रक्त की सींच // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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‘‘बैलों ने काम करने से इन्कार कर दिया है, एकदम हाथ ऊपर कर दिए हैं।’’ पूरे गाँव में यह समाचार बिजली की तरह फैल गया। जहां भी - आरु के झोंपड़े म...


‘‘बैलों ने काम करने से इन्कार कर दिया है, एकदम हाथ ऊपर कर दिए हैं।’’ पूरे गाँव में यह समाचार बिजली की तरह फैल गया। जहां भी - आरु के झोंपड़े में, गाँव की पौड़ी में, जंगल में - दो लोग आपस में मिल रहे थे तो यही बातचीत थी। जब भी कभी कोई विशेष बात होती थी तो सभी गाँव वाले आरु के तंग झोपड़े में एकत्र होते थे। आज तो आरु की चीख के ऊपर चीख थी : ‘‘अरे भाई, क्यों मुझ गरीब का झोंपड़ा तोड़ रहे हैं...’’ लेकिन किसी ने भी उसकी चीखों पर ध्यान नहीं दिया। सभी के मुंह में केवल बैलों की ही बात थी।

खैरी को बैलों पर बहुत क्रोध था। उन्हें भला बुरा कह रहा था। कह रहा था : ‘‘इन बैलों का अब दिमाग खराब हो गया है। कहते हैं कि हम में भी आप ही की तरह जान है, कब तक अत्याचार सहते रहेंगे, हूं...’’

‘‘लेकिन, लेकिन, उन्होंने ऐसी बातें सीखीं कहां से?’’ चाचे मटर को इस बात पर आश्चर्य हो रहा था, बार बार यही बात कर रहा था।

‘‘चाचा, पूरी दुनिया जागृत हो गई है। कुत्ते भी लोगों के साथ मिलकर खा पी रहे हैं और उनके साथ रहते हैं। ये तो फिर भी बड़े काम वाले जानवर हैं,’’ एक नौजवान ने उत्तर दिया।

‘‘तुम चुप रहो!’’ वलू ने उसको झिड़ककर कहा। ‘‘तुम सभी लड़कों ने ही उनको बिगाड़ा है। ऐसी बेकार बातें करके इन बेवकूफ बैलों के दिमाग में पता नहीं क्या भर दिया है।’’

‘‘मेरे वाला बैल मुझे कहता है कि साहब, हम अपना रक्त मंथन करके आपके लिए रोजी पैदा करते हैं और हमें सूखी घास भी लाठियां खाकर मिले...’’

‘‘भाई, बड़े सच कह गये हैं कि कयामत करीब है। भला इन बेवकूफों को कौन समझाए कि भगवान ने हर चीज को अपनी अपनी जगह पर पैदा किया है। ऐसे ही दुनिया का काम चल रहा है।’’

‘‘तो चाचा यह बात भी भगवान ने ही उनके दिमाग में पैदा की है कि अब आप सब भी जागृत हो जाओ। भगवान ने ही इनको यह बुद्धि दी है, और किस के पास ताकत है,’’ उसी नौजवान ने फिर से कहा।

‘‘चुप कर लड़के, फालतू बक रहे हो!’’ एक बूढ़े ने कहा। कुछ वक्त के लिए शांति छा गई।

‘‘आखिर इन बैलों को कैसे सबक सिखाएं, मार तो ये रोज ही खाते हैं!’’ एक व्यक्ति ने पूछा।

‘‘भाई साहब, मेरी तो बांहें ही सुनक् पड़ गई हैं; कल जो बैलों को मार दी थी उसने तो उल्टे हमें ही बीमार कर दिया है,’’ खैरी ने झुंझलाते कहा।

‘‘मेरे साथ भी यही हाल है। कल सभी को विश्वास हो गया कि मार से वे कभी नहीं सुधरेंगे। कोई और रास्ता ढूंढना पड़ेगा।’’

‘‘दस पंद्रह लोग मिलकर उन्हें समझाने गये हैं, देखें क्या होता है।’’

लेकिन सभी का यह विचार था कि कल इतनी मार के बाद भी नहीं माने, तो समझाने से क्या समझेंगे। सभी को बहुत गुस्सा था। कोई डांट रहा था तो कोई गालियां दे रहा था और किसी किसी के डर लग रह था। ‘‘बैल कितने ही दिनों तक नहीं आए हैं, खेती कैसे होगी, जमींदार हालत खराब करेगा।’’

‘‘राम राम,’’ बाहर से आते एक साथी ने हांफते नमस्ते की। जैसे कि छते में किसी का हाथ लग गया था और e/qefD[k;ksa की भूं भूं तेज हो गई।

‘‘पैरल, बता क्या हाल हैं?’’ एक साथी ने जल्दबाजी में पूछा।

‘‘हाल क्या बतायें! खरगोश की टांगें तीन, पूरी बात ही नहीं सुन रहे हैं। कहते हैं कि आपने हमें कई दिनों तक भड़काया और ठगा है। अब हमें भी पता चल गया है कि आप हमें लूटकर ऐश करते हो। हल चला चलाकर, खेत जोत जोतकर, अनक् उगा उगाकर, कंधे घिसाकर मर जाएं, हूं!’’ पैरल ने बैल को गाली दी।

‘‘मटर वाले मरियल लाल बैल की बात सुनी थी? कह रहा था : ‘हम तो जीवित होते हुए भी मरे हुए हैं, हमारी मौत मकौड़े की मौत के बराबर है, इसलिए क्यों न अपना बेकार रक्त देकर अपने पीछे के लोगों को सुखी करें।’’ आरिब ने कहा।

‘‘हां यार, यह मरियल लाल बैल बड़ा शरारती है। उसका हाल देखा है : मटर वाले की मार ने उसका मांस तो गला ही दिया है, बाकी ऊपर का कंकाल जा बचा है, तो भी शरारत नहीं छोड़ रहा,’’ वलू ने गुस्से से कहा।

‘‘वो सब तो ठीक है, लेकिन अब इस बात पर आईए कि आखिर करें क्या?’’

‘‘करेंगे क्या! मैं बैलों के बुजुर्गों को धमकाकर आया हूं कि अपने लड़कों को समझाइए, हम फिर भी आपस में हैं, छाया में रखेंगे, लेकिन अगर जमींदार को पता चल गया तो सबकी खैर नहीं,’’ पैरल ने बताया।

‘‘जमींदार!’’ खैरे से लगभग चीख निकल गई, ‘‘जमींदार तो पहले से ही ऐसे मौके की ताड़ में है कि कोई बहाना बनाकर हम सबको हमारे पुश्तैनी खेतों से बेदखल कर दे, अपनों को दे दे। हाल तो पहले से ही देख रहे हैं कि रोज रोज हमारे खेत जमींदार के बाहर से आए गुर्गों और खुशामदों के कब्जे में होते जा रहे हैं। खेती हो न हो, लेकिन जमींदार को अपना हिस्सा जरूर चाहिए। वह हमें कैसे भी भीख मांग मांगकर देना ही है।’’

‘‘सच कहते हो! अब तो दो पाटों के बीच फंस गए हैं, अगर बैलों की मानते हैं और ढील देते हैं तो पूरा काम हमें करना पड़ेगा, अगर जमींदार से मदद मांगते हैं तो उल्टे खेतों से ही हाथ धोना पड़ेगा। करें तो करें क्या!’’

‘‘जमींदार के आदेश पर बैलों पर पहले ही कम अत्याचार नहीं हुआ है। इस बात ने तो बैलों को उल्टे बिगाड़ दिया है।’’

‘‘फिर चाचा, खेत लुटाने से तो यह अच्छा नहीं होगा कि बैलों से समझौता कर लें। बैलों ने हमेशा हमारे लिए अपनी जान कुर्बान की है। लेकिन हम ऐसे है कि जो खुद तो अत्याचार करते ही हैं परायों से भी करवाते हैं, यह तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान है,’’ नौजवान ने कहा।

‘‘नहीं नहीं! ऐसा न हुआ है, न होगा। इन बेवकूफ बैलों के हाथों खुद को डरायें? ऐसा कैसे होगा। अपने बुजुर्गों को नहीं शरमाएंगे। इन बैलों को सबक सिखाएं फिर जो भगवान को मंजूर होगा,’’ बूढ़े ने सख्ती से कहा।

‘‘फिर भले ही हमारे हाथ कट जाएं, हमारे खेतों पर पराये कब्जा जमाकर हमें यहां वहां ठोकरें खाने पर मजबूर कर दें।’’

‘‘अच्छा अच्छा, ज्यादा बको मत,’’ बूढ़े ने गुस्से से कहा।

‘‘बेकार बकवास मत करो,’’ एक कंकाल, बूढ़े कमजोर बैल ने गुस्से से कहा, ‘‘क्यों बेकार बिगड़ गये हो, अपने दादा परदादाओं को देखो, किसी ने भी ऐसा नहीं किया, अपने मालिकों को जवाब देते हो। तौबा, तौबा, भवगान कुछ समझ दे तुम जवानों को।’’

‘‘हां चाचा, यह सब तो ठीक है, लेकिन तुमने कभी अपनी जिंदगी के बारे में सोचा है। नहीं, क्योंकि हमारी अक्ल पर, आंखों पर पर्दे चढ़ गए हैं, जिससे हमें कुछ भी नजर न आए और कोल्हू का चक्कर चलता रहे। हमारी आंखें बंद हैं तो हमारा शरीर भी कैद है। तुमने कभी सोचा है, तुमने कभी यह अनुभव किया है कि हमें किस प्रकार से धोखा दिया जा रहा है, किस प्रकार लूटा जाता है, हमारा रक्त किस प्रकार चूसा जाता है। हमें सोचना चाहिए, चाचा, हमें सोचना चाहिए,’’ एक नौजवान बैल ने जोश से कहा।

हमारे गले में सदियों सेे गुलामी का पट्टा बंधा है। इसलिए थोड़ी थोड़ी बात पर भी आप हड़बड़ा जाते हैं। इसी भय ने तो हमें बरबाद कर दिया है। जालिम हमारे भय का लाभ उठाकर, हम पर और ज्यादा जुल्म करते रहते हैं। सदियां बीत गईं, लेकिन वही कोल्हू का चक्कर, वही हल, वही पल पल का खेल, फिर अब जब हम कुछ जागृत हुए हैं तो आप बुजुर्गों में डर बैठ गया है। हम पीड़ा सहन कर रहे हैं, मार खा रहे हैं, लेकिन इसमें खुश हैं कि हमारी जिंदगियां गंदे पानी के डिब्बे की तरह नम्र और चुप हैं,’’ कांवरे बैल ने कहा।

मरियल लाल बैल, जो चुपचाप नजरें नीचे गढ़ाकर नौजवान बैलों की जोश भरी बातें सुन रहा था, औरों की ओर मुंह करके कहा, ‘‘भाईयो, इसमें हमारे बुजुर्गों का कोई दोष नहीं है, हकीकत में उन्हें कुछ अच्छे की उम्मीद नहीं होती है, इसलिए उन्हें विश्वास होता है कि यह परिवर्तन उनकी समस्या को और बढ़ायेगा।’’

‘‘लेकिन चाचा, मौत ही मौत पर विजय प्राप्त करेगा। पीढ़ी को सुखी रखने के लिए, फिर से जिंदा होने के लिए, हम में से हजारों को मरना पड़ेगा।’’

‘‘लेकिन साहब, मालिक धमकी देकर गए हैं कि हम जमींदार से मदद लेकर ऐसा सबक सिखाएंगे कि आपकी पीढ़ियां भी याद रखेंगी,’’ बूढ़े बैल ने डरते हुए कहा।

‘‘हमेशा से ही ऐसा होता आया है। लेकिन हमारे मालिक यह नहीं समझते हैं कि ऐसे करके वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। चाचा, आपने भी वक्त देखा है। जब भी हमारे मालिकों ने अपनों को डराने और अत्याचार करने के लिए परायों से कोई मदद मांगी तो अपना सब कुछ गंवा बैठे।’’

‘‘हमारे मालिक खुद तो अंधेरे में रहते ही हैं लेकिन चाहते हैं कि बाकी लोग भी अंधेरे में रहें। अक्ल की रोशनी तो दिनों दिन फैलती जाएगी, फिर जो उस रोशनी के सामने हाथ देगा वह खुद अंधेरे में रहेगा,’’ मरियल लाल बैल ने कहा।

‘‘हम तो अपनी उम्र खो चुके हैं। अगर आप अधिकार पर हैं तो भगवान आपकी मदद करेगा,’’ बूढ़े बैल ने लाचार होकर कहा।

किसानों की रही सही उम्मीद भी समाप्त हो गई। आखिर उन्होंने निर्णय किया कि जमींदार से मदद मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

वे डरते डरते, जमींदार के आलीशान बरामदे में घुसे। जमींदार फूंका हुआ एक बड़ी कुर्सी पर लेटा हुआ था। उसके चारों ओर चापलूस डेरा डाले बैठे थे, नाखून से लेकर चोटी तक जमींदार पर कुर्बान हो रहे थे। किसानों पर नजर पड़ते ही उनकी आंखें गीदड़ की आंखों से भी तेज चमक उठीं।

‘‘साहब, राम राम। जमींदार व उसका परिवार कुशल मंगल हो,’’ सभी बाहर से आए लोगों ने बड़े ही ठंडे व नम्र भाव से कहा।

‘‘हूं?’’ जमींदार काले नाग समान फुफकारा।

‘‘किस काम से आए हैं?’’ उसने रौब से पूछा।

‘‘साहब, हमारे बैलों ने खुली बगावत कर दी है। उन्होंने काम करने से और हमारा आदेश मानने से साफ इन्कार कर दिया है। हमने उनको आपका डर भी दिया, लेकिन वे जिद पर अड़ गए हैं,’’ पेरल ने अदब के साथ हाथ बांधकर विनती की।

‘‘हूं? इन बेवकूफ जानवरों के खाली दिमाग में यह हवा किसने भरी है, और आप जानवरों को समझा भी नहीं सकते, बस थोड़ी थोड़ी बात पर यहां दौड़कर चले आते हैं। हमने पहले ही कहा था कि अब आप सब भी अपने बैलों की तरह निकम्मे और नाकारा हो गए हैं। आप में अब कोई गुण शेष नहीं रह गया है। अब आपसे परिश्रम नहीं होता है और एकदम जाहिल हो गए हैं। आपको नए तरीकों से खेती करनी नहीं आती। इन खेतों से हमें क्या मिल रहा है! इसलिए हम पहले से ही कह रहे थे कि अब ये खेत बाहर से आए परिश्रमी और होशियार लोगों से जुतवाना चाहिए। आप सब लोगों ने तो खेतों का एकदम कचूमर निकाल दिया है।’’

‘‘लेकिन साहब, वर्षों से हमारे दादा परदादा ये खेत आबाद करते आ रहे हैं। नए तरीके हम भी सीख सकते हैं।’’

‘‘बस बस, ज्यादा बकवास मत कर। अपनी जबानों को हमेशा बंद रखिए,’’ उसने बात काटते कहा। ‘‘इन बेवकूफ जानवरों का दिमाग भी तुम लोगों ने ही खराब किया है। इनके साथ तुम लोगों को भी ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो पूरी उम्र याद रखें।’’ उनने अपने गुर्गों को इशारा किया जो पहले से ही इशारे की ताक में बैठे थे। केवल निवाला डालकर चबाने की देर थी। गांव वालों ने बेबस होकर एक दूसरे की ओर देखा। उनके हाथों से जैसे कोई चीज निकल गई थी। वे ऐसे डग भर रहे थे जैसे कि कत्ल होने जा रहे हों।

‘‘तेज चलो, पैरों में बेड़ियां हैं क्या?’’ उन्हें जानवरों की तरह जोर जोर से पीछे से धकेला गया।

जवान बैल बैलियां, नौजवान बछड़े बछड़ियां, दूर दूर से आकर अपने खेतों को बचाने के लिए इकट्ठे हुए थे। कोई बड़ी उम्र वाला बैल बीते वक्त का दुखड़ा रो रहा था तो कोई नौजवान बैल भविष्य के शानदार सपने देख रहा था, तो कोई मजबूत इरादे वाला बैल सभी में जोश फूंकने का काम कर रहा था। मरियल लाल बैल सबके आगे आगे था। वह जोर जोर से कह रहा था : ‘‘हमें हमेशा से अक्ल का अंधा और दिमागी तौर पर गुलाम समझा गया है, हमे अंधेरे में रखा गया है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम अपने दुश्मनों, अपने मालिकों के आगे यह सिद्ध कर दें कि अक्ल और ज्ञान की रोशनी को कोई नहीं रोक सकता। हमने अधिकार और सच्चाई को परखकर पहचान लिया है... साथियो, आपको पता है कि आपकी क्या कीमत है। उस कीमत को नहीं मानें, जो आपका रक्त चूसने वालों ने आपकी तय की है। आपको खुद अपनी कीमत लगानी चाहिए-असल कीमत तो आपके अंदर है...’’

सभी बैलों में जबरदस्त जोश और उथल पुथल थी। वे सर पर कफन बांधकर आए थे। सदियों के बाद वे जागृत हुए थे और कोल्हू के चक्कर को ढहाने के लिए, सर की कुर्बानी देने के लिए, परायों से खेतों को बचाने के लिए आकर इकट्ठे हुए थे।

दुश्मन दूर से धकेलता आ रहा था। दुश्मनों को देखकर जोश के मारे बैलों के बाल खड़े हो गए। लाल बैल ने खबरदार करते कहा, ‘‘साथियो, किसी भी चीज से मत डरना। आखिर भी हमारी जिंदगी से भयानक और कड़वी चीज और क्या होगी! वह कड़वाहट जो रोज हमारे दिल के टुकड़े टुकड़े कर रही है! शाबास साथियो, सभी मिलकर एक मजबूत ताकत बन जाएं।’’

दुश्मनों में नाखून से लेकर चोटी तक घबराहट फैल गई। उन्होंने किसानों को आगे धकेलकर एक जोरदार हमला कर दिया।

‘‘अब अपने और परायों को न देखो, रक्त की नदियां भी सच्चाई को डुबो नहीं पाएंगी,’’ बैलों के नेताओं ने नारा लगाया।

उसके बाद जंग छिड़ गई। हजारों के सर गिरते रहे, लाखों सर उठते रहे। रक्त की नदियां बह निकलीं। आकाश काला पड़ गया, जैसे कि कयामत थी, ऐसा ही नजारा था और जालिमों का अंत हो रहा था। सदियों के सतायी, सूखी और बंजर जमीन को रक्त ने लाल और गीला कर दिया और जैसे कि उसे रक्त से सींचा गया... एक नई क्षमता, एक नई ताकत मिल गई।

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आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र 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रचनाकार: रक्त की सींच // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
रक्त की सींच // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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