बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथा : कुछ स्फुट विचार // माधव नागदा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

आलेख

घुकथा भी साहित्य का उतना ही महत्वपूर्ण कला अनुशासन है जितने कि उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक या अन्य विधाएँ. कोई रचनाकार समकालीन सामाजिक यथार्थ कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए इनमें से किसी भी माध्यम को चुनने के लिए स्वतन्त्र है. यह इस पर निर्भर है कि वह अपनी बात किस विधा द्वारा सशक्ततम तरीके से सम्प्रेषित करने में सक्षम है. मसलन, यदि वह कथाकार है तो यह जरूरी नहीं कि विचाराधीन कथ्य उपन्यास जितने विस्तृत फलक की माँग करता हो. वह कहानी का माध्यम चुन सकता है और यदि रचनाकार सोचता है कि कहानी से भी अनावश्यक भटकाव उत्पन्न हो रहा है, इसी कथ्य को सघनता के साथ लघुकथा के माध्यम से अभिव्यक्त करना सम्भव है तो वह लघुकथा विधा अपनायेगा.

रचना के आकार-प्रकार से कोई विधा छोटी या बड़ी नहीं हो जाती और न ही कोई लेखक छोटा या बड़ा हो जाता है. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन्हें हिन्दी में इस विधा का जनक माना जाता है कई लघुकथाएँ लिखीं. प्रेमचन्द, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, यशपाल, जयशंकर प्रसाद, उपेन्द्रनाथ अश्क से लेकर राजेन्द्र यादव, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, काशीनाथ सिंह, स्वयं प्रकाश, असगर वजाहत, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, चित्रा मुद्गल, संजीव जैसे लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों ने भी अभिव्यक्ति को सार्थक आयाम प्रदान करने के लिए लघुकथा विधा को अपनाया है. वस्तुतः लघुकथा का आविर्भाव सार्थक और सटीक अभिव्यक्ति की छटपटाहट का ही सुपरिणाम है। जो बात एक शब्द में कही जा सकती है उसके लिए अनावश्यक रूप से वाक्य भर शब्द व्यय करने की क्या तुक? शकुन्तला किरण का यह कथन महत्वपूर्ण है, "लघुकथा, एक प्रकार से कम आयवाले अर्थशास्त्री का अपना निजी बजट है जिसे वह प्रबुद्धता के साथ बहुत सोच-समझकर इस प्रकार बनाता है कि प्रत्येक पैसे का सार्थक उपयोग हो सके." ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि रचनाकार लघुकथा विधा को सफलता के ‘शॉर्टकट’ के रूप में अपना ले. इससे न केवल उसकी सृजनात्मकता का क्षरण होगा बल्कि लघुकथा विधा को भी क्षति पहुँचेगी. वेदप्रकाश अमिताभ इस खतरे की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं, "लघुकथा की लघुता जहाँ एक ओर उसका विशेष गुण है वहीं दूसरी ओर इसकी सीमा भी बन जाती है. बहुत से दोयम दर्जे के रचनाकार केवल इसीलिए लघुकथा पर कलम चलाते हैं कि इसका आकार लघु है. लघु कलेवर के चलते लघुकथा की कथन पद्धति में एकरसता और वैविध्यहीनता की आशंका बल पकड़ती है."

यह सत्य है कि प्रारंभ में लघुकथा के इस क्षेत्र में कई लेखक कुकुरमुत्ते की तरह उग आए थे जिससे एक तरह की अराजकता का माहौल बन गया था. किसी घटना का ज्यों-का-त्यों वर्णन या चमत्कारिक अन्त या फिर कथनी और करनी में अन्तर का सरलीकृत प्रस्तुतिकरण लघुकथा की राह में रोड़े की तरह खड़ा हो गया था. परंतु गंभीर लघुकथाकारों के अथक प्रयासों के बूते अब लघुकथा सही राह पर चल पड़ी. आज के परिदृश्य पर रामकुमार घोटड़ उत्साहपूर्वक कहते हैं, "अब समुद्र का पानी मचलकर शान्त हो गया. कंकर-पत्थर एवं टूटी हुई खरपतवार की टहनियाँ अपने ही वजन के कारण पेंदे में जा गिरी हैं. परजीवी काई दूर रह गई, अब स्वच्छ निर्मल जल ही रह गया है."

अन्य कला अनुशासन की भाँति लघुकथा की परख करते समय हमें उसमें अन्तर्निहित दृष्टि, सामाजिक सरोकार, कलात्मक अभिव्यक्ति, भाषा की प्रौढ़ता, शब्दों की मितव्ययता, कथ्य की नवीनता, मानवीय मूल्य, सम्प्रेषणीयता, समय की धड़कन और संवेदनात्मक गहराई की पड़ताल करनी होगी. इस प्रकार छनकर जो सामने आएगी वही हमारे समय की सच्ची लघुकथा होगी.

लघुकथा जीवन के किसी सूक्ष्म कालखण्ड की कथात्मक अभिव्यक्ति है परंतु यह कलात्मक भी हो यह जरूरी है वरना लघुकथा सपाटबयानी का शिकार होकर घटना का स्थूल चित्रण मात्र रह जाएगी. आज इस एकरसता को तोड़ने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं.

भाषा के स्तर पर मुहावरों, लोकोक्तियों, कहावतों, आंचलिकता का सटीक प्रयोग तथा कथ्यानुरूप बिम्ब विधान इस दिशा में बहुत कारगर हैं. लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि लघुकथा इन सबके बोझ तले दब न जाए. रसूल हमजातोव कहते हैं, "शोरबे को मजेदार बनाने के लिए जिस तरह उसमें तरह-तरह के सुगंधित पत्ते या मसाले डाले जाते हैं, उसी तरह अपनी नीरस फीकी कहानियों में मैं कहीं-कहीं एकाध कहावत या मुहावरा डाल देता हूँ. ताईलूख गाँव की लड़कियाँ होठों के कोनों के पास ठोड़ी पर दो चमकते हुए बिन्दु लगाती हैं. मेरे गद्य में कहावतें भी वैसे ही हैं जैसे लड़कियों के चेहरे पर ये बिन्दु!" रसूल की यह बात महत्त्वपूर्ण है. आटे में नमक की तरह इन उपादानों का प्रयोग होना चाहिए. ठोड़ी पर चमकते बिन्दु की तरह न कि गालों पर बने बड़े-बड़े टेटू की तरह. यद्यपि लघुकथा के सीमित कलेवर में उसकी गुंजाइश निकाल लेना बड़े कौशल का काम है. फिर भी कोई लघुकथाकार इस दिशा में प्रयोग करते हुए अपनी पहचान बनाने में सफल हुए हैं.

बहुत से लघुकथाकार प्रभावी सम्प्रेषण के लिए व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग करते हैं. व्यंग्य बहुत मारक होता है. यह तीर की तरह सीधा हृदय में खूब जाता है और पाठक तिलमिला उठता है. व्यवस्था के छद्म को बेनकाब करने के लिए यह शैली बहुत कारगर है. शंकर पुणतांबेकर और घनश्याम अग्रवाल ने इस शैली का सफलता से प्रयोग किया है. घनश्याम अग्रवाल की लघुकथा ‘आजादी की दुम’ इसका सटीक उदाहरण है. यहाँ पेंशन पाने के लिए वृद्ध हनुमान द्वारा ऑफिस में टेबल-दर-टेबल पूँछ कटवाने का जो बिम्ब गढ़ा गया है वह बहुत प्रभावी है. इसी प्रकार कुँवर प्रेमिल की ‘हरीराम हँसा’ लघुकथा रुपए में उतार-चढ़ाव के माध्यम से अर्थव्यवस्था की विसंगतियों पर करारा प्रहार करती है. अनगढ़ लेखक के हाथ में पड़कर व्यंग्य महज हास्य बनकर रह सकता है, इसलिए यहाँ सावधानी परमावश्यक है.

कुछ लघुकथाकार संवेदनात्मक गहराई के साथ अपने कथ्य की प्रस्तुति करते हैं. यहाँ गरीबी, शोषण, अभाव, भेदभाव, संघर्ष के ऐसे मर्मस्पर्शी चित्र होते हैं कि मन भीग जाता है, सहानुभूति और करुणा से भर उठता है. रामकुमार घोटड़ की ‘पैंट की सिलाई’ ऐसी ही लघुकथा है. बार-बार सिलाई के लिए आनेवाले पैंट का बिम्ब जीवन की कटु वास्तविकता को उधेड़कर रख देता है. इसी प्रकार अशोक भाटिया ‘कपों की कहानी’ में टूटे हुए कप द्वारा सवर्ण मन में बची रह गई भेदभाव की तरेड़ को बड़े प्रतीकात्मक ढंग से अभिव्यक्त करते हैं. मुरलीधर वैष्णव की ‘रांग नम्बर’ संवेदनात्मक गहराई और मानवीय संस्पर्श का एक उत्कृष्ट उदाहरण है. युगल ‘पे का कछुआ’ में गरीबी और बेबसी के मर्मस्पर्शी चित्र उकेरते हैं. पृथ्वीराज अरोड़ा की ‘कथा नहीं’ में नालायक समझे जानेवाले बेटे का दुःख पिता के दुःख से भी बड़ा बनकर उभरता है.

कहानी की अपेक्षा लघुकथा में कथाकार के लिए अपना रचनात्मक कौशल दिखाने की कम ही गुंजाइश होती है. कई रचनाकार इस थोड़ी-सी गुंजाइश से भी किनारा कर लेते हैं. परंतु सतीश दुबे, बलराम अग्रवाल, कमल चोपड़ा, सतीशराज पुष्करणा, रामयतन यादव, भगीरथ, प्रतापसिंह सोढ़ी, सुकेश साहनी, संतोष सुपेकर आदि लघुकथाकार जहाँ भी मौका मिलता है अपनी सृजनात्मकता का बखूबी परिचय देते हैं. प्रतापसिंह सोढ़ी द्वारा रचे गए कुछ उपमान दृष्टव्य हैं, ‘आँसू आँखों के बीच बने गड्ढों में समा मोतियों-से झिलमिलाने लगे’ (माँ फिर लौट आई), ‘सुर्ख जोड़े में टँके सलमे सितारे मुझे ऐसे लगे जैसे दादी की हसरतें मुस्करा रही हों’, ‘सूरज गुरूब हो चुका था’ (दर्द के रिश्ते), ‘मर्द दगड़ू लुढक़ गया’ (पिता) आदि. भाषा को लेकर कुछ और प्रयोग उल्लेखनीय हैं यथा, ‘मैंने उस नोट की रीढ़ को छुआ, उसकी नसें टटोलीं. उनमें दौड़ता हुआ लाल और नीला खून देखा’ (नोट- अवधेश कुमार) इसी प्रकार घनश्याम अग्रवाल द्वारा गढ़े गए ये बिम्ब भी भाषायी ताजगी का अच्छा नमूना हैं, ‘टॉफी की मिठास और गुब्बारे की छुअन, वह दोनों में उलझ जाती है’ (गुब्बारे का खेल), ‘पहली बार उसकी हथेली और कलसा दोनों एकसाथ भरे थे, पर आँखें बुझी-बुझी थीं’ (तुलसा का कलसा). दीपक मशाल भी भाषा और बिम्ब को लेकर पर्याप्त सचेत हैं, यह उनकी लघुकथा ‘सोने की नसेनी’ पढ़कर महसूस किया जा सकता है.

भाषा के उत्स और बिम्ब की बारीक बुनावट के लिए दो लघुकथाकार अलग ही चमकते हुए दिखाई देते हैं। इनमें से एक हैं चैतन्य त्रिवेदी और दूसरे स्व. रघुनन्दन त्रिवेदी. चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथा ‘अपना ही दुश्मन’ से यह उद्धरण देखिए-

‘पता नहीं उस राज्य का रिवाज ही कुछ विचित्र था. वहाँ दुश्मन राज करते थे. जो दुश्मन नहीं हैं किसी का वह राजकार्य के लिए सर्वथा अयोग्य समझा जाता. वहाँ अक्ल के दुश्मन राज करते. जो कानून का दुश्मन होता, वह कानून की हिफाजत का काम देखता. गरीबों का दुश्मन गरीबी हटाने का काम देखता था. कुछ धर्म के दुश्मन थे वे बड़े धार्मिक माने जाते थे. समाज के दुश्मन समाज सुधारक."

स्पष्ट है लेखक किस राष्ट्र की ओर इशारा करना चाहता है. साथ ही अपनी बात कहने के लिए जो दुश्मनवाला बिम्ब सृजित किया गया है वह लघुकथा को कलात्मक ऊँचाइँ प्रदान करता है.

रघुनन्दन त्रिवेदी के गद्य की बानगी देखिए-

"अपनी जिन्दगी में पिता वह सब हो सकते थे जो वे खुद या हम चाहते. मेरी इच्छा थी उन्हें घोड़ा बनकर खूब तेज भागते रहना चाहिए. भाई मुझसे बड़े थे. वे चाहते थे पिता नाव बनें ताकि बारिश के दिनों में हम चाहें तो नदी पार कर सकें. माँ और बहन का ख्याल था कि उन्हें छाते में बदल जाना जो धूप में भी उतना ही जरूरी होता है जितना बारिश में.

घर में किसी एक की भी इच्छा अधूरी रह जाती तो पिता कष्ट पाते, इसलिए जरूरत के मुताबिक वे घोड़े और नाव और छाते में बदलते रहते."

(स्मृतियों में पिता)

चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथा में व्यंग्य की महीन धार हमारे अन्तस् को छलनी कर देती है तो रघुनन्दन की संवेदनात्मक छुअन हमें पिता के कष्टों से जोड़ देती है. कितना पीड़ादायक होता होगा पिता के लिए जब उन्हें मनुष्य से वस्तु में बदलना पड़ता होगा. यहाँ घोड़ा, नाव और छाता प्रतीक के रूप में आकर लघुकथा को यादगार बना देते हैं.

असगर वजाहत ने ‘शाह आलम कैंप की रूहें’ शीर्षक लघुकथा श्रृंखला लिखकर लघुकथा विधा को एक नई दिशा दी है. इन सभी लघुकथाओं में आया साम्प्रदायिक दंगों का भयावह सच हमें भीतर तक झकझोर देता है.

अभी तक लघुकथाओं में कोई यादगार चरित्र उभरकर नहीं आया था. कोई घीसू, माधव, पंडित परमसुख, फूलों, या चाचा मंगलसेन. परंतु विष्णु नागर की ‘ईश्वर की कहानियाँ’ श्रृंखला की लघुकथाएं पढ़ने के पश्चात् यह कमी पूरी होती दिखाई देती है. यहाँ ईश्वर पर अमिट चरित्र के रूप में हमारे मन पर अंकित हो जाता है. ईश्वर पृथ्वी पर आता है अपनी सृष्टि को पहचानने एवं इस बहाने स्वयं की पहचान कायम करने. परंतु लोग न केवल उसे पहचानने से इनकार कर देते हैं बल्कि उसका मखौल भी उड़ाते हैं. ये लघुकथाएँ एक तरफ ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देती प्रतीत होती हैं तो दूसरी तरफ ईश्वर के बहाने आमजन की कठिन होती जा रही जिन्दगी का एक नए अंदाज में जायजा लेती हैं. अपनी बनायी सृष्टि में विचरण करते हुए ईश्वरीय स्वयं की पहचान के संकट से चाहे न उबर पाया हो परंतु इन लघुकथाओं में एक पात्र के रूप में उसने निश्चित रूप से अपनी पहचान बना ली है. जब भी ये लघुकथाएँ याद आएँगी ईश्वर के रूप में एक बेबस, लाचार, पराजित, अपमानित, अपनी पहचान के लिए विकल दैवीय पात्र हमारी आँखों के सम्मुख घूम जाएगा.

विष्णु प्रभाकर लघुकथा के कथ्य, शिल्प और भाषा पर खास जोर देते हैं. एक साक्षात्कार में अशोक भाटिया के प्रश्न के उत्तर में वे कहते हैं, ‘कथ्य, शिल्प और भाषा-किसी भी रचना के तीन महत्वपूर्ण अंग होते हैं. इन तीनों में यदि हम संतुलन बना सकते हैं तो रचना उतनी ही अच्छी होगी. जैसे संगीत में रस, औचित्य और संयम तीनों का ठीक होना जरूरी है वैसे ही लघुकथा में कथ्य, शिल्प और भाषा का ठीक होना जरूरी है." बेशक लघुकथा को तकनीकी दृष्टि से सुदृढ़ होना चाहिए परंतु बेलिन्स्की की यह बात भी हमें सदैव ध्यान में रखनी होगी, "यदि कोई कलाकृति केवल चित्रण के लिए ही जीवन का चित्रण करती है, यदि उसमें वह आत्मगत शक्तिशाली प्रेरणा नहीं है जो युग में व्याप्त भावना से निःसृत होती है, यदि वह पीड़ित हृदय से निकली कराह या चरम उल्लासित हृदय से फूटा गीत नहीं, यदि वह कोई सवाल या किसी सवाल का जवाब नहीं तो वह निर्जीव है."

यह खुशी की बात है कि आज का लघुकथाकार कलात्मक संतुलन के साथ आगे बढ़ते हुए अपने युग के ज्वलन्त सवालों से बचकर निकलने की कोशिश नहीं कर रहा है; बल्कि उनसे टकरा रहा है, जवाब पाने के लिए जूझ रहा है.

संपर्क : लालमादड़ी (नाथद्वारा) - 313301

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