देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–10 : 12 तीन बतख के बच्चे // सुषमा गुप्ता

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12 तीन बतख के बच्चे[1]

एक बार की बात है कि इटली देश में तीन बतख के बच्चे रहते थे। वे तीनों भेड़िये से बहुत डरते थे क्योंकि अगर किसी दिन उसने उनको देख लिया तो वह तो उनको खा ही जायेगा।

एक दिन उन तीनों में से सबसे बड़ी बतख बच्ची ने दूसरी दो बतख बच्चियों से कहा —“ तुम्हें मालूम है कि मैं क्या सोचती हूँ मैं सोचती हूँ कि रोज रोज के इस डरने से तो अच्छा है कि हम एक घर बना लें। इससे भेड़िया हमको नहीं खा पायेगा। चलो तब तक हम लोग कुछ ऐसी चीज़ें ढूँढते हैं जिनसे हम अपना घर बना सकें।”

दूसरी दोनों बतख बच्चियाँ इस बात पर तुरन्त ही राजी हो गयीं। सो वे तीनों अपना मकान बनाने के लिये सामान ढूँढने के लिये निकल पड़ीं। रास्ते में उनको एक आदमी मिला जिसके पास बहुत सारे तिनके थे।

उन्होंने उस आदमी से कहा — “ओ भले आदमी क्या तुम हमको थोड़ा से तिनके दोगे ताकि इनसे हम अपने लिये मकान बना सकें ताकि हमें भेड़िया न खा सके?”

आदमी बोला — हाँ हाँ क्यों नहीं। जितने चाहो उतने तिनके ले जाओ।” और उसने जितने तिनके उनको चाहिये था उनको उतने तिनके दे दिये।

उन्होंने उस आदमी को धन्यवाद दिया और तिनके ले कर एक मैदान में चली गयीं। वहाँ जा कर उन्होंने तिनकों का एक बहुत ही सुन्दर घर बनाया जिसमें एक दरवाजा था, छज्जे थे और एक छोटा सा रसोईघर भी था। थोड़े में कहा जाये तो उस घर में सब कुछ था। और सब कुछ बहुत अच्छा था।

जब घर बन कर तैयार हो गया तो सबसे बड़ी बतख बच्ची ने कहा — “अब मैं इसमें अन्दर जा कर देखती हूँ कि हम सब इसमें आराम से रह सकते हैं या नहीं।”

सो वह घर के अन्दर गयी और बोली कि वह घर तो बहुत ही आरामदेह था। पर फिर वह बोली “ज़रा ठहरो।” कह कर वह घर के दरवाजे की तरफ गयी और घर के दरवाजे में ताला लगा कर घर के छज्जे पर गयी।

वहाँ से वह और दूसरी दो बतख बच्चियों से बोली जो घर के बाहर ही खड़ी थीं — “तुम लोग यहाँ से चले जाओ मेरा तुम लोगों से कुछ लेना देना नहीं है। मैं यहाँ इस घर में अकेली ही आराम से रहूँगी।”

दूसरी दो बतख बच्चियाँ बेचारी यह सुन कर रो पड़ीं। उन्होंने अपनी बहिन से बहुत प्रार्थना की कि वह उनके लिये घर का दरवाजा खोल दे और उनको घर के अन्दर आने दे और उनको भी अपने साथ उस घर में रहने दे पर उनकी बहिन ने उनकी एक न सुनी।

वे बेचारी दोनों वहाँ से चली गयीं। चलते चलते उनको एक और आदमी मिला जो भूसा ले कर जा रहा था। उन्होंने उस भले आदमी से कहा — “ओ भले आदमी, क्या तुम हमको थोड़ा सा भूसा दोगे ताकि हम अपने रहने के लिये घर बना सकें ताकि हमको भेड़िया न खा सके?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं। तुमको जितना भूसा चाहिये उतना भूसा ले जाओ।” कह कर उस आदमी ने उनको जितना भूसा चाहिये था उतना भूसा दे दिया।

सो उन्होंने उस आदमी से भूसा लिया उसको धन्यवाद दिया और फिर अपने रास्ते चल पड़ीं। वे भी एक हरे घास के मैदान में आ गयीं और वहाँ आ कर उन्होंने उस भूसे से अपना एक सुन्दर सा घर बनाया। उनका घर उनकी बहिन के घर से भी ज़्यादा सुन्दर था।

बीच वाले बतख बच्ची ने छोटी बतख बच्ची से कहा — “मैं भी इस घर में अन्दर जा कर देखती हूँ कि यह घर आरामदेह है या नहीं।”

सो वह उस घर में घुस गयी और अपने मन में सोचा कि “मैं तो यहाँ बहुत ही आराम से रहूँगी। मुझे अपनी यह छोटी बहिन यहाँ नहीं चाहिये सो वह भी दरवाजे पर गयी उसका ताला लगाया और उसके छज्जे पर चढ़ कर बोली — “यह मेरा घर है। मुझे यहाँ तुम नहीं चाहिये सो तुम यहाँ से चली जाओ।”

सबसे छोटी बतख बच्ची बेचारी बहुत ज़ोर से रो पड़ी। उसने भी अपनी बहिन से दरवाजा खोलने की बहुत प्रार्थना की पर उसने भी दरवाजा नहीं खोला। उसने अपना छज्जा भी बन्द कर लिया। सो वह छोटी बतख बच्ची रोती हुई वहाँ से चली गयी।

वह अकेली चली जा रही थी। वह बहुत डरी हुई थी कि अगर कहीं भेड़िये ने उसे देख लिया तो वह तो उसे खा ही जायेगा। पर उसके डरने से क्या होता है।

चलते चलते उसको भी एक आदमी मिला जिसके पास बहुत सारा लोहा और पत्थर थे। उसने उस आदमी से पूछा — “ओ भले आदमी, क्या तुम मुझको थोड़ा सा लोहा और पत्थर दोगे ताकि मैं भेड़िये से बचने के लिये अपने लिये एक मकान बना सकूँ?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं। जितना चाहो उतना ले लो।” उस आदमी को उस बतख बच्ची पर दया आ गयी तो उसने खुद ही उसके लिये उस सामान से एक मकान बना दिया।

उस मकान में एक छोटा सा बागीचा भी था और जरूरत का सब सामान था। इसके अलावा वह मजबूत भी बहुत था क्योंकि वह लोहे और पत्थर का बना था। उसके छज्जे और दरवाजे लोहे के बने थे।

सो उस बतख बच्ची ने उस भले आदमी को धन्यवाद दिया और उस घर में रहना शुरू कर दिया।

अब हम भेड़िये के पास चलते हैं। भेड़िया बहुत दिनों से इन बतख बच्चियों की तलाश म्ंों घूम रहा था पर वे उसे कहीं मिल ही नहीं रही थीं। कुछ दिन बाद उसको पता चला कि उन तीनों ने तो अपने अपने मकान बना लिये थे।

उसने सोचा “ठहरो मैं तुम्हारे पास आता हूँ तब मैं तुम सबको देखता हूँ।” कह कर वह उस घास के मैदान में आ गया जहाँ सबसे बड़ी बहिन ने अपना तिनकों का घर बनाया था।

वहाँ जा कर उसने दरवाजा खटखटाया तो सबसे बड़ी बतख बोली — “कौन है दरवाजे पर?”

भेड़िया बोला — “आओ आओ मैं हूँ दरवाजे पर।”

बड़ी बतख बच्ची बोली — मैं तुम्हारे लिये दरवाजा नहीं खोलूँगी क्योंकि तुम मुझे खा जाओगे।”

भेड़िया बोला — “नहीं नहीं तुम डरो नहीं। मैं तुमको नहीं खाऊँगा। तुम दरवाजा तो खोलो। अगर तुमने दरवाजा नहीं खोला तो मैं तुम्हारा घर उड़ा दूँगा।”

और उसने बड़ी बतख बच्ची के दरवाजा खोले बिना ही उसका घर उड़ा दिया और उसको खा गया। उसने सोचा “मैंने एक को तो खा लिया अब मैं बची हुई दोनों बतख बच्चियों को भी खा लेता हूँ।”

सो वह वहाँ से चल कर दूसरी बतख बच्ची के घर आया। वहाँ जा कर उसने दरवाजा खटखटाया तो वह बीच वाली बतख बच्ची बोली — “कौन है दरवाजे पर?”

भेड़िया बोला — “आओ आओ मैं हूँ दरवाजे पर।”

बतख बच्ची बोली — मैं तुम्हारे लिये दरवाजा नहीं खोलूँगी क्योंकि तुम मुझे खा जाओगे।”

भेड़िया बोला — “नहीं नहीं तुम डरो नहीं। मैं तुमको नहीं खाऊँगा। तुम दरवाजा तो खोलो। अगर तुमने दरवाजा नहीं खोला तो मैं तुम्हारा घर उड़ा दूँगा।”

और उसने उस बतख बच्ची के दरवाजा खोले बिना ही उसका घर भी उड़ा दिया और उसको भी खा गया।

अब वह तीसरी और सबसे छोटी बतख बच्ची के घर आया। वहाँ आ कर भी उसने उसके घर का दरवाजा भी खटखटाया पर उसने भी दरवाजा नहीं खोला।

इस पर भेड़िये ने पहले दो घरों की तरह से उस घर को भी उड़ाने की कोशिश की पर वह नहीं उड़ा सका। अब वह उस मकान की छत पर चढ़ गया और वहाँ जा कर उसको गिराने के लिये उस पर कूदने लगा। पर सब बेकार।

उसने कहा — “कुछ भी हो किसी न किसी तरह से तो मैं तुझे खा ही जाऊँगा।”

वह छत पर से नीचे उतर आया और बतख बच्ची से बोला — “सुन ओ बतख की बच्ची क्या तू मेरे साथ मेल जोल करके रहना चाहती है? क्योंकि तू बहुत अच्छी है इसलिये मैं तुझसे लड़ना नहीं चाहता।

clip_image002मैंने सोचा है कि कल हम मैकेरोनी[2] पकायेंगे। मैं मक्खन और चीज़ ले कर आऊँगा और तू मैकेरोनी उबाल कर रखना।”

बतख बच्ची बोली — “ठीक है कल तुम मक्खन और चीज़ ले कर आना मैं मैकेरोनी उबाल कर रखूँगी।”

भेड़िया उसके इस जवाब से सन्तुष्ट हो गया और उसको बाई बाई करके चला गया। अगले दिन बतख बच्ची सुबह सवेरे जल्दी उठी, बाजार से खाना खरीदा और अपने घर आ कर दरवाजा बन्द करके बैठ गयी।

कुछ देर बाद भेड़िया आया और उसने दरवाजा खटखटाया — “आ ओ बतख बच्ची मैं तेरे लिये मक्खन ओर चीज़ ले कर आ गया हूँ। दरवाजा खोल।”

“ठीक है तुम मुझे उन्हें इस छज्जे पर से दे दो।”

“नहीं नहीं तू पहले दरवाजा खोल।”

“मैं दरवाजा तभी खोलूँगी जब सब कुछ तैयार हो जायेगा।”

सो भेड़िये ने उसको मक्खन और चीज़ दे दी और अपने घर चला गया। जब भेड़िया वहाँ से चला गया तो बतख बच्ची ने मैकेरोनी एक केटली में पानी भर कर उबलने के लिये रख दीं।

दो बजे भेड़िया वहाँ फिर आया और पुकारा — “आ बतख बच्ची आ कर दरवाजा खोल।”

“नहीं मैं अभी दरवाजा नहीं खोलूँगी मुझे अभी बहुत काम है। मैं नहीं चाहती कि कोई मेरे काम में दखल दे। जब मैकेरोनी पक जायेगी तब मैं दरवाजा अपने आप खोल दूँगी। तब तुम अन्दर आ कर उसे खा लेना।”

कुछ देर बाद ही बतख बच्ची ने भेड़िये से कहा — “क्या तुम मैकेरोनी चख कर देखना चाहोगे कि वह ठीक से पक गयी या नहीं?”

“तू पहले दरवाजा तो खोल। उस तरीके से मैकेरोनी चखना ज़्यादा अच्छा रहेगा।”

“नहीं नहीं अन्दर आने की तो तुम सोचना भी नहीं। तुम अपना मुँह खोलो तो मैं यहीं से तुम्हारे मुँह में मैकेरोनी डाल दूँगी।”

अब भेड़िया तो बहुत लालची था सो उसने वही खड़े खड़े अपना मुँह खोल दिया और बच्ची बतख ने मैकेरोनी की बजाय केटली का उबलता पानी उसके मुँह में डाल दिया। इससे भेड़िये का गला जल गया और वह वहीं मर गया।

छोटी बतख बच्ची एक चाकू ले कर नीचे आयी और उसका पेट काट कर अपनी दोनों बहिनों को बाहर निकाल लिया। वे अभी तक ज़िन्दा थीं क्योंकि भेड़िये ने अपने लालच में उनको साबुत का साबुत ही निगल लिया था।

दोनों बड़ी बहिनों ने अपनी सबसे छोटी बहिन से अपने किये की माफी माँगी जो सबसे छोटी बतख बच्ची ने तुरन्त दे दी क्योंकि वह बहुत दयालु थी।

फिर वह उनको अपने घर के अन्दर ले गयी उनको मैकेरोनी खिलायी और फिर वे तीनों उस घर में आराम से रहने लगीं।



[1] Three Goslings (Story No 86) – a folktale from Italy, Europe.

Adapted from the book: “Italian Popular Tales”. By Thomas Frederick Crane. London, 1885.

Available free in English on https://books.google.ca/books?id=RALaAAAAMAAJ&pg=PR1&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false

[2] Macaroni is an Italian dish made with white flour, cheese and butter. See its picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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