सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास : साठ साल में चले ढाई कोस // यशवंत कोठारी

केंद्र सरकार के प्रकाशन विभाग (सूचना-प्रसारण मंत्रालय ),साहित्य अकादमी (संस्कृति मंत्रालय ) व् राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (मानव संसाधन मंत्रालय ) ऐसे संस्थान हैं जहाँ पर लेखक –पत्रकारों का काम प्रकाशन के कारण पड़ता रहता है. लगभग ६० वर्ष पुराना एन बी टी है जो ३२ भाषाओं में हजारों पुस्तकें छाप चुका है, ये पुस्तकें कई पुस्तक मालाओं में छपती हैं, अनुवाद भी छापे जाते हैं, इसके अलावा मेले , ठेले के कॉम हैं, प्रदर्शनी के काम हैं . लम्बा चौड़ा बजट है, अफसर हैं और लेखकों के गुट हैं जो इन संस्थाओं पर कब्ज़ा रखते हैं. कई बार एक ही लेखक की एक ही कहानी अकादमी भी छाप देती है, और प्रकाशन विभाग भी या कोई रचना न्यास भी छाप देता है, और प्रकाशन विभाग भी. न्यास के एक कर्मचारी की दस से ज्यादा किताबें न्यास से ही छप गयीं . न्यास अभी तक केवल १४ राज्यों के बारे में पुस्तकें छाप पाया है. ये भी आधी-अधूरी हैं. शेष राज्यों पर किताबें कब आएगी कोई नहीं जनता.

इधर उधर से प्राप्त पाण्डुलिपि को समीक्षा के लिए भेज कर स्वीकृत या वापसी कर दी जाती हैं. समीक्षक को काफी राशि मिल जाती है, जो वहां के लोगों की मेहरबानी से होता है.

न्यास में किसकी पुस्तक छपेगी इस की कोई रीति नीति नहीं है. पाण्डुलिपि मंगवाने के बाद सलाहकार समिति के नाम पर व् गोपनीयता के नाम पर मंगवाई गयी पाण्डुलिपि को अयाचित सामग्री बता कर लौटा दिया जाता है. कुछ विशेष लेखकों को बार-बार उपकृत किया जाता है.

दिल्ली के लेखक बाजी मार ले जाते हैं, वे ही लेखक उनके ही मित्र परिचित सलाहकार समिति में फटाफट सब काम.

बड़े व् प्रतिष्ठित लेखक होना जरूरी नहीं. न्यास में सम्पर्क जरूरी है. प्रकाशित व्यंग्य संकलनों को देखने पे यह स्पष्ट हो जाता है. यही स्थिति कहानी उपन्यासों की है . अनुवाद भी अपने ही लोगों को. व्यक्तिगत सम्पर्क से सब ठीक हो जाता है.

न्यास ने अब कीमतें भी काफी बढा दी है. पेपर बेक की कीमतें बाज़ार की किताबों से भी ज्यादा हैं.

पुस्तक मेलों में भी अब दरें इतनी ज्यादा कि सामान्य प्रकाशक स्टाल नहीं ले सकता.

बच्चों व् नवसाक्षरों के लिए प्रकाशित पुस्तकों की रीति नीति भी स्पष्ट नहीं है.

न्यास के वेतन भत्तों पर होने वाला खर्च भी न्यास से नहीं निकलता.

न्यास में पुस्तकों में प्रयुक्त कागज व् स्टोर से जारी कागज का ऑडिट रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जानी चाहिए. इन संस्थाओं के वार्षिक प्रतिवेदन व् ऑडिट रिपोर्टों पर भी एक आजाद इकाई द्वारा विचार किया जाना चाहिए.

हिंदी के हजारों प्रतिष्ठित लेखकों की कोई रचना न्यास ने नहीं छापी. न्यास की किसी भी पुस्तक को केन्द्रीय अकादमी का पुरस्कार नहीं मिला . श्रेष्ठ संकलनों के नाम पे खाना पूर्ति बस.

कई लेखक आर टी आई लगाने की फ़िराक में हैं. कहने को वहां राजनीतिक दबाव नहीं चलता लेकिन लेखकों के समूह सक्रिय हैं. दिल्ली और आसपास के लोगों को खूब फायदा मिलता है, कभी समीक्षा , कभी अनुवाद , कभी प्रूफ का काम , कभी कुछ और. प्रेमचंद के गबन उपन्यास का संक्षेपण किया गया लेकिन मूल आत्मा बिखर गयी. न्यास किसे विशेषज्ञ मानता है इसका कोई ठोस आधार नहीं होता .जो जीवनियाँ छपी है उनपर भी प्रश्न चिन्ह हैं. पौराणिक साहित्य, उपनिषद, रामायण आदि पर और ज्यादा किताबों की जरूरत है.

ये संस्थान कई पत्रिकाएं भी छापते हैं. उनमें भी लेखक रिपीट होते रहते हैं. इन पत्रिकाओं का सर्कुलेशन भी गिरा है .

मैं जानता हूँ इस आलेख से कई लोग नाराज़ होंगे लेकिन मुझे लगा की सरकार का ध्यान इस और आकृष्ट किया जाना चाहिए.

सम्बन्धित मंत्रालयों को इस और ध्यान देना चाहिए.

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यशवंत कोठारी ,८६,लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर -२

मो -९४१४४६१२०७

1 blogger-facebook:

  1. लेख में काफी वाजिब सवाल उठायें हैं। इन सब बातों पर विचार होना ही चाहिए।

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