खाली पेज // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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जिस वक्त नोनी उसके कमरे में आया, वह कोएटज़ी का उपन्यास Disgrabe पढ़ रहा था। बेटे को कमरे में आता देखकर, उसने पुस्तक बंद कर दी।

‘‘कैसे हो? खुश तो हो?’’ कामरान ने मुस्कराते बेटे से पूछा।

‘‘हां,’’ नोनी ने संक्षेप में उत्तर दिया और कुछ ढूंढने लगा। कामरान ने चाहा कि नोनी कुछ देर के लिए उसके पास बैठे।

‘‘कुछ देर बैठ तो सही, कुछ हाल चाल पूछें,’’ उसने देखा कि उसके स्वर में प्यार के साथ कुछ मिनक्त भी शामिल थी।

‘‘मैं गेम खोलकर आया हूं। बाद में आता हूं,’’ नोनी ने उत्तर दिया और कमरे में पड़ी प्ले स्टेशन टू जी की सी.डी. लेकर जल्दी बाहर निकल गया।

कुछ देर तक वह खाली खाली बैठा रहा। उसे पुत्र के इस व्यवहार पर कोई दुःख नहीं हुआ था। यह एक मामूली बात थी। इसमें गुस्सा करने के लिए कुछ नहीं था। बस उसका मन कुछ देर के लिए खाली खाली हो गया था। उसने बंद की हुई पुस्तक उठाई और कुछ देर तक पुस्तक को देखता रहा लेकिन उसने पुस्तक नहीं खोली। पुस्तक पढ़ने का उसका मन नहीं हुआ। उसने अनुभव किया कि उसका खाली मन पीछे चला गया था यादों के घने जंगल में। वहीं कहीं उलझे रास्तों पर यादों के कोनों में उलझ गया था। लेकिन वहां पर उसे एक ही व्यक्ति नजर आया - उसका पिता वाकही ऐसा था या उसने समझा था कि उसका पिता रूखे स्वभाव का था। भावनाओं से लुप्त। दोनों पिता पुत्र के बीच खाई थी। जैसे दोनों के बीच रेगिस्तान के रेत की बड़ी बड़ी दीवारें थीं। ऐसा कब हुआ? उसने याद करना चाहा। उसके और उसके पिता के बीच दूरी की शुरुआत कब हुई? उसने उलझे रास्ते पर निशान ढूंढने की कोशिश की। लेकिन उसे लगा यह कोशिश बेकार थी। उसके और उसके पिता के बीच नजदीकी थी ही कब! उसका पिता एक विचित्र व्यक्ति था। केवल उसे साथ नहीं, बल्कि पूरे घर से, बच्चों से उसका कोई लगाव नहीं था, कुछ अपनापन नहीं था। लगता तो ऐसा ही था। घर में वह पराये व्यक्ति की भांति रहता था। बच्चे कैसे पढ़े, कैसे उन्होंने हाथ पैर मारकर जिंदगी जीने की कोशिश की, इस बात से उसके पिता का कोई संबंध नहीं था।

उसने सोच रखा था, पक्का प्रण लिया था कि पिता के उलट वह अपने बच्चों को भरपूर प्यार देगा। उससे जितना हो सकेगा वह अपने बच्चों को दुनिया का हर सुख देगा। उसे पता नहीं चला कि एक हद उसके पिता का व्यवहार था : प्यार से, भावनाओं से खाली; तो दूसरी हद उसका व्यवहार था। उसके पास जितना प्यार था, जितनी भावनाएं थीं वे सब उसने अपने बेटे के हवाले कर दी थीं। जब नोनी की हर बात, हर इच्छा खुद-ब-खुद पूरी होती गई, तो उसे पिता के पास आकर बैठने और कुछ बोलने, बात करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही थी।

थोरी देर के लिए खाली हुआ मन अब पता नहीं कितनी ही बातों से भर गया था। मन में अलग अलग नजारे तेजी से बदल रहे थे। उसका बेटा छोटा था तो उसके बहुत करीब था। बड़ा होने के बाद धीरे धीरे वह उससे दूर होता गया। अपने शौक में वह डूबता गया। गेम, प्ले स्टेशन, कम्प्यूटर...

कामरान चाहता था कि नोनी के कमरे में जाकर थोड़ी देर उससे बातें करे, मिले जुले। नोनी के कानों पर हेड फोन चढ़ा रहता था। आंखें कम्प्यूटर मॉनीटर की स्क्रीन में गढ़ी रहती थीं। अपनी बातों और प्रश्नों की ओर नोनी का ध्यान न होता देख वह कमरे से उठकर चला आता था।

उसके होंठों पर मुस्कान आ गई। कितनी विचित्र बात थी! उसे विचार आया, ‘पिता से प्यार न मिला और बेटे से प्यार का उत्तर नहीं मिला!’

तभी उसे लगा कि प्यार व्यार सब बकवास है। उसने अपनी पूरी जिंदगी इस एक बेकार शब्द के चक्कर में फंसाकर गंवा दी। उसे पता था कि वह भावनाओं की बीमारी में डूबा था। कर भी क्या सकता था! किसी के दुःखों की बात सुनकर, दर्द से भरा शेर पढ़ते, किसी फिल्म या टी.व्ही ड्रामे में भावनात्मक नजारा देखकर और डायलाग सुनकर उसके मन का भर आना भावनाएं नहीं थीं तो और क्या था? उसने खुद से पूछा। जब उसका पिता बीमार हो गया था तो उसने उसे अस्पताल में दाखिल करवाया। वैसे उसका पिता की भी बीमारी वगैरह में इलाज नहीं करवाता था। खुद ही दवाएं लेकर खाता था, ठीक हो जाता था। लेकिन इस बार ठीक होने के बजाय ज्यादा बीमार पड़ गया। उसने सोचा कि पिताजी कुछ दिनों के बाद ठीक हो जाएंगे। दिल ही दिल में उसने यह बात मानी कि अपने पिता की बीमारी पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। फिर अचानक ही उसका पिता अस्पताल में गुजर गया। उस वक्त वह अस्पताल के कमरे में पिता के पास उपस्थित था और तब दहाड़ें मारकर रोया था।

‘‘पिता के मरने पर मैं इतना क्यों रोया था?’’ कामरान ने खुद से पूछा।

और कोई तो बात नहीं थी। उसे पिता से प्यार भी नहीं था। आखिरी वक्त में उसने पिता की बराबर देखभाल नहीं की थी और इस एहसास के दुःख के कारण वह इतना रोया था। या शायद पिता की एक परायी और गैर ताल्लुक जिंदगी गुजारने के कारण उसके मन में हमदर्दी पैदा हो गई थी। इनमें से कोई एक कारण था या दोनों कारण आपस में मिल गए थे! कामरान किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया।

उसका ध्यान कोएटज़ी के उपन्यास पर गया, जो अभी तक बंद हालत में उसके हाथ में ही था। वह पुस्तक को देखने लगा। जहां तक उसने उपन्यास पढ़ा था, वह याद करना चाहा। उपन्यास का मुख्य पात्र दक्षिण अफ्रीका के बड़े शहर की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था। अपने विद्यार्थी से शारीरिक संबंध बनाने के कारण उसे अपना दोष मानने के अलावा माफी लिखकर देने के लिए कहा गया। उसने इस्तीफा दे दिया। उसके और उसकी पत्नी के बीच कुछ वर्ष पहले तलाक हो चुका था। उसकी एक जवान बेटी थी। वह दक्षिण अफ्रीका के किसी दूर जगह पर अकेली रहती थी। वहां उसकी बेटी ने जमीन लेकर अपना फार्म (खेत) बनाया था। प्रोफेसर कुछ दिन बेटी के घर रहने का सोचकर फार्म पर आता है। उसे देखकर उसकी बेटी को कोई खुशी नहीं होती। वह अपनी बेटी को विद्यार्थी वाले स्कैंडल के कारण नौकरी छोड़ने की बात बताता है। इस बात पर बेटी कोई विशेष प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करती। वह पिता से कहती है कि जितने दिन चाहे उसके पास रह सकता है। प्रोफेसर कोशिश करता है कि घर में और जमीन के कामकाज में बेटी का हाथ बंटाये। दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद हुकूमत समाप्त होने के बाद वहां हालात बदल गये हैं। प्रोफेसर और बेटी गोरे हैं और वे क्षेत्रीय व्यक्तियों के बदले व्यवहार को महसूस करते हैं। एक दिन तीन चार नीग्रो (काले) नौजवान फार्म वाले घर में आते हैं। प्रोफेसर के हाथ पैर बांधकर उसे बाथरूम में बंद कर देते हैं। प्रोफेसर कुत्तों के भौंकने की आवाज, फायरिंग की आवाज, घर में चीजों के टूटने की आवाज और बेटी की चीखें सुनता है। लेकिन वह कुछ नहीं कर पाता। घटना के बाद वह बेटी से पूछता है कि क्या हुआ? वह कोई उत्तर नहीं देती। प्रोफेसर बहुत शर्मिंदा है कि वह बेटी के लिए कुछ नहीं कर पाया और बेटी सख्त मानसिक पीड़ा के कारण कुछ दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रहती है।

पिता और बेटी के बीच में दूरी की दीवार ज्यादा लंबी हो जाती है। वह प्रोफेसर के साथ बैठने और उससे बात करने से कतराती रहती है। प्रोफेसर उसे समझाता है कि हालात बदल गये हैं। अच्छा यह होगा कि फार्म बेचकर वापस चलें। लेकिन बेटी इन्कार करती है। डॉक्टर प्रोफेसर को बताती है कि उसकी बेटी गर्भवती है। बेटी बच्चे को गिराना नहीं चाहती थी और उसने अपने फार्म पर ही रहने का निर्णय लिया। प्रोफेसर को महसूस होता है कि यहां बेटी के घर पर रहना, जो बात उसकी बेटी भी नहीं चाहती, अब गैर जरूरी है।

‘‘मैं अगले वर्ष रिटायर हो जाऊंगा।’’ अचानक कामरान का ध्यान उपन्यास से हटकर खुद पर गया।

‘‘फिर क्या करूं गा?’’ उसने खुद से पूछा।

करने के लिए कुछ नहीं था। पूरा दिन घर में बिताने के बारे में सोचते वह अभी से बेजार होने लगा। तब उसका ध्यान फिर से बेटे की ओर गया।

‘‘वह भी मुझे पूरा दिन घर में बैठा देखकर परेशान तो नहीं होगा?’’

उसने खुद से पूछा कि जब कोएटज़ी वाले पात्र प्रोफेसर की बेटी की तरह, नोनी को मेरा घर में रहना गैर जरूरी लगा तो?

‘‘उपन्यास और कहानियां पढ़ पढ़कर मेरा सर घूम गया है। बेकार बातें सोच रहा हूं...’’ उसने जैसे खुद को डांटा।

ध्यान हटाने के लिए कामरान ने उपन्यास वहीं से पढ़ना चाहा, जहां उसने छोड़ा था। उसने पुस्तक का वह पेज ढूंढकर खोला और पढ़ने लगा। पढ़कर उसने कागज पलटा। लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आया कि वह क्या पढ़ गया था! शायद वह अपने बारे में ही सोचता रहा था। उसने दोबारा वही पेज फिर से पढ़ना चाहा। फिर से पेज पलटकर उसने पूरे ध्यान से पढ़ने की कोशिश की। लेकिन उस पेज पर छपे शब्द मकौड़े बनकर सरकने लगे। फिर धीरे धीरे गायब होते गये। उसे लगा कि वह पूरा पेज खाली था।

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