सोमवार, 6 नवंबर 2017

व्यंग्य // संस्कारों की पिच पर टीम इंडिया की बैटिंग // अमित शर्मा (CA)

अनादिकाल से संयममार्गी और बॉलीवुड तपस्वी श्री आलोकनाथ जी को संस्कार और संस्कारिता का प्रतीक बताया जाता रहा है, जिसे निर्विवाद रूप से तीनों लोकों में स्वीकार और अंगीकार दोनों किया गया है। आलोकनाथ जी भले ही संस्कारों के अधिकृत धारक और वाहक हो किंतु संस्कारों की उत्पत्ति धर्म के गर्भ से हुई है और धर्मनिरपेक्ष भारत में क्रिकेट सबसे बड़ा धर्म है , इसीलिए भारतीय क्रिकेट टीम उर्फ़ टीम इंडिया संस्कारों से सबसे ज़्यादा पीड़ित दिखाई देती है।

टीम इंडिया भले ही कितनी भी आधुनिकता से लेस क्यों ना हो जाए उसके भारतीय संस्कार हमेशा मोर (More) ही रहते हैं। अपने संस्कारों के चलते टीम इंडिया कभी अपने इतिहास और बुजुर्ग क्रिकेटरों की परंपरा का अपमान नहीं करती है और उन्हीं के नक़्शे कदम पर चलते  हुए अपने पिछले रिकार्ड्स और पुराने खिलाड़ियों का आदरपूर्वक अनुसरण करती है। देखकर गला और पेट भरना स्वाभाविक है ज़ब क्रिकेटरों की नई खेप, पुराने क्रिकेटरों के द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को पार कर कभी नो-बॉल का शिकार नहीं होती है। हार-जीत तो लगी रहती है लेकिन केवल जीतने के उद्देश्य से अपनी गौरवशाली परंपराओं की तिलांजलि नहीं दी जा सकती है।

जिस तरह से फल लगने पर बड़ा वृक्ष थोड़ा झुक जाता है, उसी तरह टीम इंडिया फुल फॉर्म में होने पर भी विपक्षी टीम को कुचलने या धूल चटाने जैसे अमानवीय कृत्यों से दूर रहकर, उसे गले लगाकर जीतने का अवसर देती है ताकि सदाशयता और नैतिकता जैसे भारतीय मूल्यों को मैच फिक्सिंग की तरह समान अवसर दिए जा सके।

टीम इंडिया अपने प्रशंसकों के प्रति काफ़ी सचेत और वफ़ादार रहती है इसीलिए कभी भी लगातार जीतने की गलती कर अपने प्रशंसकों का भरोसा तोड़कर उन्हें धोखा नहीं देती है। अगर गलती से नया खून, जोश -जोश में लगातार 2-3 मैच जीतने की भूल कर भी दे तो, तुरंत उनके भीतर से ग्लानि और लानत  की निर्बाध सप्लाई मैदान में ड्रिंक्स की तरह होने लगती है जो उनको पुनः अगले कुछ मैच, विरोधी को अर्पित कर पश्चाताप करने को प्रेरित करती है। हमारा प्रयास भले ही हमेशा जीतने का रहे , लेकिन उद्देश्य हमेशा ऐसा नहीं होता है। हार और जीत के बीच संतुलन टीम इंडिया, इंडिविजुअल रिकार्ड्स की तरह आसानी से बना लेती है जो की बाकी टीमों के लिए साधना कठिन है।

लगातार हारना और जीतना एक तरह का नशा होता है और खिलाड़ियों को हर तरह के नशे से दूर रहना चाहिए। टीम इंडिया जीत के नशे से दूर रहकर समाज में नशामुक्ति का संदेश भी देती है जो कि खिलाड़ियों की समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का भी बोध करवाता है।

हम अतिथि को भगवान का दर्ज़ा पकड़ाते हैं इसलिए केवल अच्छी आवभगत करके उन्हें खुश नहीं रख सकते हैं बल्कि जिस इरादे से भगवान मतलब विदेशी टीम भारत आई है उसमें भी उन्हें सफलता दिलवाकर भगवान से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने संस्कारों का परिचय देते हैं। तरह तरह के पकवानों  के साथ-साथ  मेहमान टीम  को जीत का स्वाद भी चखाकर "अतिथि देवो भव!" की परंपरा का वहन और निर्वहन समय पर  किया जाता है।

हमारे खिलाड़ी आउट ऑफ़ फॉर्म भले ही चले जाए लेकिन कभी "आउट ऑफ़ संस्कार" नहीं होते हैं और यही बात उनको विपक्षी बैट्समैन और बोलर्स को सम्मान और सफलता दिलाने को विवश करती है। ज़ब हम विदेशी दौरे पर जाते हैं तो एक अच्छे मेहमान की भूमिका निभाते हैं, और हमारी खातिरदारी अच्छे से केवल फील्ड में ही हो पाती है। मेज़बान की खातिरदारी से हम इतना अनुगृहीत हो जाते हैं कि  अपने खेल से जीत का आग्रह दर्शाकर, मेज़बान का अपमान कर पाप के भागी नहीं बनते हैं। आईपीएल कॉन्ट्रैक्ट्स के बदले भी हम विदेशी धरती पर जीत की अपेक्षा नहीं रखते है, त्याग की इससे बड़ी मिसाल और  क्या हो सकती है।

ज़ब बाज़ार अपनी पगड़ी उछालते हुए आपको सर पर बैठाने को तैयार हो और उसके ऊपर विश्व के सबसे धनी बोर्ड का हाथ आपके सर पर हो तो हार और जीत में सम रहने में जेब या प्रदर्शन आड़े नहीं आता है। ज़ब हार या जीत आपकी जेब को प्रभावित नहीं करता है तो दिल से स्वाभाविक खेल निकलता है जो हार -जीत के परे हमारी संस्कारी परंपराओं का रक्षक और प्रेरक होता है।

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