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लघुकथा // *चाबी वाला* // राजेंद्र ओझा


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       "चाबी वाला" पिछले न जाने कितने वर्षों से यही उसका नाम है। उसका अपना नाम बहुत पीछे छूट गया है। कहीं दब गया है बहुत नीचे, इतना कि असली नाम  बताने हेतु उसे यादों में गोते लगाना पड़ता है। उसकी यादों का समंदर  धूसर और मटमैला है।

      तरह-तरह की चाबियों के गुच्छे लिए वह सुबह से निकल पड़ता है।"बंद पड़े ताले की खो चुकी है चाबी, कोई बात नहीं, अब आपकी ही गली में आ गया है 'चाबी वाला'। देखो देखो आ गया है 'चाबी वाला'। बनवा लो, बनवा लो - चाबियां बनवा लो।

      कोई उससे सायकिल की चाबी बनवाता तो वह सोचने लग जाता- काश, मेरे पास भी होती ऐसी ही कोई सायकिल, पुरानी थोड़ी टूटी फूटी ही सही, कुछ जादा दूर चला जाता, मिल जाते कुछ जादा पैसे। वह सायकिल की चाबी बना देता, और सायकिल वाले की खुशी उसकी अपनी खुशी हो जाती।

       कोई उससे संदूक खुलवाता। संदूक सोचो तो  'खजाना' ही याद आता है। वह बंद पड़े संदूक के अंदर का खजाना देखने लगता। कुछ कपड़े, कुछ साड़ियां, कुछ रूपये पैसे, कुछ बर्तन। उसके लिए ये सब किसी 'खजाने' से कम नहीं। वह संदूक के लिए चाबी बनाने बैठ जाता है। पूरा परिवार भी वहीं जमा हो जाता है। आस पड़ोस भी डाल  देता है वहाँ डेरा। खबर मिलते ही दौड़े चले आते हैं, बाहर गये लोग।

      जंग लगे ताले को वह पहले घासलेट से धोता है। फिर वह चाबी बनाने लगता है।  थोड़ा-थोड़ा घिस कर वह चाबी को बंद पड़े ताले में डालता  है। चाबी के साथ  बहुत सारी आंखें भी  वहाँ  जमा हो जाती है। वह चाबी घुमाने की कोशिश करता है। सारी आंखें एक साथ झुक जाती है। कुछ लोग खिसकते हुए आगे भी बढ़ आते हैं। वह चाबी निकाल लेता है और चाबी को फिर से घिसने लगता है। वह अपने ऊपर दबाव महसूस करता है। पीछे मुड़ता है तो लोग भी थोड़ा-थोड़ा पीछे हो जाते हैं। बार बार चाबी को घिस कर वह ताले में डालता है और ताले को खोलने की कोशिश करता है। चाबी हर बार पहले से ज्यादा घूमती है। चाबी जितना ज्यादा घूमती है, उसके चेहरे पर एक खुशी तैरने लगती है और इस  खुशी से पीछे खड़े लोग भी भीगने लगते हैं। वह एक बार और चाबी को घिसता है और ताले के अंदर डालता है। इस बार उसकी पीठ पर बहुत सारी हथेलियों का दबाव था। वह पीठ पर मुन्नी का लदना याद कर रहा था। एक - दो छोटे बच्चे संदूक पर बैठ जाते हैं । वह अपनी गोद में बबलू को याद कर रहा था।  इस बार  ताला खुल जाता है। लोगों ने संदूक को घेर लिया था। उसे लग रहा था मुन्नी, बबलू और लखमी ने उसे बांहों में भर लिया है।

      वह घर की तरफ़ जा रहा था। उसके पास न तो सायकिल थी और न ही कोई खजाना। कुछ सिक्के थे उसकी जेब में। वह घर के पास पहुंच गया था, वहाँ न बबलू था, न मुन्नी और न ही लखमी। बहुत पहले वे किसी मेले में बिछड़ गये थे।

      उसने अपनी जेब से एक फोटो निकाली, जिसमें वे चारों थे। उसने उसे अपने बाजू में रखा और उसके ऊपर हाथ रखकर इस तरह सो गया, जैसे उसने उन सबको बांहों में भर लिया हो।

      खुशी के बंद पड़े  ताले की यही एक चाबी थी उसके पास।

राजेंद्र ओझा

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