सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

*राम रावण युद्ध में कौन जीता कौन हारा* // सुशील शर्मा

दशहरा पर्व पर विशेष आलेख

जब हम राम और रावण के बीच युद्ध की बात करते हैं तो हमारे अंदर  अच्छाई और बुराई का प्रतिबिम्ब बन जाता है और उसी के हिसाब से हमारा दृष्टिकोण निर्मित  जाता है। जब राम ने रावण को,जिसे हम  दानव राजा कहते हैं को हराया था; युद्ध के बाद राम ने आगे बढ़कर उस राक्षस राज के  विशाल ज्ञान की सराहना की बल्कि उसे सम्मानित भी किया।

अगर हम राम रावण युद्ध  के अच्छे बनाम बुरे या कौन जीता कौन हारा के कोण से विश्लेषण करेंगे तो सभी का एक ही मत होगा कि अच्छाई ने बुराई को हरा दिया जिसमें राम अच्छाई के प्रतीक एवं रावण बुराई का संकेतक था। लेकिन इस युद्ध का विश्लेषण धार्मिकता से इतर ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि को सामने रख कर करेंगे तो हम राम के ईश्वरत्व और रावण के पांडित्य दोनों के साथ न्याय कर पायेंगे। 

यह युद्ध , अच्छा / बुरा , सही / गलत और पसंद / नापसंद के द्विविभाजन से परे चला गया था ; यह  युद्ध नैतिकता का एक बयान नहीं है वरन यह  युद्ध मानव जीवन में सामाजिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है, क्योंकि जीवन हमेशा विचारों और नैतिकता की परिसीमा में ही जिया जाता है। यह युद्ध दो विचारधाराओं के अस्तित्व को बचाने का युद्ध था जिसमें एक विचारधारा का नेतृत्व राम और दूसरी विचारधारा का नेतृत्व रावण कर रहा था।

दुनिया के अधिकांश युद्ध  शक्ति , धन 'भूमि ,स्त्रियों या अन्य कीमती वस्तुओं के  लालच के लिए लड़े गए इन सभी युद्धों में दोनों पक्षों में पशुता की सीमा तक दुश्मनी का समावेश देखा जाता है।  अलेक्जेंडर से मुहम्मद तक  बाबर से लेकर बुश तक और औरंगजेब से लेकर  हिटलर तक । हर किसी ने युद्ध जीतने के बाद  हार के लिए नफरत का प्रदर्शन किया, लोगों को वह दास बनाया  , विरोधियों की हत्या की , उनकी संस्कृति को नष्ट किया अपनी संस्कृति उन पर थोपना चाही या इन सभी कार्यों को एक साथ अपनाया इतिहास इससे भरा पड़ा है। एक शत्रु के रूप में एक युद्ध प्रतिद्वंद्वी बनाना, उस व्यक्ति के लिए एक नैतिक आवश्यकता है जो लोभ के युद्ध से लड़ता है।

यह युद्ध इन सब ऐतिहासिक युद्धों से अलग है इसमें राम ने किसी  लालच के लिए  युद्ध नहीं किया था। न ही रावण को राम के राज्य की लालसा थी जहाँ एक ओर राम अपने प्यार और जिम्मेदारी का ख्याल रखने के लिए युद्ध लड़े वहीं दूसरी ओर रावण ने अपने और अपनी बहिन के सम्मान के लिए युद्ध लड़ा। ये अलग बात है कि युद्ध में सब जायज है का सूत्र सिर्फ रावण ने अपनाया राम ने नहीं। 

"अच्छा बनाम बुरा" का यह युद्ध मूल रूप से विचारधाराओं का युद्ध है। चूंकि अच्छाई और बुराई की अवधारणाएं केवल आदर्शवादी हैं अस्तित्व में नहीं है अस्तित्व में, केवल दो चीजें महत्वपूर्ण हैं सत्य और असत्य। सत्य मौलिक और शाश्वत होता है सत्य न अच्छा होता हैं न बुरा सत्य को न देखा जा सकता है न कहा जा सकता है अच्छाई और बुराई सापेक्ष होते हैं जो बात एक के लिए अच्छी है दूसरे के लिए बुरी हो सकती है। यह युद्ध सत्य के सापेक्ष लड़ा गया था न की अच्छे या बुराई के लिए। यह युद्ध प्रेम के लिए लड़ा गया था न कि घृणा के लिए ,यह युद्ध मानवता के लिए लड़ा गया था मानव के लिए नहीं।

इस युद्ध में जहाँ  राम अपने प्रेम और कर्तव्य के लिए लड़ रहे थे वही रावण अपनी विचारधारा को विस्तृत करने के लिए। जब युद्ध मानवता के लिए लड़ा जाता है तो उसमें शांति के विकल्प होते हैं राम ने कई बार शांति के विकल्प सुझाये लेकिन रावण ने वो सारे रास्ते बंद कर दिए और राम के लिए युद्ध एकमात्र विकल्प था जो छोड़ दिया गया था। और जब राम युद्ध लड़े  तो  वह जीतने के लिए लड़े। यह युद्ध हमें प्रेरणा देता है कि ऐसा ही जीवन का युद्ध है यही कारण है कि राम ने रावण को झुकाया। आखिरी समय तक भी रावण सीता को लौटा देता तो राम उसी क्षण युद्ध बंद कर देते क्योंकि राम की रावण के साथ लड़ाई नहीं थी राम की लड़ाई प्रेम स्थापित करना था। यह युद्ध मन की विषमताओं ,दुर्गुणों के साथ था जो पूरे समाज को दूषित करने में सक्षम थीं इसका अहसास राम को हुआ इसलिए एक युद्ध लड़ा गया ,एक युद्ध जो रावण के खिलाफ नहीं था उसकी दूषित विचारधारा के खिलाफ था। कोई भी व्यक्ति में सब कुछ बुरा नहीं होता है, व्यक्ति में बुराई अपना अधिकार जमा सकती है किन्तु वह हमेशा बुरा नहीं  रह सकता।  इन तथ्यों पर प्रकाश डालने पर ध्यान दें, जब रावण मर रहा था  तब उसने अपना  अहंकार और घमंड  को खो दिया था। उसने राम के ईश्वरत्व को माना और राम ने उसके गुणों की हृदय से प्रशंसा की थी। कुछ भी पूर्ण नहीं है, न व्यक्ति न ही धर्म न ही समय । रावण धार्मिक व्यक्ति था विद्वान था  लेकिन एक अच्छा राजा नहीं था। उन्होंने राज धर्म का सही ढंग से पालन नहीं किया था न ही उसने  अपने मनुष धर्म का पालन किया। इस युद्ध में राम की सबसे बड़ी सफलता ये रही की उन्होंने रावण को अंत में धर्म के रास्ते पर ला दिया उन्होंने रावण के विशद और विशाल ज्ञान को श्रद्धांजलि दी, यह अधर्म पर धर्म की अंतिम विजय है।

इस युद्ध का उद्देश्य सत्य का प्रतिस्थापन करना और धर्म को जागृत कर उसकी स्थापना करना है। यह युद्धघृणा के विरुद्ध  प्रेम के प्रतिष्ठापन का युद्ध था। इसमें न राम जीते न रावण हारा इसमें प्रेम जीता और घृणा की विचारधारा हारी।

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