजार कर रहा है?”

“एक चाचा हैं . . .। सुनो, मुझे एक विचार आया है। क्यों न तुम मेरे साथ मेरे घर चलो। हम लोग दोपहर का खाना साथ खायेंगे फिर खाना खा कर तुम यहाँ वापस आ जाना।”

खेत वाला चूहा जो महल देखने के लिये बहुत बेचैन था उसके इस बुलावे पर बहुत खुश हुआ और उसके साथ महल चल दिया।

जब वे बागीचे से बाहर आ गये तो वे एक दीवार पर चढ़े और महल के भंडारघर की छोटी सी खिड़की में आ गये।

खेत वाला चूहा बोला — “ओह कितना सुन्दर घर है और कितनी अच्छी खुशबू भी आ रही है।

“नीचे उतरो मेरे दोस्त, और बिल्कुल भी शरम मत करना, इसे अपना ही घर समझना, यहाँ तुम चाहे जितना खाओ।”

“नहीं मेरे दोस्त, बहुत बहुत धन्यवाद। मुझे इन सब का बिल्कुल भी अन्दाज नहीं है और फिर मैं शायद अपने घर का रास्ता भी न पा सकूँ इसलिये मैं यहीं इस खिड़की पर ही बैठा ठीक हूँ।”

महल वाला चूहा बोला — “अच्छा अगर तुम नीचे नहीं उतरते तो फिर ज़रा तुम वहीं रुको।” कह कर वह नीचे भंडारघर में खुद ही चला गया।

जैसे ही उसने भंडारघर से सूअर के माँस का एक टुकड़ा उठाया एक बिल्ला वहाँ आया और उस महल वाले चूहे को खा गया। खिड़की पर बैठे बैठे उस खेत वाले चूहे के मुँह से एक चीख सी निकली — “ई ई ई ई।”

खेत वाले चूहे का दिल धड़कने लगा। वह बोला — “यह क्या कह रहा है? ओह तो यह है इसका चाचा। इसके चाचा ने तो इसका बहुत ही अच्छा स्वागत किया।

अगर इसी तरह से कोई अपने भतीजे का स्वागत करता है तो ज़रा सोचो वह मेरे साथ क्या करेगा जो कि उसके लिये बिल्कुल ही अजनबी है।” और एक पल में ही वह अपने बागीचे में था।




[1] The Palace Mouse and the Field Mouse (Story No 120) – a folktale from Italy from its Molise area.

Adapted from the book : “Italian Folktales” by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Cheese is a kind of processed Indian Paneer and is very common to eat in Western countries.

[3] Leaf of lettuce – lettuce is kind of vegetable, normally eaten in salads, and looks like cabbage. See its picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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