मंगलवार, 7 नवंबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–6 : 10 सोने के अंडे वाला केंकडा // सुषमा गुप्ता

10 सोने के अंडे वाला केंकडा.[1]

clip_image002

एक बार एक राजा[2] था जिसके दो बेटे थे। एक बार वह इतना बीमार पड़ा कि काम करने के लायक ही नहीं रहा। उसके इलाज में उसकी सारी बचत खत्म हो गयी पर फिर भी वह ठीक नहीं हुआ।

बचत खत्म होने के बाद उसने अपने घर की चीजें. बेचनी शुरू कर दीं। यहाँ तक कि उसकी छत में लगे टाइल्स भी बिक गये।

एक दिन जब उसकी आलमारी बिल्कुल खाली पड़ी थी तो वह बोला — “अब मैं शिकार के लिये जाता हूँ देखता हूँ कि शायद मुझे कुछ चिड़ियें ही मिल जायें।”

किस्मत की बात उस दिन उसको एक चिड़िया भी दिखायी नहीं दी।


पर जब वह घर वापस आ रहा था तो उसको एक केंकड़ा दिखायी दे गया जो एक बड़े से पत्थर पर चिपका हुआ था।

उसने उसको ज़िन्दा ही पकड़ लिया और उसको अपने थैले में रख लिया। वह सोचता जा रहा था कि वह इस केंकड़े को अपने बच्चों को खेलने के लिये दे देगा। सो घर जा कर उसने उस केंकड़े को अपने बच्चों को खेलने के लिये दे दिया। वह एक मादा केंकड़ा थी।

बच्चों ने उस मादा केंकड़े को एक छोटे से पिंजरे में बन्द कर दिया। अगली सुबह उन्होंने देखा कि उस मादा केंकड़े ने तो एक अंडा दिया है। वे उस अंडे को उठा कर अपने पिता के पास ले गये।

clip_image004

उस अंडे को देखते ही वह राज बोला कि “अरे यह तो सोने का अंडा है।” वह तुरन्त ही बाजार गया और उस सोने के अंडे को बेच आया। वह अंडा 6 डकैट[3] का बिका।

वह मादा केंकड़ा हर रात एक सोने का अंडा देती थी और हर सुबह वह राज उस अंडे को बाजार में बेच आता। कुछ दिनों में ही वह राज बहुत अमीर हो गया क्योंकि अब तो उसकी 6 डकैट रोज की आमदनी थी।

इस राज के बराबर में एक दरजी रहता था। राज की अमीरी देख कर उसने सोचा कि “मेरी समझ में यह नहीं आता कि यह इतना गरीब राज कुछ दिनों में ही इतना अमीर कैसे बन गया।”

कुछ दिनों तक उसके ऊपर नजर रखने के बाद उसने राज के अमीर बनने का राज़ जान ही लिया। उसकी अमीरी का राज़ था एक मादा केंकड़ा।

इस दरजी के तीन बच्चे थे – दो लड़के और एक लड़की। उसने सोचा कि मैं अपनी बेटी की शादी इस राज के लड़के से कर देता हूँ। सो दोनों की सगाई कर दी गयी।

दरजी उस राज से बोला — “मैं अपनी बेटी का दहेज तैयार कर रहा हूँ पर तुम भी अपने केंकड़े को अपने बेटे के दहेज में देने के लिये तैयार रखना।”

राज ने जवाब दिया — “जब तक वह मेरे बेटे का दहेज है वह तैयार है।”

जब दरजी को केंकड़ा मिल गया तो उसने केंकड़े को ध्यान से देखा तो उसने देखा कि उसके पेट पर तो कुछ लिखा था।

अब वह तो दरजी था सो वह तो लिखना पढ़ना जानता था सो उसने पढ़ा – “जो कोई भी केंकड़ा और उसका खोल खायेगा वह एक दिन राजा बन जायेगा। जो कोई केंकड़ा और उसके पैर खायेगा उसको हर सुबह अपने तकिये के नीचे पैसों का एक थैला मिलेगा।”

इसको पढ़ कर दरजी ने सोचा मैं इस केंकड़े को अपने दोनों बेटों को खिला देता हूँ। एक को केंकड़ा और उसका खोल और दूसरे को केंकड़ा और उसके पैर। बस फिर दोनों ही अपने अपने तरीके से अमीर हो जायेंगे।

उसने उस केंकड़े को मार कर आग पर भूनने के लिये रख दिया और अपने बेटों को बुलाने चला गया।

जैसे ही वह अपने बेटों को बुलाने के लिये वहाँ से गया तो उस राज के दोनों बेटे वहाँ आ गये जिसकी वह मादा केंकड़ा थी। केंकड़े को आग पर भुनते देख कर उनके मुँह में पानी आ गया।

उन्होंने आपस में कहा कि “चलो हम लोग इसे खा लेते हैं। तुम इसका खोल खा लो और मैं इसके पैर खा लेता हूँ।” और दोनों ने उसके खोल और पैर खा लिये।

जब दरजी वापस आया तो उसने देखा कि उसकी वह मादा केंकड़ा तो जा चुकी है। यह देख कर दरजी बहुत दुखी हुआ और उसने अपनी बेटी की शादी तोड़ दी।

यह देख कर राज के बेटों को लगा कि उन्होंने यह सब क्या कर दिया। इससे दुखी हो कर उन्होंने सोचा कि उनको घर छोड़ कर चले जाना चाहिये और दुनियाँ में जा कर अपनी किस्मत आजमानी चाहिये। ऐसा सोच कर वे दोनों घर छोड़ कर चले गये।

वे जब पहले शहर में आये तो वहाँ रात को एक सराय में रुके। सुबह को जब वे उठे तो छोटे भाई ने अपने तकिये के नीचे पैसों से भरा एक थैला पाया।

वह अपने बड़े भाई से बोला — “भैया, यहाँ तो इन लोगों ने हमको चोर ही समझ लिया है। लगता है हमको ललचाने के लिये इस सराय की मालकिन ने हमारे तकिये के नीचे यह पैसों का थैला रख दिया है। और अब वह हमारा चोरी का नाम लगा देगी।”

इतना कह कर वह उस पैसों के थैले को ले कर उस सराय की मालकिन के पास गया और बोला — “मैम हम चोर नहीं हैं। हम आपके इस थैले को वापस करने आये हैं और हमारा इस थैले को तुमको वापस करना ही इस बात को साबित करता है कि हमने इस पैसे को नहीं चुराया है।”

सराय की मालकिन को तो पैसों का थैला देख कर जैसे बिजली का सा झटका लगा।

उसने अपना आश्चर्य छिपा कर पैसों का वह थैला उस लड़के से ले लिया और बोली — “हाँ यह थैला तो मेरा ही है। मेरी यह बहुत बुरी आदत है कि मैं पैसा कहीं भी रखा छोड़ देती हूँ और फिर भूल जाती हूँ। तुमने अच्छा किया कि इसे मुझे वापस कर दिया।”

अगले दिन उस छोटे भाई के तकिये के नीचे से फिर एक पैसों का थैला निकला तो वह बोला — “लगता है कि वे हमारे ऊपर अभी भी शक कर रहे हैं इसलिये अच्छा हो अगर हम यहाँ से कहीं और चले जायें।”

सो उसने वह थैला भी उस सराय की मालकिन को दे दिया। मालकिन बोली — “मैं तुमको विश्वास दिलाती हूँ कि मैंने इसको वहाँ किसी मतलब से नहीं छोड़ा। बस मैं ज़रा भूल ही जाती हूँ। थैला वापस करने के लिये तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद।”

उन भाइयों ने उससे अपना बिल पूछा, उसको पैसे दिये और वहाँ से चल दिये। अगली रात उन्होंने एक जंगल में गुजारी जहाँ वे जमीन पर सोये। वहाँ उनको एक पत्थर का तकिया इस्तेमाल करना पड़ा।

पर अगले दिन फिर उस पत्थर के पास एक पैसों का थैला पड़ा था। उसको देख कर छोटा भाई बोला — “इससे तो यह पता चलता है कि वह सराय की मालकिन हमें अभी भी नहीं छोड़ रही। वह हमारे पीछे यहाँ तक आ पहुँची। इस बार हम उसको यह पैसे वापस नहीं देंगे। तभी वह सीखेगी।”

पर जब उसने देखा कि वह कहीं भी सोये उसको हर दिन सुबह को यह थैला मिल रहा था तब उसकी यह समझ में आया कि वह उसकी अच्छी किस्मत से मिल रहा था न कि सराय की मालकिन से।

चलते चलते वे दोनों भाई एक चौराहे पर आये तो दोनों ने वहाँ से अपने अपने रास्ते अलग अलग कर लिये।

बड़े भाई ने छोटे भाई को एक बोतल दी और छोटे भाई ने बड़े भाई को एक चाकू देते हुए कहा — “यह चाकू लो भैया और जब तक यह चमकता रहेगा तब तक मेरी ज़िन्दगी को कोई खतरा नहीं है। पर जब इसमें जंग लगने लगे तो समझो कि मैं मर गया।”

उन्होंने पैसे आपस में बाँटे, एक दूसरे को विदा कहा और अपने अपने रास्ते चल दिये।

चलते चलते बड़ा भाई एक शहर में आ गया। वहाँ का राजा मर गया था सो मन्त्रियों ने एक घोषणा की कि “हमको अब ऐसा करना चाहिये कि हमको एक कबूतर छोड़ना चाहिये और जिसके सिर पर भी वह बैठेगा हम उसको ही अपना राजा बनायेंगे।”

अब हुआ क्या कि जब उन लोगों ने वह कबूतर छोड़ा तो वह उस बड़े भाई के सिर पर जा कर बैठ गया। तुरन्त ही उसने अपने आपको बहुत सारी गाड़ियों, सेना और बाजे से घिरा हुआ पाया।

पहले तो उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा था। पर जब बाद में उसको पता चला कि वह तो अब उस शहर का राजा बन गया है तो वह बहुत खुश हुआ।

वे सब मिल कर उसको महल ले गये। उसको राजा के कपड़े पहनाये, ताज पहनाया और उसको वहाँ का राजा बना दिया। अब वह वहाँ का राजा बन कर राज करने लगा।

इधर छोटा भाई एक और शहर में आ पहुँचा। वहाँ उसने एक सराय में कमरा लिया। यह सराय एक राजकुमारी के महल के सामने थी। यह राजकुमारी अभी कुँआरी थी और अपना सारा दिन अपने महल के छज्जे पर बैठ कर गुजारती थी।

एक दिन उसने इस छोटे भाई को सराय के छज्जे पर देख लिया तो वह उससे बात करने लगी। एक में से एक बात निकलती ही जाती थी और उनकी बातें खत्म होने पर ही नहीं आती थीं।

आखिर राजकुमारी बोली — “अगर तुम मेरे घर आना पसन्द करो तो हम लोग यहाँ कुछ आनन्द करें?”

“ओह यह तो मेरे लिये बड़ी खुशी की बात होगी।” कह कर वह राजकुमारी के पास चला गया।

clip_image006

जब वह राजकुमारी के पास पहुँच गया तो राजकुमारी बोली — “आओ ताश खेलें?” सो उन लोगों ने ताश खेलना शुरू कर दिया।

पर राजकुमारी हर बार जीत जाती थी और इस तरह वह लड़का हजारों डकैट हार गया।

पर इससे ज़्यादा आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसको पैसे की कमी नहीं पड़ रही थी। यह उसके उस पैसों के थैले का कमाल था जो उसको हर सुबह अपने तकिये के नीचे मिलता था।

यह सब देख कर वह राजकुमारी बड़े आश्चर्य में थी कि वह इतना अमीर कैसे हो सकता था।

उसने एक टोना टोटका करने वाले से पूछा तो उसने राजकुमारी को बताया कि उस अजनबी के शरीर के अन्दर एक जादू है जिसकी वजह से उसका पैसा कभी खत्म नहीं होता।

उसने राजकुमारी से यह भी कहा कि उसके अन्दर एक आधा केंकड़ा है जिसकी वजह से हर सुबह उसको पैसों का एक थैला अपने तकिये के नीचे रखा मिल जाता है।

राजकुमारी ने पूछा — “उस जादू को मैं अपने लिये कैसे ले सकती हूँ?”

वह टोने टोटके वाला बोला — “जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करना। यह एक दवा लो और इस दवा को उसकी शराब के गिलास में डाल देना और वह शराब उसको पिला देना।

यह दवा उसके पेट में जा कर जो कुछ भी उसके पेट में होगा वह सब बाहर निकाल कर ले आयेगी – वह आधा केंकड़ा भी। उसको तुम बहुत सँभाल कर साफ कर लेना और निगल जाना।

फिर वह पैसों का थैला बजाय उसके तकिये के नीचे से तुम्हारे तकिये के नीचे से निकलना शुरू हो जायेगा।”

राजकुमारी ने वैसा ही किया और अब वह पैसों का थैला बजाय लड़के के तकिये के नीचे से उसके तकिये के नीचे से निकलना शुरू हो गया।

वह लड़का बेचारा फिर से गरीब हो गया। अब उसके पास और कोई चारा नहीं था कि वह अपनी सब चीज़ें बेच दे और फिर से दुनियाँ में अपनी किस्मत आजमाने निकल पड़े।

वह चलता रहा चलता रहा और चलते चलते भूख से इतना कमजोर हो गया कि वह आगे नहीं जा सका और एक घास के मैदान में आ कर गिर गया।

वहाँ कम से कम उसके पास कुछ तो था खाने के लिये। उसने हाथ बढ़ा कर थोड़ी सी घास तोड़ी और खा ली।

clip_image008

इत्तफाक से वह घास चिकोरी[4] की एक जाति थी और जैसे ही उसने वह घास खायी वह गधा बन गया। उसने सोचा कम से कम अब मैं भूखा नहीं रहूँगा क्योंकि अब मैं घास खा सकता हूँ।

clip_image010

उसके बाद उसने एक पौधा और खाया जो देखने में बन्द गोभी जैसा लगता था। जैसे ही उसने उस पौधे को खाया तो लो, वह तो फिर से आदमी बन गया। उसने सोचा कि ये पौधे तो मेरा काम बना देंगे।

उसने उन दोनों घासों में से थोड़ी थोड़ी घास ले ली जिन्होंने उसको पहले गधे में बदल दिया था और फिर गधे से आदमी में बदल दिया था।

फिर उसने एक माली का रूप रखा और उसी राजकुमारी की खिड़की के नीचे इन घासों को बेचने चल दिया। उसने आवाज लगायी — “बढ़िया वाली चिकोरी ले लो बढ़िया वाली चिकोरी।”

राजकुमारी ने उसको सुना और उसके हाथ में मुलायम चिकोरी देखी तो उसको बुलाया और उस चिकोरी को तुरन्त ही चखा। उस को खाते ही वह एक गधा बन गयी।

उस लड़के ने उसके ऊपर तुरन्त ही एक गद्दी रखी और उसको महल की सीढ़ियों से नीचे की तरफ ले चला। कोई यह शक भी नहीं कर सका कि वह राजकुमारी थी।

वह उस गधे पर सवार हो कर एक ऐसी जगह ले गया जहाँ बहुत सारे आदमी काम कर रहे थे। उसने उन लोगों से कहा कि वह काम की तलाश में घूम रहा था सो अगर वे दे सकते हैं तो वे उसको कुछ काम दे दें।

उन्होंने उसको अपने यहाँ काम पर रख लिया और वह उस गधे पर दुगुने बोझ के पत्थर लाद कर लाने लगा। बोझ की वजह से वह गधा लड़खड़ा जाता था और उसके लड़खड़ाने पर वह उसको खूब मारता था।

लोग उससे पूछते कि वह उस गधे के साथ इतनी सख्ती का बरताव क्यों करता था तो वह उनको जवाब देता “यह मेरा अपना मामला है। तुमको इसमें बीच में बोलने की जरूरत नहीं है।”

यह देख कर उन्होंने राजा से शिकायत की तो राजा ने उसको अपने दरबार में बुला भेजा। उसने भी उससे पूछा कि वह उस गधे के साथ इतना बुरा बरताव क्यों कर रहा था।

लड़के ने जवाब दिया “क्यों कि इसके साथ ऐसा ही बरताव करना चाहिये।”

तभी उसने देखा कि उस राजा की कमर से एक चाकू लटका हुआ है। लो और यह चाकू तो वही चाकू था जो उसने अपने बड़े भाई को दिया था।

छोटा भाई बोला — “पहले मेरा वह पैसा वापस करो जो मैंने तुमको चौराहे पर दिया था।”

राजा बोला — “एक राजा से इस तरह से तुम्हारी बात करने की हिम्मत कैसे हुई?”

“तो फिर मुझे तुमसे कैसे बात करनी चाहिये? मैं तुमको पहचान गया हूँ। तुम मेरे भाई हो। यह देखो यह बोतल जो तुमने मुझे दी थी। और वह देखो मेरा दिया हुआ चाकू तुम्हारी कमर में।”

इस तरह दोनों भाइयों ने आपस में एक दूसरे को पहचान लिया। दोनों एक दूसरे से लिपट गये। फिर छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को उस गधे के बारे में बताया जो कि सचमुच में एक राजकुमारी थी।

राजा ने पूछा — “अगर यह तुम्हारा आधा केंकड़ा वापस कर दे तो क्या तुम इसको राजकुमारी में बदल दोगे?”

“हाँ।”

“तो तुम उसको राजकुमारी में बदल दो।”

सो उस छोटे भाई ने उस गधे को वही दवा दी जो पहले राजकुमारी ने उसको दी थी। उस गधे ने सब कुछ उगल दिया – आधा केंकड़ा भी।

उसके बाद उस छोटे भाई ने उसको वह घास खिलायी जो देखने में बन्द गोभी जैसी लगती थी और जिसको खा कर वह फिर से राजकुमारी बन गयी। उस राजकुमारी से उसने फिर शादी कर ली। राजा ने अपने छोटे भाई को अपना जनरल बना लिया और फिर सब सुख से रहने लगे।



[1] The Crab With the Golden Eggs (Story No 146) – a folktale from Italy from its Calabria area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Trnslated for the word “Mason” who builds buildings.

[3] Ducat – a currency used in those days in Italy. Shakespeare’s “The Merchant of Venice” also mentions this currency. That drama is set in Italy of 1595.

[4] Chicory – is a cultivated salad plant with blue flowers and with a good size root which is roasted and powdered for a substitute or additive to coffee. See the picture of its leaves above.

------------

सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------