लघुकथाएँ : सूर्यकांत नागर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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सूर्यकांत नागर

जन्म : 3 फरवरी, 1933

उपलब्धियां : नौ कथा संग्रह, दो उपन्यास, दो व्यंग्य और निबंध संग्रह,

लघुकथा- चार संग्रह अब तक प्रकाशित

संपर्कः 81, बैराठी कॉलोनी क्र. 2, इंदौर-452014

(म.प्र.)

सूर्यकांत नागर

लघुता

रविवार था और बतियाने के लिए पड़ोसी खन्नाजी के यहां चला गया. यू.पी. चुनाव-परिणाम पर चर्चा चल रही थी कि खन्नाजी का बेटा विमल स्कूल से लौटा.

"कैसा रहा तुम्हारा आज का पर्चा?" खन्ना साहब ने पूछा.

"पापा! बहुत बढ़िया!" बेटे ने कहा. उसकी खुशी समा नहीं रही थी. कुछ रुककर कहा, "पापा, आज एक मजेदार घटना घटी. हमारे सर जब प्रश्न-पत्रों का बंडल लेकर जा रहे थे तो उसमें से एक प्रश्न-पत्र खिसक कर फर्श पर गिर गया. सर को इसका पता न था। मैं उनके पीछे-पीछे जा रहा था. मैंने पर्चा उठाकर देखा तो वह अगले दिन होने वाले गणित का पर्चा था. मैं कुछ देर ठिठका-सा खड़ा रहा. फिर दौड़कर पर्चा मास्टर जी को थमाते हुए कहा, "सर! ये पर्चा पीछे गिर गया था. पर्चा देख सर घबरा गए. पूछा, ‘तुमने इसे पढ़ा तो नहीं?’

‘बिल्कुल नहीं.’ मैंने कहा तो उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और चल दिए." कहते हुए वह एक बार फिर प्रसन्नता से भर आया. पर मैंने देखा, खन्नाजी के चेहरे का रंग एकाएक बदल गया. अफसोस की रेखा चेहरे पर खिंच गईं जैसे कोई सुनहरा अवसर नियत के हाथ से छूट गया, "मूर्ख है साला!" वे बुदबुदाए.

"हां, सचमुच मूर्ख है. बच्चा है इसलिए खुद की आंखों में धूल झोंक ली. बड़ा होता तो टीचर की आंखों में धूल झोंक आता." मैंने कहा.

पिघलती बर्फ

हाउसिंग बोर्ड के भवन में घनश्याम और रामेश्वर के फ्लैट आमने-सामने हैं। पिछले आठ बरस से वे यहां मित्रवत रह रहे हैं. पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित हो गए हैं. पिछले दिनों पता नहीं क्या हुआ? दोनों के बीच कहा-सुनी हो गयी. बातचीत बंद हो गई. सम्बन्धों में दरार पड़ गई. दोनों परिवार में खिंचाव पैदा हो गया.

इस बार घनश्याम छुट्टियों में बच्चों को घुमाने मुंबई ले गया. इस बीच उसका भतीजा नवीन सपरिवार उनसे मिलने आ गया. दरअसल नवीन अहमदाबाद से एक शादी में शामिल होकर लौट रहा था तो सोचा कि बीच में उतरकर दो-चार दिन चाचाजी के साथ रह लेगा. बच्चों को बड़ौदा घुमा भी देगा. अपने शहर लौटने का रिजर्वेशन भी उसने इसी हिसाब से कराया हुआ था.

परन्तु जब सपरिवार चाचाजी के निवास पर पहुंचा तो वहां दरवाजे पर ताला लटकता देख बहुत निराश हुआ. उसकी माली हालत भी ऐसी न थी कि कुछ दिन होटल में गुजार दे. पूरा परिवार ताला लगे द्वार के आगे हताश-निराश बैठा था. तभी सामने से रामेश्वर की निगाह उन पर पड़ी तो पूछा. नवीन ने सारी स्थिति बयान कर दी.

रामेश्वर कुछ देर तक सोच में पड़ा रहा, फिर बोला, ‘घनश्याम हमें कुछ बताकर तो नहीं गया. गए हुए एक सप्ताह हो गया है. संभव है, दो-चार दिन में लौट आए. आइए, तब तक आप हमारे साथ रहिए.’ और आग्रह कर उन्हें अपने घर ले आया. पति-पत्नी ने खूब आवभगत की. बच्चों को आसपास घुमाया.

तीन दिन बाद घनश्याम लौटा तो सारी स्थिति जानकर हैरत में पड़ गया. लज्जित भी हुआ. धन्यवाद के दो शब्द भी ठीक से न बोल पाया. चाचा के साथ रहकर, दो दिन बाद नवीन लौट गया.

बर्फ पिघल चुकी थी. अब घनश्याम और रामेश्वर पहले की तरह पुनः एक ही स्कूटर पर दफ्तर जाने लगे थे.

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