संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 9 - कैसे मोक्ष हो यहां....! // वंदना अवस्थी दुबे

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प्रविष्टि क्र. 9

कैसे मोक्ष हो यहां....!

वंदना अवस्थी दुबे

कई सालों से अम्मा का मन था कि हम दोनों “गया” जायें और पापा का पिंडदान करके आयें. हर साल प्रोग्राम बनता, और फिर किसी न किसी कारण से टल जाता. इस बार मैंने एक दिन बस यूं ही रेल्वे की साइट खोली और गया के रिज़र्वेशन देखने शुरु किये. सारी ट्रेनें फुल थीं. इलाहाबाद होके देखा तो मिल गया रिज़र्वेशन. आने-जाने दोनों का. रात में बैठ के बोध गया के होटल सर्च किये, और एक बढिया होटल में कमरा भी बुक हो गया. नियत समय पर हम सतना से इलाहाबाद पहुंच गये. आने वाली ट्रेन भी एक दम सही समय पर आ रही थी, उसका अनाउंसमेंट सुनते ही हम प्लेटफ़ॉर्म नम्बर छह की ओर लपके.

हमारे लपकते-झपकते ट्रेन भी आ गयी लम्बे-लम्बे डग भरती. भारतीय रेल की असली तस्वीर देखनी है तो स्लीपर क्लास में सफ़र जरूर करें. आनन-फानन में हमें आरक्षण मिला था स्लीपर क्लास में . किसी प्रकार अपने डिब्बे में चढे . बर्थ पर पहुंच के देखा, कोई और महानुभाव गहरी नींद में सो रहे हैं वहां. बड़ी मुश्किल से जागे भाई साब. जागने के बाद उतरने को तैयार नहीं बर्थ से. खैर तमाम समझाइश, डांट-डपट के बाद उतरे. हमने चैन की सांस ली कि अब सुबह तक यात्रा भली प्रकार होगी. लेकिन कहां?  बर्थ पर अभी पैर सीधे किये ही थे कि अगला स्टेशन आ गया और यहां से भीड़ का जो रेला चढा, उसे शायद हमारी बोगी ही पसन्द आ रही थी. किसी के भी पास रिज़र्व टिकट नहीं, लेकिन सब के सब सपरिवार तमाम तरह के सामान सहित डब्बे में ऐसे अट गये जैसे ये बोगी तो उन्हें विरासत में मिली थी L

खैर, हम ऊपर वाली बर्थ पर थे सो सुरक्षित थे.

पूरी ट्रेन के किसी भी टॉयलेट में लाइट और पानी न था. मैं चार बोगी इधर और चार बोगी उधर तक घूम आई. लेकिन हर बोगी के टॉयलेट से बिजली नदारद. पानी भी. क्षमता से तीन गुना ज़्यादा सवारियां और टॉयलेट के ये हाल… समझ रहे हैं न??  L खैर जैसे-तैसे सुबह हुई, साढे छह की जगह सात बजे गया स्टेशन आया. हम ऐसे उतर के भागे जैसे किसी ने गले से पट्टा खोल दिया हो. होटल फोन किया कि हमारा चैक-इन दस बजे है जबकि हमारी ट्रेन ने अभी ही पहुंचा दिया है तो होटल के मैनेजर ने सहृदयता दिखाई और कहा कि वो हमारा रूम अभी ही तैयार करवा देगा हम होटल पहुंच जायें J

होटल पहुंच के नहाया-धोया और तत्काल ही हम वापस गया के पिंडदान स्थल की ओर रवाना हो गये. पिंडदान..यानि पूर्वजों की मुक्ति प्रक्रिया…. लेकिन इस जगह पर पहुंच के लगा हम अपने पूर्वजों को किस गन्दगी में ढकेलने आये हैं??

सुना था कि यहां के पंडे बहुत परेशान करते हैं. पीछे पड़ जाते हैं. लेकिन हमें ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ. पंडे मिले, लेकिन पीछे कोई नहीं पड़ा. पिंड दान स्थल पर ही बंगाली समाज के एक युवा पंडा महाशय हमें मिले और हमने उनसे ही पूजा करवाने का मन बनाया. उन्होंने भी पूजा के लिये तयशुदा रकम ही ली, अनावश्यक कुछ भी नहीं. तो कम से कम पंडों के लिये जो भयानय टाइप धारणा हमारे मन में बनी थी, खत्म हुई.

पूजा के लिये पंडे जी हमें एक मंदिर में ले गये. पूजा भी विधिवत करायी. आगे की पूजा के लिये विष्णु पद मन्दिर जाना था. यहां चारों तरफ़ गन्दगी के ढेर. जगह-जगह पिंडदान के बाद बची हुई पत्तलों के ढेर, बड़े-बड़े टोकरों में भरे हुए जौ के आटे के पिंडॆ जो गीले होने के कारण जानलेवा संड़ाध मार रहे थे. लेकिन अफ़सोस कि पितृ मोक्ष की पूजा के बाद पिंडदान के लिये हम भी पत्तल में ढेर सारे पिंडे ले के विष्णु पद मन्दिर की ओर चल दिये. हज़ारों की भीड़ में धक्के खाते , फिसलन से कई बार बचते-बचाते हम विष्णु पद के मुख्य स्थल पर पहुंचे. यहां एक बड़ा सा कुंड था, जिसमें पानी भरा था और सभी लोग पत्तलों में लाये गये पिंडे यहां विसर्जित कर रहे थे, जिन्हें वहां बैठे पंडे निकाल-निकाल के टोकरों में भरते जा रहे थे. टोकरों से आटा मिश्रित पानी पूरे फ़र्श को भिगो रहा था. अब फिसलन का राज समझ में आया. हम पूरा मन मनाये थे कि यहां केवल अपने पितरों को याद करते हुए विसर्जन करेंगे, लेकिन पता चला कि हमारा पूरा ध्यान तो खुद को फिसलने से बचाने पर लगा है!!

बाहर लाइन से रखे, सड़ांध मारते जो टोकरे हमने देखे थे, वे यहीं से भर-भर के बाहर भेजे जा रहे थे. आटे का ऐसा दुरुपयोग!! क्या हमारे पितृ भी इससे खुश होते होंगे? कितना अच्छा होता अगर इस आटे से तत्काल रोटियां सेंक के जानवरों को खिलाने की व्यवस्था होती! और अगर जानवर इस आटे को नहीं खाते हों, तो बेहतर हो कि एक बड़ी सी भट्टी हो, जिसमें विसर्जन के बाद तत्काल पिंडों की आहुति दे दी जाये. पिंड जल जायेंगे तो न सड़ांध फ़ैलेगी न ही पिंडों का अपमान होगा तमाम पैरों के नीचे…

अब बारी थी फल्गु नदी में नारियल के विसर्जन की. पंडे ने बताया कि उसकी ड्यूटी अब यहां खत्म हुई सो नारियल ले के आप शमशान के बगल से जायें, वहीं नदी है. हम उसके बताये रास्ते पे चल दिये. शमशान तो मिला लेकिन नदी न दिखी. थोड़ा और आगे बढे तो सिवाय गन्दगी के कुछ नज़र न आया. दूर-दूर तक मल-मूत्र, रंग बिरंगी पॉलिथिन, प्लेट, कप गिलास जैसा प्लास्टिक कचरा और जानलेवा बदबू….. थोड़ा और आगे बढने पर उथले नाले जैसा कुछ दिखा. हम समझ गये कि यही नदी है क्योंकि यहां कुछ और लोग भी नारियल लिये दिखाई दिये. उस अथाह गन्दगी के बीच कुछ परिवार खाना पकाते भी दिखे!! खैर उमेश जी ने यहां नारियल विसर्जित किया जिसे तत्काल एक लड़का ले के भाग गया…

यहां से वापस लौटते हुए लगा जैसे कितने खाली हो गये हैं…. पितरों को मोक्ष दिलाने का भाव ले के घर से चले थे सो इस अन्तिम क्रिया के बाद लगा जैसे हमने अपने पितरों को दूर कर दिया हमेशा के लिये… भाव तो तक़लीफ़ का भी था कि हमने इस जगह पर उन्हें मोक्ष दिलाया या गन्दगी में ढकेल दिया?

कुछ भी हो, हिन्दू आस्था और अन्तिम कर्मकाण्ड का एकमात्र स्थल है गया. यह कभी खत्म न होने वाली परम्परा है, सो बिहार सरकार और भारत सरकार दोनों को चाहिये कि यहां बेहतर व्यवस्थाएं उपलब्ध करायी जायें. कुम्भ मेले की तरह ही यहां भी रुकने के इंतज़ाम होने चाहिये. सभी लोग होटलों में रुकने वाले नहीं होते वे लूटमार का शिकार होते हुए पितृ ऋण से उऋण होते हैं. और इससे भी अधिक इंतज़ाम उन्हें पिण्डों के दहन का करना चाहिये ताकि पिंड के रूप में धरती पर मोक्ष के लिये बुलाये गये पितरों की आत्मा यहीं सड़ने-गलने और पैरों के नीचे आने को विवश न हो.

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5 टिप्पणियाँ "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 9 - कैसे मोक्ष हो यहां....! // वंदना अवस्थी दुबे"

  1. तमाम अव्यस्थाओं के बीच परम्परा का निर्वहन है मोक्ष
    बहुत कुछ जानकारी मिलती है संस्मरण से

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    1. बहुत आभार कविता जी. गया जी की स्थितियां बहुत खराब हैं.

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    2. शुक्रिया रवि जी, स्थान देने के लिये.

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  2. बहुत ही दुखद स्थिति है। परंतु इसके मूल में हमारा समाज ही है। जहां खड़े बैठे हैं वहीं थूकना कचरा फेंकना आदत में है। और लोग समझना भी नहीं चाहते।

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  3. बेनामी10:25 pm

    अच्छा संस्मरण है। समाज को जागृत होना होगा।

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