बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

लघु-व्यंग्य // बोला वायरस से कैसे हो बचाव // प्रदीप उपाध्याय

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हम जितनी ज्यादा प्रगति करते जा रहे हैं उतनी ही उपलब्धियों के साथ समस्याएँ भी जुड़ती जा रही हैं। इंसान ने जहाँ चिकित्सा के क्षेत्र में नई नई खोज कर कई तकनीक हासिल की और बीमारियों के उपचार खोज निकाले तो दूसरी ओर नये-नये वायरस जन्म लेते जा रहे हैं और नई नई बीमारियाँ घर करती जा रही हैं।पिछले दिनों ही इबोला वायरस का ज़बरदस्त हमला हुआ था जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बहुत ही गंभीरता से लिया था। पश्चिमी अफ्रीकी देशों के साथ ही विश्व के कई देश इबोला वायरस के संक्रमण की चपेट में आ गये थे । इबोला वायरस के संक्रमण से कई लोग मौत के शिकार हो गए थे। दुनिया भर में घबराहट का माहौल  हो गया था। वायरस कोई भी हो, घबराहट तो पैदा कर ही देता है।

खैर,इबोला जैसे वायरस तो आते जाते रहते हैं और अपना प्रभाव या कहें दुष्प्रभाव छोड़ जाते हैं लेकिन दुनिया में इबोला सहित अन्य वायरसों की तुलना में सर्वाधिक खतरनाक वायरस है बोला! यह प्रकृति प्रदत्त वायरस है जिसका उपचार किसी के बस में नहीं है। यह शायद मानसिक विकार उत्पन्न करने वाला वायरस है तभी तो इसके विभिन्न रूप हैं यथा इसने बोला,उसने बोला,आखिर क्यूं बोला,कैसे बोला,यहाँ बोला,वहाँ बोला,यह बोला,वह बोला, और भी बहुत कुछ बोला और क्या-क्या नहीं बोला,तुम्हारे बारे में ऐसा-ऐसा बोला,अच्छा मेरे बारे में ऐसा बोला,उसने मुझे क्यों नहीं बोला यानी अबोला! ये ऐसे  खतरनाक वायरस हैं जो मानसिक संत्रास देने के साथ ही हाथ-पैर तुड़वाने से लेकर जिन्दगी तक का हरण कर जाते हैं।

बोला नाम के वायरस के कारण लोगों की जुबान हाथ भर की हो जाती है। यह माने तो आप से वरना किसी के पिताजी के बस में नहीं आ सकती क्योंकि बीमारी ही कुछ ऐसी है। कभी कभी इस बीमारी का शिकार मौन धारण कर लेता है और उसके न बोलने पर उसे मौनी बाबा का खिताब दे देते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग इतना बोलते हैं कि उन्हें पता ही नहीं रहता कि कुछ समय पूर्व वे क्या बोल गये,इसीलिए लोग उन्हें फेंकू शिरोमणी के खिताब से सुशोभित कर देते हैं। इस बीमारी से किसी किसी की जुबान इतनी लम्बी हो जाती है कि उसे इसका ऑपरेशन करवाकर छोटी करवाना पड़ती है। इस वायरस ने दुनिया भर को अपनी चपेट में ले रखा है और इसका कोई इलाज भी नहीं है।

वास्तव में बहुत ही खतरा है इससे,यह भी एक तरह की छूत की बीमारी है, संक्रमण फैलाती है,संक्रमित करती है। वायरस का तो काम ही है संक्रमण फैलाना! आज के हालात ऐसे हैं कि ये वायरस घर-घर से लगाकर देशभर में फैल गये हैं। इस बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए लेकिन कोई गंभीरता से लेता ही नहीं!आज यह बोला तो कल वह बोला किन्तु कमाल है कि कोई चुप रह जाये। टी वी चैनलों पर तो जैसे जंग ही छिड़ जाती है, एंकर का बोला भी बोला नहीं रह जाता! लगता है कि बहुत ही गंभीर बीमारी फैल गई है। कुत्ते-बिल्ली भी शरमा जाएं,ऐसा बोला जाता है। यह बीमारी है ही ऐसी कि यह ध्यान ही नहीं रहता है कि क्या बोला जा रहा है।

बहरहाल,इस बोला नाम के वायरस से सम्भल कर रहने की आवश्यकता है। लोग चाहे जितना उकसाये,हमें तो इस संक्रमित बीमारी से बचाव की मुद्रा में रहना ही चाहिए।

डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,बाबुजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढ़की रोड़,देवास,म.प्र

1 blogger-facebook:

  1. रोचक व्यंग। बोला नाम का वायरस वाकई काफी खतरनाक है। ये जो न कर दे वो कम।

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