शोध आलेख // विभूतिनारायण राय के उपन्यास // रणजीत कुमार विमल // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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शोध आलेख

विभूतिनारायण राय के उपन्यास

रणजीत कुमार विमल

शोधार्थी, हिन्दी विभाग,

विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखंड)

विभूतिनारायण राय समकालीन दौर के चर्चित उपन्यासकार हैं। लेकिन सामान्य रूप में समकालीनता का जो दायरा बन जाता है उसके कुछ पहले ही यानि 1980 के दशक में उपन्यास लेखन में इनकी चर्चा होने लगी थी और वह दौर वस्तु और शिल्प की दृष्टि से संक्रमण का दौर कहा जा सकता है, क्योंकि पिछले दौर में जो यथार्थ चित्रण के प्रति अति आग्रह था उसका प्रभाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था और दूसरी ओर कथा में रूढ़िबद्ध हो चुके यथार्थ से मुक्त होने की बेचैनी भी खत्म नहीं हुई थी। कथा में रुढ़िबद्ध हो चुके यथार्थ से मुक्त होने की बेचैनी भी दिखलाई दे रही थी। वस्तु में बदलाव के लक्षण उस दौर में उभर रही नई कथा पीढ़ी जिसमें उदय प्रकाश, अखिलेश, सृंजय जैसे कहानीकार और विनोद कुमार शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी आदि उपन्यासकार थे, में स्पष्ट रूप से दिखलाई दे रहे थे। वस्तु के अनुरूप ही शिल्प में भी परिवर्तन हो रहे थे। इसी दौर में विभूति नारायण राय उपन्यास लेखन में सक्रिय हुए और यथार्थ चित्रण से विरक्त न होने के बावजूद उन्होंने उसकी जड़ता को तोड़ा। इसका कारण जीवन के प्रति उनकी व्यापक दृष्टि और स्पष्ट जनवादी सोच थी इसीलिए उन्होंने फार्मूलेबद्ध यथार्थ चित्रण के बजाय अपने समय और समाज की वास्तविकता को देखा और उसका सहज और गहरी संवेदनशीलता के साथ चित्रण किया।

राय साहब के अबतक कुल पांच उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। इनमें से तीन यानि शुरू के एक ‘घर’ और अंतिम ‘प्रेम की भूतकथा’ को छोड़कर सभी थीम की दृष्टि से साम्य रखते हैं। 1986 में इस कड़ी का पहला उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ प्रकाशित हुआ और वास्तव में यही उपन्यास इनकी प्रसिद्धि का सबसे अहम् कारण बना। इसमें सांप्रदायिक दंगे में गरीब और मजदूर किस्म के मुसलमानों की व्यथा-कथा है तथा राजनीति से लेकर नौकरशाही, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका का बड़ा सटीक और डिस्टर्ब करने वाला वर्णन किया गया है। ‘किस्सा लोकतंत्र’ लोकतांत्रिक राजनीति में बाहुबल और अपराधीकरण के जरिए ढहते सामंतवाद के फिर से उठ खड़े होने को थीम बनाया गया है तो ‘तबादला’ में नौकरशाहों और नेताओं के गठजोड़ से बने भ्रष्ट तंत्र की गजालत को कथा का केन्द्र बनाया गया है। इस प्रकार देखा जाय तो इन तीनों उपन्यासों को एक कड़ी में रखकर समकालीन दौर में विघटित लोकतंत्र की एक भयावह, पर मुकम्मल तस्वीर बनती है।

इस संदर्भ में आगे विचार करने से पहले इस पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है कि आज के यथार्थ के चित्रण के प्रसंग में लेखक का क्या रूख है। 1980 के दौर के प्रथम चरण कथा में नए किस्म के नायकों का विकास हो रहा था जो पहले के नायकों की तुलना में भिन्न थे। पूर्व की जनवादी-क्रांतिकारी कथानायक जहाँ सामाजिक संघर्ष के एक निश्चित पैटर्न में

बंधे हुए थे वहीं इस दौर के कथानायक यथार्थवाद और सामाजिक संघर्ष की तय परिभाषा से बिलकुल अलग दिखाई दे रहे थे। टूटे-फूटे लुम्पैन समय के ये कथानायक स्वयं उसी प्रकार से रिएक्ट कर रहे थे और पाठक वर्ग इनमें रुचि ले रहा था, क्योंकि उसे घिसे-पिटे यथार्थ चित्रण की तुलना में एक ताजगी दिखलाई दे रही थी। इसके बावजूद विभूतिनारायण राय अपने उपन्यासों में यथार्थ का ठोस चित्रण करते रहे, फिर भी रोचकता में कमी नहीं आई तो इसका एकमात्र कारण है जीवन के प्रति गहरी समझ और सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ को देखने की सूक्ष्म दृष्टि। इस संदर्भ में सबसे पहले इनके उपन्यास ‘घर’ की चर्चा अपेक्षित है।

‘घर’ में जिस निम्न मध्यवर्गीय परिवार का चित्रण है उसको ऊपर से देखने पर कोई अवसाद नहीं दिखलाई देता है जबकि वह परिवार भयानक आर्थिक संकटों से जूझ रहा है। बाहर से सब व्यस्त दिखलाई देते हैं जबकि किसी के पास कोई काम नहीं है। सब सक्रियता से कुछ ‘बन’ जाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। सब वास्तव में एक घनघोर अर्थहीनता के शिकार हैं। परिवार में एक युवा लड़की है जिसकी अपनी सहज यौन कामनाएँ हैं जिसका लेखक ने स्त्री विमर्श के चालू मुहावरे से बाहर निकलकर बड़ा मार्मिक चित्रण किया है। यह उद्धरण द्रष्टव्य है- ‘उसका मन करता है कि चीखे-चिल्लाए, अपने बदन के कपड़े तार-तार कर डाले। उसकी नसें तड़क रही हैं, एक अजनबी आग है जो पूरे शरीर को जलाकर भस्म कर डालना चाहती है।.. अगर वह मुंशी जी (पिता) से विद्रोह कर दे तो। लेकिन नहीं, शायद ऐसा वह नहीं कर सकती।’1 वह अपने यौनेच्छा के वशीभूत होकर अपने से छोटे भाई के दोस्त के साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश करती है लेकिन इसके बावजूद घर के बंधन को तोड़ने का प्रयास नहीं करती है। इस प्रकार लेखक यौन मनोविज्ञान के चित्रण में व्यापक सामाजिकता की उपेक्षा नहीं करता है। फिर भी इस उपन्यास को यथार्थ के प्रति नकारात्मक रवैया प्रस्तुत करने वाला उपन्यास नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें जिस घर का वर्णन है वह महज एक ढांचा भर नहीं है; बल्कि वह परिवार के सभी सदस्यों को जोड़े रखने वाला सूत्र है। इस प्रकार राय साहब व्यापक सामाजिक यथार्थ का चित्रण करते हुए सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण में भी पैठते हैं, इसीलिए सपाट किस्म का यथार्थवादी उपन्यास होने के बावजूद इनका यह उपन्यास मन की गहराई को छूता है। यौन मनोविज्ञान का चित्रण इसकी कथा की मूल संवेदना नहीं है। मूल संवेदना है घोर अभाव के बीच वह पारिवारिक संबंध चेतना जिसको घर एक सूत्र के रूप में जोड़े हुए है। इसीलिए लड़की अपनी अतृप्त यौन कामना के बावजूद न्यूरोटिक नहीं है। यौन मनोविज्ञान का चित्रण भी यथार्थ का ही एक हिस्सा है मगर सामाजिक-आर्थिक यथार्थ का दबाव इतना ज्यादा है कि वह इस घर की कहानी की मुख्य समस्या नहीं बन पाता है और जीवन की बुनियादी समस्याओं से लेखक अपने सरोकार बनाए रखता है।

राय साहब के उपन्यासों में थीम, चरित्र और यथार्थ के प्रति ट्रीटमेंट को लेकर पर्याप्त वैविध्य है। इनमें किसी भी दृष्टि से दुहराव नहीं दिखलाई देता है। बल्कि एक ही उपन्यास के भीतर यथार्थ को बरतने एवं चरित्र की मानसिक निर्मिति के चित्रण, अन्तर्द्वन्द्व, मानसिक और सामाजिक संघर्ष आधाारित है। इनके चर्चित उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ की भूमिका से लिए गए इस उद्धरण को देखना जरूरी है- ‘शहर में कर्फ्यू लिखना मेरे लिए एक त्रासदी से गुजरने जैसा था। उन दिनों मैं इलाहाबाद में नियुक्त था और शहर का पुराना हिस्सा दंगों की चपेट में था। हर दूसरे-तीसरे साल होने वाले दंगों से यह दंगा मेरे लिए कुछ भिन्न था। इस बार हिंसा और दरिंदगी अखबारी पन्नों से निकलकर मेरे अनुभव संसार का हिस्सा बनने जा रही थी- एक ऐसा हिस्सा जो अगले कई सालों तक दुःस्वपन की तरह मेरा पीछा नहीं छोड़ने वाला था। मुझे लगा कि इस दुःस्वप्न से मुक्ति का सिर्फ एक उपाय है कि इन अनुभवों को लिख दिया जाय।’2

यहाँ गौर करने की बात है कि हर दो-तीन सालों में होने वाला इलाहाबाद का दंगा उन्हें खास क्यों लगा? इसको समझने के लिए स्वतंत्र भारत में होने वाले दंगों के बदलते चरित्र पर ध्यान देना होगा। स्वतंत्रता के समय जो दंगे हुए उनके पीछे धर्म के आधार पर एक अलग राष्ट्र की परिकल्पना काम कर रही थी जो परिकल्पना किसी ठोस विचार के बजाय नेताओं के राजनीतिक स्वार्थ और उसके लिए किए जाने वाले दांव-पेंच पर ज्यादा टिकी हुई थी और इस स्वार्थ को हवा देने में अंग्रेजों की भी महती भूमिका थी, जबकि भारत के मुसलमान मजहबी तौर पर ही भिन्न थे, नस्ली तौर पर नहीं इसलिए इस परिकल्पना का आधार ही खोखला था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘भारत के अल्पसंख्यक यूरोप के अल्पसंख्यकों की भांति नस्ली या राष्ट्रीय अल्पसंख्यक नहीं हैं, ये धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। नस्ली तौर पर भारत एक मिश्रित प्रजातियों का देश है पर यहाँ नस्ल को लेकर कभी कोई प्रश्न नहीं उठे।’3

आजादी के समय होने वाले दंगों के पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण था पर बाद के समय में दंगों का चरित्र बदलता गया और धर्म का प्रश्न संस्कृति के रास्ते दो धार्मिक समुदायों के बीच नस्ली विभाजन के लिए आ गया। यह भी ध्यान देने की बात है कि विभाजन के नाम पर जो दंगे हुए उसमें भी पूरे अल्पसंख्यक समुदाय की सहमति नहीं थी इसलिए पाकिस्तान बनने के बाद भी बड़ी संख्या में मुसलमान वहां जाने के लिए तैयार नहीं हुए। रिजवान कैसर का यह कथन उल्लेखनीय है- ‘1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तानी एजेंडे को मुसलमानों के लिए हर मर्ज की दवा के रूप में प्रायोजित किया था जिसने उन्हें वोट देने वाले उन मुसलमानों का समर्थन दिला दिया जो औसतन 15: थे जबकि 11: ने ही मुस्लिम लीग को वोट दिया। ऐतिहासिक सन्दर्भों में बात करें तो मुसलमानों के एक बटे दसवें हिस्से, वह भी ज्यादातर उच्च वर्ग की राय मुसलमानों पर थोप दी गई और उसे पूरे समुदाय का सामूहिक निर्णय बताया गया।’4

इसके बावजूद देश का विभाजन हुआ और जो मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए उन्हें भी शक की निगाह से अथवा दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाता रहा। इसी के अनुरूप मुसलमान भी धीरे-धीरे एक प्रकार के भय का शिकार होते गए और दोनों समुदायों के बीच खाई बढ़ती गई। 1980 के दशक तक आते-आते यह खाई इतनी चौड़ी हो गई कि अक्सर दंगे होने लगे और धार्मिक भिन्नता नस्ली घृणा में बदलती गई और इसी का परिणाम हुआ कि दंगों के दौरान सरकारी मशीनरी भी बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में खड़ी होती दिखाई देने लगी। इस उपन्यास में शहर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में राय साहब ने जो देखा, महसूस किया उसी के कारण वे इतने व्यथित हुए कि उन्हें इस उपन्यास की रचना के लिए अग्रसर होना पड़ा। जिस दंगे का वर्णन इसमें किया गया है उसमें इन्होंने अपनी आँखों से देखा कि किस प्रकार पूरा निजाम मुसलमानों के खिलाफ था।

लेखक ने ‘शहर में कर्फ्यू’ में यथार्थ के चरम को कथा में लाने का काम किया है, इसलिए इसमें कहीं भी फैंटेसी के प्रयोग की गुंजाईश नहीं रह गई। इसीलिए विजेन्द्र नारायण सिंह इसे रिपोर्ताज की शैली का उपन्यास कहते हैं जो इसकी संरचना और प्रविधि को देखने पर उचित कथन कहा जा सकता है। इसकी कथावस्तु का दायरा भी बड़ा नहीं है, केवल कर्फ्यू के दिनों के ब्योरे हैं मगर ये ब्योरे इतने सूक्ष्म और मार्मिक हैं कि इन्हीं से कथा का पूर्ण रूप से परिपाक हो जाता है। इसमें कोई भी चरित्र ऐसा नहीं है जिसको प्रचलित मुहावरे में मुख्य चरित्र कहा जा सके। लेकिन बलात्कार की शिकार लड़की का चित्र उभरता है और वह पाठकों की संवेदना को झकझोर देता है। सईदा, जिसकी बीमार बच्ची कर्फ्यू के कारण दवा के अभाव में मर जाती है, तमाम निम्न वर्गीय, गरीब और फटेहाल वंचित मुस्लिम लोगों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत होती है जिस पर साम्प्रदायिक कहर टूटता है। इससे यह मालूम पड़ता है कि दंगे में ऐसे ही लोग सबसे ज्यादा यातना के शिकार होते हैं, यानि लेखक अपनी प्रखर सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि के कारण साम्प्रदायिकता और वर्गीय विभाजन के गठजोड़ की पहचान करता है और इस प्रकार सामाजिक तथा धाार्मिक विद्वेष के सरलीकरण के बजाय भारतीय समाज के जटिल यथार्थ को सामने लाता है। दरअसल राय साहब में कथा कहने का अद्भुत कौशल है जिसके कारण यथार्थ के साथ छेड़छाड़ किए बिना वे उसको ठस बनने से बचा लेते हैं। विजेन्द्र नारायण सिंह का कहना सही है कि ‘राय में कथा रचने का कौशल है जो अन्य किसी भी त्रुटि को आच्छन्न कर देती है...’ राय एक कुशल किस्सागो हैं और किस्सागोई की कला से समाज की सड़ांध का अनावरण करते हैं। इस तरह किस्सागोई की कला आलोचनात्मक यथार्थवाद का साधन बनती है। यथार्थ विवरण को कथा विधान के द्वारा संयोजित किया गया है।’5

इस उपन्यास में कर्फ्यू के दौरान घर में रहने वाले गरीब मुस्लिम परिवार की यातना का वर्णन है। कथा का केन्द्र बीमार बच्ची और उसकी माँ सईदा है। घर का कोई भी सदस्य बाहर नहीं निकल सकता क्योंकि पुलिस का रवैया इस समुदाय के प्रति खास तौर पर क्रूरतापूर्ण है। बच्ची दवा के बिना मर जाती है। व्यथा की पराकाष्ठा इन पंक्तियों से जाहिर होती है- ‘जो चीज याद आ रही थी वह भूख, धूल और बहती नाक का ऐसा मिला-जुला सम्मिश्रण था जिससे फिल्मी माँ के वात्सल्य को कोई माहौल नहीं बन पा रहा था।’6

वर्ग चेतना में सांप्रदायिक भावना किस प्रकार घालमेल करती है इसका उदाहरण कम्युनिस्ट रामपाल है जो साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देता है। लेखक कम्युनिस्ट, शांति समिति के लोगों एवं सत्ता तंत्र सबके पाखंड की कलई इसमें उतार देता है।

‘किस्सा लोकतंत्र’ वर्तमान लोकतंत्र की अधोगति की कथा है। हालाँकि इस थीम पर लिखे गए उपन्यासों का अभाव नहीं है, आजादी के तुरंत बाद के समय का चित्रण उसी दौर में रेणु ने ‘मैला आंचल’ में कर दिया था कि किस प्रकार लोकतांत्रिक राजनीति भ्रष्टाचार, भोग की आकांक्षा और जातिवाद का शिकार हो गई थी। यह भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना ही कही जायगी कि आजादी की लड़ाई के संघर्ष का समय नायकत्व के उभार का समय था मगर आजादी मिलने के साथ ही प्रतिनायकत्व के उदय का दौर शुरू हो जाता है जो आज राजनीति में अपराधी, माफिया और दलालों के गठजोड़ में परिणत हो गया है।

इस उपन्यास की कथा की शुरुआत पुलिस के द्वारा

अपराधी तत्वों के पनपने से होती है और अंत इन अपराधियों के माफिया तत्वों के गठजोड़ द्वारा एक इतर सत्ता तंत्र को विकसित करने के साथ होता है।

‘किस्सा लोकतंत्र’ की तरह ही ‘तबादला’ भी सामान्य किस्म का उपन्यास है। इसे ‘किस्सा लोकतंत्र’ का विस्तार भी कहा जा सकता है। जिस जन विरोधी भ्रष्ट सत्ता की चर्चा वहां हुई है उसी का और अधिक विद्रूप यहाँ प्रस्तुत किया गया है। भ्रष्टाचार, कार्य संस्कृति के पतन की बानगी के तौर पर इसमें कार्यालय के वातावरण का चित्रण किया गया है।

राय साहब के उपन्यासों में कथ्य की दृष्टि से पर्याप्त विविधता दिखलाई देती है। इसका बेहतरीन उदाहरण है ‘प्रेम की भूत कथा’। भूत की फैंटेसी महज कथा कहने की तकनीक है, इसमें जादुई यथार्थवाद देखना अनावश्यक है। इसमें प्रेम का वही उदात्त रूप चित्रित हुआ है। समर्पण और उत्सर्ग को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है। हत्या का आरोपी एलन फांसी पर चढ़ जाता है मगर खुद को निर्दोष सिद्ध करने के लिए असलियत नहीं बताता क्योंकि तब उसकी प्रेमिका की बदनामी होती। इस प्रकार एक ओर इसमें विक्टोरिया युग की नैतिकता की संवेदनशून्यता और अमानवीयता को दिखलाया गया है तो दूसरी ओर प्रेम में खुद का उत्सर्ग कर देने की उदात्त चेतना को भी दिखलाया गया है और इसी के पक्ष में लेखक खड़ा दिखलाई देता है। इसका अर्थ है कि लेखक ठोस सामाजिक यथार्थ के चित्रण तक ही सीमित नहीं है बल्कि गहरी मानवीय और तरल संवेदना का चित्रण भी करता है।

विभूति नारायण राय के अलग-अलग उपन्यासों में अलग-अलग तकनीक का प्रयोग किया गया है। ‘शहर में कर्फ्यू’ में उन्होंने दृश्य रचे हैं जबकि अन्य उपन्यासों, खास तौर से ‘प्रेम की भूतकथा’ में उन्होंने किस्सा कहने की कोशिश की है और इसमें उन्हें पर्याप्त सफलता मिली है। किस्सा कहने के लिए उन्होंने लैश बैक पद्धति का भी प्रयोग किया है। इसी प्रकार भाषा में भी वैविध्य दिखलाई देता है। मनोज कुमार पाण्डेय का यह कथन भाषा के प्रसंग में प्रकाश डालता है- ‘घर के रामानुज लाल श्रीवास्तव और ‘तबादला’ के बटुकनाथ उपाध्याय की भाषा एक-दूसरे से इतनी अलग है कि जानना मुश्किल हो जाता है कि दोनों एक ही लेखक की भाषाएँ हैं। उनके नवीनतम उपन्यास ‘प्रेम की भूतकथा’ में तो उनकी भाषा कवियों वाली हो जाती है या कई बार ढलान पर बहते साफ पानी की तरह बहने लगती है। एक और बात यह भी है कि उनके उपन्यासों में सिर्फ चरित्रों की ही भाषा नहीं बदलती बल्कि लेखक के वर्णन को नैरेट करने की भाषा भी बदल जाती है।’7 इस भाषाई वैविध्य के साथ ही इनकी एक और विशेषता है कि ये व्यंग्य का प्रयोग इस तरह अनायास करते हैं कि सहज रूप में विडंबना उत्पन्न हो जाती है।

संदर्भ सूची :-

1. घर, विभूति नारायण राय, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृष्ठ 28-29

2. शहर में कर्फ्यू, विभूति नारायण राय, भूमिका

3. डिस्कवरी ऑफ इंडिया, जवाहरलाल नेहरू, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली, 1981, पृष्ठ 382

4. हंस सं. राजेन्द्र यादव, अक्षर प्र., दिल्ली, अगस्त 2003

5. अनहद गरजै, सं. शम्भु गुप्त, सर्वेश जैन, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2012, पृष्ठ- 83

6. शहर में कर्फ्यू, विभूति नारायण राय,

7. अनहद गरजै, सं. शम्भु गुप्त, सर्वेश जैन, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2012, पृष्ठ- 98

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