श्रीरामकथा में अल्प वर्णित रधुकुल समर्पित शत्रुघ्नजी // डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

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श्रीरामकथा में अल्प वर्णित रधुकुल समर्पित शत्रुघ्नजी

डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति

श्रीरामायण तथा श्रीरामचरितमानस में श्री शत्रुघ्नजी के संबंध में विशेष वर्णन प्राप्त नहीं होता है । शत्रुघ्नजी के चरित्र की कई विशेषताएँ पद्मपुराण तथा अध्यात्मरामायण में भी यत्र तत्र वर्णित हैं । श्री शत्रुघ्नजी एक विशेष चरित्र वाले भाईयों में तथा परिवार में एक थे । बाल्मीकीय रामायण में इन्हें भगवान् विष्णु का ही अंशावतार बताया गया हैं । शत्रुघ्नजी के चरित्र से स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि वे श्रीराम के दास भक्तों में अग्रगण्य पंक्ति में प्रथम थे। शत्रुघ्नजी प्रेमी, मितभाषी ,विषयविरागी, सरल सदाचारी ,सत्यवादी गुरूजन अनुगामी और वीर भी थे । शत्रुघ्नजी के जीवन चक्र का वर्णन उनके नामकरण से प्रारम्भ होता है -

जाके सुमिरन तें रिपु नासा । नाम सत्रुहन बेद प्रकासा ।

श्रीरामचरित मानस बाल-196 -4

जिनके स्मरणमात्र से शत्रु का नाश होता है उनका वेदों में प्रसिद्ध '' शत्रुघ्न '' नाम है।

इसी बात का श्री वाल्मीकीयरामायण में भी वर्णन प्राप्त होता है ।

सौमित्रिं लक्ष्मणमिति शत्रुघ्नमपरं तथा ।

वसिष्ठः परमप्रीतो नामानि कुरूते तदा ।।

श्री वा. रा. बाल. 18-22

उस समय महर्षि वशिष्ठ ने प्रसन्नता के साथ सबके नाम रखे । सुमित्रा के एक पुत्र का नाम लक्ष्मण और दूसरे का शत्रुघ्न निश्चित किया गया ।

शत्रुघ्न के गुण और चरित्रों का अनुमान श्रीभरतजी के व्यवहार से संलग्न वर्णित है। श्रीभरतजी एवं शत्रुघ्न दिखने में दो शरीर अवश्य थे किन्तु उनकी आत्मा एक ही थी । श्रीराम व लक्ष्मण की जोड़ी सा ही इन दोनों भाईयों का प्रेम शब्दों में वर्णित करना एक कठिन कार्य है । श्री वाल्मीकीयरामायण में इनके प्रेम का वर्णन इस प्रकार है -

अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनुः परिपालयन् ।

भरतस्यापि शत्रुध्नो लक्ष्मणावरजो हि सः ।।

श्री वा0रा0 बाल- 18-32


जब श्रीरामचंद्रजी घोड़े पर चढ़ कर शिकार खेलने के लिये जाते थे , उस समय लक्ष्मण धनुष लेकर श्रीराम की रक्षा करते हुए उनके पीछे-पीछे जाते थे । इसी प्रकार लक्ष्मणजी के छोटे भाई शत्रुघ्न श्रीभरतजी को प्राणों से भी अधिक प्रिय थे और उनके साथ ही रहते थे । चारों भाइयों के विवाह उपरान्त वे सब जनकपुर से अयोध्या लौट आये । अयोध्या में विवाह के कुछ दिन बाद भरतजी को उनके मामा युधाज्ति् अपने देश ले जाने लगे तब शत्रुघ्नजी भी उनके साथ नाना के देश चले गये । शत्रुघ्नजी भरतजी के प्रेम और सेवा में इतने डूब गये कि अपने माता-पिता भाई-बंधु और नवविवाहित पत्नी श्रुतकीर्ति का प्रेम -माया मोह मार्ग में कांटा नहीं बन पाया । बड़े भैय्या भरतजी के बिना वे एक क्षण भी अयोध्या में रहना नहीं चाहते थे अतः उन्होंने भरतजी की सेवा में रहना ही श्रेष्ठतर समझा । अयोध्या से बुलावा आने पर भी ननिहाल में अकेले न रहकर भरतजी के साथ शीघ्र लौट आये । अयोध्या पहुँचने पर माता कैकेयी द्वारा पिता के मरण तथा लक्ष्मण और सीता के साथ श्रीराम के चौदह वर्ष वनवास का समाचार सुनकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ शत्रुघ्नजी ने भरत से इस प्रकार कहा -

गतिर्यः सर्वभूतानां दुःखे किं पुनरात्मनः ।

स रामः सत्वसम्पन्नः स्त्रिया प्रवाजितो वनम्।।

बलवान् वीर्यसम्पन्नो लक्ष्मणो नाम योऽप्यसौ ।

किं न मोचयते रामं कृत्वापि पितृ निग्रहम् ।।

श्रीवा0रा0 2-78-2-3 ।।

भैय्या (भरत) जो दुःख के समय अपने तथा आत्मीयजनों के लिये तो बात ही क्या हो सकती है समस्त प्राणियों को सहारा देने वाले हैं, वे सत्वगुण सम्पन्न श्रीरामजी एक स्त्री के द्वारा वन में भेज दिये गये । (अर्थात् यह अत्यन्तः ही दुःख की बात है ) साथ ही साथ वे जो कि बल और पराक्रम से सम्पन्न लक्ष्मण नाम वाले शूरवीर है उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने अपने पिता को कैद (निग्रह) करके भी श्रीराम को इस संकट से क्यों नहीं मुक्त किया । इस प्रकार वार्तालाप दोनों भाइयों में हो रहा था तथा शत्रुघ्नजी दुःख और क्रोध के समुद्र में डूब रहे थे । उसी समय राम के विरह से दुःखी एक द्वारपाल ने सूचना दी कि राजकुमार ! जिस दुष्ट क्रूरा पापिनी मंथरा के षडयन्त्र से ही श्रीराम को 14 वर्ष का बनवास दिया गया है , वह वस्त्राभूषणों से सजधज कर खड़ी है। बस फिर क्या था , शत्रुघ्न भी अपना क्रोध रोक नहीं सके । यथा -

लखि रिस भरेउ लखन लधुभाई । बरत अनल धृत आहुती पाई ।

हुमंिग लात तकि कबूर मारा । परि मुह भर महि करत पुकारा ।।

कूबर हुटेउ फूट कपारू । दलित दसन मुख रूधिर प्रचारू ।।

आह दइअ मैं काह नसावा । करत नीक फलु अन इस पावा ।।

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे धसीटन धरिधारि झोंटी ।।

भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ।।

श्रीरामचरितमानस अयोध्या 162-2-3-4

मंथरा को सजी देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में आ गये । मानो जलती हुई अग्नि में घी की आहुति मिल गई हो । शत्रुघ्नजी ने जोर से निशाना साध कर कूबड़ पर एक लात मार दी। मन्थरा चिल्लाती हुई मुँह के बल भूमि पर गिर पड़ी । उसका कूबड़ भी टूट गया ,कपाल फूट गया , दांत टूट गये और मुँह से रक्त बहने लगा । वह दर्द से पीडित होकर बोली हाय दैव ! मैंने क्या बिगाड़ा जो भला करते हुए बुरा फल पाया ।

उसकी यह बात सुनकर और नख से शिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी ने झोंटा पकड़-पकडकर उसे घसीटने लगे । तब दया के सागर भरत जी ने मन्थरा को छुडा लिया और दोनों भाई शीघ्र ही माता कौशल्या जी के पास गये। उसके बाद कैकेयी उसे छुडाने के लिये आयी थी तो शत्रुघ्नजी ने उसे फटकार दिया । अंत में भरत ने जाकर शत्रुघ्न को समझाया कि स्त्री जाति अवध्य मानी जाती है यथा -

इमावपि हतां कुब्जां यदि जानति राधवः ।

त्वां च मां चैव धर्मात्मा नाभिभाषिष्यते ध्रुवम् ।।

श्री वा.रा.अयो- 78-23

धर्मात्मा श्रीराम तो इस कुब्जा के भी मारे जाने का समाचार यदि जान ले तो वे निश्चित ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे । शत्रुघ्नजी एक आज्ञाकारी छोटे भाई थे । अतः उन्होंने श्रीभरतजी की इस बात , और आज्ञा को सुनकर मूर्च्छित अवस्था में मंथरा को छोड़ दिया ।

इस प्रकार प्रसंग में यह बात स्पष्ट हो गई कि श्रीराम नारी जाति का कितना सम्मान करते थे कि उन्होंने इसे अवध्य बताया । बड़े भाई भरत ने भी क्रोध एवं शोक से भरे शत्रुघ्न को पाप एवं अधर्म से रोककर बड़े भाई का दायित्व का निर्वहन किया । शत्रुघ्न जी का चरित्र भी एक आदर्श आज्ञाकारी भाई के रूप में यहाँ स्पष्ट हो गया । शत्रुघ्न श्रीराम को अयोध्या लौटाने भरत के साथ गये । चित्रकूट के निकट भरत की आज्ञा से श्रीराम की पर्णकूटी ढूंढने लगे । श्रीराम एवं भरत मिलाप में श्रीराम ने भरत एवं शत्रुघ्न को अश्रु भरे नेत्रों से गले लगाया । इसे वन में शत्रुघ्न का किसी से कोई संवाद रामायण एवं रामचरितमानस में विशेष रूप से पर्याप्त वर्णित नहीं है ।

श्रीभरत एवं शत्रुघ्न ने अयोध्या लौटने के पूर्व श्रीराम की प्रदक्षिणा की तथा चरणों में प्रणाम कर उनसे मिले । शत्रुघ्न का स्वभाव लक्ष्मणजी की भाँति तेज और शीघ्र क्रोधित हो जाने का था। वे कैकेयी के प्रति मन में रोष से भरे रहते थे । अतः श्रीराम इस बात को जानते हुए ही वन से विदा की बेला में शत्रुघ्न को वात्सल्य पूर्ण समझाया और कहा कि -

मारतं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरू तां प्रति ।।

मया च सीतया चैव शप्तोऽसि रधुनंदन ।

श्री वा0 अयो0 112 -27-28

रघुनन्दन शत्रुघ्न । निश्चय ही तुम्हें मेरी और सीता की शपथ है, तुम माता कैकेयी की सेवा करना उन पर कभी क्रोध न करना । इतना कहते कहते उनकी आँखों से आँसू उमड़ आये उन्होंने व्यथित हृदय से भाई को विदा किया । यह प्रसंग स्पष्ट रूप से बताता है कि शत्रुघ्न श्रीराम से कितना प्रेम , आज्ञा पालन और भक्तिभाव रखते थे ।

अयोध्या लौटकर शत्रुघ्न ने भरतजी की आज्ञा तथा प्रजा की सेवा का व्रत ले लिया। शत्रुघ्न पर भरत का भी पूरा विश्वास था । अतः उन्हें चाहे छोटा या बडा कार्य हो सौंप कर चिन्ता मुक्त थे । श्रीराम के अयोध्या आगमन की सूचना भरत को मिलने के पश्चात् भरतजी की आज्ञा से श्रीराम का आगमन कर अगवानी , स्वागत् और नगर को सजाने-सॅवार ने का कार्य भी बड़ी कुशलता पूर्वक शत्रुघ्न ने किया ।

भरतजी का अपने दोनों छोटे भाई लक्ष्मणजी एवं शत्रुघ्न पर समान अधिकार था । कई ऋषियों ने सीताजी के वनवास के एक दिन पश्चात् लवणासुर के अत्याचारों का वर्णन श्रीराम को बताया । अध्यात्यरामायण में उत्तरकाण्ड के सर्ग 6 में यह वर्णन श्रीमहादेवजी ने पार्वतीजी को लवणासुर की कथा के माध्यम से किया है । यमुनातट पर रहने वाले समस्त मुनिजन लवणासुर से अत्यन्त ही भयभीत होकर श्रीरामचंद्रजी के पास दर्शनलाभ एवं भृगुपुत्र च्यवन ऋषि को आगे कर अभय -लाभ प्राप्त करने आये । श्रीराम ने कहा कि आप सब ब्राह्मण ही मेरे इष्ट देव है । आप आज्ञा कीजिए यदि कोई कार्य अत्यन्त ही दुष्कर हो तो भी मैं अवश्य करूंगा। यदि आप सिर्फ मेरे दर्शन हेतु आये है तो मैं धन्य हूँ । भगवान के वचन सुनकर महर्षि च्यवन ने अत्यन्त ही प्रसन्न होकर कहा हे प्रभो ! पहले सत्ययुग में मधु नामक एक बड़ा ही धर्मात्मा देवता स्वभाव का एवं ब्राह्मणों का भक्त महांदैत्य था । उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीमहादेवजी ने उसे एक दिव्य त्रिशूल दिया तथा कहा कि इससे तू जिस किसी पर प्रहार करेगा वह इस त्रिशूल से भस्मीभूत हो जावेगा । ऐसा सुना गया है कि मधु की पत्नी रावण की छोटी बहिन कुम्भीनसी थी । कुम्भीनसी से लवण नामक ,महादुष्ट, महापराक्रमी, ब्राह्मणों तथा देवताओं को कष्ट पहुँचाने वाला यह राक्षस उत्पन्न हुआ ।

महर्षि च्यवन ने उसके दुष्ट कृत्यों को श्रीराम को बताया । तब श्रीराम ने लवण को मार डालने का कहा इसके पश्चात श्रीराम ने अपने भाइयों से पूछा -

लवणं नाशयिष्यामि गच्छन्तु विगतज्वराः।

इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपिभातृन् को वा हनिष्यति ।।

लवणं राक्षसं द्द्याद् ब्राह्मेणेभ्योऽभयं महत् ।

तच्छुत्वा प्राञजलिः प्राह भरतो राधवाय वै ।।

श्री अध्यात्मरामायण सर्ग 6-11-12

तुम में से कौन लवण राक्षस को मारेगा ? और ब्राह्मणों को महान अभय देगा ? यह सुनकर भरतजी ने श्रीराम जी से हाथ जोड़कर कहा - लवणं को मैं ही मारूंगा। प्रभो मुझे आज्ञा दीजिये । इसी बीच शत्रुघ्नजी ने श्रीराम को प्रणाम कर कहा हे राधव ! लक्ष्मणजी आपके साथ युद्ध में बड़ा भारी कार्य कर चुके है इसी प्रकार भरतजी भी नंदीग्राम में रहकर 14 वर्षों तक बड़ा कष्ट सहा है । अतः मैं ही लवण का वध करने जाउंगा ।

आपकी कृपा से मैं अवश्य ही उसे युद्ध में मारकर आपके चरणों में उपस्थित होना चाहता हूँ। शत्रुघ्न के दृढ़ निश्चय व वचन को दृष्टि में रखकर श्रीराम ने उन्हें गोद में उठा लिया और कहा '' मैं आज तुम्हारा (लवण की राजधानी ) मथुरा के राज्य पर अभिषेक करूंगा । लक्ष्मण जी ने श्रीरामजी की आज्ञा से अभिषेक की सामग्री उन्हें लाकर दे दी । शत्रुघ्न की इच्छा न होने पर भी श्रीराम की आज्ञा का पालन किया । श्रीराम ने शत्रुघ्न का अभिषेक कर उन्हें दिव्य बाण देकर कहा कि तुम संसार के कष्टरूप लवण को इस बाण से मार डालना । मार्ग में जाते समय शत्रुघ्नजी एक रात्रि महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ठहरे । उस रात्रि में सीताजी कुश और लव उन दो जुडवा (यमज) पुत्रों का जन्म हुआ । इसलिये यह शुभ रात्रि शत्रुघ्नजी के लिये आनंददायिनी हुई ।

राक्षस लवण अपने घर में ही उस शिवजी के दिव्य त्रिशूल की पूजा अर्चना कर अनेक प्रकार के जीवों को मारने व खाने वन को जाता था । श्रीराम ने यह बात बताकर कहा कि अतः वह लौटकर घर न आये वन में ही रहे उससे पूर्व ही शत्रुघ्न तुम नगर के द्वार पर धनुष धारण कर खड़े रहना । लौटने पर वह क्रोधपूर्वक तुमसे लड़ेगा और उसी समय वह मारा जा सकता है । यही समय उसका मृत्यु का है । दुष्ट लवण को मारकर उसके मधुवन में एक नगर बसाकर मेरी आज्ञा से वहीं रहना । तुम्हें पाँच हजार धोड़े ढाई हजार रथ, छः सौ हाथी और तीन हजार पैदल भी भेज दिये जावेंगे । शत्रुघ्न ने मधुपुत्र लवण को मार कर मथुरापुरी को एक समृद्धशाली नगर बनाया ।

मथुरा में उसे सुन्दर नगरी बसाकर शत्रुघ्नजी बारह वर्ष बाद श्रीराम के दर्शन प्राप्त करने हेतु अयोध्या लौटे । आते समय भी वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ठहरे । वहाँ उन्होंने मधुर स्वर में श्रीरामचरित को सुना । रात्रि में उसे सुनकर वे करूणा से भर गये । रात्रि में नींद नहीं आयी । प्रातःकाल श्रीरामजी के दर्शन की उत्कण्ठा से अयोध्या की ओर चल पडे । अयोध्या पहुँचकर श्रीरामजी को प्रणाम कर कहा कि - भगवान आज्ञानुसार मैं लवाणांसुर को मारकर तथा वहां मथुरा नगर बसाकर आया हूँ

द्वादशैतानि वर्षाणि त्वां विना रधुनन्दन् ।

नोत्सहेयमहँ वस्तुं त्वया विरहितों नृप ।।

स में प्रसादं काकुत्स्थ कुरूष्वामितविक्रम ।

मातृहीनों यथा वत्सो न चिरं प्रवसाम्यहम् ।।

श्री वा0रा0 7/72 -11-12

महाराज रधुनाथजी ! ये बारह वर्ष मैंने आपके वियोग में बड़ी कठिनता से व्यतीत किये हैं । अतः अब मैं आपके बिना , वहाँ निवास करना नहीं चाहता । अतएवं महापराक्रमी श्रीरामजी ! आप मुझ पर ऐसी कृपा करें जिससे मातृविहीन बालक की भाँति मैं आप से अलग होकर बहुत दिनों तक कहीं न रहूँ ।

शत्रुघ्न की इस बात को सुनकर श्रीराम ने उन्हें हृदय से लगाया और कहा - वीर तुम्हें यह शोक नहीं करना चाहिये क्योंकि यह क्षत्रियों के स्वभाव के अनुरूप नहीं हैं । तुम एक वीर क्षत्रिय हो अतः क्षात्र धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करना तुम्हारा कर्तव्य है । समय समय पर मुझसे मिलने आ जाया करो । शत्रुघ्नजी ने श्रीराम की आज्ञा प्रसन्नता पूर्वक मान ली । अपने दोनों बडे भाई श्रीभरतजी एवं लक्ष्मण को प्रणाम कर मथुरा चले गये।

श्रीराम परमधाम जाने वाले थे तब शत्रुघ्नजी को संदेश भेजकर बुलाया गया । श्रीराम के परमधाम जाने का निश्चय का पता लगा तो शत्रुघ्नजी ने अपने दोनों पुत्रों सुबाहु एवं शत्रुधाती का राज्याभिषेक कर दिया । सुबाहु का मथुरा का राज्य और शत्रुधाती को विदिशा का राज्य सौंप कर मात्र रथ के द्वारा अयोध्या के लिये प्रस्थान किया । श्रीराम से कहा कि मैं अपने दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक कर आपके साथ ही परमधाम चलने का निश्चय करके आया हूँ । मैं आपका जीवन भर अनुयायी रहा हूँ । अतः आप ऐसी आज्ञा न दे कि मैं घर्मसंकट में पड़कर उस आज्ञा का उल्लंघन कर दूँ । मैंने आजीवन आपकी आज्ञा का पालन किया है । आप ही मुझे इस धर्मसंकट से बचावे । श्रीराम ने शत्रुघ्नजी की यह प्रार्थना स्वीकार की और उनके साथ परमधाम पधार गये ।

शत्रुघ्न के जीवन चरित्र का वर्णन कई ग्रन्थों में अधिक विस्तार से नहीं तो कम से कम जितना है अत्यन्त ही प्रभावशाली व्यक्तित्व का हैं । वे विष्णु भगवान् के अंशावतार थे । उनमें अपने तीनों बडे भाईयों के गुण जैसे आज्ञापालन ,वीरता , क्षत्रियत्व ,न्यायप्रियता ,धर्मरक्षक ,लक्ष्मण जैसा क्रोध भी था । उन्होंने श्रीराम की आज्ञा से लवण राक्षस का वध कर मथुरा नगरी को एक नया स्वरूप देकर बसाया , वह आज भी उनकी सृजनता का द्योतक है । वे अंत समय में भी बड़े भाई श्रीराम का अनुकरण कर उनसे ही आज्ञा प्राप्त कर भाई का प्रेम व साथ बिताने , राज्य के वैभव का परित्याग कर परमधाम चले गये । वे जीवनभर अपने तीनों भाईयों की आज्ञा का सम्मान कर कर्तव्य मार्ग से कभी भी विचलित नहीं हुए । उनके भ्रातृत्व प्रेम का ऐसा दृष्टान्त आज मिलना व दिखना दिवास्वप्न है । श्री सीताराम -लक्ष्मण के वन गमन एवं भरतजी के चौदह वर्ष नंदीग्राम चले जाने के बाद रघुकुल के परिवार की सेवा करने का कार्य शत्रुघ्नजी ने ही किया ।

रघुकुल के परिवार में सबसे छोटे सदस्य की यह अग्नि परीक्षा ही थी । शत्रुघ्नजी ने सभी माताओं , भाई, भाभियों , एवं प्रजा की जो चौदह वर्षों में सेवा व बड़ों की आज्ञा पालन की है । इसका उदाहरण शायद ही किसी पौराणिक कथा में हो। उनका पूरा पूरा जीवन ही भारतीय संस्कृति में सदैव श्लाघनीय है तथा सदियों हमारी नई पीढी को प्रेरणा-ऊर्जा प्रदान करता रहेगा ।

डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.) पिकोड- 456010

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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