बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : महावीर उत्तरांचली // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

clip_image002

महावीर उत्तरांचली

जन्म : 24 जुलाई, 1971

उपलब्धियां : पांच कृतियां गजलें, दोहे, शेर और जनक छंद की प्रकाशित

संपर्कः बी-4/79, पर्यटन विहार, वसुन्धरा इन्क्लेव, दिल्ली-110096

महावीर उत्तरांचली

तलाश

"मैं तो खलील जिब्रान बनूंगा, ताकि कुछ कालजयी रचनाएं मेरे नाम पर दर्ज हों." एक अति उतावला होकर बोला. हम सब उसे देखने लगे. हम सबकी आंखों के आगे हवा में खलील जिब्रान की उत्कृष्ट रचनाएं तैरने लगीं.

दरअसल काफी समय बाद मुलाकात में हम पांच लेखक इकट्ठा हुए. सभी एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित. पांचों पांडवों की तरह हम सब लेखन के हुनर के धुरंधर योद्धा. अतः हम पांचों के मध्य समय-समय पर साहित्य के अलावा विविध विषयों पर आत्ममंथन, गहमा-गहमी, टकराव, गतिरोध, वाद-विवाद, आलोचना, टीका-टिप्पणी आदि का दौर चलता रहता था. आज का विषय बातों-बातों में यूं ही बनता चला गया. बात चली कि हम साहित्य कैसा रचें? हमारे इर्द-गिर्द साहित्य की भीड़ है. हम किनका अनुसरण करें। या किस शिखर बिंदु को छुएं?

"मैं ओ’ हेनरी बनना चाहूंगा! उसके जैसी कथा-दृष्टि अन्यत्र नहीं दिखती." पहले शख्स का उतावलापन देखकर दूसरे ने भी जोश के साथ अपने होने की पुष्टि कर दी. हम सभी का ध्यान अब उसकी ओर गया. ओ’ हेनरी की अमर कहानियां ‘बीस साल बाद’, ‘आखिरी पत्ती’, ‘उपहार’ और ‘ईसा का चित्र’ आदि हम सबके दरमियान वातावरण में घूमने लगीं.

"मुझे चेखब समझो." तीसने ने ऐसे कहा, जैसे चेखब उसका लंगोटिया यार हो. बड़े गर्व से हम तीसरे की तरफ देखने लगे. चेखब का तमाम रूसी साहित्य अब हमारे इर्द-गिर्द था.

"और आप...!" मैंने सामने बैठे व्यक्ति से कहा.

"भारतीयता का पक्ष रखने के लिए मैं प्रेमचंद बनना चाहूंगा." उन चौथे सज्जन ने भी साहित्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया.

मैं मन ही मन सोच-विचार में डूब गया, ‘काश! इन सबने दूसरों की तरफ देखने की जगह अपनी रचनाओं में खुद को तलाशने की कोशिश...’ अभी मैं इतना ही सोच पाया था कि भावी प्रेमचंद ने मुझे झकझोर कर मेरी तन्द्रा तोड़ी, "और आप क्या बनना चाहोगे महाशय?"

"मैं क्या कहूं, अभी मेरे अंदर खुद की तलाश जारी है. जिस दिन पूरी हो... तब शायद मैं भी कुछ..." आगे के शब्द मेरे मुख में ही रह गए और मैं भविष्य के महान साहित्यकारों की सभा से उठकर चला आया.

पिघलती बर्फ

"सम्पूर्ण विश्व में मेरा ही वर्चस्व है." भूख ने भयानक स्वर में गर्जना की.

"मैं कुछ समझी नहीं." प्यास बोली.

"मुझसे व्याकुल होकर ही लोग नाना प्रकार के उद्योग करते हैं. यहां तक कि कुछ अपना ईमान तक बेच देते हैं." भूख ने उसी घमंड में चूर होकर पुनः हुंकार भरी, "निर्धनों को तो मैं हर समय सताती हूं. अधिक दिन भूखे रहने वालों के मैं प्राण तक हरण कर लेती हूं. अकाल और सूखा मेरे ही पर्यायवाची हैं. अब तक असंख्य लोग मेरे कारण असमय काल का ग्रास बने हैं."

यकायक मेघ गरजे और वर्षा प्रारम्भ हुई. समस्त प्रकृति खुशी से झूम उठी. जीव-जन्तु, वृक्ष-लताएं, घास-फूस. मानो सबको नवजीवन मिला हो! शीतल जल का स्पर्श पाकर ग्रीष्म ऋतु से व्याकुल प्यासी धरती भी तृप्त हुई. प्यास ने पानी का आभार व्यक्त करते हुए, प्रति उत्तर में ‘धन्यवाद’ कहा.

"किसलिए तुम पानी का शुक्रिया अदा करती हो, जबकि पानी से ज्यादा तुम महत्त्वपूर्ण हो?" भूख का अभिमान बरकरार था.

"शुक्र है मेरी वजह से लोग नहीं मरते. गरीब आदमी भी पानी पीकर अपनी प्यास बुझा लेते हैं. क्या तुम्हें भी अपना दंभ त्यागकर अन्न का शुक्रिया अदा नहीं करना चाहिए?"

प्यास के इस आत्म मंथन पर भूख हैरान थी.

-----------

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.