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लंबी कहानी अच्छा तो तुम यहां हो ! - राजेंद्र चंद्रकांत राय

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रिटायरमेंट पहले तो बड़ा रोमेंटिक सा लगता है, पर कुछ दिनों बाद ऐसा महसूस होने लगता है कि हम नौकरी से ही नहीं, बल्कि जिंदगी से भी निकले जा रह...

सोनम सिकरवार की कलाकृति

रिटायरमेंट पहले तो बड़ा रोमेंटिक सा लगता है, पर कुछ दिनों बाद ऐसा महसूस होने लगता है कि हम नौकरी से ही नहीं, बल्कि जिंदगी से भी निकले जा रहे हैं। सरकारी नौकरियों ने लोगों को इतना गाफिल बना दिया है कि पहले तो वे इसमें डूबे रहते हैं और जब नौकरी पल्ला झाड़ लेती है, तब वे ठगे से रह जाते हैं। मगर हमारी कहानी का यह जोड़ा, ऐसे लोगों से भिन्न है। ये दोनों रिटायरमेंट को एक नयी शुरूआत की तरह देखते हैं और जिंदगी के दूसरे पक्ष के प्रति इनके मन में गहरी उत्कंठा भी है।

ये लोग अपने युवाकाल के दिनों में लगभग एक साथ ही नौकरी में दाखिल हुए थे और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए पति-पत्नी बन गये थे। कुछ सालों के बाद पुरुष को यह बात खलने लगी थी, कि स्त्री इतनी जल्दी प्रेमिका की काया से खारिज होकर, पत्नी की घरेलू काया में स्थानांतरित क्यों हो गयी? जबकि उन्माद और स्फुरण, पुरुष में अब भी बचा हुआ था, पर स्त्री आधी घरेलू और आधी दफ़्तरी होकर दो हिस्सों में बंट गयी थी। पुरुष ऐसा करने में स्त्री से पिछड़ गया था, क्योंकि वह अपने को हमेशा ही युवा-उमंगों से लबरेज महसूस करता था। मस्त और फक्कड़ बने रहने के प्रति उसके मन में गहरा अनुराग था। चरित्र का हिस्सा। अक्सर ऐसा होने लगाा था कि वह स्त्री में अपने हिस्से की, एक भरपूर प्रेमिका की तलाश करता, और उसके हाथ कभी एक घरेलू स्त्री लगती तो कभी मात्र एक स्कूल-टीचर। प्रेमिका नदारद रहती। वह स्त्री से अपने लिये एक प्रेमिका की मांग करता और वह बुजुगर्गाना अंदाज में फरमाती कि हम जिंदगी भर लवर्स नहीं बने रह सकते। उसकी एक उम्र होती है। अब दूसरी उम्र आ चुकी है और इस दूसरी उम्र के अपने तकाजे हैं, जिन्हें पूरा करना है।

साठ पार होते-होते शनिवार-इतवार की छुट्टियाँ लंबी होने लगीं। कदन लंबे होने लगे। सुबहें अख़बार पढ़ने और नाश्ता करने के बाद भी बची रहतीं। दोपहरें, भोजन और विश्राम से लंबी हो जातीं और शामें चाय की प्यालियों में न समातीं, छलक-छलक कर गिरती रहतीं। बरामदे में बैठकर वे, उन्हें काटने की कोशिशें करते, किंतु वे दिा न होतीं बल्कि फेन्स के इधर ही रही आतीं। यहाँ तक कि टहलने का पराक्रम करने पर भी अछोर बनी रहतीं। वे दोनों टहलने के लंबे रास्ते खोजते और उन पर सुस्त-कदम चलते। कभी सड़कों से उतर जाते और बगीचों में बैठकर फूलों के रंगों और किस्मों पर मामूली किस्म की बातें करते और कभी-कभी तो तालाब के तट पर बैठकर पानी में कंकर फेंकते और उसकी लहरों में बनने वाले वृत्तों को गिनते रहते।

ऐसी ही एक शाम, जब वे बाएं हाथ में कंकरों की एक छोटी सी ढेरी रखे हुए, उन्हें दाएं हाथ से उठा-उठा कर तालाब में फेंक रहे थे, एक सम्मोहन चुपके से आकर, उन्हें अपनी जद में ले चुका था। वे न तो बायां हाथ देख रहे थे और न दायां, बस, ताल-जल में होने वाली 'डुब्ब' की हल्की आवाज पर कान रखे हुए, वहां बनने वाले जल-वृत्तों पर आँखें जमाये हुए थे। कभी स्त्री पुरुष के बनाये वृत्तों में साधिकार प्रवेश कर जाती थी, तो कभी पुरुष। वे एक-दूसरे के बनाये वृत्तों की तोड़-फोड़ में मनोयोग से जुटे हुए थे। तोड़-फोड़ में भी प्रेम और एंद्रिकता होती है। विपरीत व्यक्तित्वों में जा समाने की उद्दाम लालसा ही ऐसा कराती है।

वे इतने दत्त-चित्त थे कि उन के कंकर प्रक्षेपण के बीच एक और तीसरा, और कुछ ज्यादा ही कोमल कंकर-प्रक्षेपण भी शामिल हो गया है, इसका उन्हें पता ही न चला। वे उस तीसरे कंकर को भी, पहला या दूसरा ही समझते रहते, यदि जरा देर बाद ही कंकर के साथ-साथ एक रंग-बिरंगी फिरकी सी बाल-आकृति भी, तालाब के पानी में जल-वृत्त बनाने न गिर पड़ती।

दोनों औचक रह गये थे। सम्मोहन टूट गया था। टूटे हुए सम्मोहन से बाहर निकलने में समय लगा। 'क्या हो गया है' यह समझने की मानसिक प्रक्रिया के दौरान ही पुरुष फुर्ती से उठा और तालाब में कूद गया। दूसरे ही पल उसके हाथों में ढाई-तीन साल का एक मासूम बच्चा था, जो नाक-कान में पानी भर जाने के कारण, भयभीत होकर जोर-जोर से रो रहा था। गले में पानी भर जाने से बेचैन था और बुरी तरह से खाँस रहा था । स्त्री, इस दृश्य को देखकर हक्का-बक्का थी और अपनी जगह पर हतप्रभ सी खड़ी रह कर, 'कैसे हो गया', 'यह किसका बच्चा है' जैसे सवालों से अपना चेहरा भरे हुए थी।

पुरुष उस फड़फड़ाते हुए बच्चे को अपनी छाती से लिपटाये हुए था और उसे चुप कराने के लिये क्या करे, समझ नहीं पा रहा था। उसका सूट पानी में लिथड़ गया था। चश्मे पर पानी की तरल पर्त चढ़ गयी थी और बाहर का सब कुछ धुंधला-धुंधला हो गया था। मूंछों की सफेदी पर जल की तरलता लेट गयी थी।

बच्चे के माता-पिता पार्क में ही कहीं थे और अब बदहवासी में, इसी तरफ भागे हुए चले आ रहे थे। माता ने आते ही बच्चे को अपनी गोद में झपट लिया और साड़ी के पल्ले से उसका सिर पोंछने लगी। पिता भी डरा-डरा सा दिख रहा था और बच्चे के बच जाने पर ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था। बच्चे के माता-पिता बच्चे को लेकर कब चले गये, उन्हें पता ही नहीं चला। वे बच्चे की दशा देखकर परेशान रहे होंगे और इसी हड़बड़ी में उन्होंने, बच्चे की रक्षा करने वाले इन दोनों का शुक्रिया तक अदा न किया था।

उनके दिल अब भी धड़-धड़ कर रहे थे। पुरुष का शरीर तो कांपने ही लगा था। यह देखकर स्त्री ने हाथ पकड़कर बैठा दिया- थोड़ा बैठ जाईये... सुचित्त हो जाईये, फिर घर चलेंगे।

स्त्री भावनात्मक रूप से पुरुष की तुलना में थोड़ा मजबूत है पर पुरुष फिल्म में भी कोई हृदयस्पर्शी दृश्य देख ले, तो थरथरा जाता है। गहरे प्रेम के दृश्य उसकी आंखों में पानी भर देते हैं। बच्चों के प्रति उमड़े हुए प्रेम के दृश्यों को तो वह बिना रोये देख ही नहीं सकता। थोड़ी देर तक बैठ लेने के बाद जब वे घर के लिये चले, तो स्त्री ने पूछा- अब कैसा लग रहा है...?

- ठीक है... यूं ही... थोड़ा सा डर गया था...।

- सूट तो पूरा गीला हो गया...।

- हाँ, पर बच्चा बच गया...।

- हाँ, ईश्वर ने कृपा की...।

वे तालाब के तट से उतरकर पार्क में आये और बाहर जाने की सीमेंट-पगडंडी पर चलने लगे। पुरुष बार-बार छाती को छू रहा था। उसे लग रहा था कि बच्चा अब भी, उस जगह पर, उससे चिमटा हुआ है और डूबने से बचने के लिये छटपटा रहा है। उसे लग रहा था `कि वह, डरा और घबराया हुआ नन्हा-छौना, अपने छोटे-छोटे हाथों से अब भी उसका कोट थामे हुए है।

स्त्री की आँखों में भी, अभी तक, बच्चे का पानी में 'धम्म से' जा गिरना धंसा हुआ था। वह चुप सी हो गयी थी, और अपनी आँखों से, डूबने के उस खुबे हुए दृश्य को, बाहर निकाल पाने में लगातार असमर्थ होती जा रही थी। वह अकारण ही अपनी आँखों को पोंछे जा रही थी, जैसे आँखें पोंछने से, वह भयानक और मौत के मुंह में जाने वाला दृश्य भी पुँछ जायेगा।

- चलिये... जल्दी चलकर कपड़े बदल डालिये... नहीं तो सर्दी लग जायेगी...।

- हाँ, चलो...।

उनके कदम तेज हो गये।

विनय साहब टहलकर लौट रहे थे, देखा तो टोका- अरे, क्या सूट सहित तैरने गये थे ? कहां से नहाकर चले आ रहे हैं...?

पुरुष ने उन्हें पूरा किस्सा सुनाया। स्त्री ने दरवाजे पर लगा ताला जल्दी से खोला। बत्तियाँ ऑन कीं और भागती हुई सी अंदर गयी। पुरुष बरामदे में ही खड़ा रहा। फिर उसने कोट उतारा और बेंत की कुर्सी पर बैठ गया। पेंट से अब पानी नहीं टपक रहा था, पर एक वजनदार गीलापन अभी भी शेष था।

स्त्री तौलिया और कपड़े ले आयी- लीजिये, पहले सिर पोंछिये...शर्ट भी उतार दीजिये और चेंज कर लीजिये...। जल्दी से...।

पुरुष ने पेंट बदल ली और ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी ऑन कर चुका था। वहाँ ब्रेक चल रहा था और विज्ञापन धमाचौकड़ी मचाये हुए थे। वह अपनी घड़ी का डॉयल देखने लगा, जिसके अंदर आर्द्रता की पर्त, श्वेत चादर की तरह तन गयी थी। उसे हटाने के लिये उसने, मुँह से कई फूँकें मारीं, पर उसका कोई असर न हुआ। जब टीवी पर समाचार आने लगे, तो वह उनमें रमने की कोशिश करने लगा। स्त्री ने भी कपड़े बदल लिये थे, बाहर आकर पूछा- चाय पियेंगे क्या...?

- हाँ, पर थोड़ा स्ट्रांग बनाना...।

स्त्री चली गयी। टी वी पर कोटा में पढ़ने वाले एक बच्चे के अपहरण और बदले में दो करोड़ रुपयों की फिरौती मांगे जाने का समाचार चल रहा था। यह अपहरण एक युवा स्त्री ने अपने पूर्व-सहपाठी के साथ मिलकर करवाया था। अब दोनों पकड़े जा चुके थे। बच्चे की तस्वीर देखकर पुरुष ने महसूस किया कि अपहृत-बच्चा वैसा ही लग रहा है, जैसा कि वह डूबने वाला बच्चा था। शरीर में एक फुरैरी सी उसने महसूस की और बच्चे से ध्यान हटाने के लिये वह बेमतलब ही चैनल बदलने लगा। अपने आंसुओं को रोके रखने की भी यह एक कोशिश ही थी। उसे पता था कि वह बच्चे के दृश्यों को देखेगा और रोने लगेगा।

स्त्री चाय सहित फिर हाजिर थी- लीजिये...गरमागरम चाय...अदरक डाला है... फायदा करेगा।

प्याला देकर स्त्री भी बैठ गयी और टीवी देखने लगी, फिर बोली- आज, आप न होते तो वह बच्चा डूब ही जाता...।

- हाँ... पर यह भी तो हो सकता है कि वह हमें वहां देखकर ही चला आया हो। हम वहाँ न होते, तो शायद वह वहाँ आता ही नहीं...।

- पर आजकल के मां-बाप भी तो देखो कितने लापरवाह होते हैं...कि अपने बच्चे का ठीक से खयाल तक नहीं रख पाते...।

-सचमुच बच्चे पैदा करना तो आसान है, पर उन्हें बड़ा करना बहुत मुश्किल वाला काम है...।

स्त्री चुप हो गयी।

चाय की कई चुस्कियों की खामोश निरंतरता के बाद पुरुष ने कहा- मुझे जरा अजीब सा लग रहा है...!

-तबीयत तो ठीक है न् आपकी...?

पुरुष हँसा- तबीयत को क्या होना है...? बिल्कुल ठीक हूं...।

- फिर..., कैसा लग रहा है...?

- ऐसा लग रहा है...!

- हां... बताओ कैसा लग रहा है...?

- ऐसा लग रहा है, जैसे हम अपना ही बच्चा आज वहां पर खो आये हैं...।

स्त्री चकित हुई- खो आये हैं...? ये क्या कह रहे हैं आप...? अरे नहीं, बल्कि हुआ तो यह है कि आपने ही, उसके माँ-बाप को, उनके द्वारा खो दिया गया बच्चा लौटा दिया है...। वे लोग कितनी दुआएं दे रहे होंगे...।

- हां।

पुरुष ने आगे कुछ न कहा। बातों का धागा वहीं टूट गया। बाहर सर्द हवा बढ़ गयी थी और उसकी सुरसुराहट, बीच-बीच में कानों में कुछ फुसफुसाने अंदर तक चली आ रही थी।

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अगले दिन स्त्री का जन्म-दिन था। नींद खुलते ही पुरुष को याद आ गया था। दोनों एक-दूसरे का जन्मदिन याद रखते थे और सुबह आँख खुलने के साथ ही 'विश' करने की आदत बना रखी थी। पुरुष ने इस बार ऐसा नहीं किया। जानबूझकर। उठा और टहलने चला गया। स्त्री जाग गयी थी और आंखें मूंदे मुबारकबाद का इंतज़ार कर रही थी। स्त्री ने नोटिस किया कि पुरुष उसका जन्मदिन भूल गया है। उसने इसका बुरा नहीं माना। बुरा मानने की भी एकउम्र होती है। वह रोजमर्रा के कामों में लग गयी।

पुरुष ने बर्थ-डे केक खरीदना चाहा, पर सुबह-सुबह वह कहां मिलता, इसलिये बेकरी-बूथ से साधारण केक ही खरीद लिया था। उसे पैक कराया और इस तरह चुपके से घर आया जैसे कोई अमूल्य-वस्तु लाकर चौंका देना चाहता हो। यह सब करते हुए उसके दिल में खदबद मची हुई थी कि स्त्री को तो अंदाज तक न होगा कि वह केक लेने गया है, अचानक केक देखकर वह कितनी अचंभित हो जायेगी ?

पुरुष ने केक वाला कैरी-बैग बरामदे में ही, एक गमले की आड़ में, ऐसी जगह पर रख दिया, जहाँ से वह दिखाई न दे और नित्य-क्रियाओं में जुट गया। जब वह तौलिये से मुँह पोंछने के बाद, बाहर की खुली जगह पर, बैंत की कुर्सी में बैठकर अख़बार पढ़ने के आसन में जम गया, तब तक स्त्री चाय और भुने हुए पापड़ लेकर आ गयी थी। पुरुष ऐसे उठा, जैसे वह रोज की तरह, शब्द-पहेली भरने के लिये पेंसिल लेने उठा हो। उसे शब्द-पहेली भरने का खब्त था। जब-तक पूरी न भर लेता अख़बार से चिपका ही रहता।

लौटकर बोला- देखो तो जरा, यह पेंसिल वहाँ पड़ी हुई थी।

स्त्री ने उसकी शिकायत पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि ऐसी शिकायतें तो वह करता ही रहता था। उसके पास शिकायतों का अंबार था। जिस तरह उसके पास शिकायतों का अंबार था, उसी तरह उसके पास छोटी-छोटी बातों का जखीरा भी था। जब तक सारी बातें स्त्री को न बता देता, उसे चैन न आता था। पेंसिल के बहाने वह किचिन से चाकू और बरामदे से केक-पैक उठा लाया था। स्त्री उसका छोड़ा हुआ अख़बार देखने में व्यस्त थी। पुरुष ने आहिस्ता से मेज पर केक रख दिया और चाकू की नोक से अख़बार सरकाकर लय में बोला- हैप्पी बर्थ डे टू यू...माय डार्लिंग...।

स्त्री गले तक आल्हाद से भर गयी। उसने अपने मुंह पर दायां हाथ रखकर पूछा- अरे...! आपको याद था..? मैं तो समझी थी कि आप भूल गये...।

- इधर देखो...।

स्त्री ने कौतूहल से मेज की ओर देखा। अख़बार की ओट में केक रखा था। वह और भी खिल गयी- अरे वाह...? केक भी...? कब लाये...कित्ते का मिला...?

इसके आगे उसके मुँह से शब्द नहीं निकले। आँखें सजल हो गयीं। पुरुष ने आँखों का जल वहीं रोक देने के लिये जल्दी से कहा- केक लाये यह इंपॉर्टट है या कित्ते का लाये यह...?

फिर स्त्री के नेत्रों में सजलता देखकर बोला- चलो...चलो, अब केक काटो भाई...। मुंह में पानी आ रहा है...।

स्त्री ने खुद को सम्हाला और चाकू से केक काटा। पहला टुकड़ा पुरुष को खिलाया। पुरुष ने उसकी अंगुलियों हल्के से काटकर मसखरी की और दूसरा टुकड़ा स्त्री के मुंह में रख दिया। खाकर वह गाने लगा -

हम भी अगर बच्चे होते,

नाम हमारा होता बबलू-डबलू...

खाने को मिलते लड्डू

और दुनिया कहती हैप्पी बर्थ डे टू यू....

स्त्री ने भी उसके सुर में सुर मिलाकर उसकी खुशी को दोगुना बनाने में सायास मदद की और फिर लजा भी गयी- कोई सुने तो...?

- सुने तो सुने... हम कोई गुनाह कर रहे हैं क्या...?

- बुढ़ापे में गा रहे हैं, वह भी लॉन में...।

- जी हां और गा-कर बता रहे हैं कि हम अभी बूढ़े नहीं हुए हैं...।

थोड़ा चुप रहकर स्त्री बोली- हम लोग बबलू-डबलू वाली उम्र कब की पीछे छोड़ आये हैं...।

- हाँ, यह तो है.... हमेशा वही उम्र तो नहीं रहती...।

- अपने बच्चे होते, तो हम भी उनकी उम्र में शामिल हो सकते...।

पुरुष खामोश रहा, स्त्री उदास हो गयी। पुरुष ने लॉन की चार-दीवारी देखी। फूल-पत्ते देखे और दुख के साथ कहा- हमने सब कुछ तो किया, पर बच्चे नहीं पा सके...।

- आप दुखी क्यों होते हैं...? देखिये हमने तय किया था कि इस कारण से कभी दुखी नहीं होंगे...।

- दुखी नहीं हूँ... पर जीवन सूना-सूना लगता है। आध-अधूरा सा...।

- मैं इसीलिये इस बात की कभी चर्चा नहीं करती...। आप उदास हो जाते हैं... बहुत सेंसिटिव हैं...।

वातावरण बोझिल हो गया। चुप्पी धूप में घुल-घुलकर फैलने लगी। पुरुष तौलता रहा कि वह जो कहना चाहता है उसे कहे या न कहे, फिर काफी देर चुप रहने के बाद बोला- वैसे अभी भी एक रास्ता है...।

स्त्री प्रश्नवाचक हो गयी।

- हम कोई बच्चा गोद ले सकते हैं...।

स्त्री मुस्कुरायी- अब, इस उम्र में...?

-हाँ, इसी उम्र में बच्चा गोद लेना चाहिये...। यह वही समय है, जब हम उसे पूरा वक़्त दे सकते हैं...। ठीक तरह से उसे पाल सकते हैं...। हमारे पास पूरी फुरसत है कि एक बच्चे को बड़ा होते देख सकें। अपना बचपन तो कोई देख नहीं पाता, क्योंकि तब सभी लोग उसे जीने में लगे होते हैं...। जवाब में पुरुष ने इस तरह विश्वासपूर्वक कहा, जैसे उसे इस सवाल की पहले से ही उम्मीद रही हो और बदले में उसने मजबूत किस्म का उत्तर तैयार करके रखा हो।

स्त्री ने बिना एतराज जाहिर किये कहा- असल में बच्चों को पालने की एक उम्र होती है... हम जिस उम्र में पहुँच गये हैं..., वहाँ पहुंच जाने पर तो खुद बच्चे ही अपने माँ-बाप को पालने लगते हैं...।

पुरुष शांत भाव से बोला- मेरा तो एक सुझाव भर है... वैसे तुम जैसा ठीक समझो...। मैं तुम अपनी बात थोपूंगा नहीं...।

पुरुष फिर से अख़बार पढ़ने लगा और स्त्री अख़बार की ओट से उसे पढ़ने की कोशिश करने लगी- हम रिटायर हो गये हैं... बूढ़े हो रहे हैं... क्या सब ठीक से कर पाएंगे...? बच्चे के साथ कहीं हमसे कोई अन्याय तो न हो जाये...?

पुरुष का उत्साह फुदक कर सामने आ गया- रिटायर ही हुए हैं न्... पर बूढ़े नहीं हुए...। बूढ़ा हो गया होता तो क्या उस दिन तालाब में कूद सकता था...? देखो, अब हमारे पास समय ही समय है...। फुरसत ही फुरसत...। असल में बच्चे भागम-भाग में पाले ही नहीं जा सकते...। उसके लिये तो पूरी फुरसत चाहिये...। इतनी फुरसत कि बच्चे को जरा सा भी अकेलापन न लगे। उसकी थोड़ी सी भी उपेक्षा न हो...।

स्त्री सुनते-सुनते कहीं गुम हो गयी।

पुरुष ने अपनी बात को और बेहतर तरीके से कहने की कोशिश की- जो पेरेंट वर्किंग होते हैं न्, उनके बच्चे, बच्चे नहीं रह पाते...। माँ-बाप अपनी व्यस्तताओं और ज़रुरतों के चलते, उन्हें अपनी तरह बड़ा और सयाना बना डालते हैं... अपनी तरह व्यवहार करना सिखा देते हैं... है कि नईं...?

स्त्री ने सहमति जतायी- हां,ये तो है...।

- तो फिर...?

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दूसरी सुबह अख़बार पढ़ते-पढ़ते पुरुष ने हड़बड़ाई हुइ्र सी आवाज में स्त्री को पुकारा। वह दौड़ी-दौड़ आयी- क्या हुआ...?

पुरुष ने उसके आगे अख़बार फैलाते हुए कहा- देखो तो...जरा, इस न्यूज को पढ़ो... माँ-बाप काम पर गये थे, घर पर बच्चे अकेले थे। एक तीन साल के बच्चे ने चूहामार दवा खा ली...अब हॉस्पिटिलाइज है...।

- अरे...? स्त्री ने अख़बार छुड़ा लिया। पूरी ख़बर पढ़ी और कहा- ओफ्फ! कितने लापरवाह हो गये हैं, आजकल के माँ-बाप? बच्चे तक ठीक से नहीं पाल सकते...ये।

स्त्री किचन में गैस पर कुछ चढ़ा कर आयी थी। याद आते ही उधर भागी। कुछ देर बाद ही स्त्री के चीखने की आवाज आयी। अब पुरुष भागकर वहाँ पहुँचा- क्या हुआ...?

वह हँस रही थी- इत्ता बड़ा चूहा...।

- चूहा...?

- हाँ... इत्ता बड़ा था...।

- मैं तो डर ही गया था...।

- क्यों...?

- यह सोचकर कि कहीं उबलता दूध या दाल तो तुमने अपने ऊपर नहीं गिरा ली...।

- गिरा लेती तो...? स्त्री शरारतन बोली।

- तो अच्छी पिटायी होती तुम्हारी...दूध और दाल कितने महंगे हो गये हैं...पता है तुम्हें..? पुरुष ने भी शरारत की।

स्त्री ने बनावटी गुस्सा दिखाया- अच्छा...! पिटायी होती... ऐं और दवाई नहीं होती...?

- हां, बाद में दवा भी हो जाती...।

- मैं कोई छोटी बच्ची हूँ, जो मेरी पिटायी होती...?

- जो चूहे से डर जाये...वह बच्ची नहीं, तो और क्या है...?

- हाँ, मुझे तो बचपन से ही चूहों से डर लगता है...। पता...उन दिनों हमारे पड़ोस में एक साउथ-इंडियन फेमिली रहती थी...एक रात उनके छोटे से बच्चे का अंगूठा एक चूहे ने कुतर लिया था... बस, तभी से चूहे से बहुत डरने लगी हूँ मैं तो...।

- चूहा अंगूठा कुतर लेता है...? पुरुष ने आश्चर्य किया।

- हाँ, मैंने खुद देखा था...।

- मैंने तो आज ही सुना...।

पुरुष कान खुजलाता हुआ बाहर चला गया। पर जाते-जाते, स्त्री का ही कहा हुआ, एक पुराना वाक्य उस पर उछालता गया- 'जिंदगी तो बहादुरी से जी जाती है, जानेमन...।'

स्त्री ने वाक्य का सिरा पकड़ा और अतीत में पहुँच गयी। उस दिन स्त्री को सेवा-निवृत्त होना था। विदाई-पार्टी के बाद जब उपहार में मिले ट्रांजिस्टर के साथ वह बाहर आयी, तो पुरुष स्कूटर लेकर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। स्कूटर स्टार्ट करते हुए उसने कोमलता के साथ कहा था-देख रही हो, आज तुम्हें दूसरी बार विदा कराके ले जा रहा हूँ...। वो भी सरकार से...।

स्त्री उसके रूमानी-लहजे से लजा गयी थी, पर प्रेम के गहरे अहसास ने उसे ऊपर, गले तक भर भी दिया था- इसी तरह हमेशा विदा कराके ले जाते रहना..., कभी अपने से विदा मत कर देना...।

शब्दों ने करुणा उत्पन्न कर दी थी।

- इस विदा पर, उस विदा की बात क्यों कर रही हो...? दोनों अलग बातें हैं। यह विदा 'करायी' जाती है और वह विदा 'हो' जाती है,सो भी अचानक...,बिना इंतज़ार के...। उसकी बात करके मुझे तकलीफ में मत डालो...।

- अब नहीं करूंगी...। लेकिन किसी भी विदाई से क्या डरना...? जिंदगी तो बहादुरी से जी जाती है, और विदाई भी बहादुरी से ही होना चाहिये, जानेमन...।

रिटायर हो जाने के बाद दोनों को अपने-अपने कामों से फुरसत मिल गयी थी और दोनों ने अपने को व्यस्त रखने की खातिर, कुछ नये शगल तलाश लिये थे। पुरुष ने हिन्दी अख़बार में छपने वाली शब्द पहेली भरना और मूंछों को कॉस्मेटिक लगाकर कड़क बनाये रखना, अपनी दिनचर्या में जोड़ लिया था। स्त्री टीवी की तुलना में ट्रांजिस्टर से अधिक मोह रखने लगी थी। सुबह उठकर चाय के साथ ही गीत-संगीत शुरू हो जाता था, निम्मी मिश्रा, अमरकांत, राजेन्द्र, यूनुस खान, ममता सिंह उसके रेडियो-मित्र बन चुके थे और 'स्कूल चलें हम'... स्त्री का सिगनेचर-सांग हो गया था। वह किचिन में जाती तो गाते हुए जाती, स्कूल चलें हम...। बाथरूम में भी यही सांग चलता और बाज़ार जाते वक़्त भी। वह हिीं भी जाये, अपने संगीत में स्कूल ही जा रही होती।

रिटायर होने के साल भर बाद भी प्राविडेंट-फंड, ग्रेच्युटी और पेंशन का हिसाब नहीं बनाया था दफ्तर ने। वे बड़े कसैले दिन थे। वेतन बंद हो गया था और पेंशन शुरू नहीं हुई थी। स्त्री ने तय किया कि मकान का आधा हिस्सा किराये पर उठा दिया जाये, तो हजार-बारह सौ का जुगाड़ हो जायेगा। और कुछ खर्च घटा दिये जायें, तो थोड़ा वहां से भी बचाया जा सकता है। पुरुष ने भी कुछ उपाय किये। स्कूटर का प्रयोग घटा कर पेट्रोल-खपत पर पाबंदी लगायी गयी। केबल हट गया, किताबें खरीदने का शौक रोक दिया गया और मोबाइल फोन में बीस-तीस रुपये के वाऊचर डलाये जाने लगे।

पुरुष की दिनचर्या में तब्दीली आ गयी थी। सुबह उठकर टहलने जाना, लौटकर चाय और अख़बार के साथ थकान दूर करना, नहाने के बाद शब्द-पहेली भरना। दोपहर के भोजन के बाद दो घंटे सोना, उठकर टीवी पर कुछ देखने की बजाय, चाय के साथ ट्रांजिस्टर पर गीत सुनना। स्त्री ने झाड़ू-पौंछे वाली बाई को छुड़ाकर खुद ही काम सम्हाल लिया था। पुरुष ने आपत्ति की तो स्त्री ने उमंग से बताया था कि इससे शरीर फिट रहता है। झुकने-मुड़ने का अवसर मिलता है, वरना किचन में खड़े-खड़े रीढ़ की हड्डी और घुटने दुखने लगती है। कमर अकड़ जाती है।

इस पर भी खालीपन ने साँप बनकर उन दोनों को अपनी गुंजलक में लपेटे रखने में कोई कोताही नहीं की थी। शुरू-शुरू में तो वह एक सामान्य साँप ही रहा, पर धीरे-धीरे उसका आकार और भार बढ़ता गया और वह एनाकोंडा होता चला गया।

बरामदे में सेंटर-टेबल पर अख़बार के साथ सीस-पैंसिल की स्थायी-उपस्थिति बनी रहती। शब्द-पहेली में तीस-चालीस शब्द भरना पड़ते, जिनकी खोज-बीन में पुरुष मशरूफ रहता। कभी-कभी शब्दों की तलाश में वह किचन में जा धमकता और स्त्री को गीत की धुन से उठाकर, शब्द पहचानने में मदद करने के लिये, इसरार करता। 'अगर तुम मिल जाओ... जमाना छोड़ देंगे हम...' की पंक्ति ट्रांजिस्टर के साथ-साथ गुनगुनाते हुए, वह पुरुष को चुप रहने का इशारा करती। पुरुष ट्रांजिस्टर बंद करते हुए गाता- मैं मिल गया हूँ, अब ट्रांजिस्टर छोड़ दो तुम...। भारी माथा-पच्ची के बावजूद पहेली का एकाध प्रकोष्ठ खाली रह ही जाता और पुरुष उसके लिये सारा दिन हलाकान रहता। मूंछ उमेठते हुए, खाली प्रकोष्ठ पर ही अपनी नज़रें गड़ाये रखता, तब तक, जब तक कि उसे उपयुक्त शब्द न मिल जाता।

दो साल बाद जाकर पेंशन-फिक्शेसन हो सका। प्राविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का एक चौथाई हिस्सा बैंक में जमा कर दिया गया, ताकि आकस्मिक खर्च चलाये जा सकें। बैंकों ने जमा रकम पर दी जाने वाली ब्याज दरें इतनी गिरा दी थीं कि वे नाम-मात्र की रह गयी थीं। उनसे रुपये के वार्षिक मूल्य-अवमूल्यन का मुआवजा तक न निकल पाता था। बैंक आम लोगों को ठग रहे थे। सरकार बाज़ार के साथ गलबहियां डाले हुए थी। पुरुष बैंक नीति पर रुष्ट रहता था। उसने स्त्री को बताया कि यही पूंजीवाद है। यही बाज़ारवाद है। मध्यवर्ग अपनी बचत बैंक में न रखे, उसे बाज़ार में ले जाकर फूंक दे...यही चाल इसके पीछे है...। बाज़ारवाद के प्रभाव में देश की नीतियाँ पहुंचा दी गयी हैं। खुलेपन का यही नतीजा है...। ग्लोबल-विलेज हमारी जेबें काट रहा है और जेबकतरों का संसद में गुणगान चल रहा है...।

पुरुष ने बैंकों को सबक सिखाने और थोड़ा ज्यादा ब्याज पाने के उद्देश्य से अपनी रकम का दो-तिहाई हिस्सा पोस्ट-ऑफिस में जमा करा दिया था। मासिक-ब्याज वापसी योजना से घर के खर्चे चल रहे थे। स्त्री का आप्त-वाक्य उसे शक्ति देता था कि अगर किसी का कर्ज-उधार न देना हो, तो कम से कम रुपयों में भी घर, मजे से चलाया जा सकता है।

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अगले महीने किरायेदार आ गये। छोटा परिवार था, पति-पत्नी और तीन-चार साल का एक बच्चा। बस। वे ट्रांस्फर होकर आये थे। पति सुबह नौ बजे काम पर चला जाता। किसी उद्योग में था। पत्नी घर के काम-काज में लगी रहती। बच्चा कॉमन बरामदे का फायदा उठाकर इस तरफ चला आता, जहाँ पुरुष शब्द-पहेली से भिड़ा होता और स्त्री सब्जी वगैरह काट-छांट रही होती। फूले हुए गाल और तोतली-भाषा वाला वह बच्चा, उन दोनों को मोहित कर चुका था। बच्चे की माँ ने उसे सिखा दिया था कि वह उन्हें दादा-दादी कहा करे। बच्चा 'दादा' और 'दादी' शब्द का ऐसा मनभावन उच्चारण करता था कि वे निहाल हो जाते। कलेजा मुँह को चला आता। थोड़े से सीखे हुए शब्दों की पूंजी से ही वह बच्चा अनगढ़ वाक्यों का निर्माण करता और ढेर सारी बातें कहना चाहता। वे उसकी बातों में डूब जाते और अपने कामों को भूल ही जाते।

बच्चा अक्सर पुरुष से कहानी सुनने की मांग करता। कहानी सुनने के लिये बच्चा जितना उतावला होता, उससे कहीं ज्यादा उतावला तो सुनाने के लिये पुरुष होता। वह उसे गोद में बैठा लेता और बड़े चाव से कहानियाँ सुनाता। जल्दी ही उसका कहानियों का निजी स्टॉक खत्म हो गया, तब पुरूष ने एक नयी जुगत भिड़ायी और अख़बार के रविवारी अंक से कहानियाँ और कविताएं काट-काट कर रखना शुरू किया। वह उन्हीं से बच्चे को कहानियाँ और कविताएं सुनाता और उन्हें किफायत के साथ हफ्ते भर चलाता रहता। इतनी किफायत से, जितनी किफायत से स्त्री घर चला रही थी।

बरसात के ऊदे दिनों में एक दिन, बच्चा जब स्त्री की गोद में आया तो स्त्री ने अनुभव किया कि उसके कपड़े पूरी तरह सूखे हुए नहीं हैं। स्त्री बच्चे को किचन में ले गयी। उसके कपड़े उतारे, तौलिया लपेटकर उसे कुर्सी पर बैठाया और कपड़े गैस-चूल्हे पर गर्म करके दोबारा पहनाये। बादल-पानी के कारण धूप नहीं निकलती थी और कपड़े सुखाने की समस्या बनी ही रहती थी। स्त्री बाज़ार गयी और कपड़े सुखाने का स्टेंड लाकर बरामदे में रख दिया। स्टेंड केवल बच्चे के कपड़ों के लिये रिजर्व कर दिया गया।

बच्चे ने उस स्टेंड को बहुत पसंद किया। उसके ज्ञान में वह पहली बार प्रवेश कर रही थी। बच्चे ने अपनी ज़रूरत का आविष्कार कर लिया और उसका झूले की तरह प्रयोग करने लगा। वह लोहे की छड़ पकड़कर लटक जाता और झूलने की कोशिश करता। तब पूरा का पूरा स्टेंड ही इधर-उधर डोलने लगता। एक दिन उसे इस तरह झूलता हुआ देखकर, बच्चे की माँ ने डांट लगायी कि इस तरह तो वह अपने हाथ-पैर ही तोड़ लेगा। माँ ने उसे स्टेंड से उतार दिया। गुस्से में जरा झिंझोड़कर। बच्चा रोते हुए दादी-दादी करता हुआ स्त्री के पास चला गया। स्त्री ने उसे पुचकारा और उसकी माँ को झूठ-मूठ की डाँट पिलायी। मनाया। चुप कराया।

एक ऐसी दोपहर में, जब बरामदा सूना था, कपड़े सुखाने का वह स्टेंड धड़ाम से गिरा और उसी के साथ बच्चे के चीखने की आवाज भी आयी। वे तीनों के तीनों भागकर वहाँ पहुँचे और स्टेंड में फंसे हुए बच्चे को निकाला। बच्चा बुरी तरह रो रहा था। वह खेल के बिगड़ जाने और फिर उसके हादसे में बदल जाने के कारण, एक भयपूर्ण अचंभे में दाखिल हो गया था। इसीलिये डर गया था और रोकर उस डर से बाहर आने की जुगत कर रहा था। इस तरह वह अपने संसार की आनंददायी चीजों के ही, अचानक पीड़ादायी चीजों में बदल जाने की प्रवृत्ति से परिचित होने की प्रक्रिया में था। अभिभावकों ने उसे खतरे में देखा। गुस्सा हुए। दुखी हुए। डांट-फटकार हुई। बच्चे की माँ को रोना आया। स्त्री ने उस दिन को कोसा जब वह स्टेंड खरीदकर लायी थी। स्टेंड बरामदे से उठाकर अंदर कमरे में रख दिया गया, ताकि बच्चे की पहुँच से दूर रहे।

बच्चे की झूलने की इच्छा को जानकर, पुरुष ने रस्सा बाँधकर देसी झूला तैयार कर दिया और बच्चे को उसमें बैठाकर झुला दिया। बच्चे को मजा आ गया और झूलना ही, कुछ दिनों के लिये उसका प्रिय खेल बन गया। कुछ दिनों के लिये इसलिये, क्योंकि किसी एक चीज पर रमे रहना बच्चों की फितरत में नहीं होता। वे किसी नयी चीज के प्रति आकृष्ट होते ही, पुरानी चीज को रद्द कर देते हैं।

तीन-चार दिन के अंदर ही गिरने और चोट खाने की बच्चे की मुराद, दोबारा पूरी हो गयी। इस बार वह वह सामने के आँगन में दौड़ते हुए गिरा और अपना घुटना छिलवा बैठा था।

पुरुष हमेशा की तरह शब्द-पहेली में सिर खपा रहा था। वह सीस-पेंसिल और अख़बार लिये-लिये ही दौड़ा, बच्चे को उठाया और अंदर ले जाकर खून साफ कर बोरोप्लस लगाया। मुँह से फूंककर ठंडक पहुँचायी, खाने के लिये जेम्स की गोलियां दीं। दो-तीन दिनों में चोट वाली जगह पर पपड़ी आ गयी, पर बच्चे ने इसमें से ही एक नये खेल का आविष्कार कर लिया। वह पुरुष को देखते ही रोनी सूरत बनाकर रुंधे गले से 'दादाजी...दादाजी' की पुकार लगाता हुआ आता और चोट वाली जगह पर फूँकने के लिये कहता। पुरुष ने भी इस नकली खेल में असली रस ईजाद कर लिया था।

थोड़ी देर बाद बच्चा बताता-दादू, थीक हो गया।

फिर खुद ही पूछता- कैसे थीक हुआ?

पुरुष कहता- जादू से...। हम हें जादूगर... मंतर मारकर सब ठीक कर देते हैं...। जय काली कलकत्ते वाली, तेरा वचन न जाये खाली...। छू...।

बच्चा हँसता और मंत्र को संक्षिप्त बना देता- जै काली...।

पुरुष ने माली को तलाशा और सामने की खुली वाली जगह में उसे लॉन-ग्रॉस लगाने का काम दे दिया, ताकि बच्चा वहां गिरे तो उसे चोट न आये। माली से बात तय कर लेने के बाद वह अपनी शब्द पहेली भरने बैठ गया। उसने एक बैठक में पहेली के सारे खाने भर डाले। ऐसा पहली बार हुआ था। वह आनंद में उमंगता हुआ किचन पहुँचा और स्त्री से बोला- देखो एक भी खाना खाली नहीं है।

स्त्री प्रशंसा से मुस्कुरायी,कहा-शाबाश...मेरे हीरो...।

-अगर एक बॉक्स भी खाली रह जाये तो मुझे दिन भर अच्छा नहीं लगता...।

-कोई बॉक्स खाली रहना भी नहीं चाहिये। जिंदगी का हर डब्बा भरा हुआ ही हो।

-यस माइ फिलॉसफर-वाइफ, यस। यू आर हंड्रेड परसेंट करेक्ट।

साल भर का समय बच्चे की संगत में कूदता-फांदता न जाने कब निकल गया। बच्चे की मांगें बढ़ती गयीं और शौक भी। उसकी माँ कभी-कभी कहती भी, कि आप लोग इसकी इतनी बातें न माना करें... यह जिद्दी होता जा रहा है।

स्त्री समझा देती- बचचा ही तो है...। अभी उम्र ही क्या है उसकी...? बड़ा होगा तो सब समझने लगेगा। हम सब भी तो कीाी बच्चे ही थे...।

पिछले दिन बच्चे ने आसमान में उड़ती हुई पतंगों को देखा था, और उन्हें देखकर उसके मन में भी पतंग उड़ाने की आकांक्षा पैदा हो गयी थी। उसने पुरुष के पास आकर कहा था- दादाजी, हम भी पतंग उड़ाएंगे। फिर क्या था, पति-पत्नी बाज़ार गये। धागा, मांझा, पतंग खरीदे गये। पौंड्स पावडर का पुराना खाली डब्बा तलाशा गया। खाली न मिला तो पावडर उलटकर दूसरे डब्बे में रखा गया और डोर लपेटी गयी। फिर जोते बांधे गये और पतंग उड़ायी गयी। पुरुष के साथ बच्चा पूरी शाम पतंग उड़ाता रहा।

सुबह पुरुष अख़बार पढ़ डालने के बाद शब्द-पहेली से जूझ रहा था। उसे एक खाने में 'सिफारिश' शब्द के लिये संस्कृत शब्द भरना था और वह सूझ नहीं रहा था। शुरुआत में ही अटक जाना उसके लिये परेशानी का सबब बन चुका था। उसने किचन में जाकर स्त्री से भी पूछा, वह खाना पकाने की तैयारी में थी और एक काम करते हुए दूसरा दिमागी काम करने को उसने कभी भी तवज्जो न दी थी। वह तुरंत ही न बता सकी, कहा कि दोपहर में जब फुरसत होगी, उस वक़्त वह ज़रूर सोच लेगी। वह फिर बरामदे में आ जमा और सीस-पेंसिल से कान खुजाता रहा, मूंछ की नौक भी साधता रहा।

बच्चे की पतंग की कमान के पास का हिस्सा फट गया था। बच्चा दुखी हो गया और अपना दुख तथा फटी पतंग, दोनों को लेकर, अपनी जानी-पहचानी जगह पहुँच गया।

- दादाजी...!

बिना उसकी ओर देखे पुरुष ने कहा- हाँ, बेटे...।

- हमाली पतंग तो फत गयी..., जोल दीजिये न...।

पुरुष 'सिफारिश' के लिये संस्कृत शब्द तलाशता रहा।

- दादाजी...!

- हाँ बेटे...। इस बार बच्चे को भी देखा।

- पतंग फत गयी...।

- अरे... ये कैसे हुआ...?

- पता नईं...जोल दीजिये न्।

- जोड़ दूं...? पर काये से चिपकायें...चिपकाने के लिये गम तो है नहीं...बेटा।

- है तो...।

-गम नहीं है बेटे...ऐसा करते हैं कि शाम को मार्केट से ले आएंगे,तो चिपका देंगे...ठीक...?

-आपके पाछ है ना...।

-कहां है, भइया...? होती तो हमें पता होता न...।

-आप उससे मूछें तो जोलते हैं...।

पुरुष आंखें फाड़े देखता रह गया फिर हँसा और उसे गोद में उठाकर किचन में जा पहुंचा-सुनलो...अपने इन छोटे नवाब साहब की बातें जरा सुनलो...। ये साहब हमारे कास्मेटिक से अपनी पतंग जोड़ेंगे। कहते हैं कि पतंग फट गयी है तो जिससे आप अपनी मूछें जोड.ते हैं उसी से इनकी पतंग जोड़ दें।

वे देर तक हँसते-खिलखिलाते रहे और बच्चा हैरान कि चिपकाने की बजाय दादा-दादी हँस क्यों रहे हैं। पतंग जोड़ते क्यों नहीं।

बच्चे का संग पाकर स्त्री भी अपनी आंतरिकता में खिल गयी थी। वह विगत-यौवना से पुनः आगत-यौवना बन चुकी थी। स्त्रियां अपने जीवन में दो बार खिलती हैं, पहली बार एक सम्पूर्ण पुरुष का प्यार पाकर औा दूसरी बार बच्चे पर अपना वात्सल्य लुटाकर। उसकी सुबहें मुन्ने से शुरू होती और दिन मुन्ने से ही पूरे होते। वह सोने से पहले, आने वाली सुबह में मुन्ने के लिये क्या करना है, उससे किया गया कौन सा वादा निभाना है, याद करती। योजना बनाती। पुरुष से डिस्कस करती। तब इसलिये सो जाने का यत्न करती कि इन सब बातों को पूरा करने के लिये सुबह जल्दी जागना है। जागने के लिये सोना कितना अनोखा होता है, यह बात उसके सिवाय और कौन जान सकता था?

ऐसे दिन पहले कभी न थे।

वे बाज़ार जाते, तो उनके सौदों में मुन्ने की ज़रूरतों का सामान भी शामिल हो जाता। वे घूमने जाते, तो मुन्ना पहले तैयार होकर आ खड़ा होता। वे अड़ोस-पड़ोस में जाते, तो वह भी साथ जाता। बहुत से लोग यही समझते थे `ि कवह उनका पोता है। पर जैसे कि हर खुशी के साथ होता है, यह खुशी भी अल्पकालिक ही साबित हुई। अच्छे दिन आते तो हैं, पर जाने की तैयारी के साथ ही आते हैं।

एक दिन मुन्ने के पिता ने उनके पास बरामदे में बैंत की कुर्सी पर बैठते हुए कहा- अंकल, खुशखबरी है...।

- सुनाईये-सुनाईये... हम तो हमेशा खुशखबरें ही सुनते रहना चाहते हैं।

- मेरा ट्रांस्फर हो गया है...।

दोनों का दिल 'धक्क' से रह गया।

वे बताते रहे- मैंने हेड-क्वार्टर तक एप्रोच लगायी थी...। आज सफलता मिल ही गयी। शायद चार-पाँच दिन में रिलीव हो जाऊँ...।

वे दोनों रात भर नहीं सोये। उनसे खाना भी नहीं खाया गया। स्त्री तो किचन में ही नहीं गयी। वे बिस्तरों पर खामोश पड़े रहे। बातें करने के सारे विषय खत्म हो चुके थे। ट्रांजिस्टर पर 'विविध भारती' चलता रहा। गाने बजते रहे। 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी, हैरान हूं मैं...।'

गानों की आवाजें कहीं से आती रहीं और कहीं जाती रहीं। वे न जाने किसके लिये आ रही थीं। आज उनका समर्पित श्रोता उनसे बेज़ार था।

घंटों बाद स्त्री ने मरी सी आवाज में कहा- हम कुछ ज्यादा ही इन्वॉल्व हो गये थे, नईं...?

- हाँ, सोचा ही नहीं कभी, कि वह एक दिन चला जायेगा।

- चला जायेगा तो, बहुत सूना-सूना लगेगा न्...?

- हां...।

- हम भूल गये थे कि वह हमारा नहीं है...।

- हमारा भी होता, तो उसे भी इसी तरह अपने माता-पिता के साथ कहीं न कहीं जाना ही पड़ता...।

- ऐसे कैसे जाना पड़ता...? मैं जाने ही नहीं देती...। रोक लेती...।

पुरुष खामोश रहा। भ्रमों का भी कोई जवाब होता है?

जरा देर बाद स्त्री ने सवाल किया- बच्चा हमें याद करेगा न्...।

- हाँ, बच्चा भी हमें याद करेगा...।

- कहीं बीमार न पड़ जाये...?

- भूल जायेगा...। बच्चे नयी जगह जाकर भूल जाते हैं...। वहाँ उसके दादा-दादी तो हैं ही...उनमें रम जायेगा...।

वे खामोश हो गये।

पुरुष ने कहा- अच्छा अब सो जाओ... अभी तो चार-पाँच दिन हैं वे लोग...।

स्त्री चुप रही। कुछ देर के बाद पुरुष ने पूछा- सो गयीं क्या...?

- हाँ, सो रही हूँ...। स्त्री ने ट्रांजिस्टर बंद कर दिया। गाना अधूरा रह गया-'रहं न रहें हम, महका करेंगे, बनके....।

- अच्छा...। पुरुष ने करवट बदल ली और अंधेरे में आँखें बंद कर सोने की कोशिश करता रहा।

कोशिशों से भी कहीं नींद आती है।

वह धोखेबाज दिन भी आया, जिसे नहीं आना था। वे लोग चले गये। स्त्री ने बच्चे के लिये कपड़े, मिठाइयाँ, टॉफी आदि रखे। उस दिन मुन्ना स्त्री की गोद छोड़ने को तैयार न था। किसी अज्ञात शक्ति ने उसे अहसास करा दिया था, कि अब दोबारा उनसे मिलना नहीं होगा। मुन्ना के माता-पिता तो अपने शहर जाने की उत्फुल्लता से सराबोर थे, वे स्त्री-पुरुष की आंतरिक स्थितियों से बेख़बर ही थे। उन्हें उससे लेना-देना ही क्या था? वे किरायेदार थे। भाड़ा देकर रहते थे और पूरा-पूरा चुकाकर जा रहे थे। हां, यह ज़रूर था कि परदेस में वे दोनों उनके काम आये थे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए मुन्ने की मां ने मिठाई का डिब्बा स्त्री के हाथों में पकड़ाते हुए कहा था- आप लोगों ने हमारा बहुत खयाल रखा। आजकल के मकान-मालिक ऐसे कहां होते हैं...? हम आप लोगों को भूल नहीं पाएंगे...। चिट्ठी लिखेंगे...।

स्त्री और पुरुष अंदर से जार-जार रो रहे थे। वे समय को आगे खिसकने से रोक लेना चाहते थे, पर उनके किये कुछ भी नहीं हो रहा था।

चलते समय उन लोगों ने औपचारिक होकर कहा- आप लोगों ने हमें माता-पिता का प्रेम दिया। हम यहाँ घर जैसे रहे। हमें भूल मत जाईयेगा...।

स्त्री का तो कलेजा मुँह को आ रहा था। ऑटो में बैठते समय मुन्ने को लेने जब उसकी माँ आयी, तब वह मचल गया। चीखने लगा और स्त्री के गले में बाहें डालकर, पूरी शक्ति से चिपक गया। स्त्री के आँसू ढुलक आये। मुन्ना के पिता ने ही मुन्ना को जबरन खींचकर गोद से अलग किया। वह ऑटो से हाथ फैलाकर और झांख-झांख कर रोता रहा। वे अपनी जगह पर गड़े रहे। ऑटो ओझल हो गया, तब भी। वे वहाँ से हिल तक न सके। यों उनके अंदर का सब कुछ हिल चुका था।

बरामदा सूना और घर वीरान हो गया। सन्नाटा स्थायी भाव बनकर पसर गया। काम खत्म हो गये। व्यस्तताएं गुम हो गयी। बातें समाप्त हो गयीं। वे घंटों बैठे रहते और मुँह से एक शब्द तक न निकलता। बेंत की कुर्सियों की पुश्त पर ढेर होकर पड़े रहते। खामोश। ट्रांजिस्टर धूल खाता रहा। उसकी मधुर आवाजें खो गयीं थीं।

एक दिन पुरुष ने कहा- ऐसे तो तुम बीमार पड़ जाओगी...। जो चीज हमारी नहीं थी, उसके लिये इतना दुख क्यों? उसे तो जाना ही था। हम ही उसे अपना समझ बैठे थे। गलती हमारी ही थी। हमें इतना इन्वाल्व नहीं होना चाहिये था। अपने को सम्हालो और मुझे भी...। पुरुष ने थोड़ा मजाक भी जोड़ दिया- जरा देखो तो मेरी दशा..., तुमने तो आजकल मुझ पर ध्यान देना ही छोड़ दिया है। मैं बेठिकाना हो गया हूं...।

स्त्री मुस्कुरा दी- झूठे कहीं के...!

- हां, अब ठीक है...। मुझे भरोसा हो गया कि तुम्हें मैं याद हूं...। मेरा भी कोई वजूद है भाई...।

- अच्छा एक बात सुनिये...।

- हाँ-हां, दो सुनाईये...।

- अब कभी मकान किराये पर नहीं देंगे...।

- ठीक है, नहीं देंगे। तुम्हीं ने कहा था कि दे दो, तो दिया था। अब कहती हो तो नहीं देंगे...।

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अगली सुबह बुझे मन से चाय के गर्म प्याले पीते हुए स्त्री ने पूछा- आजकल शब्द पहेलियाँ नहीं भरते...?

- ध्यान नहीं रहता। सीस भी गुम गयी है... दिखाई नहीं पड़ रही...। और तुम भी तो गाने नहीं सुनतीं...।

- शायद बैटरी खत्म हो गयी है...।

- किसकी...? तुम्हारी या ट्रांजिस्टर की...?

- दोनों की।

- चलिये चार्ज करा देते हैं...।

स्त्री मुस्कुराकर चुप हो गयी। वहां खामोशी तैरने लगी।

जरा देर बाद स्त्री ने कहा- सुनिये...।

- हाँ...।

- एक बात कहें...?

पुरुष मुस्कुराया- बातों की कोई राशनिंग है क्या...?

- हमें कोई बच्चा गोद ले लेना चाहिये...।

पुरुष चैतन्य हुआ- पक्की बात कर रही हो...?

- हाँ...।

- कैसे मन हो गया, पहले तो तुम झिझक रही थीं...।

- 'सखी-सहेली' वालों का भी कहना है कि हमें बच्चा गोद ले लेना चाहिये। मैंने उन्हें चिट्ठी लिखकर पूछा था...।

- हूं। तो ये 'सखी-सहेली' वाले हमारे घर में घुसे हुए हैं,,,एं...?

- ले लें न्...?

- हां, ले सकते हैं, पर किसे ले लें...? रिश्तेदारों में देखें क्या...?

- रिश्तेदार तो खुद ही चाहते हैं कि हम उनका बच्चा गोद ले लें...?

- कौन...?

- आपके भाई हैं..., मेरे भाई हैं...।

- हाँ, मैंने भी महसूस किया है...। तुम क्या कहती हो?

- मेरा ऐसा सोचना है कि हम लोग बिल्कुल छोटा सा बच्चा गोद लें...और वह ऐसा हो कि कोई यह न जाने कि वह किसका बच्चा है ? खुद वह भी कभी यह बात न जान पाये...।

- हूँ...। पर क्या तुमने अपना मन पूरी तरह बना लिया है...? कहीं बाद में पछतावा न हो...।

- नहीं होगा...। मैं रात भर सोचती रही हूँ...। मन बना लिया है। यही ठीक होगा...। हमें अपने जीवन का तकाजा तो चुकाना ही होगा। हमें यह जीवन इसीलिये मिला है, कि बदले में हम भी एक जीवन पालें-पोसें...।

- अरे वाह! कभी-कभी तुम कितनी ऊँची बातें करती हो... रियली, आई प्राउड ऑफ यू...।

- ऊँची बातें हैं या नहीं, यह तो नहीं मालूम, परंतु यह ज़रूर मालूम है कि कुदरत के इस चक्र में अगर हमारी भागीदारी नहीं हो सकी, तो हम शायद मनुष्यता से वंचित रह जाएंगे...।

- हाँ, अपने बचपन को दोबारा जीने से तो रह ही जाएंगे।

- दूसरा बचपन...!

- हमारा अपना बचपन तो सूख ही चुका है, उसकी यादें तक उड़ चुकी हैं...। जरा देखो तो, यह आपा-धापी वाली जिंदगी, हमसे क्या-क्या छीन लेती है...और हमें पता तक नहीं चलता...।

- हाँ, अब समझ में आ रहा कि पेड़ क्यों अपने फलों को पकाकर नीचे गिरा देते हैं...। फल क्यों बीजों को ज़मीन पर उगल देते हैं... और धरती क्यों उन्हें फिर से अंकुरित कर देती है...।

पुरुष ने उत्साह से कहा- यही जिंदगी है। और जिंदगी की फिलॉसफी भी यही है...।

- नहीं, मैं तो जीवन के सत्य की बातें कर रही हूँ...। हमें भी कुदरत का कर्ज़ चुकाना होगा...। हमें कम से कम एक जीवन को पाल-पोसकर, इस संसार को भेंट करना ही होगा...।

पुरुष मौन रहकर उसे निहारता रहा।

स्त्री ने कहा- हम एक बच्चा गोद लेंगे।

इसकी आवाज में हिमालय की दृढ़ता थी।

पुरुष ने कहा- हां, हम एक बच्चा गोद लेंगे।

विविध भारती पर गीत बज रहा था- 'तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं...शिकवा नहीं,पर तेरे जिंदगी भी, जिंदगी तो नहीं...।'

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वे दोनों कबाड़ हो चुकी लैंबी स्कूटर पर सवार थे। पुरुष इधर-उधर, खोजती सी नज़रों के साथ, स्कूटर की गति को कम से कम रखते हुए चल रहा था, जबकि पिछली सीट पर बैठी हुई स्त्री, अपने सामने की ओर पड़ने वाले साइन-बोर्डों को पढ़ने में व्यस्त थी। पुरुष की नज़र अचानक ही उस बोर्ड पर पड़ी, जिसे वे खोजने निकले थे।

उसने कहा- मिल गया...।

स्कूटर रुकी। पहले स्त्री उतरी, फिर वह। स्त्री ने बोर्ड पढ़ा- हाँ, 'आश्रय' ही तो लिखा है...।

- चलो...।

पुरुष ने सड़क पर खड़े स्कूटर को स्टार्ट करने की कोशिश की। चार-पाँच किक् खाकर स्कूटर स्टार्ट हुआ। वे फिर सवार हुए और स्कूटर अपनी खड़खड़ की ध्वनि के साथ, दोपहर के सन्नाटे को धकियाता हुआ, ढलान उतरने लगा। वह बंगला सड़क से सौ-सवा सौ मीटर अंदर था। सदर के बंगलारें का यही वास्तु-शिल्प है। अंग्रेजों की रुचि की धरोहर।

बंगले के सामने पहुँचकर स्कूटर रुका। वे उतरे। स्त्री ने साड़ी का पल्ला ठीक किया, आदतन। पुरुष ने अपनी दुर्बल काया का पूरा जोर लगाकर स्कूटर स्टेंण्ड किया। सहज होने में उन्हें कुछ पल लगे। पुरुष ने अपने सफेद बालों को हथेली से ही एक तरतीब देने की कोशिश की। मूछों पर उंगलियाँ फिरायीं। स्त्री ने चप्पल में पैर के अंगूठे को ठीक से फंसाया। पल्ला एक बार और सुधारा और कहा- चलिये।

भव्यता और सूनेपन की व्यापकता के बीच, वहां मौजूद हल्की सी चहल-पहल को उन्होंने दूर से ही महसूस किया। सीढ़ियाँ तो तीन-चार ही रही होंगी, पर उन्हें लगा कि वे किसी न्यायालय की असंख्य सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। चीप-पत्थर की सुघड़ सीढ़ियाँ वे अभी पूरी तरह चढ़ भी नहीं पाये थे, कि सफेद कपड़ों की यूनीफार्म सी लगने वाली शर्ट-पेंट वाला, एक दरम्यानी उम्र का आदमी स्टूल से उठकर खुद ही उनकी तरफ चला आया। एक व्यावसायिक मुस्कान से उसने उनका स्वागत किया- आईये साहब...!

- हमें 'आश्रय' में...?

- हाँ-हाँ, यह आसरय ही है और मैं उसका एक साधारण सा कारकरता... आईये...आपका सुआगत है जी...।

वह घूमकर आगे हो गया और वे दोनों उसके पीछे हो लिये। पुरुष ने एक बार और कालर ठीक की और बालों पर हाथ फेरा। स्त्री ने पर्स खोला और आँखों पर लगा गॉगल उतारकर उसमें सरका दिया।

उस कार्यकर्त्ता के पीछे-पीछे चलते हुए वे जिस बड़े से कक्ष में पहुँचे, वहाँ आबनूस की एक भारी-भरकम मेज और पुराने डिजाइन की चंद कुर्सियाँ करीने से रखी हुई थीं। फर्नीचर पुराने शिल्प का था। खामोश और अंतर्मुखी सा। उन पर भूरे रंग का पॉलिस इतनी बार किया जा चुका है कि उसकी मोटी तह के नीचे लकड़ी का अपना जिस्म दब चुका था और वहाँ पर आईने वाली चमक जैसी चिकनाहट आ गयी थी। गौर से देखें तो प्रतिबिंब भी दिखायी देता था। कमरे में एक किस्म की बुसी-बुसी सी गंध का स्थायी डेरा था। ऐसी गंध पुराने रंग-रोगन और पुरानी किताबों के पन्नों से आती है। मगर बुरी नहीं लगती। कमरे का छप्पर मोटी-मोटी शहतीरों पर धरा हुआ है, उसके भार से मुख्य शहतीर में जरा सा झुकाव भी आ गया है। उसी झुकी हुई शहतीर पर कबूतरों ने अपना मुकाम बना लिया है। वे वहाँ बैठे थे और गर्दन झुकाकर, कमरे में आये हुए लोगों का जायजा ले रहे थे। बड़े आकार वाली एक पुरानी घड़ी इन सब बातों से अलहदा रहते हुए टिक्-टिक् करने और सुईयों को एक लय के साथ खिसकाने में व्यस्त थी। ऐसा लगता था कि उसे अपने कांटों को खिसकाने में बहुत मेहनत करना पड़ रही है। जिस शहतीर पर कबूतरों का घर था और जो जरा सी झुक भी चुकी है, उसी पर खूब चौड़ी और लंबी ब्लेडों वाला धूमिल रंग का एक पंखा मंद गति से चक्कर खा रहा था। ऐसे, जैसे उसका मन घूमने का न हो। या ऐसे जैसे कि वह सब तरफ से निरपेक्ष होकर अपने में डूब गया हो।

- आप लोग बैठिये, मैं सेकरेटरी साहब को ख़बर करता हूँ...।

वे बैठ गये। इस बड़े कमरे से जुड़े हुए, उसके इर्द-गिर्द और भी कमरे थे। कुछ कमरे इस कमरे से भी बड़े होंगे, ऐसा अनुमान भी जगता था। उन कमरों में यहाँ की तरह खामोशी न थी, बल्कि वहां चहल-पहल थी। वहाँ से, चलने-फिरने, उठाने-रखने और भाग-दौड़ करने की आवाजें आ रही थीं। कुछ आवाजों की जुगलबंदी भी थी। स्त्री उन आवाजों का नोटिस लेते हुए गहरे वात्सल्य से मुस्कुरायी। पुरुष ने मुस्कुराने में उसका साथ दिया। इस तरह वे थोड़ा और सहज हो गये।

सेक्रेटरी साहब अंदर कमरे से इस बैठक में आये। उनके चेहरे पर सौम्यता और मुस्कान घुल-मिलकर फैले हुए थे। वे दोनों खड़े हो गये, कहा - नमस्कार...।

- नमस्कार साहब... तशरीफ रखिये...।

वे सब बैठ गये। पहले वाला आदमी एक ट्रे में पानी के गिलास लेकर हाजिर हो गया ।

सेक्रेटरी ने कहा- पानी पीजिये, बाहर तो बड़ी धूप है...।

- जी हाँ, देखिये तो, इस साल मार्च के शुरू में ही इतनी गर्मी पड़ने लगी है, आगे न जाने क्या होगा...।

इन दोनों ने पानी पिया।

- कहिये हुजूर... मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूँ?

'खिदमत' शब्द पर स्त्री का ध्यान गया। उसने सेक्रेटरी साहब को दोबारा गौर से देखा। दरम्यानी कद-काठी, प्रौढ़-आयु, सांवला रंग और तराशी गयी, सफेद पड़ जाने को आतुर अपनी दाढ़ी में, वे सौम्य और प्रभावशाली लग रहे थे। बातों से भले।

पुरूष ने कुछ कहने से पहले एक बार स्त्री की ओर देखा, तब कहा- असल में हम इसलिये आये हैं कि... 'आश्रय' के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करें... न्यूज पेपर में तो पढ़ते ही रहते हैं। कुछ और ज्यादा जानने की इच्छा हो गयी।

- यह तो बड़ी अच्छी बात है। हम भी चाहते हैं कि हमारे बारे में ज्यादा से ज्यादा जाना जाये...। पर कम ही लोग होते हैं, जो ऐसी इच्छा रखते हैं या अपनी मशरूफिवत से यहां आने का वक़्त निकाल पाते हैं। देख लीजिये, यह एक आश्रम जैसा ही है...। यहाँ उन बच्चों की परवरिश की जाती है, जो अनाथ हो जाते हैं...।

पुरूष ने गंभीरता से कहा- अच्छा-अच्छा...।तो उन अनाथ बच्चों को फिर जिंदगी भर यही रहना पड़ता होगा, है न ?

- नहीं... सब को नहीं रहना पड़ता...। कुछ बच्चों को गोद ले लिया जाता है...।

- अरे वाह! चलिये गोद लेने वाले लोग भी दुनिया में हैं, वरना सिनेमा के अलावा तो वे और कहीं दिखायी नहीं देते...। कहकर पुरुष मुस्कुराया।

सेक्रेटरी ने भी मुस्कुराकर ही कहा-नहीं, गोद लेने वाले भले लोगों की तादाद बढ़ी ही है, घटी नहीं। अब यह अलहदा बात हो सकती है, कि हम उन्हें न देख पाते हों। यह जरा पोशीदा मामला भी है न्...। ज्यादातर लोग नहीं चाहते कि कोई जाने कि उन्होंने बच्चा गोद लिया है...। इसलिये भी पता नहीं चलता।

- हां-हां।

जरा देर चुप रहने के बाद पुरुष ने कहा- हमारे एक दोस्त हैं...। वे एक बच्चा गोद लेना चाहते हैं...। क्या उन्हें मिल जायेगा...?

- ज़रूर मिल जायेगा...। पर उसके लिये उन्हें ही यहाँ आना पड़ेगा..।. हमसे बातें करना पड़ेंगी...। हमारे कुछ क़ायदे हैं, उनको पूरा भी करना पड़ेगा...।

- अच्छा-अच्छा...! पुरूष सोच में पड़ गया, फिर बोला- समझ लीजिये कि हमें ही लेना हो, तो क्या हम ले सकते हैं...?

सेक्रेटरी साहब को विस्मय हुआ, उन्होंने उन दोनों को एक बार देखा, फिर आत्मीयता से बोले- बड़ी मेहरबानी है जनाब...। इन बच्चों के लिये आप जैसे लोग खुदा की नेमत हैं...।

- हमारे कोई संतान नहीं है और हम दोनों चाहते हैं कि एक छोटा बच्चा गोद ले लें... उसे पालें। स्त्री ने कहा।

पुरुष को जैसे खयाल आया हो, उसने परिचय कराने की गरज से कहा- ये मेरी पत्नी हैं...।

सेक्रेटरी ने अभिवादन किया, फिर पूछा- आप लोग क्या करते हैं, थोड़ा डिटेल में अपने बारे में कुछ बताईयेगा...?

- हम दोनों गवर्नमेंट-जॉब में थे...। अब रिटायर हो चुके हैं।

- रिटायर हो गये हैं..? सेक्रेटरी साहब ने विस्मय को दबाने की कोशिश की।

- जी हाँ... दो साल हुए...।

सेक्रेटरी मेज की ओर देखते हुए पेपरवेट को गोल-गोल चक्कर खिलाने लगे। चुप्पी से थोड़ी सी असहजता छा गयी।

स्त्री ने हस्तक्षेप किया- देखिये आप यह न समझिये कि हम इतनी उम्र के हो गये हैं...तो हम बच्चे का पालन नहीं कर सकते...। हम पूरी जिम्मेदारी से बच्चे का पालन-पोषण करेंगे...। उसे कोई कमी न होने देंगे...। उसे एक ब्राइट फ्यूचर देने के लिये कोई कसर नहीं रखेंगे...।

सेक्रेटरी को लगा कि उनकी देह-भाषा से कोई गलत मैसेज चला गया है, तो वे जरा संकोच के साथ बोले- मुआफ कीजियेगा...और आप लोग बुरा न मानियेगा..। सब तरह की इनफरमेशन प्राप्त करना हमारा काम भी है और ज़रूरत भी...।

पुरुष ने विनम्रता प्रदर्शित करते हुए कहा- हमें पता है सेक्रेटरी साहब, आपका काम कितना जिम्मेदारी वाला है...। आप जो भी पूछना चाहते हैं... शौक से पूछें...। हम आपको सेटिस्फाई करने की पूरी कोशिश करेंगे...।

- शुकिया... आपका बहुत-बहुत शुक्रिया...। अच्छा बताईये, आपके घर में आप दोनों के अलावा और कौन-कौन लोग हैं...?

- कोई नहीं, बस हम दोनों हैं और अब चाहते हैं- 'हम दो हमारा एक'...। पुरुष ने थोड़ा हास्य पैदा करने का प्रयत्न किया।

सेक्रेटर ज़रूरत को देखते हुए भरपूर मुस्कुराये, फिर सवाल भी किया- सिर्फ आप दोनों...?

- जी हाँ... सिर्फ पति-पत्नी...। और हमारे बीच में कोई 'वो' भी नहीं है...।

तीनों ने इस कथन का हँसने के लिये भरपूर उपयोग किया। स्त्री ने भांप लिया कि कोई समस्या आने ही वाली है। उसने पूछा- क्या बच्चा गोद लेने में हमारे लिये कोई दिक्कत है...?

सेक्रेटरी थोड़े ठंडे लहजे में बोले- दिक्कत तो नहीं है...। पर आप लोग इतने बुजुर्ग हो गये हैं...,इसलिये जरा सोचने वाली बात तो है...।

- तो क्या हुआ...,हम बच्चे के पालन-पोषण में कोई लापरवाही नहीं करेंगे...। पुरुष ने जल्दी से कहा।

- सर, यह बात नहीं है...। वो क्या है कि हमारे पास अब तक, कोई ऐसा केस नहीं आया न्...। मतलब इतनी उम्र में गोद लेने कोई नहीं आया...। फिर एक बात और है जनाब, बच्चा पालने की भी एक उम्र होती है...उसके अपने तकाजे होते हैं, नहीं तो बाद में बड़ी परेशानी होती है...। बच्चे को भी, और उसके पेरेन्ट्स को भी...।

- तो क्या हमें बच्चा नहीं मिल पायेगा..? स्त्री ने जरा बेताबी से कहा, उम्र से क्या होता है, असल चीज तो है भावना,,,और निष्ठा मीन्स डिवोसन...। और आप तो जानते ही हैं, भाई साहब, कि राजा दशरथ को तो उम्र के चौथेपन में जाकर ही बच्चे मिले थे...।

सेक्रेटरी हँसने लगे- उनकी बात दूसरी है मैडम...। वो बादशाह थे...। बड़ा परिवार था...। तीन रानियाँ थीं...। सैकड़ों नौकर, सैकड़ों दासियाँ...।

पुरुष ने कहा- हम भी एक आया रखने वाले हैं...।

सेक्रेटरी शालीनता से मुस्कुराये, मगर चुप रहे।

- तो क्या हम बच्चा गोद नहीं ले सकते...?

- मैंने यह कब कहा...?

- तो फिर हमें साफ-साफ बताइये न...।

सेक्रेटरी ने कार्यकर्त्ता को चाय लाते देखा तो कहा-लीजिये चाय आ गयी।

उन दोनों ने चाय के प्याले ले लिये और उसे याचना की तरह पीने लगे। सेक्रेटरी ने घूँट भरा और कहा- देखिये साहब... वो क्या है कि हमारी बड़ी जिम्मेदारी होती है। बच्चा यहाँ से किसी के घर न जाये, तो वह इतना बुरा नहीं होता..,.मगर वह कहीं जाकर वहां से लौट आये, तो यह सबसे बुरा होता है...। या न लौटे पर उसकी देख-भाल ठीक तरह से न हो पाये, या...।

पुरुष ने बीच में ही कहा- सक्रेटरी साहब, हम समझ रहे हैं...हमारे बच्चे के साथ ऐसा कुछ भी नहीं होगा...।

- मैं कहाँ कह रहा हूँ कि ऐसा होगा...। लेकिन बुरा मत मानियेगा, प्लीज... असल में आप लोगों की उम्र को देखते हुए, कुछ बातों पर गौर करना भी बहुत ज़रूरी है...।

आगे कुछ कहते-कहते सेक्रेटरी रुक गये, तो पुरुष ने कहा- हाँ-हाँ कहिये... बिना संकोच के कहिये...। आखिर आप और हम, दोनों ही बच्चे के वैलविशर ही तो हैं...।

- देखिये, असल में बात यह है कि बासठ-पैंसठ साल की उमर ऐसी होती है, जब दस तरह के रोग आदमी को घेरने लगते हैं...। ऐसे में खुद अपनी देखभाल करना ही मुश्किल हो जाता है। तब एक छोटे बच्चे की परवरिश तो और भी मुश्किल होती है...।

थोड़ी देर चुप्पी छायी रही। माहौल असहज बन गया था। सेक्रेटरी ने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिये लहजा और भी नरम किया- मुआफ कीजियेगा...देखिये, जरा भी बुरा मत मानियेगा...। मैं आपके जज़्बात समझता हूँ, मगर हमारी जिम्मेदारियाँ ही कुछ ऐसी हैं...। बच्चे अनाथ और बेसहारा ज़रूर हैं, पर उन्हें बार-बार बेसहारा न होने दिया जाये, यही हमारी और आपकी मंशा होनी चाहिये... है कि नईं...,क्यों साहब...?

वे सब खामोश हो गये। पुरुष कुर्सी की पुश्त से टिक गया। झुकी हुई शहतीर पर पंखा अपनी सुस्त रफ़्तार में घूम रहा था और कबूतर का जोड़ा इसी ओर निहार रहा था- अचल। मानो यहां उसी के बारे में बातें हो रही हों और जो फैसला लिया जाना है, उससे उसका गहरा ताल्लुक हो।

स्त्री ने हताशा से कहा- मतलब यही है कि आप हमें इस योग्य नहीं समझते कि हम बच्चा गोद ले सकें...।

सेक्रेटरी ने और विनम्रता से कहा- मुझे गलत न समझियेगा प्लीज...!

एक मिनट और बैठे रहकर पुरुष ने स्त्री की ओर देखा, फिर एक गहरी सांस लेकर कहा- तो चलें...?

स्त्री ने हताश-नज़रों से घड़ी को देखा, जो बिना किसी उतावली के, अपने काँटों को आगे खिसकाने के दस्तूर में व्यस्त थी।

सेक्रेटरी उन दोनों को विदा देने बाहर तक आये और एक बार फिर कहा- सॉरी मैडम, हमें गलत न समझियेगा...।

वे दोनों खामोश-उदासी के साथ, सीढ़ियाँ उतरकर स्कूटर तक पहुँचे। उसे स्टार्ट किया। बैठे और मंथर गति से लौट पड़े। कार्यकर्त्ता ने, जाती हुई स्कूटर की दिशा में, सूनी-सूनी आँखों से देखने वाले सेक्रेटरी साहब से पूछा- क्या हुआ सर?

सेक्रेटरी ने अनमनेपन से कहा- देखते नहीं, आज बड़ी उमस है...।

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कई दिनों तक वे दोनों निराशा में झूलते रहे। पुरुष ने सोचा कि 'आश्रय' वाले चालाक लोग लगते हैं। उन्हें ज़रूर रिश्वत चाहिये होगी। उसने पत्नी से कहा- सब जगह भ्रष्ट लोग बैठे हैं...।

- पर उन्होंने हमसे तो कुछ भी नहीं मांगा...।

- यही तो तरीका है...। यही तरीका है, रिश्वत मांगने का...। पहले खूब परेशान करो... फिर आदमी खुद ही ऑफर करेगा...।

स्त्री खामोश रही।

-चलो कोई तरीका निकालते हैं।

पुरुष ने दूसरे तरीके को आजमाने का निश्चय किया। उसने पाँच हजार रुपये जेब में डाले और अपने पड़ोसी मित्र विनय विनय बाबू के साथ एक बार फिर 'आश्रय' जा पहुँचा।

सेक्रेटरी साहब ने प्रसन्नता के साथ स्वागत किया- आईये-आईये ज़नाब...! 'आश्रय' में आपका एक बार फिर से, तहे दिल से स्वागत है...।

पुरुष ने सोचा ये लोग कितने मक्कार हैं,पहले से भांप लेते है कि सामने वाला रुपया ले आया है। पर ऊपर से अपने को भला आदमी दिखाने में कोई चूक नहीं करते। सारी व्यवहार-कुशलता इसी की बाजीगरी है। ऐसे हैं अनाथ बच्चों के ये महान् संरक्षक।

सेक्रेटरी उन्हें आदरपूर्वक अपने कक्ष में लिवा ले गये। कुर्सियाँ पेश कीं और पानी लाने की कोमल हिदायत दी। पुरुष ने परिचय कराया- ये विनय साहब हैं..., ट्रायबल वेलफेयर डिपार्टमेंट में डिप्टी डॉयरेक्टर हैं और हमारे पड़ोसी भी...। हम लोग यूं ही आपसे मिलने चले आये...।

वे और आत्मीय हुए- आपका हमेशा स्वागत है...,जब चाहें तशरीफ लाएं...। हमें मिलकर हमेशा खुशी ही होती है...।

- 'आश्रय' बड़ा पुराना केंद्र लगता है। विनय साहब ने बात शुरू करने के लिये कहा और ठुड्डी खुजलाने लगे। कबूतरों का जोड़ा अब भी शहतीर पर जमा हुआ था।

-हां साहेब, इसे बीस साल होने को आये...।

- अच्छा...! बीस साल...? पुरुष ने बेज़रूरत आश्चर्य को बड़ा करते हुए कहा।

सेक्रेटरी उत्साहित हुए- हाँ जी, हमारा एनजीओ इसे चलाता है...। आज तक कोई शिकायत नहीं आयी...और न ही हमारी रेपुटेशन पर कोई आँच ही...।

- एन जी ओ...? पुरुष के लिये यह एक अचीन्हा शब्द था।

- एनजीओ मीन्स, नान गवर्नमेंटल ऑर्गनाइजेशन...। गैर सरकारी संगठन...। यह समाज का है। सरकार का नहीं। प्रोफेसर, डॉक्टर्स, पत्रकार और लेखकों ने मिलजुल कर यह संस्था बनायी है...।

- अच्छा-अच्छा... 'आश्रय' नाम भी तो कितना अच्छा है...।

- जी...।

-आप यहाँ नौकरी करते होंगे... आपका स्केल क्या है?

सेक्रटरी शालीनता से मुस्कुराये- नहीं जनाब, मैं नौकरी तो यूनिवर्सिटी में करता हूँ...। लायब्रेरियन हूँ..। और यहाँ ऑनरेरी-सेक्रेटरी...। यहाँ से हम में से कोई भी वेतन या खर्च नहीं लेता...। जो बनता है, अपनी तरफ से वह लगा ज़रुर देता है।

पानी आ गया था। पुरुष ने बेवजह पानी पिया। कबूतर ने अपनी गर्दन लचकाकर नीचे के लोगों को देखा।

पानी पीने से मना करते हुए विनय साहब ने कहा- मेरे दोस्त पहले भी एक बार यहाँ आ चुके हैं, भले आदमी हैं...। इनकी वाइफ तो एकदम इंडियन-वुमेन हैं...। बस ऊपर वाले ने इनके साथ एक नाइंसाफी कर दी, इन्हें कोई बच्चा नहीं दिया...।

सेक्र्रेटरी और ज्यादा विनम्र हो गये- ऊपर वाला बड़ा कारसाज है, सर, वह कोई नाइंसाफी कर ही नहीं सकता। वह जिन्हें एक बच्चा नहीं देता...उन्हें दुनिया भर के बच्चे दे देता है...।

विनय साहब ने बिना कुछ सुने अपनी बात जारी रखी- ये बच्चा गोद लेना चाहते हैं..., तो आप दे क्यों नहीं देते ? क्या दिक्कत है...?

- ज़रूर लेना चाहिये... ऐसे ही लोगों की दुआ से 'आश्रय' अपने बेसहारा बच्चों की परवरिश कर पा रहा है।

- पर शायद आपको कोई अड़चन है...?

सेक्रेटरी हँसे। उनके हँसने में गहरा प्यार छलक आया- अड़चन कुछ नहीं है...सर, हम और आप दोनों ही बच्चों के वैलविशर हैं...। उसी नज़रिये से हम सोच रहे थे, कि ऑफ्टर-रिटायरमेंट वाली एज में बच्चा गोद लेना चाह रहे हैं, तो आगे चलकर कोई दिक्कत न आये...। न आपको और न ही बच्चे को...। खुदा न करे, पर किसी कारण कोई चूक हो गयी या आप-हम अपनी ड्यूटी में फेल हो गये, तो वह बच्चे के हक में बहुत बुरा होगा...।बहुत ही बुरा...। बस यही एक चिंता है, नहीं तो हम यहाँ क्यों बैठे हैं... इसीलिये न्...!

सेक्रेटरी साहब की बातों का पुरूष पर अच्छा प्रभाव पड़ा। उसे लगा कि शायद वह उनके बारे में गलत धारणा पाले हुए है, हो सकता है कि वे वैसे न हों। उसे ग्लानि महसूस हुई। तब उसने अतिशय विनम्रता से कहा- सेक्रेटरी साहब..., यदि आपको लगता हो कि हम बच्चे की देखभाल ठीक तरह से नहीं कर पाएंगे या हमारी एज के कारण बच्चा देना उचित न लगता हो, तो हम आपको मजबूर नहीं करेंगे...। जैसा आप ठीक समझें, वैसा ही करें...।

विनय साहब ने थोड़ा असहजता से पुरुष को देखा, पर पुरुष ने उसका नोटिस नहीं लिया, वह बोलता रहा- हम अक्सर केवल अपने हिस्से का ही देख और सोच पाते हैं...। आप उसे दोनों ओर से देखने की कोशिश कर रहे हैं...। बच्चे के बारे में आपका फैसला ही ज्यादा सही होगा...।

कहने के बाद पुरुष को बड़ा सुकून मिला। बाहर गर्मी बढ़ती जा रही थी, पर अंदर, इस कमरे में, पंखे की चौड़ी और पुरानी ब्लेडें ठंडक बनाने में लगातार जुटी रहीं। पीछे के कमरे हलचल भरे थे। उस दिन वाले कार्यकर्ता चाय दे गये। सेक्रेटरी साहब ने आदरपूर्वक चाय पेश की। जब सबने अपने-अपने प्याले ले लिये, तो उन्होंने को आवाज दी- श्याम भैया... आप भी अपनी चाय लेकर यही आ जाओ न...।

वे, जो कार्यकर्ता थे, अपना प्याला लेकर वहीं पर आ गये और घीमे से कुर्सी खिसकाकर बैठ गये।

- ये श्याम भैया हैं...। इन्होंने अपना फालतू वक़्त 'आश्रय' को अर्पित कर दिया है। अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिये सुबह अख़बार बाँटते हैं, और शाम को अगरबत्तियाँ बेचते हैं...। और बाकी का समय सेवा भाव से यहां देते हैं।

पुरुष मुँह फाड़े देखता रह गया। उसके दिमाग में लगी हुई जंग की एक परत झारी। खुद विनय साहब सकते की हालत में थे। सरकारी अफसर होने के कारण उन्हें सारी दुनिया चोर और लुटेरी ही नज़र आती थी। वे नहीं जानते थे कि एनजीओ इस तरह भी चलाये जाते हैं। वे तो सोचते थे कि एनजीओ माने सरकारी ग्रांट...। रुपया ही रुपया...। चोरी और लूट...। ऐश ही ऐश।

वे दोनों अभी खोयी हुई हालत में ही थे कि सेक्रेटरी बोले- मेरा एक सजेशन है...।

- जी..., बताएं...।

- आप अपनी मिसेज के साथ एक बार और मशवरा कर लें... यदि आपको तब भी लगे कि बच्चा गोद लेना ही है, तो आ जाईयेगा...। मैं आपका सहयोगी हूँ..., मदद ही करूँगा...।

सेक्रेटरी साहब के आखिरी शब्दों ने पुरुष को सांत्वना के असीम सागर में डुबो दिया। विनय साहब के चेहरे पर साहबी-सुकून झलका, कि लो करा दिया काम। कबूतर के जोड़े ने अपनी जगह पर परिक्रमा लगायी और फिर गुटर-गूँ की तान छेड़ दी।

सेक्रेटरी बाहर तक छोड़ने आये। अब वे देवदूत लग रहे थे।

विनय साहब ने रास्ते में कहा- हमें देखते ही वो सेक्रेटरी समझ गया था, कि अब गड़बड़ नहीं चलेगी...।

पुरुष के मन में 'गड़बड़' शब्द पर ऐतराज पैदा हुआ, वर उसने बातों का रुख मोड़ने के लिये कहा - सेक्रेटरी साहब तो लगता है, हम लोगों की उम्र से डरे हुए हैं, मगर हम कोई जल्दी मरने वाले नहीं हैं...विनय साहब।

तीन-चार दिनों बाद ही पुरुष, स्त्री को साथ में लेकर 'आश्रय' पहुँच गया। सेक्रेटरी साहब सालों पुराने दोस्त की तरह मिले। वे देर तक इधर-उधर की बातें करते रहे और बातों-बातों में ही उन्होंने, अपने काम की जानकारियाँ हासिल कर लीं। पृष्ठभूमि, अन्य परिवार-जन, रिश्तेदार, मित्र, पास-पड़ोस, शौक, विचार, दर्शन आदि के बारे में उन्होंने सब जान लिया और पूछताछ वाली फूहड़ता का जरा सा भी प्रदर्शन नहीं होने दिया। वे उनके शौक पूछते, तो अपने शौक भी बताते, पास-पड़ोस की जानकारी लेते, तो अपना पास-पड़ोस भी मजे-मजे विश्लेषित करते। घंटे भर की बातचीत के बाद सेक्रेटरी बोले- मैं अब समझ गया हूँ कि आप लोग आइडियल-पेरेंट हैं...। मुबारक हो।

स्त्री ने उदास होकर कहा- पर हमें तो ईश्वर ने ही रिजेक्ट कर दिया...।

- न...न मैडम..., ऐसा मत कहिये...। वह खुद दुनिया का सबसे बड़ा पेरेंट है...। वह कभी गलती नहीं करता। वह किसी को रिजेक्ट नहीं करता। ऐसा लगता है कि उसने आप लोगों की परफेक्टनेस को देखते हुए, आप लोगों को किसी बड़े काम के लिये चुना है...। अपना बच्चा तो सभी पालते हैं...। अपने बच्चे को सभी प्यार करते हैं...। आप पर उसने यह जिम्मेदारी डाली है, कि आप किसी दूसरे के बच्चे को पालें...। किसी बेसहारा को प्यार करें...। मैडम जी, खुदा यह नियामत सबको कहाँ बाँटता है...? यह तो उसने उन खास लोगों के लिये सम्हालकर रखी हुई है...जो दुनिया में सबसे अनोखे होते है। और हमारा दिल कहता है कि उन खास लोगों में आपका भी शुमार है।

स्त्री की आँखें नम हो गयीं। हृदय थरथराने लगा। उन्हें लगा कि वे एक अदनी स्त्री से, अचानक ही एक महान् स्त्री में तब्दील हो गयीं हैं। उन्हें महसूस हुआ कि उनके जीवन का एक खास मकसद है। वे कोई साधारण स्त्री नहीं हैं। जीवन, केवल खाने, पहनने, सोने और अंत में खांसते हुए विदा हो जाने का ही नाम नहीं है। ये मकसद नहीं हैं, संसाधन हैं। मकसद कुछ और ही होता है, उसे पहचानना और पकड़ना पड़ता है। पहचानने और पकड़ने की योग्यता अर्जित करना पड़ती है।

उनके मन में सेक्रेटरी साहब के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा हुआ। वे अध्यापन कार्य से रिटायर हुईं थीं, इसलिये उन्हें यह मर्म समझने में कोई बाधा महसूस नहीं हुई, कि जो स्वयं ही बड़प्पन से भरा होता है, वह अपने सामने मौजूद हर आदमी को भी बड़प्पन से भर देता है, जबकि अंदर से ओछेपन का शिकार आदमी, दूसरों को छोटा और हीन बनाकर सुख का अनुभव करता है।

स्त्री की आंखों से आंसू बह चले। न जाने क्यों, न जाने कहां ?

सेक्रेटरी ने उनके आंतरिक भावों को महसूस कर लिया था, कहा- बस-बस मैडम...,यही आँसू आपको क्वालीफाय करते हैं, कि आप एक माँ हैं...। बेहतर माँ... मरियम जैसी मां...। खुदा ने आपको इसीलिये चुना है...।

सेक्रेटरी उन्हें 'आश्रय' के भीतरी कमरों में ले गये। वहाँ कई और सहयोगी स्त्री-पुरुष थे। एक कमरे में किचन था और वहाँ दो स्त्रियाँ काम कर रही थीं। खेल-घर में कुछ बच्चे जमा थे। उन बच्चों ने देखते ही अभिवादन किया। एक अलग कमरे में चार-पाँच पालने थे। उनमें से तीन में बच्चे थे और दो खाली थे। दो आयाएं उन बच्चों के लिये बॉटल में दूध भरकर निपल लगा रही थीं। खिलौनों और बच्चों की तस्वीर वाले आकर्षक पोस्टरों से कमरे की सजावट की गयी थी। अलगनी और रैक में छोटे, मंझोले और थोड़ा बड़े बच्चों के आकार वाले कपड़े करीने और तरतीब से रखे हुए थे। वहां पर मौजूद लोगों में नौकरीपन नहीं था। वे घरेलु और समर्पित दिखायी देते थे। पहले पालने में लेटे बच्चे को स्त्री ने उठाया, प्यार किया और छाती से चिपका लिया। कहा- यही है मेरा बेटा...।

सेक्रेटरी ने इस बात पर गौर किया कि स्त्री ने चुनने-छाँटने की बाजारू प्रवृत्ति और रंग-रूप की भेदभाव वाली दृष्टि से अपने को बचाये रखा है।

वे बोले- लीजिये, आप इस बच्चे की माँ हो गयीं...।

स्त्री को लगा, देवता वरदान दे रहे हों।

स्त्री को वहीं छोड़कर सेक्रेटरी साहब फिर से बैठक कक्ष में आ गये। पुरुष से कहा- यह एक फॉर्मल एप्लीकेशन फॉर्म है, भर दीजियेगा..।. और यह है कैटलॉग... इसमें उन चीजों की सूची है, जिन्हें आपको बच्चे को यहां से ले जाने से पहले खरीद लेनी हैं। कैटलॉग के पीछे वाले हिस्से में ही कुछ काशन्स डॉयरेक्शनस् भी लिखे हैं...। वे हँसते हुए आगे बोले- लिखे तो हैं, पर माता-पिता इन बातों को पहले से ही जानते हैं...। फिर भी यह हमारी ओर से दिया ही जाता है...।

पुरुष ने सेक्रेटरी साहब से सूची ली और उसे गौर से पढ़ा। कुछ देर बाद, जब स्त्री अंदर वाले कक्ष से निकलकर वहां पर आ गयी, तो उस समय उसकी प्रसन्नता और कृतज्ञता देखते ही बनती थी। वह चेहरे पर साफ-साफ तैर रही थी। पुरुष ने स्त्री के उस परम आनंद को देखा। महसूस किया। फिर उस आनंद से अपने को भी सराबोर कर लिया। अब वे दोनों ही आनंद की प्रशांति में आकंठ डूबे हुए थे। स्त्री और पुरुष से एकाएक माता-पिता में तब्दील हो चुके, उन दोनों प्राणियों को, बाहर तक छोड़ने के लिये, सेक्रेटरी साहब और श्याम भैया, दोनों ही आये। दोनों आयाएं भी अंदर से आकर, उनके पीछे खड़ी हो गयी थीं।

वे चले गये तो सेक्रेटरी साहब ने दोनों हाथ उठाकर दुआ मांगी- खुदा इनकी मदद करना...! ये बड़े भले लोग हैं...।

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'आश्रय' ने जो सूची दी थी, उसमें लिखी हुई चीजें तो बाज़ार से खरीदी ही गयीं, उनके अलावा भी ढेर सारी चीजें खरीद ली गयीं। कुछ चीजें तो दो-दो हो गयीं और कुछ चीजें तो ऐसी भी थीं, जिनका शायद ही कभी उपयोग हो, पर उन्हें भी खरीद लिया गया था। फिर चूहे, मच्छरों और चीटियों से बचाव के उपाय किये गये। घर की साज-सज्जा बदल दी गयी। नोकदार फर्नीचर बदल दिया गया। दीवारों के कॉर्नर पर दोहरी पुट्टी कराकर, उन्हें गोलाकार बनाने की यथासंभव कोशिशें की गयीं। बच्चों के चित्र वाले कैलेण्डर आ गये। साफ-सफाई पर ध्यान दिया जाने लगा। डेटॉल, स्प्रिट, और एसिड की बोतलें बाथरूम में जम गयीं। पंखा कितना तेज चले, कितनी रोशनी हो, इस पर विचार-विमर्श हुआ। बच्चे को चूमते, खिलाते और दूध पिलाते समय कौन सी सावधानियाँ रखी जायें, इस ओर भी तवज्जो दी गयी।

पड़ोसियों, मित्रों और रिश्तेदारों ने भी खूब टिप्स दिये। हर कोई बताने, सिखाने और समझाने पर अमादा था। वे भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने जैसी एकाग्रता से सब नोट करते रहे। टीवी विज्ञापनों को गौर से देखकर पुरुष ने बच्चे के लिये आवश्यक वस्तुओं की भी एक अलग सूची तैयार की- हमाम, मालिश तेल, ग्राइप वाटर, काकरोच मारने की दवा आदि। उनकी सुबहें, शामें और दिन सज गये। नये और अनोखे हो गये।

फिर जिस दिन बच्चा लाया जाने वाला था, उस दिन घर को खूब सजाया गया। वंदनवार लगाये गये और आंगन में रंगोली डाली गयी। विनय साहब की कार, मय ड्राइवर के उधार मांगी गयी। कार को उसी तरह फूलों से सजाया गया, जैसे बारात के लिये सजाया जाता है। प्रातःबेला में कार 'आश्रय' के द्वार पर जा खड़ी हुई। बच्चे को नये कपड़े पहनाकर तैयार कर दिया गया था। दोनों आयाएं बच्चे को गोद में लिये रो रही थीं।

सेक्रेटरी साहब ने बताया- हमारी ये दोनों बहनें सबेरे से रो रही हैं।

स्त्री ने उन्हें अपने से चिपका लिया- हम इसे कहीं बाहर नहीं ले जा रहे है...। जब आप लोगों का मन हो, घर चले आएं...। यह हम सबका बच्चा है...। आपका, हमसे ज्यादा...।

'आश्रय' वालों ने उपहारों से कार को भर दिया था। सभी लोग विदा देने मौजूद थे। यहां तक कि वे सभी बच्चे भी कार घेरकर क्षड़े थे और रो रहे थे, जो उम्र में कुछ बड़े थे।

बच्चे के आने की खुशी में उसका नामकरण-संस्कार करने के बहाने एक पार्टी आयोजित की गयी। इस पार्टी में दोस्त, रिश्तेदार और पड़ोसी आमंत्रित किये गये। 'आश्रय' के सेक्रेटरी साहब, श्याम भैया केयर टेकर, आयाएं, स्वयंसेवक और वहाँ के बड़े बच्चों को खासतौर पर निमंत्रित किया गया था। सेक्रेटरी साहब तो खुद ही आने को उत्सुक थे। असल में यह उनके कर्त्तव्य का ही हिस्सा था, कि जिस घर में बच्चा दिया जाये, उस घर से एक सतत् संपर्क भी रखा जाये। और यह सब इस तरह हो, कि गोद लेने वालों को जरा सा भी इस बात का अहसास न हो, कि उन पर नज़र रखी जा रही है।

गुब्बारों, फूलों, खिलौनों से घर की तिल-तिल जगह भर गयी। केले के खंबे और वंदनवार लगाये गये। स्वागत-द्वार और रोशनी का विशेष इंतजाम किया गया। मीठे और कोमल संगीत से पूरा घर धड़कने लगा। पुरुष और विनय साहब द्वार पर सबका स्वागत करने खड़े हो गये। स्त्री अंदर मेहमानों को बिठाने और सम्मान देने में जुट गयी। स्त्री के विद्यालय की पुरानी सखियों ने आकर सब सम्हाल लिया था। अभ्यागतों ने बधाई दी, उपहार दिये और बुफे-शैली में अपनी थालियाँ सजाकर, अलग-अलग समूहों और उप-समूहों में खाने-गपियाने में जुट गये।

पुरुष के भाई ने स्त्री के भाई के पास जाकर कहा- खाना अच्छा बना है...।

- जी हाँ... अच्छा केटरर लगता है...।

- आप क्या सोचते हैं...?

वे अनभिज्ञ बन गये- किस बारे में...?

- अरे, इस बच्चे के बारे में...।

- बहुत अच्छी बात है...बड़ा ही पुण्य का काम है...एक अनाथ बच्चे को पालना...। फिर मिर्च की नोंक कुतरते हुए कहा- मेरा न लेते तो न सही, आपका ही ले लेते...।

- हाँ... ठीक ही कह रहे हैं...।

- अरे भैया... अपना गोत्र नहीं, तो कम से कम खून तो अपना ही होता न्...।

- यह भी ठीक ही कह रहे हैं...।

फिर कान के पास मुँह लाकर बोले- वह सेक्रेटरी है न्... अरे वही आसरय वाला...?

- हाँ... हाँ...।

- मुसलमान है...।

- अच्छा...? स्त्री के भाई ने खूब बड़ा सा आश्चर्य किया, हालाँकि उन्हें यह बात पता थी।

- कहीं यह, उसी का या उसके किसी रिश्तेदारों का बच्चा हुआ तो...?

स्त्री के भाई ने पापड़ तोड़ते-तोड़ते कहा- अब उन्हें समझाए कौन...? दोनों किसी की मानते हैं क्या...?

मेहमानों से मिलते-जुलते और उनसे भोजन करने का अनुरोध करते हुए पुरुष उनके पास भी पहुँचा- ठीक से खाईयेगा... संकोच न करियेगा...बच्चे के लिये चाचा और मामा का स्नेह ही सबसे बड़ा होता है...।

विनय साहब सरकारी-विभागों से आये हुए, अपने और अपने स्तर से बड़े ओहदे वालों के साथ खा रहे थे और बच्चे के एडॉप्सन का श्रेय सिद्ध करने के लिये बता रहे थे- पहले तो आश्रय वाले इन्हें बच्चा देने को तैयार ही न थे...।

- क्यों...?

- कह रहे थे, इन लोगों की उम्र ज्यादा है...।

- फिर...?

- फिर क्या...हम साथ में गये...समझाया...। तब कहीं जाकर वे लोग तैयार हुए...।

दूर के रिश्ते में पुरुष की मामी लगने वाली स्त्री, एक अन्य स्त्री से कह रही थी- बच्चा पालना बड़ा मुश्किल काम है...देखो का कर पाती हैं ये ?

- आप तो हैं, सिखा देना...।

- अरे हमसे से तो साल दो साल में ही मेल-मुलाकात होती है...अब देख हैं...का करती हैं जे...?

सेक्रेटरी साहब यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर को बता रहे थे- पेरेन्ट्स का सिलेक्शन बड़ा गुत्थी भरा काम होता है... और यह तो स्पेशल केस है...। पैंसठ साल की उम्र वालों ने एडाप्सन किया है...।

- एक्सपेरीमेंट समझिये...।

- हाँ, एक्सपेरीमेंट तो है ही, पर रिस्क भी बहुत है...।

- बिना रिस्क के कोई भी एक्सपेरीमेंट होता है क्या...?

- खुदा माफ करे... इस बार मैंने बच्चे के बजाय पेरेंट्स को तवज्जो दी है...अब वही सब निबाहेगा...।

आधी रात तक बातें, ठहाके और गप्पें चलती रहीं। गुब्बारे फूटते रहे। प्लेटें-चम्मचें खनकती रहीं। पंडित जी ने 'न' वर्ण से नाम रखने का सुझाव दिया। बच्चे का नाम रखा गया- नंदन। तालियाँ बजीं। स्त्री और पुरुष माता-पिता बनने के सुख से लबरेज हुए।

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रात में स्त्री को बार-बार लगता कि नंदन ने बिस्तर गीला कर दिया है। वह पुरुष को जरा सा हिलाती और वह हड़बड़ा कर उठ बैठता- क्या हुआ...? क्या बात है...?

- जरा देखो तो, शायद इसने बिस्तर गीला कर दिया है...।

पुरुष लाईट ऑन करता। चश्मा लगाता। बिस्तर छू कर देखता, फिर बताता- नहीं तो... बिस्तर तो एकदम सूखा है...।

- अच्छा! स्त्री को आश्चर्य होता।

लेकिन जब नंदन बिस्तर गीला कर देता तब स्त्री को पता नहीं चल पाता। पुरुष ही उसे बताता, तब वह फिर आश्चर्य करती- अच्छा...?

आया दिन भर के लिये रखी गयी थी, किंतु उत्साह के कारण अधिकतर काम तो वे दोनों खुद ही कर डालते थे। उसे मौका कम मिलता। हाँ, उसकी सलाहें खूब ली जातीं। पल-पल में उससे पूछा जाता। मालिश वही करती थी, स्त्री को डर लगता था कि बच्चे को कहीं चोट न लग जाये। मालिश के समय नंदन चिल्ला-चिल्ला कर रोता था। पुरुष कहीं भी रहता, दौड़ा-दौड़ा आता और रोने के कारण पूछता। आया उसे बाहर भेज देती, बताती- मालिश कड़क न होगी, तो हाथ-पाँव भी कड़क न होंगे...। भैया जल्दी-जल्दी चलना न सीख पाएंगे।

मालिश के बाद वह बच्चे को वही नहलाती-धुलाती। नहाने के बाद बच्चा दूध पीता और चौथाई बोतल खत्म होने से पहले ही गहरी नींद में सो जाता। आया को पल भर में सुला देने का हुनर आता था। वह यह तक बता देती कि नंदन अब कितने घंटे सोयेगा। वे दोनों अचरज करते और ऐसी अनुभवी आया को पा लेने के लिये ईश्वर का धन्यवाद भी करते।

उन्हें नंदन की हर बात पर अचरज होता। अचरजों से घर भरा हुआ था। वह मुस्काता, वे अचरज करते। उन्हें निहारता, तो अचरज करते। उसकी मासूम नींद उन्हें अचरज में गुम कर देती। पलकें हिलतीं तो वे सोचते, सपना देख रहा होगा। और यह भी कि उसके सपनों में हम होंगे या नहीं...? वह बच्चा न था, अचरजों का पुलिंदा था।

मामी कई महीनों बाद मिलने आयीं और यूं ही पूछ लिया- नंदन को टीका लग गया...?

- टीका...?

- हाँ... पोलियो का, माता का..।

- अरे... हम तो भूल ही गये...कि टीका भी लगवाना है...।

- वाह-वाह अच्छे पढ़े-लिखे मां-बाप हो भाई ..। इसी से कहते हैं कि बच्चा पालना कोई हँसी-खेल नहीं है...। ऐसे बखत घर में किसी बूढ़े-सयाने का होना बहुत जरुरी होता है...। पर तुम लोगों को तो किसी से मतलब ही नहीं है...।

- न मामी जी, ऐसा न कहिये...। आप ही हमारी सयानी हैं और आपको ही हमारी हर तरह से मदद करना पड़ेगी...। समय-समय पर सब बातों की याद दिलाना पड़ेगी। आप ये सब न करेंगी तो कौन करेगा...? आपके सिवाय हमारा कौन है...?

मामी को यही सुनना था, वे खुश हो गयीं।

उसी शाम वे लोग नंदन को डॉक्टर के यहाँ ले गये। वहां पर पहले से कई माता-पिता प्रतीक्षा कर रहे थे। स्त्री भी बैठ गयी। पुरुष बाहर टहलने लगा। बाजू में बैठी हुई स्त्री ने पूछा- आपका नाती होगा...?

स्त्री थोड़ा अचकचायी- नहीं, बेटा है...।

उसे अचरज हुआ- लेट डिलेवरी है...?

- हाँ, स्त्री बच्चे में व्यस्त हो गयी, ताकि और जवाब न देना पड़ें।

डॉक्टर ने भी बच्चे का मुआयना करते हुए हँसी की- मम्मी-पापा को तो आजकल अपने बच्चों के लिये फुरसत नहीं होती, दादा-दादी पर सब छोड़ देते हैं...।

वह चुप रही। टीका लगने पर नंदन बुक्का फाड़कर रोया। स्त्री का कलेजा हिल गया। पुरुष भागता हुआ चैम्बर में आया- क्या हुआ...?

- कुछ नहीं... बच्चों को इतना रोना ही चाहिये...। डॉक्टर ने कहा।

रोते हुए बच्चे को हिलाते-डुलाते-बहलाते वे बाहर चले आये। घर आ जाने पर भी बच्चा दर्द से रोता ही रहा। रात में, बड़ी देर बाद उसे नींद आयी, तब दोनों को थोड़ी राहत मिली। वे थक गये थे। स्त्री हलाकान हो चुकी थी। अब चैन पाने के बाद उसे डिस्पेंसरी में मिली महिला की याद आयी। गहरी सांस लेकर उसने पुरुष को बताया- लोगों को पता नईं क्या मिलता है..., पूछेंगे ज़रूर- 'नाती है?' अरे, कोई भी हो, तुम्हें क्या...?

पुरुष हँसा- गुस्सा क्यों होती हो..., लोगों के लिये ये बात अनोखी है...। वे इसके आदी नहीं हैं...। तुम तो बता दिया करो- बेटा है हमारा...। नहीं है क्या...?

नंदन के आने के बाद उनकी दिनचर्या में बहुत से बदलाव हुए। जैसे सबसे बड़ा बदलाव तो यही हुआ कि दोनों में से जब कोई एक बाहर जाता, तो दूसरा घर पर ही रहता। निश्चिंतता गायब हो चुकी थी और हर समय सजगता-सतर्कता बनी रहती, जैसे हस्पताल में दाखिल किये गये मरीज के परिजनों में एक स्थायी सतर्कता आ जाती है। दो घंटे के लिये भी पुरुष बाहर गया होता, तो लौटते ही पूछता- नंदन कैसा है? उसकी खांसी को आराम लगा?

बच्चे के दांत निकलने का समय तो उन पर पहाड़ सा गुजरा। दस्त और बुखार ने मानो बच्चे के प्राण ही निकाल लिये। वह हमेशा दर्द और विपत्ति में फंसा हुआ दिखाई देता। डॉक्टर के यहाँ दौड़-पदौड़ मची रहती। वे बेचैन और व्याकुल हो जाते। पर डॉक्टर इत्मीनान से कहता- इट इज जस्ट टीथिंग ट्रबल...। ऐसा ही होता है..।. घबराने की कोई बात नहीं है...। दवाएं देते रहें...।

थोड़े ही दिनों में बच्चे ने अपने दंतावतरण तकलीफों से निजात पा ली। अब उसके सामने के दो दांत, चावल के छोटे-छोटे दानों की तरह झलकने लगे थे। वह हँसता तो झलकन खिल जाती। स्त्री ने पुरुष को बताया कि सूरदास ने इस पर बड़ा प्यारा पद लिखा है, स्कूल में वह पढा़या करती थी-

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।

किलकि हंसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत।।

फिर स्त्री सोच में पड़ गयी कि यशोदा जी ने क्या किया होगा? दांत निकलने पर कृष्ण को कितना कष्ट हुआ होगा? तब तो डॉक्टर भी न थे।

दो साल के अरसे तक सिनेमाघर जाने पर निजी पाबंदी रखने के बाद, एक दिन उनका सिनेमा देखने का प्रोग्राम बना। लंबी यात्रा पर निकलने जैसी तैयारी हुई। याद कर-कर के दूध की बॉटल, बिस्किट, नैपकिन, पानी की बॉटल आदि सब रखे गये। तैयारी के कारण समय भी लगा और हड़बड़ी भी हुई। घर में ताला डाला और ऑटो रोका। उसे सिनेमाघर का नाम बताया और जल्दी चलने को कहा।

पुरुष ने रास्ते में जानकारी हासिल की- दूध की बॉटल तो रख ली है, न...?

- हाँ।

- पानी की...?

- हाँ।

- नेपकिन्स्...?

- सब रख लिया है बाबा...! पर...। स्त्री ने जीभ काटी।

- क्या हुआ...?

- नंदन...?

- नंदन...।

पुरुष ने गोद की ओर देखा - अच्छा, उसे ही भूल गयीं...।

ऑटो लौटाया गया। दौड़कर ताला खोला। जी धक्-धक् करता रहा। नंदन अब भी चैन से सो रहा था। निश्चिंत।

पुरुष ने कहा- जिसके लिये इतने इंतजाम किये और एक भी चीज नहीं भूले, उसे ही भूल गये...। आदतों का कितना असर होता है!

नंदन ने जिस दिन पहली बार 'मां... मां...' कहा। स्त्री निहाल हो गयी। वह दिन भर बताती रही कि आज नंदन ने उसे पुकारा। सबसे पहले उसे ही पुकारा। मां से ही बच्चे का असली रिश्ता होता है। पुरुष भी खुश हुआ। उसने हँसते-हँसते, बच्चे को बेईमान कहा। बाद में नंदन ने कुछ और शब्द सीख लिये। वह 'पापा' भी कहने लगा और इस तरह उसने तराजू के पलड़े सम कर दिये। दूधू, मम्मा (आया) उसके प्रिय शब्द बन गये। वह रोज कुछ नया-अनोखा करता, अंजानी भाषा के शब्दों को झराता-गिराता और वे दोनों उन्हें बटोरते-फिरते। नन्हे पैरों से वह जिस दिन दो डग चला, घर में धूम मच गयी। उसे चलने के लिये बार-बार प्रोत्साहित किया जाता। वह डगमगाता और धम्म से बैठ जाता। बच्चे को भी पता चल गया था कि उसके चलने में कोई जादू है, खेल है...। वह भी उसमें मजा लेना सीख गया था। चलता और गिर पड़ने का अभिनय करता।

दो साल पूरे होकर चार-पाँच माह और निकल गये तो पड़ोसियों-मित्रों-परिचितों ने पूछना शुरू किया- किस स्कूल में डालने का सोच रहे हैं...!

पुरुष ने इन सवालों की अवहेलना कर दी- अभी से स्कूल...? अरे, नंदन का बचपन नष्ट करना है क्या... अभी तो इसे खूब खेलने-खाने दो...। मुक्त-विकास बच्चे की पहली ज़रूरत है...। स्कूल बच्चे के विकास को रोक देता है...। वे उस पर कृत्रिम-अनुशासन लाद देते हैं...। बच्चा सोना चाहता है, तो वह जगाते हैं...। वह बोलना चाहता है, तो उसे चुप रहने को कहते हैं...। वह हँसना चाहता है, तो उसके हँसने से उनका डिसिप्लिन टूटता है...।

पुरुष के विचारों से स्त्री भी सहमत थी। ऐसे ही विचारों के लिये वह पुरुष पर गर्व करती थी। पर नंदन के, तीन साल की उम्र पार करते ही, वे दोनों भी इस चिंता के घेरे में आ ही गये। पुरुष सबसे बढ़ियां माने जाने वाले स्कूल का एडमीशन फॉर्म ले आया। दोनों ने मिलकर उसे इतनी गंभीरता से भरा, जितनी गंभीरता से अपनी नौकरी का आवेदन-पत्र भी नहीं लिखा होगा। इंटरव्यू के लिये दो दिनों तक तैयारी की गयी। कई-कई लोगों से मशवरा किया। टिप्स् लीं। विनय साहब के पोते वहीं पढ़ते थे, उनके साथ खास गुफ्तगु हुई।

इंटरव्यू देने पहुँचे तो बच्चों और माता-पिता की छोटी सी भीड़ वहाँ पहले से मौजूद थी। लोगों और खासतौर पर महिलाओं को देखकर स्त्री को कोफ्त हुई। उसे लग रहा था कि इनमें से कोई ज़रूर पूछेगा 'नाती है क्या...?'

वह जरा झुकी-झुकी सी अपने में ही सिकुड़ी-सिमटी, एक कुर्सी पर बैठ गयी। पुरुष भी बाजू में बैठ गया। नंदन बच्चों में सरक गया। दो अजनबी बच्चे पहले आमने-सामने खड़े हुए, फिर उन्होंने एक-दूसरे को परखा। दूसरे बच्चे ने नंदन को छुआ और अपरिचय का नकाब टूट कर गिर पड़ा। बड़ों को परिचय करने में देर लगती है, जबकि बच्चों का संकोच जल्दी ढल जाता है। स्त्री के बाजू में बैठी महिला ही उस दूसरे बच्चे की मां थी। उधर बच्चे दोस्त बने और इधर माताओं में भी बातचीत चल पड़ी। कहाँ रहते हैं, बच्चे का नाम क्या है, जैसे सवाल तो हुए पर किसी ने नहीं पूछा- आप दादा-दादी हैं क्या?

जब प्यून उनके नाम की चिट ले आया, तो स्त्री ने राहत महसूस की। प्रिंसपाल मैडम का कक्ष अपेक्षाकृत बड़ा और भव्य था। वे स्वयं अत्यंत गरिमामय और शांत व्यक्तित्व की महिला थीं।

मैडम ने कहा- प्लीज बैठिये...।

वे बैठ गये।

फिर पूछा गया- चाइल्ड के मम्मी-पापा नहीं आये...?

पुरुष मुस्कुराया- हमीं मम्मी-पापा हैं।

मैडम लज्जित हुईं- सॉरी... आपका चाइल्ड है...। फिर नंदन से पूछा- क्या नाम है आपका...?

नंदन ने कहा- इंग्लिश में पूछिये न्...?

सब हँस पड़े। उसने इंग्लिश में अभ्यास किया था।

- ओह... व्हॉट इज योर नेम...माईसन...?

- माई नेम इज नंदन...।

ऐसी ही कई और औपचारिक बातों के बाद कहा गया कि वे दो दिन बाद आकर सूची देख लें। प्रतीक्षा के दो दिन काटने कठिन हो गये। यों वे आश्वस्त से थे, पर बार-बार आशंकित भी हो जाते थे। पुरुष दो दिन बाद स्कूल गया और जब लौटा तो उसका चेहरा ही बता रहा था कि नंदन को प्रवेश दे दिया गया है। स्त्री बरामदे में इंतजार कर रही थी और स्कूटरों की आवाजों पर चौंक-चौंक पड़ रही थी।

स्त्री ने कहा- मिल गया न्...?

- हाँ, मिल गया... कांग्रेट्स।

तब बाज़ार की बारी आयी। नंदन के लिये बस्ता, पानी की बॉटल, टिफिन, किताबें, यूनीफॉर्म वगैरह खरीदने के लिये पूरा बाज़ार खंगाला गया। चीजें इस तरह खरीदी गयीं, मानो प्रापर्टी खरीदी जा रही हो। रंगों, आकार और वजन पर खास ध्यान दिया गया। यूनीफॉर्म पहनकर जब नंदन सामने खड़ा हुआ, तो वह उन्हें संसार का सबसे खूबसूरत बच्चा लगा। अपनी नज़र अपने ही बच्चे को न लग जाये, स्त्री ने सोचा।

बच्चे के स्कूल जाने का पहला दिन उत्सव की तैयारी का दिन बन गया। कोई बस्ता बंद कर रहा था, तो कोई जूते चमका रहा था। स्त्री नाश्ता और टिफिन तैयार करने में व्यस्त थी। आया ने उसे नहलाया। नंदन आया के हाथों से ही नहाता था। वह नहाने के लिये कहे तो नंदन तुरन्त बाथरूम में पहुँच जाता, अन्यथा नहाने में सौ दिक्कतें पैदा करता। हैन्की से लेकर पानी की बॉटल तक इस तरह सम्हाले गये, गोया नंदन एक लंबी यात्रा पर जा रहा हो।

पुरुष ने उसे स्कूल पहुंचाया। बच्चे को भी इस नयी जगह के प्रति चाव था। वह हँसता हुआ 'बाय' करता, गेट के अंदर चला गया। पुरुष लौट आया और स्त्री को बहलाता रहा कि कोई विशेष बात नहीं, स्कूल ही तो है। खेलकूद, कहानी, पोयम्स में यूं ही समय कट जाता है। पर उसे भी लग रहा था कि कहीं नंदन रो न रहा हो, उसका ध्यान स्कूल वालों ने रखा होगा कि नहीं...? बच्चे ने कुछ खाया होगा या नहीं...?

छुट्टी होने के समय से काफी पहले ही, पुरुष स्कूल के गेट पर जा खड़ा हुआ था। घड़ी सुस्त हो गयी थी। बारिश के दिनों की धूप काट रही थी। बमुश्किल घंटी बजी, छुट्टी हुई। ऑटो, रिक्शे, मोटर-साइकिलों और साइकिलों पर लोग अपने बच्चों को लेने हाजिर हो गये। कुछ तो इतने लापरवाह थे कि छुट्टी होने के थोड़ी देर बाद ही पहुँच सके। पुरुष को ऐसे लोगों पर गुस्सा आया।

तभी नंदन की झलक दिखाई दी। पुरुष स्कूटर खड़ी कर उसी ओर लपका। स्कूल वाली आया ने देखा तो बच्चे को सिखाया- जब आपको लेने वाला कोई भी आये तो हाथ ऊपर उठाने का, क्या...?

नंदन ने गर्दन हिलायी और हाथ उठा दिया। नंदन हँसता हुआ दौड़ा और पुरुष की गोद में छपाक् से कूद गया। नंदन को चूमते हुए वह स्कूटर तक आया। रास्ते में पुरुष ने नंदन से सारी पूछताछ कर डाली- पानी पिया था..?. टिफिन खाया था...? किताबें बस्ते में रख ली थीं...? पानी की बॉटल कहाँ है? आदि-आदि। बच्चे को स्कूल में खूब मजा आया था। वहाँ खेल ही ज्यादा होते रहे। नये दोस्त बने। एक लड़की का नाम भी याद हो गया- तानिया। उस पर स्त्री और पुरुष आदिम-भाव से मुस्कुराये। स्त्री ने तानिया के बारे में बहुत सी बातें पूछीं। बच्चा रुचि के साथ बताता रहा।

तानिया, अशरफ और प्रेमिल के साथ नंदन की खास दोस्ती हो गयी थी। लंच-रीसिस में वे एक साथ लंच लेते। बतियाते और खाने की चीजें शेयर करते। नंदन ने तानिया से पूछा- तानिया, आपके पापा, आपको लेने नईं आते...?

- नईं... वे तो ऑफिस जाते हैं...।

- ऑफिस...? ऑफिस क्या होता है...?

- तानिया और बाकी दोस्त हँसे, प्रेमिल ने मजाक उड़ाया- अरे, इसे ऑफिस नहीं पता...!

नंदन अपनी अज्ञानता से सहम कर चुप हो गया, तब तानिया ने परांठे का टुकड़ा मुँह में रखते-रखते कहा- पापा जहाँ जॉब करते है न्..., वही ऑफिस होता है...मेरे पापा का ऑफिस खूब बड़ा है...।

नंदन पूछना चाहता था जॉब क्या होता है, पर अज्ञान के उसी डर से चुप रहा।

नंदन ने स्कूल से लौटने पर रास्ते में पुरुष से पूछा- पापा, जॉब क्या होता है...?

- जॉब माने काम...। सब लोग रुपये कमाने के लिये जॉब करते हैं...। उसी से खर्चे चलते हैं... । स्कूल की फीस देते हैं...।

- आप नहीं करते...?

- हम भी करते थे बेटा...हमने खूब काम किया। आपकी मम्मी ने भी जॉब किया...। अब रिटायर हो गये हैं...।

नंदन फिर मुश्किल में पड़ा।

- रिटायर माने क्या होता है, पापा...?

पुरुष हँसा। उसे बच्चे के सवालों के जवाब देना अच्छा लग रहा था- जब बहुत सालों तक जॉब करते रहते हैं, तो फिर सरकार रिटायर कर देती है कि आप ने बहुत सालों तक काम किया...मेहनत की, अब आराम कीजिए...हम आपको रिटायर करते हैं...।

नंदन खुश हुआ- आप रिटायर हैं...?

- हाँ।

- तो अब आपको रुपये नहीं मिलते...?

- मिलते हैं...। हमने खूब सारा रुपया कमा कर बैंक में जमा कर दिया है...। अब बस निकाल कर खर्च करते रहते हैं...।

- आपके पास खूब सारे रुपये हैं...?

- हाँ।

- मैं परमिल को बताऊँगा...।

टुकड़ों-टुकड़ों में बच्चा अपने संसार से परिचित हो रहा था। रोज उसके सामने नये सवाल आ जाया करते। वह उनके उत्तर पाने के लिये आकुल हो जाता।

एक दिन उसने अपनी मां से पूछा- मम्मा, आपके और पापा के हेयर्स व्हाइट क्यों हैं?

- पहले ब्लैक ही थे बेटा, पर अब व्हाइट हो गये...।

- मेरे फ्रेंड्स के मम्मी-पापा के हेयर्स तो ब्लैक हैं...।

- जिनके हेयर्स अभी ब्लैक हैं, उनके भी बाद में व्हाइट ही हो जाएंगे...।

- मेरे फ्रेण्ड्स मुझे चिढ़ाते हैं...।

- क्या कहते हैं...?

- 'योर पापा इज ओल्ड मेन'...।

बच्चा उदास होकर सोफे पर लेट गया- मुझे अच्छा नहीं लगता...।

बच्चे की उदासी ने स्त्री को दुखी कर दिया। उसने उसे समझाने की बहुत कोशिशें कीं, पर बच्चा उदासी से बाहर न आ सका। स्त्री समझ न सकी कि इसमें इतनी दुखद बात क्या है?

स्त्री ने बाद में यह बात पुरुष को बतायी। पुरुष कुछ देर तक सोचते रहने के बाद बोला- देखो, नंदन को ऐसा नहीं लगना चाहिये कि उसके माता-पिता, दूसरे बच्चों के माता-पिता से अलग हैं। इससे उसमें हीन-भावना आयेगी...। कॉम्पलैक्स डेवलेप होगा...। वह अनमना होकर इंट्रोवर्ट हो जायेगा।

- पर इसमें इतना सीरियस क्या है?

- हमें उसकी आँखों से संसार देखना और समझना होगा...। उसकी दुनिया में जाना और उसके हिसाब से जीना पड़ेगा...। तभी वह खुलेगा,...।

-हाँ, उसे खुलना चाहिये...। दुनिया के रंगों के साथ ही उसे जीना आना चाहिये...।

- करेक्ट... यू आर जीनियस माई लव...।

- फिर...?

- फिर क्या..,.औरतों वाला एक उपाय ही इसका इलाज है...।

- व्हॉट डू यू मीन बाइ 'औरतों वाला'...?

- हेयर डॉय...।

- औरतों की तुलना में मेल पर्सन ही ज्यादा हेयर डॉय यूज करते हैं...समझे।

- जी समझे...। तो बाल काले करके हम लोग भी फिर से जवान हो जाएंगे...!

- नकली जवान...।

- पर मैं तो अपनी सफेदी में भी भरपूर जवां-मर्द हूं।

- मैंने तो कभी शक जा़हिर नहीं किया।

- वाह...! क्या बात कही है...?

पुरुष ने उसे कमर से पकड़कर ,गोद में उठाकर एक चक्कर खिला दिया। फिर जरा देर बाद पुरुष ने स्वर बदला- पर लोग क्या कहेंगे...? हँसेंगे, कि बुढ़ापे में बाल काले करा रहे हैं...। जवानी सूझ रही है...?

- हाँ... और कोई तितली रीझ भी तो सकती है...। स्त्री ने उसे छेड़ा।

- हां, वो कला तो हमें आती है...। दस तितलियों को एक साथ रिझा सकता हूँ..., क्या समझीं...?

स्त्री ने मजाक त्याग कर ताना कसा- अरे सुनो मियां, एक हम ही हैं जो अब तक निभाये जा रहे हैं...। पर अब कोई घास तक न डालेगा..,.समझे...?

- जब इतना शानदार खेत ही हमारे सामने है, तो फिर 'घास' की तरफ देखेगा ही कौन...?

- हाँ, अब आये रास्ते पर...।

- हम तो शुरू से ही रास्ते पर हैं, मैडम...। आप ही हम पर आजकल नज़रे-इनायत नहीं करतीं...।

दूसरे दिन वह नंदन को स्कूल छोड़ता हुआ सैलून चला गया। सैलून के बाहर गाड़ी खड़ी की। फिर गाड़ी के पास ठिठका हुआ सा खड़ा रहा। सैलून के उस बोर्ड को घ्यान से पढ़ा, जिसे पहले भी कई बार वह पढ़ चुका था। उसने इधर-उधर इस तरह देखा, जैसे कि वह चोरी करने के लिये किसी घर में घुसने ही वाला है। सैलून की तरफ बढ़ने की कोशिश की, किंतु पैर उठे ही नहीं। खड़ा-खड़ा सोचता रहा। कान खुजलाये, मूंछें संवारीं। बालों पर हाथ फेरा। हिम्मत दगा दे रही थी। उसने इरादा छोड़ दिया। स्कूटर को स्टेंड से उतारा। सैलून पर नज़र डाली। सीट पर बैठा। किक पर पैर रखा। सैलून को देखा। वहां बैठे हुए लोगों को निहारा। मन ने सहारा दिया, आज बहुत भीड़ है, फिर किसी दिन देखा जायेगा। किक पर पैर का दबाव लगाया। स्टार्ट नहीं हुई। एक, दो, तीन। स्कूटर ने नोटिस ही नहीं लिया।

सैलून। स्कूटर। नंदन। 'योर पापा इज ओल्ड मेन'...।

उसने स्कूटर के मिरर में अपने सफेद बालों की तफ्तीस की। ताकत बटोरी। अपने से कहा, बेटे के लिये करना पड़ेगा। करना ही पड़ेगा। स्कूटर से उतरा। उसे स्टेंड किया। पेंट ऊपर सरकायी। कदम सैलून की तरफ बढ़ाये। शीशे का दरवाज़ा खोला। प्रविष्ठ हुआ।

खाली सोफा देखा। बैठ गया। समय काटने और असल घड़ी के आने पर अपने को तैयार रखने के लिये, उसने फिल्मी मैग़जीन के पन्ने उलटाने शुरु कर दिये। अभिनेताओं के काले बालों से उसे ईर्ष्या हुई।

उसकी बारी आने पर कटिंग ब्वाय ने कहा- आईये सर...।

वह सीट पर जाकर बैठ गया।

- कटिंग सर...?

- हां।

लड़के ने गले पर एक कपड़ा बांध दिया। कपड़े से एक गंध उठी और उसके नथुनों में भर गयी। सिर पर पानी स्प्रे किया गया। उसने सोचा कि डाइ करने के बारे में भी बता दे। मन ने कहा, कटिंग के बाद बता देना।

कटिंग के बाद पूछा गया- सेव्ह करनी है सर...?

- हां।

सेव्हिंग होने लगी।

- और सुनो...!

- जी सर...।

- ...अच्छा बाद में बताते हैं।

- ओके सर...।

सेव्ह के बाद सवाल- आप कुछ कह रहे थे सर...!

- हां, वो...।

- डाय करना है सर...?

- आं,...हां, पर तुम कैसे जान गये...?

लड़का मुस्कुराया और चुप रहा। वे भी। चुप्पी में ही सारे सवाल-जवाब थे। पुरुष ने सामने के बड़े आइैने में कनखियों से देखा। लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उनके प्रति किसी में कोई उत्सुकता न थी। एक नौजवान तो अपने पसंद का हेयर डाय लेकर इंतज़ार में था।

लड़के ने उनके बालों की चंपी की। डाय तैयार किया। ब्रश से बालों पर लपेटना शुरु किया। पूरे बाल लिथड़ गये।

सैलून के आईने में एक भिन्न व्यक्ति अवतरित हो गया। बीस साल कम उम्र वाला। पुरुष ने कई कोणों से अपने सिर का मुआयना किया। अपने में विश्वास भरने की खातिर, सेलून-ब्वॉय से मजाक किया- यंग दिख रहा हूँ, ना...? कुछ गड़बड़ तो नहीं लगती...।

वह भी कोई कम प्रोफेशनल न था, उसने प्रशंसा में कहा- गड़बड़ तो पहले थी, सर... अब तो आप स्मार्ट दिखने लगे हैं...।

- हूँ...?

- यस सर...।

- थैंक्यू...।

पुरुष ने उसे रेट की तुलना में दस रुपये ज्यादा दिये। पर सैलून से बाहर आते ही फिर पहले वाली परेशानी ने उसे घेर लिया। उसके मन में अजीब सी झिझक पैदा हुई। उसे लगा, सब उसी को देख रहे हैं। उस पर हंस रहे हैं। फिर उसने अपने को सम्हाला और दूनिया को ठेंगे पर रखने के भाव से सिर तानकर चला। अब उसे किसी की परवाह नहीं थी। तुरंत ही उसके सामने एक नया क्षण आकर खड़ा हो गया था। अब उसके अंदर की झिझक गायब हो चूकी थी। उसके अंदर पहुंचकर, अपना ठिकाना बना चुकी दृढ़ता ने उससे कहा- जब सभी लोग बाल काले कराये फिर रहे हैं, श्वेतकेशी सिर गायब हो गये हैं,

तो एक उसी ने कौन सा अजूबा कर डाला है?

उसने स्त्री के लिये भी हेयर डॉय खरीद लिया।

छृट्टी होने पर जब नंदन स्कूल से बाहर आया, तो उसने परिचित स्कूटर पर एक अपरिचित व्यक्ति को देखा। लेकिन दूसरे ही पल वह पहचान भी गया और अपने पापा की चिर-परिचित मुस्कान पकड़कर दौड़ा चला आया।

- अरे पापा..., आपके भी हेयर ब्लैक हो गये?

- हाँ, बेटा।

- कैसे हो गये?

पुरुष हँसा- जादू से...।

बच्चा किलका - हेईई...।

बाहर से प्रसन्न दिखते पुरुष के अंदर हिचक के नये हिचकोलों ने जगह बनाने की एक और कोशिश की। अपने काले बालों को लेकर एक असहजता उस पर फिर तारी थी। कोई पहचान ले तो क्या कहेगा ? उसने डिकी से निकालकर 'पी' कैप लगा ली। वह बार-बार, अपने मन के तालाब में, इस पार से उस पार और उस पार से इस पार फिंक रहा था।

नंदन ने यूकेजी कक्षा पंचानवे प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण करके अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़ दिये। नंदन के लिये उपहार लाये गये। 'आश्रय' के सेक्रेटरी महोदय कलर-बॉक्स का एक खूबसूरत सैट लेकर आये।

स्त्री ने दाद पाने के उद्देश्य से कहा- हमें उम्मीद न थी कि इतने अच्छे मार्क्स लायेगा...।

- लेकिन हमें तो थी। सेक्रेटरी ने मुस्कुरा कर कहा।

- अच्छा...? पुरुष ने अचरज किया।

- हाँ, आखिर बेटा आपका है...!

वे दोनों आंतरिक-गौरव से निहाल हो गये।

बदले में स्त्री ने पूछा- आपके बच्चे क्या करते हैं...?

- हमारे बच्चे...? हमारे बच्चों की न पूछिये...! कोई पालने में झूल रहा है, कोई नर्सरी में है और कोई फर्स्ट स्टेंडर्ड में...। हम तो अपना स्कूल 'आश्रय' में ही चलाते हैं...। नहीं तो बच्चों को जनरल स्कूलों में बहुत सी दिक्कतें आती हैं...। मानसिक दिक्कतें...।

स्त्री ने अपने को सुधार कर कहा- मैं 'आश्रय' वाले नहीं..., आपके अपने बच्चों के बारे में पूछ रही थी...।

सेक्रेटरी साहब पल भर चुप रहे, फिर गंभीर होकर बोले- वे ही मेरे बच्चे हैं...। असल में हमें कोई औलाद नहीं है मैडम...। बेगम को अंदरूनी परेशानी है...। डॉक्टरों ने कहा कि अगर बेगम मां बनना चाहेंगी, तो उनकी जिंदगी खतरे में पड़ जायेगी...। इसलिये हमने बेऔलाद रहने का फैसला किया है...। अब 'आश्रय' के बच्चों में ही हमें अपने बच्चों की सूरतें नज़र आने लगी हैं...। बेगम भी ईद-बकरीद, शबे-बारात...सारे त्यौहार इन्हीं बच्चों के साथ मनाती हैं...। वे ही हमारी दुनिया हैं...। हमारे बच्चे, आपके बच्चे...ये भेद तो हमने पैदा कर लिये हैं, वरना तो सब बच्चे ही हैं...,खुदा के बाग़ीचे के फूल...।

स्त्री आहत हुई कि उसने ऐसा बेकार सा सवाल पूछकर सेक्रेटरी साहब को दुखी कर दिया। पुरुष को भी धक्का लगा। उसने बात सुधारने की गरज से कहा- आप दोनों कितने महान् हैं...! अपने निजी-प्यार को फैलाकर आप लोगों ने उसे इतना ग्रेट बना दिया...।

- नहीं-नहीं हम महान-वहान कुछ नहीं हैं। इंसान हैं और अपने दुखों को, खुशियों में बदलने के तरीके सीखकर, दुनिया और दुनियावाले को जानने की कोशिश कर रहे हैं...। असल में हमें क्या लगता है कि...औलाद के गम में घुटते रहना, जिंदगी को बेइज्जत करने के समान है। वैसा जीना तो मरने से भी बदतर है। उससे ज्यादा बड़ी जिंदगी ये है...। इसमें एक मकसद है...। जिंदगी का मतलब है...। अपने लिये तो सभी जीते हैं...औरों के लिये जीने में जो एक रूहानी-सुकून है...,उसका कोई जवाब नहीं है...। वह जरा अलग ही चीज है...उसे शायद बयां नहीं किया जा सकता...। वह तो महसूस करने की चीज है। बस इसीलिये। यही हमारी इबादत है...और यही हमारी ईदगाह भी है...। बेगम का हमें इसमें बड़ा सपोर्ट है...। खुदा उन जैसा नेक सबको बनाये...। यूनिवर्सिटी-लायब्रेरी से आकर, आश्रय में ही रहते हैं...। वहां भी बस किताबें ही पढ़ते रहते हैं। किताबें आदमियों से कहीं ज्यादा बेहतर और भली होती हैं। दिल नहीं दुखातीं। सहारा ही देती हैं। रोना-हँसना उन्हीं के साथ। वहां आंसू हैं तो दामन भी है। लोग तो न जाने क्या-क्या समझते हैं...? कोई्र हमें फरिश्ता कहता है, तो कोई चोर...। कोई मुफ्तखोर। निराली दुनिया, निराले लोग। खुदा तेरी दुनिया, खुदा तेरे लोग...।

कहते-कहते उनकी आवाज नम हो गयी । वे एकाएक चुप हो गये। उनकी भावनाएं जानकर ये दोनों, एक तरफ उनके प्रति श्रद्धावनत थे, तो दूसरी तरफ थोड़ा शर्मिंदा भी, कि उन्होंने सेक्रेटरी साहब के दिल के घावों को कुरेद दिया। उन्हें चुप देखकर सेक्रेटरी साहब ने हँसते हुए कहा- अरे भाई, आप लोग इस तरह खामोश क्यों हो गये...? क्या हमें चाय-वाय नहीं पिलाइयेगा...?

स्त्री जी हाँ-जी हाँ करती हुई अंदर भागी। वे दोनों उस हड़बड़ी को लक्ष्य कर हँसने लगे।

- आप नंदन की बर्थ-डे पार्टी में, बेगम साहिबा को लेकर नहीं आये थे...?

- हां, उस वक़्त उनकी तबीयत नासाद थी...।

- अब किसी दिन ज़रूर लाईयेगा...।

- हाँ। वो भी आना चाहती हैं...। उन्हें आप लोगों के बारे में पता है। मैं आप लोगों का जिक्र घर में अक्सर करता रहता हूँ...।

चाय पीकर और नंदन को दुआएं देकर सक्रेटरी साहब चले गये।

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स्टेंडर्ड फर्स्ट में नंदन के दोस्तों में और भी इजाफा हो गया। वह एडाप्टेड-चाइल्ड है और कक्षा में अच्छी पोजीशन लाता है, इसलिये उसकी क्लास-टीचर मैडम और प्रिंसपल मैडम नंदन को खासतौर पर पहचानने लगी थीं। नंदन एक बातूनी और प्यारा बच्चा था। क्लास-टीचर मैडम स्वभाव से ही बच्चों को प्यार करने वाली और उनकी सहयोगी बनकर शिक्षा देने पर विश्वास करने वाली युवा स्त्री थीं। फिलहाल अविवाहित थीं और बच्चों के बीच सबसे लोकप्रिय 'मिस' । एनुअल डे के कार्यक्रम के लिये उन्होंने स्कूल में एक नाटक, फैंसी ड्रेस काम्पीटीशन और कुछ प्रहसन तैयार कराये थे। स्वतंत्रता पर आधारित नाटक में शहीद भगतसिंह के पात्र के लिये उन्होंने नंदन का चुनाव किया था। रिहर्सल-रूम की दीवारों पर शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, गांधी जी के चित्र टांग दिये गये थे, ताकि बच्चे उन्हें आत्मसात् कर सकें और प्रभाव भी ग्रहण करें।

नंदन घर पर अभ्यास दुहराता। स्त्री और अम्मा उसके दर्शक होते। वह सिखाये गये जोश के साथ अपने संवाद बोलता- ''अन्याय और भेदभाव वाली सरकार मेरे देश में नहीं चल सकती...। उसे जाना ही होगा...। मेरा देश आजाद होकर रहेगा..। इंकलाब जिंदाबाद..!''

संवाद बोलने के बाद वह अपनी काल्पनिक-मूछें भी ऐंठता।

स्त्री नंदन को लेकर बरामदे में आयी। पुरुष हमेशा की तरह, सीस-पेंसिल लेकर शब्द-पहेली के प्रकोष्ठों को भरने में मशगूल था। स्त्री को देखते ही बोला- चांदी का पर्यायवाची शब्द तो बताओ।

- रजत।

- अरे वाह! लो भर गयी पहेली..। मैं तो इस पर न जाने कब से अटका हुआ था...।

- पहेली छोड़िये...और नंदन की एक्टिंग देखिये...। इनके स्कूल में ड्रामा होने वाला है...। नंदन बन रहे हैं शहीद भगतसिंह...।

पुरुष को विस्मय हुआ- एक्टिंग...? नंदन एक्टिंग कर रहे हैं...? अरे वाह..., दिखाओ भाई... हमें भी तो दिखाओ...। अरे हीरो तो हम भी बनना चाहते थे...मगर बंबई भागने की कभी हिम्मत ही नहीं हुई...। भाग जाते तो हीरो होते...। भागा सो आगा।

पुरुष ने सीस-पेंसिल किनारे रख दी। नंदन अकड़कर खड़ा हुआ, संवाद दोहराया। स्टेपिंग ली और आखिर में अपनी काल्पनिक मूछें उमेठकर दिखायीं। पुरुष ने आह्लाद से भरकर उसे गोद में उठाया और गालों को चूम लिया, फिर अपनी मूछें उमेठीं- मूछें ऐसे उमेठी जाती हैं बच्चे, समझे...।

- पापा... आपकी मूछें कितनी अच्छी हैं... शहीद भगतसिंह जैसी...। प्रफुल्ल और तानिया के पापा की तो मूछें ही नहीं हैं...।

पुरुष ने नाटकीयता से जवाब दिया- मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं...हा... हा... हा...।

नंदन अगले दिन स्कूल जाने तैयार हुआ तो स्त्री टिफिन लेकर पीछे-पीछे भागी आयी और पुरुष से शिकायत की- देखिये न्, नंदन टिफिन नहीं ले जा रहा है...।

- अरे क्यों...? टिफिन रखो बेटे..., भूख नहीं लगेगी क्या...?

वह रूठकर बोला- मुझे नईं ले जाना टिफिन-विफिन...।

- क्यों...?

- मम्मी टिफिन में रोज परांठा रख देती हैं...। कभी नूडल्स् या पिज्जा नहीं रखतीं...। मेरे फ्रेण्डस् चिढ़ाते हैं...। परांठा-ब्वाय कहते हैं...।

दोनों चकित रह गये- नूडल्स्-पिज्जा...?

फिर कहा- अच्छा आज रख लो... कल से नूडल्स्-पिज्जा ले जाना।

बच्चा खिल उठा- सच्ची पापा...?

- हां बेटे...।

उसने मां की तरफ देखकर, उछलते हुए कहा- माय पापा इज ग्रेट...!

पुरुष बच्चे को स्कूल छोड़कर लौटा तो नूडल्स का पैकेट भी लेता आया।

- लो ये है नूडल्स्...।

- मुझे तो नूडल्स् बनाना नहीं आता...।

- तो क्या हुआ...? इसमें क्या मुश्किल है...? इस पैकेट में बनाने की विधि लिखी है...। चलो किचन में...। मिलकर बनाते हैं...।

वे दोनों पैकेट पर लिखी हुई विधि को पढ़-पढ़कर, नूडल्स् बनाने के प्रयोग में ऐसे जुट गये, जैसे कुकरी के विद्यार्थी हों।

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नंदन स्टेंडर्ड टू में पहुँचा। पुरुष को उच्च रक्तचाप की शिकायत हुई। डॉक्टर ने सावधानी बरतने को कहा। बताया इससे पैरालीसिस का खतरा रहता है, अटैक भी आ सकता है। शांत रहा करें। आराम करें। तनाव-मुक्त रहें। वैसे चिंता की कोई बात नहीं, साठ-पैंसठ साल के बाद इस तरह की परेशानियाँ आ ही जाती हैं। सुबह नाश्ते के बाद एम्लोप्रेस टेबलेट रोज खाया करें।

चिंता मुक्ति की सलाह ने चिंताग्रस्त बना दिया। बेटे की खुशियों में वह अपना स्वास्थ्य, उम्र और जिंदगी को भुलाये हुआ था। उस दिन उसने शब्द-पहेली वाला समय स्त्री के साथ विचार-विमर्श करने में खर्च किया।

- उम्र अड़सठ साल हो रही है... ऊपर से हाई-ब्लडप्रेशर...। कहीं कुछ हो गया तो...?

स्त्री ने वर्जना की- कुछ नहीं होगा...। ऐसी बीमारियां अब कॉमन हो चुकी हैं...। सबका इलाज है...। फालतू बातें मत किया करो।

पुरुष ने कहीं शून्य में देखते हुए कहा- आज समझ में आ रहा है...।

- क्या समझ में आ रहा है...?

- यही, कि उस समय सेक्रेटरी साहब बच्चा देने में क्यों झिझक रहे थे?

स्त्री ने गुनहगार की तरह सिर झुका लिया।

- नंदन को पढ़ाई पूरी करने में अभी पंद्रह-सोलह साल और लगेंगे...।

- हूँ...।

- तब तक हम लोगों की उम्र हो जायेगी अस्सी-बयासी...।

- हूँ...।

- फिर... इतना भी कौन जीता है...?

स्त्री खामोश रही।

- उल्टे नंदन को ही हमारी देखभाल में लगना पड़ेगा...।

- कुछ भी हो, उसकी पढ़ाई बीच में नहीं छूटना चाहिये...।

- यही चिंता मुझे भी है...।

- यदि हमें बीच में ही कुछ हो गया तो...?

पुरुष ने नाराजगी दिखायी- अशुभ क्यों सोचती हो...?

- अशुभ नहीं, भविष्य के बारे में सोचती हूँ...। वह चाहे जितना भी अशुभ हो, पर बच्चे के हित में हमें सोचना ही होगा...।

पुरुष चुप हो गया।

स्त्री ने कहा- सेक्रेटरी साहब कितने दूरदर्शी हैं...। वे बहुत आगे की बात सोच रहे थे, जबकि हमें केवल बच्चा दिख रहा था...।

- उल्टे हम उन पर शक कर रहे थे...। अगर वैसा हो गया, तो हमारे नंदन का क्या होगा...? उसके फ्यूचर का क्या होगा...? तुम्हारा क्या होगा...?

- मेरी चिंता क्यों करते हो...? मैं तो तुम्हारे सामने ही चल दूँगी।

वह हँसी।

- हँसी मत करो... सीरियसली सोचो...।

- मैं सीरियस हूँ...।

- मान लो मुझे पैरालीसिस ही हो गया...! हाथ-पैर जवाब दे गये...तो हम तो नंदन पर बोझ हो जाएंगे...। वह मासूम बच्चा क्या करेगा...? उसका रास्ता बंद हो जायेगा...। ओह, कैसा अंधकार ही अंधकार है...? कुछ भी समझ में नहीं आता।

पुरुष की कनपटियों में चिलकन हुई। उसने हथेली से अपना माथा पकड़ लिया।

स्त्री ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा- हताश मत होओ। रास्ता खोजो...। रास्ते होते हैं, सिर्फ उन्हें खोजना पड़ता है...। जो खोजना चाहता है, उसे ही वह मिलता भी है।

पुरुष गर्दन लटकाये खामोश सुनता रहा।

- अच्छा, एक बात कहें...? स्त्री ने पूछा।

पुरुष ने गर्दन उठायी।

- आप सेक्रेटरी साहब से सलाह करें...। वही कोई रास्ता बता सकते हैं...!

- तुम कहती तो ठीक हो, मगर उनके पास किस मुंह ये जाएं...? संकोच होता है, वे कहेंगे, यह सब तो पहले सोचना था। पहले क्यों नहीं सोचा...?

- नहीं, वे यह सब नहीं कहेंगे...। वे भले और समझदार आदमी हैं। अनुभवी हैं। कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल देंगे...।...वैसे भी ब्लड-प्रेसर कोई बड़ी भारी बीमारी नहीं है...। आजकल सबको हो जाती है...। ज्यादा चिंता करने की कोई बात नहीं है...।

- पर अलार्म तो है ही... कि चेत जाओ बच्चू, वरना...।

- हां, तो चेतने से कौन मना कर रहा है...?

वे हँसने लगे। चिंता की सघनता फटने लगी।

संकोच, ग्लानि और असमंजस के साथ, अगली ही शाम पुरुष 'आश्रय' जा पहुँचा। हमेशा की तरह, उसके साथ 'आश्रय' के लिये एक डोनेशन-चैक था। बच्चों के लिये उपहार थे। स्कूटर की आवाज सुनकर श्याम भाई बरामदे में आये और मुस्कुराये। पास आकर पैकेट वगैरह पकड़ने में मदद की।

पुरुष ने आत्मीयता से पूछा- कैसे हो भाई...?

- अच्छा हूँ...। आप कैसे हैं, मैडम जी अच्छी हैं न्...? और हमारा नंदन क्या कर रहा है आजकल...?

- पार्टी के बाद कभी घर तो आप आये नहीं...। सब कुछ यहीं पूछ लेते हो...।

- क्या बताऊँ सर जी..., फुरसत ही नहीं मिलती...। आप तो जानते हैं, मैं न्यूज-पेपर और अगरबत्तियाँ बेचता हूँ...।

- हाँ-हाँ... तो, हमें भी अगरबत्तियाँ लगती हैं। न्यूज-पेपर हम भी पढ़ते हैं भाई, पढ़े-लिखे हैं...।

दोनों हँसने लगे।

- तो, कल से हाजिर हो जाएंगे...।

- यह हुई न बात। हम सब अच्छे ही हैं, श्याम भाई...। नंदन तो अपने स्कूल का हीरो है... नाटक, स्पोर्ट्स, पढ़ाई सब में नाम कमा रहा है...।

श्याम भाई खुश हो गये- ईश्वर उसे रोज ऐसी ही तरक्की दे...। आईये...अंदर आईये। सेक्रेटरी साहब भी आते ही होंगे...।

वे अंदर गये। पैकेट सेक्रेटरी साहब की मेज पर रखे और अंदर वाले साथियों से मिलने पहुँच गये- विमला बहन नमस्ते...। गन्नू भाई राम-राम...। फिरोज बाबू सलाम...। अरे एक पालना और बढ़ गया...! और मिंटू बेटे..., क्या हालचाल हैं...? मुनिया तू क्या सिल रही है...?

सब अपने-अपने किस्से सुनाने लगे। गन्नू भाई मिठाई ले आये- सर मिठाई खाओ...।

- मिठाई...किस बात की...?

- कल मुनिया का बर्थ-डे मनाया था हम लोगों ने..., उसी की है...।

- अरे वाह... हैप्पी बर्थ डे मुनिया...।

- थैंक्यू अंकल...।

बाहर आहट हुई। श्याम भाई बोले- शायद सेक्रेटरी साहब आ गये...।

पुरुष की मुस्कान गायब हो गयी। वे बिना उत्साह चल कर सेक्रेटरी साहब के कमरे तक आये। सेक्रेटरी देखकर मुस्कुराये, कहा- अरे वाह! मैं आपके बारे में ही सोच रहा था कि आज मुलाकात करनी है...।

- और मैं खुद मुलाकात करने आ गया।

सेक्रेटरी चौंके- इतने उदास क्यों हैं...? क्या कोई जेल-मुलाकात के लिये आये हैं...?

सब हँसने लगे। इस मजाक ने माहौल को खुशगवार बना दिया। पुरुष की निगाह ऊपर शहतीर पर गयी। वह सूनी थी। उस पर कबूतर न थे।

उन्होंने पूछा- अरे कबूतर कहाँ गये...?

- उड़ गये...। यह तो रैन-बसेरा है...। चंद दिनों का ठिकाना...। सब अपनी-अपनी मंजिल की ओर निकल ही जाते हैं...। रह जाते हैं हम और श्याम भाई और हमारे साथी...। पर, सब एक नयी दुनिया में जाते हैं..., एक नयी जिंदगी बसर करने..। उनका जाना दुखदायी तो होता है, पर मन को सुकून भी मिलता है...। और सब कुशल-मंगल तो है न्...?

- जी हाँ... आपकी दुआ है।

फिर पुरुष ने, धीरे-धीरे मुख्य विषय पर उतरते हुए सारी बातें बतायीं। सेक्रेटरी साहब ने न तो ताना दिया, न उपहास किया और न ही याद दिलाया कि देखिये हम तो पहले ही कह रहे थे, आपने ही तब इस पर कुछ नहीं सोचा।

वे बोले- चिंता की कोई बात नहीं है..., जिंदगी में सब तरह के हालात आते हैं...। हमें उन सब का सामना करना चाहिये...। अच्छे-बुरे हालात आते हैं, तो वहीं से नये रास्ते भी पैदा होते हैं...।

फिर उन्होंने सब बातों पर गौर किया और अपने सुझाव दिये। दो घंटे की लंबी बैठक के बाद जब पुरुष 'आश्रय' से बाहर निकला, तो बेचैनी की जगह इत्मीनान था और परिस्थितियों को उलट देने का खास हौसला भी।

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पुरुष घर पहुँचा तो नंदन जूते-मौजे पहनकर बरामदे में तैयार खड़े थे। पुरुष ने पूछा- क्या बात है नंदन जी... कहीं जा रहे हैं क्या...?

- अरे पापा..., आप भूल गये...?

- क्या...?

- आपने आज चाट खिलाने का प्रॉमिस किया था...।

पुरुष ने माथा ठोका- ओह... सॉरी बेटा..., मैं तो भूल ही गया था...। अभी चलते हैं...।

पुरुष ने स्त्री को सूत्र रूप में बताया कि मुलाकात हो गयी है और सलाह-मशवरा भी हो गया। मैं मुँह-हाथ धो लूँ, तब तक तुम भी तैयार हो जाओ।

- मैं क्या करूंगी...? आप दोनों बाप-बेटे ही चाट खा आओ...। मेरे सिर में दर्द है...। मैं डिस्प्रिन लेकर लेटूँगी...।

- अरे..., बताया क्यों नहीं...? चाट कल खा आएंगे...।

- ऐसी बात नहीं हैं... मेरा मन नहीं है...। आप नंदन को लेकर चले जाईये...। वह बहुत देर से आपका रास्ता देख रहा है...।

- ओ के...।

पुरुष तैयार होकर आया, नंदन उछलकर साथ हो गया। पुरुष ने स्कूटर निकाला। किक् लगायी...एक...दो...तीन...पर स्कूटर पर कोई असर नहीं हुआ, चार...पाँच...छह...पुरुष हाँफने लगा।

नंदन ने कहा- पापा, आप बाइक ले लीजिये...!

- क्यों..., स्कूटर तो है अपने पास...।

- पुरानी हो चुकी है और यह तो लेडीज-सवारी है पापा...। जेन्ट्स-सवारी तो बाइक है...। सबके पापा बाइक ही चलाते हैं...।

- अच्छा... ये लेडीज सवारी है...? सुन लो जरा, नंदन क्या कह रहे है...?

- हाँ...पापा, सब लड़के स्कूटर को लेडीज-सवारी ही कहते हैं...।

बीसवीं किक् के साथ स्कूटर स्टार्ट हो गया।

- लो हो गया, अब चलें...?

- पापा, बाइक ले लो न्...।

- बाद में देखेंगे...। अभी तो चलो...।

न्ंदन मुंह बनाते हुए बैठ गया। स्कूटर ने खड़-खड़ की आवाज की। कुछ हिचकोले खाये ओर चल पड़ा।

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पुरुष ने कुछ दिनों तक 'शब्द-पहेली' के खब्त को विश्राम दे दिया। वह नंदन के भविष्य के लिये बढ़ियाँ से बढ़ियाँ आर्थिक-नियोजन करने में जुटा रहा। उसने नंदन की पढ़ाई-लिखाई के लिये तथा अचानक आ जाने वाले खर्चों के लिये धन की अलग-अलग व्यवस्थाएं कीं। बैंक, फिक्स-डिपॉजिट और इंश्योरेंस कंपनी उसकी मददगार बनी। कुछ रकम इस तरह डिपॉजिट कर दी गयी, कि नंदन को हर तीसरे साल, परिपक्व होकर एक बड़ी रकम मिलती रहे। पोस्ट-ऑफिस से मिलने वाले मासिक-ब्याज और इंश्योरेंस-पॉलिसियों में नंदन को नामित कर दिया गया। मकान का उत्तराधिकार भी तय हो गया। बचा रह गया सिर्फ वसीयतनामा। सेक्रेटरी साहब ने एक ऐसे वसीयतनामे की सलाह दी थी, जो नंदन के अवयस्क-काल में, उसके लिये एक सहयोगी-भूमिका अदा कर सके।

स्त्री ने सुझाव दिया- ऐसे लोगों को नंदन की जिम्मेदारी देकर उनके नाम वसीयतनामे में डाले जाएं, जो भविष्य में उसकी मदद, जिम्मेदारी के साथ कर सकें।

- हाँ, ये ठीक है, मगर वे कौन लोग होंगे...? रिश्तेदारों का रवैया तो तुम्हें पता ही है, हमने जबसे नंदन को एडॉप्ट किया है...,सब नाराज ही चल रहे हैं...।

- नाराज नहीं, ईर्ष्या-जलन में चल रहे हैं। उनकी निगाह तो हमारे धन पर है...।

- ईर्ष्यालु लोग क्या नंदन की मदद करेंगे...?

- उल्टा ही करेंगे...।

- तब...?

- तब...!

यह तब कई दिनों तक उन्हें परेशान करता रहा।

एक दिन स्त्री ने ही कहा- वसीयत लागू कराने के लिये जिन लोगों के नाम डाले जाने हैं, उनमें एक तो अपने सेक्रेटरी साहब ही हो सकते हैं...।

- हां, उनका नाम तो मैं तय कर ही चुका हूँ...। उनका और श्याम बाबू का...। पर ये दोनों भी तो बुजुर्ग ही हैं न्...।

- फिर...?

पुरुष के मन में कोई बात कौंधी- ऐसा करते हैं कि नंदन से ही पूछते हैं कि उसे सबसे प्यारे कौन लगते हैं...।

स्त्री मुस्कुरायी- पूछ लो...।

नंदन को बुलाकर जब पूछा गया तो उसने तपाक से कहा- मम्मी-पापा...!

वे दोनों वात्सल्यजनित आवेग से भर गये।

- और...?

- और... अम्मा...।

अम्मा माने आया।

पुरुष ने स्त्री से कहा- अरे 'अम्मा' का ध्यान तो हमें आया ही नहीं...।

- और...?

- और तानिया...।

- तानिया ? वे मुस्कुराये।

- हाँ।

- और... तानिया की मम्मी..., वे मुझे पिज्जा खिलाती हैं...।

- और...?

- और क्लास-टीचर मैम...। वे मुझे 'वेरी गुड' देती हैं न्...।

- अरे वाह...! और...?

- और...! और...! प्रिंसपल मैम...। वो हैं न, हमेशा हँसती रहती हैं और 'माई चाल्ड' कहती हैं...।

- अच्छा...।

- हाँ। चाइल्ड मीन्स्- बेटा...।

- और...?

- और...? और कोई नईं...।

नंदन के बताये नामों के बारे में सेक्रेटरी साहब से चर्चा की गयी। प्रिंसिपाल मैम, क्लास टीचर मैम, तानिया की मम्मी और अम्मा अर्थात् आया का नाम वसीयत में शामिल किये गये। सेक्रेटरी साहब और पुरुष ने उन सभी से बात की और सहमतियां हासिल कर लीं। वसीयतनामा बनवाने में वकील की सहायता ली गयी, और उसे रजिस्टर भी करा लिया गया। उसमें जिनके नाम डाले गये थे, उन सबके पास वसीयत की एक-एक प्रति रखवा दी गयी। मूल प्रति सेक्रेटरी साहब के पास रखवायी गयी।

सब हो जाने पर पुरुष ने खुश होकर स्त्री को बताया- अब कोई चिंता नहीं...। सारी व्यवस्था ठीक-ठीक हो गयी। कहीं कोई कमी नहीं...। हंड्रेड परसेंट परफेक्ट...। नो डाऊट एनीव्हेयर...। अब मैं चैन से मर सकता हूं।

स्त्री ने नाराज होकर कहा- क्या यह सब हमने मरने के लिये किया है...?

-नहीं, नंदन के लिये...।

-तो बेकार की बातें क्यों करते हैं...?

- अच्छा बाबा, नहीं करेंगे...।अब हम चैन से जी सकते हैं...।

- ये हुई न बात...।

पुरुष आज उतना ही खुश था, जितना वह अक्सर शब्द-पहेली भरने के बाद हुआ करता है।

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नंदन के स्टेंडर्ड टू का रिजल्ट भी उम्दा रहा। पुरुष ने बाइक की खरीदी टालते-टालते पूरा साल निकाल दिया था, अब और टालने की कोशिश नंदन को दुख देगी; यह सोचकर पुरुष ने रिजल्ट के तोहफे के रूप में बाईक घर ले आने का इरादा बनाया। स्कूटर भी ज्यादा तंग करने लगा था। पच्चीसों किक् लगतीं तब स्टार्ट होता और एक्सीलेटर कम करते ही बंद हो जाता। 'स्कूटर लाओ-बाईक ले जाओ' योजना में स्कूटर के तीन हजार रुपये मिले और पोस्ट-डेटेड चैक्स देकर बाईक मिल गयी। यों सात-आठ सौ रुपये महीने का नया खर्च आ गया। नंदन ने उछल-उछल कर और तालियाँ बजा-बजा कर बाईक का स्वागत किया। वह बाईक पर सवार हो गया और मुँह से कृत्रिम आवाज निकाल कर काल्पनिक-यात्राएं करता रहा। स्त्री ने बाईक की पूजा की। प्रसाद चढ़ाया। नंदन बाईक पर ही बैठा रहा। वे दोनों भी उसकी खुशी का आनंद लेते रहे और अपार संतोष का अनुभव करते रहे। दो घंटे बाद नंदन बाइक से नीचे उतरा।

उसने कहा- पापा! एक बात कहें...।

- हाँ, कहो बेटा...।

- जब आप जीन्स पहनकर बाईक चलायेंगे न् तो जॉन अबराहम लगेंगे...।

- अच्छा...! जॉन इब्राहीम...? पुरुष ने नंदन को खुश करने लिये बड़ा अचरज किया।

- इब्राहीम नहीं पापा...अबराहम...।

- ये कौन है भाई, तुम्हारा कोई दोस्त है क्या...?

- हीरो है पापा...। स्मॉर्ट्र एंड माचो...।

- माचो...?

- अब माचो का मीनिंग आप डिक्शनरी में देख लेना न पापा...।

- तो वो एक्टर है...?

- हां...। हीरो द ग्रेट...।

पुरुष ने उसे चिढ़ाने के लिये कहा- काहे का हीरो...सुना है बाइक से गिर गया था...। हाथ-पैर तुड़ा बैठा...। महीना भर हॉस्पिटल में रहा...।

- अरे, आपको पता है...? नंदन को आश्चर्य हुआ।

पुरुष ने दिखावटी अभिमान से कहा- तो तुम क्या समझते हो...? पापा को सब पता रहता है...समझे।

- वाउ...माइ पापा इज ग्रेट...। पर आप जीन्स खरीद लो पापा...!

- चल...! क्या हम अब इस उम्र में जीन्स् पहनेंगे...?

- सब पहनते हैं...।

- ज़रुरी नहीं कि सब जो करें, वही मैं भी करुं...।

दिन पंख लगाकर उड़ते रहे। समय की घड़ी अपनी रफ्तार से चलती रही।

स्त्री एक दिन वायरल-फीवर से ग्रस्त हुई। चैक-अप कराने पर ज्ञात हुआ कि हीमोग्लोबिन घट कर पाँच प्रतिशत रह गया है।

रिपोर्ट देखकर पुरुष नाराज हुआ- तुम खुद के प्रति बहुत लापरवाह हो गयी हो। और तुम ही क्या हिंदुस्तान की सभी औरतें अपने लिये इतनी ही लापरवाह होती हैं। सबकी फिक्र करेंगी, बस खुद की नहीं करेंगी।

- जो सबकी फिक्र करता है, कोई तो ऐसा हो, जो उस अकेले की फिक्र करे...।

ज्वाब में पुरुष ने अनार, एपल, हैप्टोग्लोबिन टॉनिक, गुड़, टमाटर सब लाकर रख दिये, कहा- कम्पलीट बेड-रेस्ट...। उठना नहीं है... समझीं...?

- हाँ, समझ गयी। वह मुस्करायी।

- मुस्कुराने से काम न चलेगा। सचमुच रेस्ट करना है...। जानती हो न्, नंदन को तुम्हारी कितनी ज़रूरत है...।

- मुझसे ज्यादा तो आपकी है...।

- मैंने अपने हिस्से का सब काम कर दिया है...। अब जो बचा है, वह तुम्हारे हिस्से का है...।

स्त्री मुस्कुरायी- देखना, पहले मैं जाऊँगी...।

पुरुष का शरीर थरथरा गया, उसने कमजोर स्वर में कहा- सवाल यह नहीं है कि पहले कौन जायेगा...बल्कि हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिये, कि हम ज्यादा से ज्यादा देर से जाएं...ताकि नंदन को कोई तकलीफ न हो...। हमारे बिना वह क्या करेगा...? हम..., हम उसे दोबारा अनाथ कैसे बना सकते हैं...? हमने अपने-आप से यह वादा किया है कि हमें अपनी जिम्मेदारी भरपूर तरीके से निभानी है...। इस वादे को हमें मिलजुलकर पूरा करना ही है...। एक-दूसरे के बचे हुए कामों को अपने जिम्मे लेने की तैयारी सहित...।

-हां...। हमें अपने आप को बचाये रखना होगा...। ज्यादा से ज्यादा...।

- तो कहो कि फिर ऐसी बात नहीं करोगी...।

- नहीं करूंगी बाबा...।

- जल्दी ठीक होने के लिये मन से तैयार रहोगी...।

- प्रॉमिस...।

पुरुष ने स्त्री की देखभाल सम्हाल ली। फलों का जूस निकालता, दवा पिलाता और डोज कम न हो, इस बात पर खास ध्यान देता। स्त्री की जीभ और दाँत अनार-जूस से नीले हो गये थे। सुबह का नाश्ता पुरुष बनाता और खाना बनाने में अम्मा मदद करती। नंदन को नाश्ता पसंद न आता, परंतु मम्मी की बीमारी के कारण चुपचाप खा लेता। किसी बात की जिद न करता। पापा की हेल्प करने की कोशिश करता। दूध वाले से दूध लेता, न्यूज पेपर उठा लाता और कभी-कभी तो झाड़ू भी लगाने लगता।

हफ़्ते भर बाद फिर चेक-अप हुआ तो पता चला हीमोग्लोबिन का प्रतिशत रत्ती भर भी नहीं बढ़ा है। खून चढ़ाना ही एक मात्र विकल्प बचा था। पुरुष ख़ून चढ़ाये जाने के खिलाफ था, क्योंकि ख़ून की शुद्धता का सवाल था, पर अब, जबकि ख़ून चढ़ाना ज़रूरी हो गया था, वह इस विषय में थोड़ा नरम पड़ गया था। स्त्री को 'ओ पाजीटिव' ग्रुप का खून चाहिये था। पुरुष का ग्रुप था 'बी'। इधर-उधर तलाश की गयी। श्याम भाई अगरबत्तियाँ देने आते थे, उन्होंने कहा- मेरा भी 'बी' है, पर अपने सेक्रेटरी साहब का खून 'ओ' ग्रुप का है...उनका ले लीजिये...।

श्याम भाई ने सेक्रेटरी साहब को बता दिया था, उनका फोन आ गया था कि जब चाहे बुला लीजियेगा।

स्त्री को संकोच हुआ- उनका खून लेंगे...?

- क्यों...?

- नहीं, कुछ नहीं... ऐसेई...।

- ऐसेई क्या, वे मुस्लिम हैं...यही न्...!

स्त्री चुप रही।

- जब बेटा उनसे लिया है, तो फिर खून लेने में परहेज क्यों...?

- आप बात को कहाँ से कहाँ ले जा रहे हैं...मैंने तो यूं ही कहा...। वे इतने बुजुर्ग हो गये हैं, इसलिये...।

- ओ. के., अच्छा देखो आज तुम्हें हॉस्पिटलाइज होना होगा...। कल संडे है...नंदन की छुट्टी रहेगी, तो स्कूल की हबड़-दबड़ भी नहीं होगी। दोपहर बाद जब नंदन स्कूल से आ जायेगा, तब हम लोग हॉस्पिटल जाएंगे...।

स्त्री ने थकान से आँखें मूंद लीं। पुरुष स्त्री के पास ही थोड़ी देर तक खामोश बैठा रहा, फिर उठने लगा। स्त्री ने उसका हाथ पकड़ लिया- सुनो...

- हाँ, बोलो...।

स्त्री ने टकटकी लगाकर पुरुष का चेहरा देखा और फिर बड़ी तरलता के साथ पूछा- मैं ठीक तो हो जाऊँगी न्...?

पुरुष हँसने लगा, ढाढस बंधाने वाली हँसी- अरे यह भी कोई बीमारी है...? हिन्दुस्तान की सत्तर फीसद औरतों को हीमोग्लोबिन की कमी रहती है...। चिंता न करो, सब ठीक हो जायेगा...। बस, खून चढ़ा और तुम चंगी हुईं।

- नंदन को हम-दोनों की बहुत ज़रूरत है...।

- हाँ, यही तो मैं भी कह रहा हूँ...।

- और...?

- और क्या...?

- आपको तो मेरी और भी ज्यादा ज़रूरत है...।

पुरुष ने स्त्री के हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख दिया। आँखें सजल हो गयीं- इसीलिये मैडम आपको ब्लड चढ़ेगा...।

उसने स्त्री के हाथ को प्यार से थपथपाया।

बच्चों की छुट्टी होने में अभी वक़्त था, लेकिन पुरुष स्कूल के गेट के बाहर पहुँच गया था। उसने और उसके जैसे अन्य अभिभावकों ने अपने-अपने वाहनों को खड़ा करने के लिये, एक जगह निश्चित कर ली थी और वे प्रतिदिन वहीं रुकना तथा अपने-अपने बच्चों का इंतज़ार करना पसंद करने लगे थे। हालांकि हर बार वही जगह उन्हें मिले, यह मुमकिन नहीं होता था। कोई और भी वहाँ खड़ा रहकर इंतज़ार करता मिल जाता था, तब थोड़ा अटपटा तो लगता, परंतु चंद मिनटों के इंतज़ार की घड़ियां कहीं भी गुजारी जा सकती हैं, ऐसा सोच लेने पर बोझ उतर जाता था। स्कूल के सामने स्कूटर और बाईक ही ज्यादा होतीं। कभी-कभार एकाध कार भी दिख जाती।

सहज रहने की लगातार कोशिशों के बावजूद एक भीतरी असहजता उसे बेचैन बनाये हुए थी। सेक्रेटरी साहब को उसने पहले ही फोन कर दिया था कि वे हॉस्पिटल पहुँच जायें। नंदन को स्कूल से लेकर वह भी पहुँच जायेगा। यही बात पुरुष के दिमाग में लगातार भनभना रही थी। तन स्कूल में और मन कहीं और था।

छुट्टी की घंटी बजी। स्कूल का बड़ा-सा द्वार खुला। बच्चों की यूनिफार्म का रंगीन सैलाब खरामा-खरामा बाहर आया। स्कूल के अनुशासन की जद में बच्चे धीमे कदमों से चले और गेट पार करते ही आज़ादी ने उन्हें अपनी बाहों में लपक लिया। अपनी पीठ पर बस्ता लादे हुए वे, बेताबी की पीठ पर सवार होकर फुर्र हो जाने को तत्पर थे। यूनिफॉर्म के रंगों की एक झिलमिल-नदी के कलरव से भरे हुए बहाव में से निकलकर, नंदन कब उसके पास आकर खड़ा हो गया, पुरुष को यह पता ही न चला। वह कहीं और डूबा हुआ था। नदी के बहाव में आँखें डुबाकर भी, कहीं और जा चुका था।

नंदन ने पुकारा- पापा...!

बच्चे की पुकार सुनते ही पुरुष अपने आप में लौट आया- हाँ, बेटे...।

- चलिये पापा...मैं आ गया...।

पुरुष ने बाईक में बस्ता रखा। नंदन आगे सवार हुआ। बाईक स्टार्ट हुई। नंदन ने स्विच दबाया, हॉर्न बजा। बाईक चली। बाल उड़े और हवा का दबाव पलकों को ठेलने लगा।

- पापा, मम्मी की तबीयत कैसी है...?

- अच्छी है, बेटे...।

- आपने अपनी वाली टेबलेट खायी, पापा...?

- खायी बेटे...।

थोड़ी देर खामोश रहकर नंदन बोला- इस बार मेरा हैप्पी-बड्डे नहीं मनाना पापा...।

-अरे क्यों...?

- उस में जो रुपये खर्च होते हैं न्, हम उन्हें सेव करेंगे..., ताकि वो पैसे मम्मा की दवा के काम में आएं। और फिर अब तो मैं बड़ा हो गया हूँ न् पापा... और बड़ों का हैप्पी-बड्डे नहीं मनाया जाता। सिर्फ बच्चों का मनाया जाता है।

पुरुष हँसा- अरे वाह, हमारा बेटा तो कितना समझदार हो गया है..! पर इसकी ज़रुरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि मम्मी की दवा के लिये पापा के पास बहुत सारे रुपये पहले से ही रखे हैं...। नंदू बाबा को फिक्र करने की कोई ज़रुरत नहीं है...।

-नहीं पापा, आपके पास रुपये हैं, तो भी...। हमने कहा न् कि हम अब बड़े हो गये हैं...और हमारी भी तो कोई जिम्मेदारी है कि नईं...?

पुरुष हँसा- अरे, कितनी बडी-बड़ी बातें करने लगा है हमारा बेटा...? ये तो बड़ी अच्छी बात है कि आप बड़े हो गये हैं...पर...।

पुरुष आगे कुछ कहना चाहता था, परंतु पीछे से चली आ रही बस के कर्कश हॉर्न ने उसकी आवाज को गायब कर दिया। पुरुष के कान सुन्न पड़ गये। नंदन ने दोनों हाथों से अपने कान बंद कर लिये। पुरुष ने अपनी बाईक को पहले ही सड़क के किनारे कर लिया था और गति भी धीमी कर ली थी। पुलिया होने के कारण बाईक को और किनारे नहीं ले जाया जा सकता था।

हॉर्न फिर बजा और बजता रहा। बस आगे निकल जाने के लिये उतावली थी, इसीलिये किसी आवारा सांढ़ की तरह, कहीं से भी घुसकर निकल भागने की बदहवासी दिखा रही थी। पुलिया की दीवार से पुरुष का पैर चिपका हुआ था और बाईक को उसने, उसी तरफ को तिरछा भी कर लिया था, ताकि बस उन्हें बिना छुए निकल जाए। पर तभी पीछे से बाईक को एक जबरदस्त धक्का लगा और सब कुछ हवा में बिखर गया। बाईक पहले ऊपर की ओर उछली, फिर ज़मीन से घिसटती हुई दूर तक चली गयी। नंदन का टिफिन-बॉक्स हवा में उड़न-तश्तरी की तरह उड़ा, ऊपर गया और फिर नाचते हुए, ज़मीन पर उतरने लगा था।

शुरु के कई क्षणों तक पुरुष को यह समझ में ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है ? जैसे उतना वक़्त, उसे छोड़कर कहीं अलोप हो गया था। मुठ्ठी जैसे खुल गयी थी और उसमें बंद अमूल्य खज़ाना बिखर चुका था। पुरुष ने लहूलुहान चेहरे में, मिचमिचाती हुई पलकों को थिर करके, किसी तरह देखने की कोशिश की। उसे अपनी पिचकी और बेढब हो चुकी बाईक का लुटा-पिटा आकार दिखायी दिया। आगे के बुरे अनुमानों ने उसके दिमाग पर एक हथौड़ा चलाया। तभी उसकी आंखों पर एक जबरदस्त किस्म का बोझ सा आया और न चाहते हुए भी उसकी पलकें ढह गयीं। चंद पलों के बाद ही उसने फिर से ताकत बटोरी और अपने आसपास देखने की कोशिश की, परंतु नंदन कहीं दिखायी नहीं दिया। पगलायी हुई बस अब भी भागी जा रही थी। ट्रेफिक ठहर गया था। लोगों के रेले के रेले हादसे वाली जगह पर भागते हुए चले आ रहे थे। पुरुष के कान में, दौड़ते हुए जूते-चप्पलों की ध्वनियों के नगाड़े से बजे जा रहे थे। लोगों की चीख-पुकार से पुरुष की बटोरी हुई ताकत भी फिसल गयी। भीड़ जमा हो गयी थी। शोर बढ़ता जा रहा था और पुरुष की आँखें फिर से मुंदने लगी थीं।

छोटे-मंझोले शहरों में हादसों की ख़बर बड़ी तेजी से फैलती है। पुरुष जहाँ रहता था, उस कॉलोनी में, 'आश्रय' में और नंदन के स्कूल में दुर्घटना की ख़बर ने बिजली ही गिरा दी थी। मानो पूरा शहर ही हतप्रभ होकर रह गया था। जब शहर को होश आया तो लोग हस्पताल की ओर भागने लग गये थे। शहर का एकमात्र ज़िला-हस्पताल लोगों की भीड़ से भर गया था। उसका भवन और अहाता भीड़ को सम्हाल पाने में असमर्थ हुआ जा रहा था। यह तमाशाई भीड़ न थी, जैसी कि बड़े शहरों में हुआ करती है। यह, दुखी और सहृदय लोगों की भीड़ थी, जिसमें मदद पहुँचाने का उतावलापन छलका पड़ रहा था।

पांच लाख की आबादी वाले शहर का अधिकतर हिस्सा, इस बात से वाकिफ था कि उनकी अपनी कोई संतान नहीं है और उन दोनों ने अनाथाश्रम से बच्चा गोद लिया है, वह भी बुढ़ापे में। हालांकि इसे पोशीदा रखने की पूरी-पूरी कोशिशें की गयीं थीं, पर प्रत्येक जानकार ने, किसी और से न बताने की हिदायत देते हुए, ख़बर आगे बढ़ाने के काम को बड़ी खूबी के साथ पूरा किया था। शुरु-शुरु में लोगों ने इसे एक अचंभे की तरह ही लिया था। वे हँसा करते थे, पर बाद में, उन्हीं लोगों ने, अपने अचंभे को स्वयं ही विदा कर दिया था और अपनी समूची सहृदयता उनके प्रति उड़ेल दी थी। खामोशी के साथ ऐसा माहौल बन गया था, जैसे उस बच्चे को सैकड़ों लोगों ने गोद ले रखा हो। चुपचाप। बिना दिखावा किये। मनों से। भावनाओं से। हृदयों से। ऐसे लोगों के शहर, अब होते ही कितने है। वह था, इसीलिये भागते-भागते ठहर गया था। जो हिस्सा ठहराव में भी, खुद को थिर न रख सका, सरकारी हस्पताल के अहाते में आकर जमा हो गया था। कातर।

अंदर से ख़बर आयी- खून की ज़रूरत है। फिर वह ख़बर एक से दूसरे के पास से होती हुई, अहाते में मौजूद हर कान तक पहुंची। उत्तर में 'हमारा ले लो' की ध्वनियां-प्रतिध्वनियां गूंजने लगीं। खून लेने-देने की व्यवस्था वाले कक्ष के आगे, ख़ून देने वालों की कतार लग गयी। पैथॉलॉजिस्ट ने इस उतावलेपन और ज़ज्बे का मन ही मन स्वागत किया। पर नौजवानों में से सिर्फ आठ-दस को ही अपने पीछे आने के लिये कहा। बाकी बाहर रुके रहे। रक़्त-जाँच होने लगी। स्टॉफ की कमी से जूझते हस्पताल में अनगिनत सहयोगियों और मददगारों का अतिरेक भर गया। दवाईयां, फल, कॉटन आदि चीजें बिन बुलाये आने लगीं। अहाते में प्रार्थनाएं और दुआएं करने वालों के होंठ बुदबुदाने लगे। पलकें बंद होकर फड़-फड़ करने लगीं। औरतें रोती रहीं और आसमान के हाथ जोड़ती हुईं, न जाने क्या-क्या मांगती भी रहीं।

हे प्रभो! सब कुशल रखना। बेचारा परिवार अनाथ न हो जाये। उन सबको एक-दूसरे की बेहद ज़रूरत है। उन्हें जुदा न करना।

या खुदा! तू बड़ा कारसाज है। यहाँ तक इनकी गाड़ी ले आया है, तो बीच में ही उसका कोई पहिया मत निकल जाने देना। दो दिन और दो रातों तक हस्पताल में जद्दोजहद और आपाधापी मची रही। अंततः हुआ यह कि ईश्वर ने कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया। खुदा गाड़ी के पहियों को सलामत रखने में कामयाब न हो सका। गाड़ी का सबसे छोटा, कोमल, नन्हा और रफ़्तार के लिये चिर-उत्सुक पहिया, गाड़ी को निर्ममता से त्यागकर, अनंत में कूच कर गया। शेष रह गयी मरी हुई काठ की बेजान गाड़ी। पुरुष और स्त्री।

उनकी हँसती-खिलखिलाती जिंदगियां, पत्थर की प्रतिमा में तब्दील हो गयीं। धूल और मिट्टी की पर्तों में दबी प्रस्तर-मूर्तियाँ, माने उन्हें अभी-अभी किसी ऐतिहासिक स्थल से, खुदाई करके निकाला गया हो। जीवन, शरीरों को अलविदा कह गया था। मुर्दे, दीवारों की टेक लगाकर बैठे रहते या निढाल पड़े होते। घर उन परिचितों-अपरिचितों से भरा रहता, जो उनकी तीमारदारी में जुटकर, उन्हें फिर से जिंदा कर देने की बेअसर जुगत लगाने में जी-जान से भिड़े हुए थे।

कोशिशें बरबाद हो रही थीं। उन शरीरों से जिंदगी का पता गुम हो चुका था। वे खामोशी की अतल गहराईयों में उतर गये थे। कोई उनके मुँह में निवाला डालता, तो वे निगल लेते, वरना मरे हुए लोगों को भी कहीं भूख लगती है?

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'आश्रय' के दफ्तर में श्याम भाई ने सेक्रेटरी साहब से कहा- वे तो एकदम पथरा गये हैं...। अब जाने क्या होगा उनका...?

सेक्रेटरी साहब ने चिंता के साथ, अपने चेहरे को दोनों हाथों से पोंछा, फिर कहा- महीना भर हो गया...,उन लोगों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता...। ज़िंदा रहने की उम्मीद ही आदमी को ज़िंदा रखती है, पर उससे तो इन लोगों ने अपना पल्ला ही झाड़ लिया है...।

- ऐसे में तो वे लोग भी मर जाएंगे...।

- अभी क्या जिंदा हैं...? बस दिल ही धड़क रहा है, बाकी का सब कुछ तो ठहर गया है...।

- कुछ करिये, सेक्रेटरी साहब...। हमारे मां-बाप जैसे ही तो हैं ये लोग। जो भी बन पड़ेगा, हम सब उनके लिये करने को तैयार हैं...।

- क्या नहीं किया, श्याम भाई...! पर जब खुद उनमें ही जीने की तमन्ना न रह गयी हो, तो कोई दूसरा उन्हें कैसे जिला सकता है...?

श्याम भाई ने आकाश की ओर देखकर निराशा की लंबी सांस भरकर कहा- दया करो प्रभु..., दया करो...!

कई क्षणों के मौन के बाद सेक्रेटरी साहब ने कहा- बड़ी कशमकश है...।

वे उठकर टहलने लगे। श्याम भाई ने उनकी उद्विग्नता को महसूस किया पर विवशता से उन्हें देखते रहने के अलावा वे और कुछ नहीं कर सकते थे। कई चक्कर लगाने के बाद, सेक्रेटरी साहब ने श्याम भाई के पास आकर कहा- एक उपाय है...।

श्याम भाई उठकर खड़े हो गये और उत्सुकता से पूछा- क्या उपाय है, बताईये...हम जान लगाकर भी उसे पूरा करेंगे?

- हां, उसमें सबकी मदद लगेगी...। पूरे 'आश्रय' परिवार की...।

- सब करेंगे, सेक्रेटरी साहब, सब करेंगे...। सब यही चाहते हैं...। आप चाहो तो सबसे बात कर सकते हैं...।

आश्रय के तमाम लोग वहां आकर, एक किनारे खड़े हो गये थे। उन सबने भी वादा किया। सेक्रेटरी साहब ने अपने उपाय पर उन लोगों से विस्तारपूर्वक चर्चा की।

- उन्हें, वहाँ, उस माहौल में घुटते रहने के लिये छोड़ देने की बजाय..., यहाँ लाकर बचाने की कोशिश की जा सकती है...।

- यहाँ..., आश्रय में...?

- हाँ, आश्रय में...।

- बच्चों के आश्रय में बुजुर्ग...?

- हाँ, बच्चों के आश्रय में बुजुर्ग...। वे अपना बच्चा खो चुके हैं और उसी का दुख उन लोगों को मारे डाल रहा है...। जानते हो बच्चे के गम के अलावा उन्हें एक और चीज जो मारे डाल रही है. वो क्या है...?

सब ने एक साथ पूछा- क्या है, सेक्रेटरी साहब...?

- वे बच्चे की मौत के लिये, अपने आप को जिम्मेदार मान बैठे हैं...।

श्याम भाई ने कहा- पर बच्चे के साथ तो इक्सीडेंट हुआ है...?

-हां, फिर भी,,,। वे कुछ समय से ऐसा सोचने लगे थे कि पकी उम्र में बच्चे को गोद लेकर, वे बच्चे के हित में बड़ी भारी भूल कर चुके हैं...।

सब खामोशी से सुनते रहे।

- उन्हें अपने को गुनहगार मानने की भावना से बाहर निकालने के लिये, यहां बच्चों के बीच में लाकर रखना ज़रुरी है...। पहले हमें उनकी देखभाल करना होगी, फिर वे ही शायद आश्रय के बच्चों की देखभाल में लग जायेंगे...। इस तरह एक उम्मीद बनती है...। हो सकता है, उनमें जीने की तमन्ना पैदा हो जाये। बच्चे ही जिंदगी का सबसे बड़ा सबूत होते हैं और जिंदगी के प्रति भरोसा जगाने का मंतर भी। अगर आप सब लोग इसके लिये तैयार हों और यह जिम्मेदारी उठाने में मदद करें, तो...।

उन सबने पल भर की देर किये बिना कहा- हम सब तैयार हैं।

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एक पुरानी और खड़खड़ करने वाली जीप गाड़ी मनहूसियत से भरे उस मकान के सामने आकर ठहर गयी। जीप की घुर्राती आवाज ने कॉलोनी के अनेक घरों के कान खड़े कर दिये। लोग झांख-झांख कर देखने लगे। जीप से सेक्रेटरी साहब और श्याम भाई उतरे। लोग उन्हें पहचानते थे, इसलिये जीप की बेसुरी आवाज ने उन लोगों के मन में जो संशय उत्पन्न कर दिये थे, वे खत्म हो गये। बाहर इतना शोर-शराबा था, मगर उस मकान की चुप्पी नहीं टूटी थी। वहाँ कोई औत्सुक्य नहीं जागा। सब कुछ बेहरकत रहा। दो मूर्तियाँ, बरामदे में रखे मैले और बदरंग कवर वाले सोफों पर, स्थिर ही रही आयीं। आँखें हिलती-डुलती थीं, मगर उनका दृष्टि-विस्तार एक सीमा तक जाकर ठहर जाता था। उसकी जद में संसार का कोई भी हिस्सा नहीं रह गया था।

सेक्रेटरी साहब और श्याम भाई ने उनके सामने जाकर अभिवादन किया, पर वे अचीन्हे ही रहे आये। पहचान और स्मृतियाँ किसी सघन अरण्य में जा चुकी थीं। वे दोनों आदर और प्रेम की देहभाषा के साथ, उनके करीब बैठ गये। एक या दो दिन पहले की कप-प्लेटें सेंटर टेबुल पर रखी हुई थीं। पास-पड़ोस से कोई दरिया या ऐसी ही कोई चीज बनाकर लाया होगा। वह सूख चुकी थी। चीटियों ने वहाँ तक अपनी कतारें बना ली थीं, और अपने भंडार-घर की तरफ आने-जाने का सिलसिला चलाये हुए थीं। अख़बार इधर-उधर पड़े हुए, फड़फड़ा रहे थे। शब्द-पहेलियाँ उपेक्षा का दुख बरदाश्त करती हुई, कहीं दबी पड़ी थीं। सीस पेंसिल लापता थी।

सेक्रेटरी साहब ने कहा- हम आप दोनों को लेने आये हैं..., चलिये।

बोल निरर्थक हो गये।

अस्वीकृत और निरुत्तर भी।

- चलिये..., आज से आप दोनों हमारे साथ ही रहेंगे...।

उनकी आँखें कहीं शून्य में अटकी रहीं।

कान, भाषा के व्याकरण और बारहखड़ी के खिलाफ हो चुके थे।

मौन डटा रहा।

- श्याम भाई...!

- जी...।

- ऐसा करिये कि ज़रूरी चीजें किसी बैग या सूटकेस में रख लीजिये और घर को ठीक से बंद कर दीजिये।

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वे जीप के पिछले हिस्से में बैठा दिये गये। उन्हें न तो कोई उज्र हुआ और न कोई सहमति। श्याम भाई उनके साथ ही बैठे। ड्राइवर से सेक्रेटरी साहब ने कहा- चलो मियां...।

जीप ने हुंकार भरी। खड़-खड़ का गुंजार किया। दो-तीन मिनट तक चाबी और बैटरी में संघर्ष चला, फिर बैटरी मान गयी।

- आहिस्ता चलना भाई..., बीमार लोग हैं...।

जीप को आहिस्ता चलाने की ज़रूरत न थी, जीप गाड़ी ने अपनी मर्जी से एक नाजुक रफ़्तार तय कर रखी थी। वही उसकी सबसे कम और सबसे तेज रफ़्तार थी।

घर पीछे सरकता चला गया।

लोग अपने-अपने बरामदों, आँगनों और दरवाज़ों पर खड़े होकर उन्हें विदा करते हुए, अपने हाथ हवा में हिला रहे थे।

दीवारों का धूसर-पीला रंग धीरे-धीरे रंगहीन होता रहा।

जीप जब 'आश्रय' के सामने आकर खड़ी हुई तो वहाँ स्वागत के लिये बच्चों और कार्यकर्त्ताओं का समूह खड़ा था। बच्चे दौड़ पड़े। गाड़ी घेर ली गयी। बच्चों के रंग-बिरंगे संसार का छोटा सा टुकड़ा, पुरानी जीप-गाड़ी की रंग-हीनता पर भारी पड़ गया। मुस्कराते हुए बच्चों ने कहा- आईये, नानाजी आपका स्वागत है!

एक छोटी बच्ची ने पूछा- आप किधर चली गयी थीं, नानी-मां...? हमें भूल गयीं क्या...?

उन दोनों की देहों पर जमी किसी मिट्टी जैसी पर्त में दरारें पैदा हुईं। आँखें फड़फड़ायीं, होंठ थरथराये। गर्दन ने इंच भर का मोड़ लिया।

श्याम भाई ने गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोला और हाथ बढ़ाया- आईये... अपना घर आ गया है...।

पुरुष ने कांपती हथेली वाला अपना दाहिना हाथ धीरे-धीरे उठाया। चेहरे की श्वेत-दाढ़ी के बालों में हरकत हुई। वहाँ से मुस्कान की एक धारा फूट कर बाहर आने की जद्दोजहद करने लगी। पपड़ियाँ झरने लगीं। सूखापन उखड़ने लगा।

पुरुष के अचानक ही बेहद बूढ़े हो गये शरीर ने कोशिश की और वह जर्जर शरीर किसी तरह बाहर उतर आया। बच्चों ने गुलदस्ते भेंट किये। उसने उनके सिरों पर हाथ फेरा। अब तक स्त्री भी उतरकर पुरुष के बाजू में खड़ी हो गयी थी। बच्चों ने उन्हें भी गुलदस्ते दिये, कहा- वैलकम नानी जी...।

पुरुष ने स्त्री की ओर देखा। उसके कंधों पर हाथ रखा, फिर थरथराती मुस्कान से मुस्कुराकर कहा- देखो... कितने सारे नंदन...।

स्त्री ने सबसे छोटे बच्चे को गोद में उठाया और कहा- अच्छा, तो तुम यहाँ हो...।

'आश्रय' के साइन-बोर्ड पर कबूतरों का एक नया जोड़ा बैठा हुआ अपनी गरदनें मटका रहा था और छोटे-छोटे चूजे गुटर-गूँ... गुटर गूँ... कर रहे थे।

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महीने भर बाद पुरुष की जिद पर, सेक्रेटरी साहब उसे रेडीमेड गारमेंट्स की एक दूकान पर ले गये। पुरुष ने वहां से जीन्स का पेंट उठाया और अपनी कमर पर लगाकर आईने में देखा।

आईने में नंदन की आकृति उभरी।

वह दाहिने हाथ की अंगुलियों से गोलाकृति बनाकर मुस्कुरा रहा था।

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राजेंद्र चंद्रकांत राय

अंकुर, 1234 जेपीनगर, असधारताल, जबलपुर- 482004 मप्र

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