आज़ादी, संविधान और वर्तमान भारत // सुशील शर्मा

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26 जनवरी 1950 को भारतीय गणराज्य के ऐतिहासिक जन्म की शुरुआत हुई ; ब्रिटिश शासन की वापसी के बाद हमारे देश को संप्रभुत्व गणराज्य बनने में  894 दिन लगे तब से, हर साल पूरे राष्ट्र में महान गर्व और खुशी के साथ गणतंत्र दिवस मनाया जाता है।

ब्रिटिश कॉलोनी से एक संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने तक भारत के लिए एक अद्भुत संक्रमण काल था वास्तव में यह एक ऐतिहासिक यात्रा थी। यह लगभग दो दशकों की लंबी यात्रा थी जो 1930 से  1950 तक की यात्रा जो अपनी वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सपने को अवधारणा के साथ शुरू हुई थी। इस यात्रा के बाद जिस भारतीय गणराज्य का जन्म हुआ वही हमारे सपनों का भारत है। भारत को आजाद हुए सात दशक हो चले हैं और भारत विकास के कई पड़ाव पार कर चुका है। भारत का संविधान दुनिया में किसी भी देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है और यह एकराष्ट्रीय दस्तावेज है जिस पर वर्तमान भारतीय राज्य की स्थापना गठन और शासन की व्यवस्था निर्धारित है।

ऐसा नहीं था कि आज़ादी के समय भारत को एक संवैधानिक दस्तावेज की जरूरत थी, भारत में एक शासी दस्तावेज था, जिसे भारत सरकार अधिनियम, 1935 के रूप में जाना जाता था। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947, भारत के अस्थायी संविधान के रूप इसे मान्य किया गया था। इस अधिनियम को उपयुक्तता के अनुसार पारित परिषद में आदेश द्वारा संशोधित किया गया था।

भारत के लिए एक संविधान सभा का विचार पहले भारतीय दार्शनिक एम.एन. रॉय द्वारा प्रस्तावित किया गया था। वह एक समय पर कम्युनिस्ट थे, हालांकि बाद में वह खुद को एक कट्टरपंथी मानवतावादी मानते थे । गांधीजी के साथ उनकी असहमति थी। रॉय मानव स्वतंत्रता में विश्वास करते थे। उनका मानना ​​था कि भारत को संविधान सभा का उपयोग करने के माध्यम से सत्ता हासिल करना चाहिए।

भारतीय संविधान सभा की मसौदा समिति विश्व के विभिन्न संविधानों का विस्तार से अध्ययन किया। मसौदा समिति के निम्न सदस्य थे:

1 - अध्यक्ष: डॉ. बीआर अम्बेडकर

2 - एन गोपालस्वामी अय्यंगार

3 - कृष्णस्वामी अय्यर

4 - डॉ के एम मुंशी

5 - सैयद मोहम्मद सदाउल्ला

6 - बीएल एमटर (जिन्होंने ख़राब स्वास्थ्य के कारण इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह एन माधव राउ को जगह दी गई)

7 - डीपी खेतान (जो 1 9 48 में निधन हो गया और इनकी जगह टीटी कृष्णमाचारी ने बदला)

संविधान सभा, जिसे भारतीय नेताओं और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के सदस्यों के बीच वार्ता के परिणामस्वरूप गठित किया गया था, की पहली बैठक 9 दिसंबर,1946 को हुई थी। इसका उद्देश्य भारत को एक संविधान देना था, जो एक स्थायी उद्देश्य की पूर्ति करें और इस प्रकार प्रस्तावित संविधान के विभिन्न पहलुओं को अच्छी तरह से अनुसंधान करने के लिए कई समितियां नियुक्त करें। भारतीय संविधान के अंतिम रूप में सिफारिशों पर विचार-विमर्श और संशोधित कई बार चर्चा हुई थी और आधिकारिक रूप से तीन साल बाद 26 नवंबर, 1949 को अपनाया गया था।

मुख्य आधार जिस पर हमारा संविधान बनाया गया था, वह भारत सरकार अधिनियम, 1935 था। यह इसलिए था क्योंकि यह कानून आजादी के बाद भी हमारे संविधान के रूप में माना जाता था। यह गोलमेज सम्मेलन की एक श्रृंखला के बाद तैयार किया गया था। राज्य सरकारों, शक्तियों का विभाजन, उच्च न्यायालय और एक संघीय न्यायालय (अब सर्वोच्च न्यायालय), अखिल भारतीय सेवाएं, नियंत्रक महालेखा परीक्षक, सभी प्रमुख विशेषताएं भारत सरकार अधिनियम से प्रेरित थे।

स्वतंत्र के बाद भारत की उपलब्धियां-- स्वतंत्रता के बाद भारत को एक बिखरी अर्थव्यवस्था, व्यापक निरक्षरता और चौंकाने वाली गरीबी का सामना करना पड़ा। आजादी के इतने साल बाद भी भारत अनेक ऐसी समस्याओं से जूझ रहा है जिनसे वह औपनिवेशिक शासन से छुटकारा मिलने के समय जूझ रहा था. अनेक ऐसी समस्याएं भी हैं जो आजादी के बाद पैदा हुई हैं और गंभीर से गंभीरतम होती जा रही हैं। लेकिन इतनी कठिनाइयों के बाद भी भारत विकास के पथ पर अग्रसर है।1944 में भारत के आठ बड़े उद्योगपतियों ने आर्थिक विकास का एक दस्तावेज तैयार किया जिसे बंबई योजना कहा जाता है।

आचार्य श्री मन्नारायण द्वारा ‘गांधीवादी योजना' के माध्यम से दस वर्ष में लोगों को जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया गया। एम.एन. राय ने भी ‘जनता योजना' का प्रस्ताव रखा, जिसमें सरकारी खेती और भूमि के राष्ट्रीयकरण पर बल दिया गया। जयप्रकाश नारायण की ‘सर्वोदय योजना' भी विकास के गांधीवादी मॉडल पर आधारित थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव द्वारा 1950 में योजना आयोग की स्थापना की गई। आयोग को परामर्शदात्री संस्था का दर्जा दिया गया। आयोग को सात दायित्व निभाने थे-

1 विकास की राष्ट्रीय प्राथमिकताएं निर्धारित करना, विकास की स्थितियों को परिभाषित करना तथा संसाधनों के वितरण हेतु सुझाव देना;

2 भारत के भौतिक, पूंजीगत तथा मानवीय संसाधनों का आंकलन करना;

3 इन संसाधनों के प्रभावी एवं संतुलित उपयोग के लिए योजना तैयार करना;

4 योजना के सफल क्रियान्वयन हेतु आवश्यक शतों का निर्धारण करना;

5 योजना के प्रत्येक चरण के कार्यान्वयन हेतु अपेक्षित प्रशासतंत्र सुनिश्चित करना;

6 योजना क्रियान्वयन द्वारा हासिल प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन करना

7 नीतियों और मापदंडों में अपेक्षित सुधारों की सिफारिश करना;

8 स्वयं की प्रभावी कार्यशीलता, बदलती आर्थिक परिस्थितियों, चालू समस्या आदि विषयों के सम्बंध में अपनी सिफारिशें देना।

आधुनिक भारत में विकास -1. विज्ञान का क्षेत्र -आज भारत  “न्यूक्लियर-पावर-संपन्न” देशों में शामिल है। अपनी मिसाइलें बनाकर हमने दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया है। चंद्रमा में चन्द्रयान भेजकर अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है। मंगलयान की बात हमारे अंतरिक्ष अध्ययन/अभियान की योजना का अंग है। इसरो  (ISRO) जैसी हमारी संस्था उत्कृष्ट कार्य करके विश्व के कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ रही है। ओएनजीसी (ONGC) खनिज तेल की खोज अपने दम पर देश एवं विदेश में कर रही है। सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

2. शिक्षा और डिजिटल इंडिया -स्वतंत्रता के बाद भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय विकास किया है। स्वतंत्रता के समय शिक्षा की विकास दर 12 प्रतिशत थी जो अब बढ़ कर 74.04 प्रतिशत हो गई है। शासकीय-प्रशासकीय तंत्र में अंकीय तकनीकी (digital technology) का प्रयोग बढ़ रहा है। बहुत से स्थलों पर कंप्यूटरीकृत वातावरण में कार्य हो रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकी के साथ रोग-निदान एवं रोगोपचार किया जा रहा है। देश की सेवा क्षेत्र में प्रमुख विकास, टेली सेवाओं और सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा हुआ है। दो दशक पहले शुरू हुई यह प्रवृत्ति सबसे अच्छी है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपनी टेली सेवाओं और आईटी सेवाओं को आउटसोर्स करना जारी रखा हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के कारण विशेषज्ञता के अधिग्रहण ने हजारों नई नौकरियां दी हैं, जिससे घरेलू खपत में वृद्धि हुई है और स्वाभाविक रूप से, माँगों को पूरा करने के लिए अधिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश हुआ है।

वर्तमान समय में, भारतीय कर्मचारियों के 23% सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं जबकि यह प्रक्रिया 1980 के दशक में शुरू हुई। 60 के दशक में, इस क्षेत्र में रोजगार केवल 4.5% था। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार, 2008 में सेवा क्षेत्र में भारतीय जीडीपी का 63% हिस्सा था और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है।

3. कृषि -व्हीट जीनोम सीक्वेंस : इस साल भारतीय वैज्ञानिकों ने विदेशी वैज्ञानिकों के साथ मिल कर गेहूं के जीनोम को सीक्वेंस किया. गेहूं का जो जीनोम है वो बहुत बड़ा है. बहुत सालों से लोग मशक्कत कर रहे थे कि इस जीनोम को सीक्वेंस किया जाए. भारतीय वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक दिल्ली और लुधियाना की लैबॉरेट्री में इस जीनोम को सीक्वेंस किया. इस सफलता से भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा को पुख्ता करने में मदद मिलेगी। शोध में लगातार निवेश, भूमि सुधार, क्रेडिट सुविधाओं के दायरे का विस्तार और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे में सुधार कुछ अन्य निर्धारित कारक थे, जो देश में कृषि क्रांति लाए थे। देश कृषि-बायोटेक क्षेत्र में भी मजबूत हुआ है। राबोबैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले कुछ सालों से कृषि-जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र 30 प्रतिशत बढ़ गया है। देश के अनुवांशिक रूप से संशोधित / प्रौद्योगीकृत फसलों का प्रमुख उत्पादक बनने की भी संभावना है।

भारत ने अपनी आजादी के उन मूल्‍यों को संजोये रखा है जिन मूल्‍यों से इसे स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हुई है. इसीलिए आजादी का यह पावन दिन हर भारतीय के ह्रदय को राष्‍ट्र के प्रति अपार प्रेम बलिदान और शौर्यपूर्ण भावनाओं से भर देता है।

ऐतिहासिक दिवस के बाद से 26 जनवरी को पूरे देश में उत्सव और देशभक्तिपूर्ण उत्साह के साथ मनाया जाता है। उस दिन भारत के संविधान के महत्व को सम्मान दिया जाता है जिसे इस दिन अपनाया गया था। प्रत्येक गणतंत्र दिवस पर, भारत का महान संविधान, जो कि उदार लोकतंत्र का जीवंत दस्तावेज है हमें प्रेरित करता है और हमें गर्व से परिपूर्ण कर देता है की हम महान भारतीय परंपरा की एक कड़ी हैं ।

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