370010869858007

---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 12 - बचपन की यादें // अर्चना अग्रवाल

image

प्रविष्टि क्र. 12

बचपन की यादें

अर्चना अग्रवाल

आँखें खुलीं एशिया के सबसे बड़े बाज़ार , भारत के दिल चाँदनी चौक में

भगवान ने धरती पर भेजा भी तो गालिब के पड़ोसी बनाकर , कोई रिश्ता रहा होगा मेरा शायद कभी शेरो - शायरी से।

ऐतिहासिक परांठे वाली गली के पास छ्त्ता मदन गोपाल में रहते थे हम। सामने जंगलीमल धर्मशाला और नुक्कड़ पर कुँवर जी दाल बीजी वाले चीराखाना के स्कूल में जाते हुए गाना गाती थी , तू ना मिली तो हम जोगी बन जाएँगे मतलब पता नहीं था बस तरन्नुम याद थी।

जंगलीमल धर्मशाला में निचले तल्ले पर शादी ब्याह की बुकिंग होती थी तो ऊपर प्रथम तल पर तकरीबन सात - आठ परिवार रहते थे जिनमें करीब बीस बच्चे थे।

मैं और मेरे भाई -बहन स्कूल से आकर सारा दिन वहाँ खेलते थे।

एक स्नेह , आत्मीयता का बंधन बंध गया था वहाँ।

होली के दिनों में मम्मी उन परिवारों की महिलाओं के साथ मिलकर आलू , साबूदाने के पापड़ , चिप्स , सैवयाँ , कुरैरी बनाती थीं।

एक दिन एक परिवार आलू की बोरी मंगा लेता था सभी औरतें सामूहिक रूप से वहाँ काम करतीं थीं शाम को सबके चाय नाश्ते का प्रबंध उसी परिवार की ओर से किया जाता था।

इसी प्रकार एक-एक कर सभी परिवारों का पूरे साल के नाश्ते का इंतज़ाम हो जाता।

हम बच्चों को भी मदद के बहाने खेल मिल जाता और 26 जनवरी को कैसे भूल सकती हूँ मैं।

पहले हम टी वी पर परेड देखते फिर भाग कर लाल किले के सामने पहुँच जाते। सैनिकों की टुकड़ियों को जीवंत सामने देखकर ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजाते।

भैया , उछाल दे , उछाल दे , चिल्लाते।

कोई कमांडर अपना नेतृत्व दंड उछाल कर लपक लेता और हम उछलकर खुशी ज़ाहिर करते।

मेरे स्कूल में बंदर बहुत आते थे , मध्यावकाश के समय हम खाना खाते हुए उन्हें रोटी , परांठा दिखाकर चिड़ाते , " ले बंदर रोटी तेरी माँ मोटी "

एक दिन सचमुच ही बंदर ने झपट्टा मारा और मेरे हाथ से रोटी ले गया मैं घबराकर गिर गई और बाईं आँख पर चोट लगी , आँख तो बच गई पर एक चोट का निशान स्मृति रूप में आज भी है मेरे पास।


वो परियों की कहानियों जैसे दिन थे।


हल्के -फुल्के तितलियों जैसे और सुनहरे।


कहते हैं बचपन की यादें बहुत खूबसूरत होती हैं और यदि वो चाँदनी चौक से जुड़ी हों तो क्या कहने !

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 5938891463114472109

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

---प्रायोजक---

---***---

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव