संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 12 - बचपन की यादें // अर्चना अग्रवाल

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प्रविष्टि क्र. 12

बचपन की यादें

अर्चना अग्रवाल

आँखें खुलीं एशिया के सबसे बड़े बाज़ार , भारत के दिल चाँदनी चौक में

भगवान ने धरती पर भेजा भी तो गालिब के पड़ोसी बनाकर , कोई रिश्ता रहा होगा मेरा शायद कभी शेरो - शायरी से।

ऐतिहासिक परांठे वाली गली के पास छ्त्ता मदन गोपाल में रहते थे हम। सामने जंगलीमल धर्मशाला और नुक्कड़ पर कुँवर जी दाल बीजी वाले चीराखाना के स्कूल में जाते हुए गाना गाती थी , तू ना मिली तो हम जोगी बन जाएँगे मतलब पता नहीं था बस तरन्नुम याद थी।

जंगलीमल धर्मशाला में निचले तल्ले पर शादी ब्याह की बुकिंग होती थी तो ऊपर प्रथम तल पर तकरीबन सात - आठ परिवार रहते थे जिनमें करीब बीस बच्चे थे।

मैं और मेरे भाई -बहन स्कूल से आकर सारा दिन वहाँ खेलते थे।

एक स्नेह , आत्मीयता का बंधन बंध गया था वहाँ।

होली के दिनों में मम्मी उन परिवारों की महिलाओं के साथ मिलकर आलू , साबूदाने के पापड़ , चिप्स , सैवयाँ , कुरैरी बनाती थीं।

एक दिन एक परिवार आलू की बोरी मंगा लेता था सभी औरतें सामूहिक रूप से वहाँ काम करतीं थीं शाम को सबके चाय नाश्ते का प्रबंध उसी परिवार की ओर से किया जाता था।

इसी प्रकार एक-एक कर सभी परिवारों का पूरे साल के नाश्ते का इंतज़ाम हो जाता।

हम बच्चों को भी मदद के बहाने खेल मिल जाता और 26 जनवरी को कैसे भूल सकती हूँ मैं।

पहले हम टी वी पर परेड देखते फिर भाग कर लाल किले के सामने पहुँच जाते। सैनिकों की टुकड़ियों को जीवंत सामने देखकर ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजाते।

भैया , उछाल दे , उछाल दे , चिल्लाते।

कोई कमांडर अपना नेतृत्व दंड उछाल कर लपक लेता और हम उछलकर खुशी ज़ाहिर करते।

मेरे स्कूल में बंदर बहुत आते थे , मध्यावकाश के समय हम खाना खाते हुए उन्हें रोटी , परांठा दिखाकर चिड़ाते , " ले बंदर रोटी तेरी माँ मोटी "

एक दिन सचमुच ही बंदर ने झपट्टा मारा और मेरे हाथ से रोटी ले गया मैं घबराकर गिर गई और बाईं आँख पर चोट लगी , आँख तो बच गई पर एक चोट का निशान स्मृति रूप में आज भी है मेरे पास।


वो परियों की कहानियों जैसे दिन थे।


हल्के -फुल्के तितलियों जैसे और सुनहरे।


कहते हैं बचपन की यादें बहुत खूबसूरत होती हैं और यदि वो चाँदनी चौक से जुड़ी हों तो क्या कहने !

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6 टिप्पणियाँ "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 12 - बचपन की यादें // अर्चना अग्रवाल"

  1. वाह, बहुत बढ़िया

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  2. बचपन की यादें ताज़ा करवा दीं आपने अर्चना...बहुत ख़ूबसूरत!

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  3. बहुत ख़ूबसूरत!संस्मरण

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