आँखों में टंगे सपने // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी


रैक से पुस्तक निकालते, देखते और वापस रखते कंवल ने महसूस किया कि किसी की आंखें उसको लगातार घूर रही हैं। उसने एक दो बार आढ़ी तिरछी नजरों से उस व्यक्ति की ओर देखा और कतरा गयी। परंतु व्यक्ति था जो पत्थर बना खड़ा था। कंवल पुस्तक देख रही थी और वह कंवल को देख रहा था। कंवल को सख्त खीज हुई। उसने क्रोध में सीधे उस व्यक्ति के मुंह में घूरकर देखा। उसकी नज़रों को जैसे धक्का लगा।

‘जॉनी!’ नाम उसके होंठों पर आ गया। उसकी आँखों में खीज की जगह आश्चर्य भर गया। कुछ पल के लिए नज़रें जम गयीं।

‘‘हैलो...’’ पत्थर बन गये शरीर में हलचल पैदा हुई। कंवल ने सोचा वह एकदम वहां से चली जाये। जिस हाथ में पुस्तक पकड़े हुए थी उस हाथ में थोड़ा डर महसूस किया। उसने मुंह घुमाकर पुस्तक रैक में रखा। उससे अपनी बेरुखी ठीक नहीं लगी।

‘‘यहां पर कब से खड़े हो?’’ उसने औपचारिकता से पूछा।

‘‘जब से तुम दुकान में आई हो,’’ जॉनी की आवाज घुटी हुई थी।

‘‘लेकिन मुझे तो दस पंद्रह मिनट हो गए हैं। इतनी देर में तुमने बात भी नहीं की! अगर मैं तुम्हें न देखती और चली जाती तो भी तुम बात नहीं करते?’’

‘‘मैं इतनी देर तक सोचता रहा कि तुम्हारा ध्यान अपनी ओर कैसे आकर्षित करूं ,’’ उसने हंसने की कोशिश की। दुकान पर खड़े लोगों की तिरछी नज़रें और ध्यान उनकी ओर था। दोनों दुकान से बाहर आ गए।

‘‘अगर तुम्हें जल्दी न हो तो कहीं पर एक घंटे के लिए बैठें?’’जॉनी ने फुटपाथ पर आकर पूछा। कंवल ने इन्कार करना चाहा। जॉनी उतावली नजरों से उसे देख रहा था। वह इन्कार नहीं कर पाई।

‘‘साफ है, एक घंटे के लिए तो बैठना ही है,’’ कंवल ने मुस्कराते कहा और सोचा : ‘यह एक घंटा ही तो हमारे नसीब में है।’

जॉनी ने कार का दरवाजा खोला और कंवल को बैठने के लिए कहा। उसने कार को स्टार्ट किया और रोड पर लाया।

‘‘कैसे हो?’’

‘‘तुम्हें कैसा लग रहा हूं?’’

‘‘पहले से ज्यादा स्लिम और स्मार्ट।’’

‘‘हुं...’’ मुस्कान जख्म की तरह उसके होंठों पर फैल गई।

‘‘दो वर्षों में तुम बिल्कुल नहीं बदली हो। मैं तो बूढ़ा हो गया हूं... देख, बालों में सफेदी आ गई है...’’

वह हंसने लगा, फीकी हंसी।

कंवल ने उसके सर को देखा। उसे काले बालों में कुछ सफेद बाल नज़र आए। उसने फिर से जॉनी के चेहरे में देखा। वही चेहरा था। मासूम, अपनापन महसूस कराने वाला और दूसरे को खुद की ओर आकर्षित कराने वाला। आँखें खंडहर थीं, बेबसी और बुजदिली के निशान। कंवल के मन में नफरत पैदा हुई। एक पल के लिए उसे जॉनी से नफरत का अहसास हुआ।

‘बुज़दिल...बुज़दिल...’ शब्द लगभग उसके होंठों पर आ गए थे। उसने निचले होंठ में दांत दबा दिए।

‘‘क्या सोच रही हो?’’

कंवल हड़बड़ाई और लौट आई।

‘‘तुम्हारी बूढ़ी बनने की सोच रही थी।’’

जॉनी ने ठहाका लगाया।

‘‘एक लोग बूढ़े हो जाने के बाद भी दिमागी तौर पर जवान होते हैं और हम जैसे टूटे लोग जवान होते हुए भी दिमागी तौर पर खुद को बूढ़ा महसूस करते हैं।’’

कंवल ने कोई उत्तर नहीं दिया। दोनों चुप थे। कार शहर के शोर से निकलकर बाहर बड़े चौड़े रास्ते पर आ गई थी। जॉनी ने एक कूल कॉर्नर के पास गाड़ी साइड करके खड़ी की। उसने हॉर्न बजाकर लड़के को बुलाया और उसे स्नैक्स और कोक लाने के लिए कहा।

‘‘दो वर्ष कोई इतना बड़ा वक्त नहीं, लेकिन इस वक्त में बहुत कुछ हो सकता है। हमें एक दूसरे का कुछ पता न चल सका। इसलिए हालचाल देना आवश्यक है, क्यों?’’ जॉनी ने कहा।

‘‘हालचाल कुछ खास तो नहीं। मैं एम.ए. करने के बाद घर जाकर बैठ गई। लेकिन बाद में बोर हो गई। बोरियत के कारण घर वालों से रोज खटपट होती थी। इतनी हद तक कि घर के लोग मुझसे तंग आ गए और मैं घर के लोगों से।’’ वह हंसने लगी। ‘‘आखिर नौकरी आकर की। अब यूनिवर्सिटी में लेक्चरार हूं।’’

‘‘रहती किधर हो?’’

‘‘वहीं कैम्पस में घर मिला है।’’

‘‘अकेली?’’

‘‘हां, क्यों? आदमी अकेला नहीं रह सकता क्या? मेरे साथ एक औरत रहती है, उसे कोई घर नहीं है। घर का कामकाज करती है और मेरे साथ ही रहती है।’’

‘‘तुमने... शादी नहीं की है?’’ जॉनी ने हिचककर पूछा। कंवल उसका मुंह ताकने लगी। फिर उसके होंठों पर फीकी मुसकान आई और उसने मुंह फेर लिया।

जॉनी को अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ।

लड़का स्नेक्स और कोक लेकर आया था। कुछ देर तक चुप रहने के बाद कंवल ने कहा, ‘‘तुम बताओ? तुम्हारे क्या हाल हैं?’’

‘‘मैं तो अब ज्यादातर गाँव में रहता हूं। पिताजी के गुज़र जाने के बाद ज़मीनें संभालने का पूरा काम मुझे ही करना पड़ता है। इसलिए बाहर निकलने के लिए ज्यादा वक्त नहीं मिलता। काम करने में ही पूरा वक्त निकल जाता है?’’

‘‘बच्चे कितने हैं?’’

‘‘अभी तो एक बच्चा हुआ है, लड़का है,’’ उसने बाहर रास्ते पर देखते हुए कहा।

‘‘खुश हो?’’ कंवल का प्रश्न अप्रत्याशित था। जॉनी ने उसकी ओर देखा।

‘‘अगर मैं ‘नहीं’ कहूंगा तो ये बात तुम्हें झूठ लगेगी। हकीकत ये है कि औरों की मर्जी के आगे गर्दन झुकाकर शादी करने के बाद मैंने ये सोचना छोड़ दिया है कि मैं खुश हूं या नहीं! तुम्हें पता है मेरी कोई मर्जी नहीं। मेरा अपना कोई अधिकार नहीं,’’ उसने जैसे खुद को ताना मारा। ‘‘मुझे औरों की मर्जी के मुताबिक जीना है। मैं खुश हूं या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ उसकी आवाज भारी हो गई थी।

दो वर्ष पहले यूनिवर्सिटी में जब जॉनी के पिता का पत्र आया था, तब उसने कंवल को ऐसे ही दुखी और भारी लहजे में कहा था, ‘‘पिताजी ने पत्र में लिखा है कि शादी पक्की हो गई है। मेरे चाचाजी को केवल एक ही लड़की है, और कोई औलाद नहीं। ज़मीन बहुत है। पिताजी मेरी शादी इसलिए करवाना चाहता है ताकि चाचाजी की जायदाद हमारे पास रहे, बाहर न जाये। और मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि इन्कार कर पाऊं। पिताजी और चाचाजी की मर्जी के आगे झुकने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं...’’

‘‘तुम बुजदिल हो...’’ कंवल ने उसकी बेबसी पर दुख और क्रोध से डरते कहा था।

‘‘हां, तुम सच कह रही हो। मैं बुजदिल हूं। मैं मानता हूं कि मैं बुजदिल हूं।’’ और फिर वह गर्दन झुकाकर लड़खड़ाते कदमों से चला गया था।

कंवल को अब भी वही दुख और वही क्रोध महसूस हुआ। उसने कहना चाहा, ‘तुम बुजदिली के आदि हो गए हो। तुम कभी खुश न रह पाओगे।’ लेकिन जॉनी की आंखें देखकर उसे उसके ऊपर रहम आ गया। कुछ लोगों के नसीब में केवल दुख, केवल भोगना ही क्यों होता है? और क्या यह ज़रूरी था कि जॉनी मेरी जिंदगी में आता, या मैं जॉनी की जिंदगी में आती। हमारी जिंदगी में क्या कोई नॉर्मल बैलेंस्ड आदमी नहीं आ सकता था और अगर आता तो शायद हम ऐसे न होते, जैसे आज हैं। यह आदमी के ज़ाती (अंदरूनी) हालात हैं, जो उसे बाहरी जिंदगी में बना या बिगाड़ देते हैं...’

‘‘मैं तुम्हारे घर आ सकता हूँ?’’ जॉनी को चुप अच्छी न लगी।

‘‘क्या मुझे औपचारिक दावत देनी पड़ेगी?’’

जॉनी हंसने लगा।

‘‘जब चाहे तुम आ सकते हो।’’

फिर से शांति छा गई। दोनों के पास बोलने के लिए कुछ था ही नहीं।

‘‘अब चलना चाहिए,’’ कंवल ने घुटन महसूस करते कहा।

‘‘ठीक है,’’ जॉनी ने कार स्टार्ट की। ‘‘मुझे घर का पता दो तो तुम्हें ड्राप करता जाऊं।’’

कंवल ने उसे ऐड्रेस बताई और सोचा : ‘कितनी अजीब बात है। हमने साथ रहना, साथ जीना चाहा था लेकिन अब हमें ये भी पता नहीं कि हजम रहते कहां हैं और कैसे जीते हैं?’

कार जब कंवल के घर के आगे आकर खड़ी हुई तो उसने जॉनी को अंदर चलने का निमंत्रण दिया।

‘‘नहीं, आज नहीं, तुम्हारे पास कल आऊंगा शाम को।’’

और उसने हाथ हिलाकर कंवल से विदा ली।

सुबह नींद से जागते ही कंवल के दिमाग में शाम का इंतजार शुरू हो गया। यूनिवर्सिटी में क्लास लेते, स्टॉफ रूम में औरों से बतियाते उस पर शाम का इंतजार हावी था। उसे अपनी इस बेचैनी और इंतजार वाले स्वभाव से शर्मिंदगी होने लगी। उसे अपने ऊपर क्रोध आया। लेकिन फिर भी वह अपने इस स्वभाव से जान न छुड़ा सकी। उसे विचार आया : अकेली उदास शामों का अंत तो होना ही नहीं है, इस एक शाम को जॉनी आ भी गया तो क्या हो गया। उसके बाद भी तो यही शामें होंगी और अकेलापन होगा।

शाम को जॉनी ने आते ही उससे पूछा, ‘‘तुम ऐसे अकेली कैसे रह लेती हो! तुम्हें घुटन नहीं होती?’’

‘‘नहीं तो, मैं अकेली कहां हूं, यूनिवर्सिटी से लौटकर आकर सो जाती हूं। रात को टी.व्ही. देखती हूं या पुस्तक पढ़ती हूं। कभी कभी शाम को कोई सहेली आ जाती है। और घर में बाई तो है ही, समस्या है वक्त काटने का, वो तो गुज़र ही जाता है।’’

‘‘हां, समस्या है वक्त काटने का, जो ऐसे नहीं कटता जैसा हम चाहते हैं। लेकिन खैर, हमारे न चाहते हुए और हमारी मर्जी के खिलाफ भी कट ही जाता है,’’ जॉनी ने कमरे के चारों ओर देखते कहा। ‘‘लेकिन अकेलेपन में जो वहशीपन है वह आखिर व्यक्ति को थका देता है। सच बताओ, तुम अपनी जिंदगी से खुश हो?’’

कंवल ने ठहाका लगाया। जॉनी को लगा कि उसने उसके प्रश्न को ठहाके में उड़ा दिया है।

‘‘लोगों को मेरा इस तरह से रहना अजीब लगता है। इस समाज में अगर कोई भी औरत आजाद रहे तो लोगों के बहसबाजी का विषय बन जाती है। लेकिन मुझे परवाह नहीं। मैं अपनी मर्जी के मुताबिक जीना चाहती हूं। और अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी के मुताबिक जी रहा है तो उसे खुश होना चाहिए। मैं खुश नजर नहीं आती क्या?’’

जॉनी चुपचाप उसे ताक रहा था।

‘‘मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?’’ कंवल ने मुस्कराते हुए कहा। जॉनी ने कोई उत्तर नहीं दिया, केवल देखता रहा।

‘‘प्लीज़, मुझे ऐसे मत देखो।’’ जॉनी की नज़रें कंवल के मन में हलचल पैदा कर रही थीं। उसने आंखें नीचे करके जॉनी की नज़रों से खुद को छुड़ाना चाहा।

जॉनी अपनी जगह से उठकर कंवल के पास आकर बैठा। उसका हाथ अपने हाथ में लेते उसने कहा, ‘‘कंवल, हम दोनों खुश नहीं हैं और दोनों यह बात छुपाने की कोशिश कर रहे हैं।’’

कंवल ने अपनी गर्दन जॉनी के कंधे पर रख दी। ‘काश! वक्त थम जाए... हम दोनों घी शक्कर बन जाएं। कितना सुकून और आराम है जॉनी के कंधे के सहारे में। सहारे के बिना जिंदगी काटना कितना मुश्किल है, लेकिन यह सहारा टेम्प्रेरी है। आज है, इस पल है। कल न होगा...’

‘‘कंवल,’’ जॉनी बुदबुदाया।

‘‘जॉनी...’’

जॉनी ने कंवल का चेहरा अपने हाथों में पकड़कर उसकी आँखों में देखा।

‘‘तुम मुझे ऐसे क्यों देखते हो?’’ कंवल के होंठ हिलने लगे थे। जॉनी ने उसके हिलते होंठों में अपने होंठ लगा दिये। कंवल को लगा कि उसका वजूद निष्प्राण होता जा रहा है। शरीर में कोई लहर उठने लगी थी और उसकी सांस खिंचकर होंठों में आ फंसी थी।

कंवल स्टॉफ रूम में अकेली बैठी थी। बाकी सभी बाहर कॉरीडोर में धूप में बैठे थे। कल शाम वाली बोरियत अभी तक उस पर छायी हुई थी, जॉनी काफी वक्त के बाद आया था और आते ही कहा था, ‘‘आवश्यक काम से आया था, आज ही वापस गाँव जाना है। सोचा कुछ देर तक तुम्हें देखता चलूं।’’

‘‘इस कुछ देर के लिए आने की ज़रूरत क्या थी?’’

‘‘वैसे तुम्हें देखने के लिए बहुत दिन हो गए थे,’’ जॉनी मुस्कराया, कंवल को चिढ़ हो गई। उसने जॉनी की ओर देखा और होंठ को ज़ोर से काटकर मुंह फेर लिया।

‘‘एक तो तुम्हें क्रोध बहुत आता है और जब आता है तो उसे दबा देती हो। लड़ती कर, गालियां देती कर, अपने लंबे नाखूनों से मेरा मुंह नोचती कर, लेकिन अपने होंठ को ऐसे बेहूदगी से काटकर लहूलुहान मत किया कर।’’

‘‘ठीक है। मेरी मर्जी। मैं अपने क्रोध को खुद पर उतारना चाहती हूं, होंठ मेरा है। बाकी सब खैर है,’’ कंवल ने क्रोध को रोककर सब्र से उत्तर दिया।

‘‘होंठ तो तुम्हारा है, लेकिन तकलीफ मुझे हो रही है।’’

कंवल ने देखा कि जॉनी की आंखों में शरारत थी।

‘‘क्यों? तुम्हें तकलीफ क्यों होनी चाहिए?’’

‘‘कटे हुए होंठ को चूमने में तकलीफ न होगी?’’

जॉनी ने ठहाका लगाया। वह मुस्करा भी न पाई। लेकिन नहीं, उसके दांत दिखे थे, जिससे कि जॉनी ये न समझे कि उसने उसके मज़ाक को enjoy न किया है। उसके बाद वह जल्दी चला गया।

सब कुछ नए सिरे से शुरू हो चुका था। जॉनी अब महीने में एक दो बार उसके पास आता था। कंवल ने सोचा कि यह सब शुरू क्यों हुआ। और इसका अंत कैसे होगा... ‘हम आज भी वहीं खड़े हैं जहां से अलग हुए थे। हमें बहुत कुछ बदल जाना चाहिए था, इस वक्त हमें वैसा नहीं होना चाहिए जो हम दो वर्ष पहले थे। वैसे बहुत कुछ बदल गया है। हालात... वक्त... फिर भी हम दोनों एक दूसरे के लिए वही हैं। उसी तरह सोचते हैं, ये कौन-सी सज़ा है? वह पीड़ा जो दो वर्ष पहले हमारी जिंदगी में घुस आई थी वह हमेशा रहेगी? यह क्या है? क्या है? उसने चाहा कि चीखे, ‘यह सरासर भावुकता है, पागलपन है।’ तभी उसने पागलों के समान ठहाके लगाने चाहे। लेकिन कोई टीस थी जो गले में आकर अटकी थी। उसे खुद से नफरत का अहसास हुआ।

‘‘कंवल,’’ किसी ने अंदर आकर उसे बुलाया।

कंवल ने खुद को सामान्य करने की कोशिश की। सल्मी उसे आश्चर्य से देख रही थी।

‘‘क्या बात है? तबियत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘ऐसे ही बैठे बैठे सांस घुटने लगा था।’’

‘‘यह तो खतरनाक है। डॉक्टर को दिखा। इससे हार्ट अटैक भी हो सकता है।’’

‘‘हां, आज शाम को डाक्टर के पास जाऊंगी,’’ कंवल ने बात पूरी करनी चाही।

‘‘एक बात पूछूं,’’ सल्मी ने उसके पास बैठकर अपनेपन से कहा।

‘‘क्या बात है?’’

‘‘जॉनी क्या अब तुम्हारे पास रोज आता है?’’

‘‘कहें तो काफी पब्लिसिटी हो गई है,’’ कंवल मुस्कराने लगी।

‘‘लोगों का तो तुझे पता है और वे भी यहां के! हमेशा इस ताड़ में रहते हैं कि उन्हें किसी की कोई बात हाथ आ जाए।’’

‘‘मुझे पता है कि लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं। उनकी नज़रों में मैं बदनाम हूं। जानती हूं। लेकिन ये सभी बातें तो बेचारों के लिए बड़े मनोरंजन की हैं नहीं तो इस रेगिस्तान में और रखा ही क्या है?’’

‘‘लेकिन कंवल, आखिर यह चक्कर क्या है?’’

‘‘कौन-सा चक्कर?’’

‘‘यही, जॉनी का तुम्हारे पास आना। एक मित्र की हैसियत से मेरी तुमसे विनती कि तुम शादी कर लो। बेकार बदनामी से क्या लाभ? मैं तो किसी से तुम्हारी निंदा सुनती हूं तो उससे लड़ पड़ती हूं।’’

‘‘तुम आखिर कितना लड़ोगी मेरे लिए,’’ कंवल हंसने लगी। ‘‘लोगों को बोलने दो।’’

‘‘अब तुम्हें कौन समझाए। अच्छा उठो तो बाहर चलकर धूप में बैठें। कमरा तो देखो कितना ठंडा है,’’ सल्मी उसे बाहर ले आई।

ठंड का मौसम पूरे जोर पर था। तेज ठंडी हवाएं लग रही थीं। आकाश में बादल छाए हुए थे और कभी कभी बूंदें बरस रही थीं। ठंड और बढ़ गई थी। बाहर तेज ठंडी हवाएं नोक की तरह चुभने लगी थीं और अंदर कमरे में हीटर की गर्मी के कारण घुटन थी। कंवल सख्त डिप्रेस्ड थी। उसे कोई बात नहीं सूझ रही थी कि इस डिप्रेशन से कैसे जान छुड़ाए। न ही पुस्तकों की कहानियों में मजा था और न ही टी.व्ही. पर कोई अच्छा कार्यक्रम ही था। दरवाजे पर दस्तक हुई तो वह हड़बड़ा गई। अभी रात को आठ बजे कौन आया होगा?

बाई ने जाकर दरवाजा खोला और जल्दी जल्दी कदम उसके कमरे की ओर आए।

‘‘जॉनी!’’ वह उठ खड़ी हुई और उसकी आंखों में चमक आ गई। ‘‘मैं सख्त डिप्रेशन फील कर रही थी। यह तो सोच भी नहीं सकती थी कि ऐसे अचानक आ जाओगे...’’

‘‘अभी भी डिप्रेशन है?’’ जॉनी ने मुस्कराकर पूछा।

‘‘नहीं! अब तो डिप्रेशन का नाम भी नहीं है,’’ कंवल ने ठहाका लगाया। ‘‘बाहर तो काफी सर्दी है। ओह... तुम्हारे हाथ कितने ठंडे हैं, बर्फ समान!’’ कंवल ने जॉनी के हाथ अपने हाथों में लिए। सर्दी की वजह से जॉनी के होंठ नीले पड़ गए थे और नाक बर्फ के समान ठंडा था। कंवल ने उसे खींचकर हीटर के पास किया और अपना मुंह उसके होंठों और नाक पर रगड़ने लगी।

‘‘इतनी सर्दी में निकलने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘बस, अचानक ख्याल आया और चला आया। अभी सीधा गाँव से ही आ रहा हूं। ‘‘Poor Soul’’ कंवल ने अपने होंठ उसके होंठों पर फिराते हुए कहा, मैं तुम्हारे लिए गर्म गर्म कॉफी बनाकर लाती हूं।’’

‘‘कॉफी तुम्हारे होंठों से ज्यादा गरम न होगी। बैठ, एक जरूरी बात कहनी है।’’

कंवल ने उसकी संजीदगी को बड़े आश्चर्य से देखा और बैठ गई।

‘‘मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं,’’ जॉनी जल्दी जल्दी में कह गया। कंवल को वह सख्त बेवकूफ लगा।

‘‘यह बात कहने के लिए तुम इतनी सर्दी में गांव से आए हो,’’ वह हंसने लगी।

‘‘प्लीज, कंवल! मैं सीरियस हूं...’’

‘‘लेकिन मैं नहीं चाहती,’’ कंवल ने हंसी रोककर संजीदगी से कहा।

‘‘क्यों?’’ जॉनी को जैसे इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी।

‘‘बस, मैं नहीं चाहती, मेरी मर्जी,’’ उसने मुंह बनाकर कहा।

‘‘कंवल, बात को समझने की कोशिश करो। हमारा इस तरह से मिलना ठीक नहीं। लोग बातें करने लगे हैं।’’

‘‘लोग... लोग...’’ उसने तंग होकर कहा। ‘‘लोगों का काम है बातें करना। तुम अगर लोगों से डरकर मुझसे शादी करना चाहते हो तो मुझे नफरत है इससे।’’

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था,’’ जॉनी परेशान हो गया। ‘‘कंवल, तुम्हें पता है कि मैं अपनी निजी जिंदगी में कितना दुखी हूं। एक दलदल है जिसमें फंसता जा रहा हूं। केवल तुम ही मुझे बचा सकती हो। मुझे तुम्हारे प्यार की छाया चाहिए। लेकिन यह हालात कब तक रहेंगे? तुम्हारे लिए भी यह ठीक नहीं। हमारे समाज में यह इज्जतदार तरीका नहीं, क्योंकि हमारे समाज में ऐसी औरतों को ‘सिरीत’ कहा जाता है। तुम मेरे लिए keep नहीं हो और मैं तुम्हारे लिए कोई भी ऐसी बात सहन नहीं कर सकता।’’

‘‘ठीक है। keep बनकर रहने के लिए मैं भी नहीं चाहती। लेकिन इसके साथ ही यह भी नहीं चाहती कि मुझे तुम्हारी दूसरी औरत का नाम दिया जाए, जो आम भाषा में पहाज होती है। अगर लोगों की बात करते हो तो वे यह भी कहेंगे कि मैंने तुझसे शादी इसलिए की है क्योंकि तुम्हारे पास पैसा है, ज़मीनें हैं, कार और बंगला है। नहीं, मैं औरों की नजर में अपना यह किरदार कभी भी पसंद नहीं करूं गी।’’

‘‘वैसे तो तुम कहती रहती हो कि तुम्हें लोगों की परवाह नहीं, फिर इस बात में परवाह क्यों करती हो?’’

‘‘मैंने कभी भी परवाह नहीं की है। अगर परवाह करती तो ऐसे अकेली नहीं रहती और तुमसे न मिलती। लेकिन मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि मुझे लालची समझा जाए औा ऐसा कहा जाए कि मैंने तुम्हें दौलत के कारण फंसाया है। तुम्हारी पत्नी और तुम्हारे रिश्तेदार भी तो ऐसे ही समझेंगे।’’

‘‘ओह कंवल...’’ जॉनी सर को रगड़ने लगा।

‘‘जानी तुम मेरी पोजीशन को समझने की कोशिश कर। मैं खुद को दिमागी तौर पर गिरा नहीं सकती...’’ कंवल ने उसके गले में बांहें डालते कहा।

जॉनी कुछ देर तक चुप करके बैठा रहा। फिर कह, ‘‘न कंवल, मुझे ये हालात अच्छे नहीं लग रहे। तुम फिर से सोचो। मैं कल इस वक्त तुम्हारे पास आऊंगा।’’ वह उठ खड़ा हुआ और जाने लगा। कंवल ने उसे रोकना चाहा, लेकिन रोक खुद को लिया, कुछ कहने से। वह चुपचाप बाहर के दरवाजे तक उसके साथ आई। जॉनी दरवाजा खोलकर पीछे मुड़ा और कंवल को देखता रहा। कंवल ने चाहा कि वह उससे कहे : ‘तुम्हें पता है कि मैं तुम्हें क्यों कहती हूं कि तुम मुझे ऐसे मत देखा करो? मुझे लगता है जैसे कि तुम मुझे आखिरी बार देख रहे हो...’ और तब तक जॉनी दरवाजा बंद करके जा चुका था।

शाम से न कटता वक्त खींच खींचकर गुजर गया। रात सरकती ज्यादा सर्द होती गई। दस बज गये। डिप्रेशन की बहुत बड़ी लहर उठी आर कंवल के ऊपर छा गई। उसके सर में सख्त दर्द होने लगा। वह उठ खड़ी हुई और फिर कमरे में चलने लगी। अचानक उसे ख्याल आया कि जॉनी नहीं आएगा। अब कभी नहीं आएगा। कंवल डर गई। उसे अपने विचारों पर विश्वास न हुआ। वह यह बात मानने को तैयार न थी। तभी उसके मन में ज़ोरदार ख्वाहिश उठी सिगरेट पीने की और अपने अंदर बड़े न भरने वाले खाल को धुएं से भरने की। उसने अल्मारी खोली। जॉनी के सिगरेटों के चार पांच पैकेट पड़े थे। कंवल एक पैकेट और माचिस लेकर कुर्सी पर आ बैठी। उसने पैकेट खोलकर सिगरेट निकाला और उसका दिल भर आया। होंठ को जोर से काटकर खुद को रोने से रोका। एक कतरा उसके मन के समान भटककर हाथ पर आ गिरा। कंवल ने हाथ ऊपर उठाकर जबान से उस कतरे को पोंछ दिया। (जायका कड़वा नमकीन उसकी जिंदगी की तरह!) उसने सिगरेट जलाकर एक लंबा कश खींचा। धुआं उसके फेफड़ों में भर गया और वह खांसने लगी। दो वर्ष पहले जब जॉनी ने शादी की थी, कंवल ने पहली बार सिगरेट पिया था। तब भी उसे खांसी हुई थी। कितने लंबे समय के बाद उसे फिर से सिगरेट पीने की ख्वाहिश हुई थी। कंवल को ध्यान आया कि वह जल्दी जल्दी कश खींच रही थी और उसका हाथ कांप रहा था। पत्ते सब गिर गये थे और वह अपने आंगन में सूखे पत्तों की खर खर की आवाज साफ सुन रही थी। सर्दी की हवा कमरे के खुले दरवाजे से अंदर घुस रही थी। कंवल ने उठकर दरवाजा बंद करना चाहा लेकिन उसने सोचा कि अगर जॉनी ने बाहर के दरवाजे की कुंडी खटखटाई तो! सुन कैसे सकेंगे? बाई तो सोई होगी। कंवल ने दरवाजे को बंद करने का विचार उतार दिया। उसने खुद को रजाई से अच्छी तरह ढंक लिया। सिगरेट खत्म होने को था। कंवल ने उस सिगरेट से नया सिगरेट जलाया और टोटा ऐश ट्रे में मरोड़ दिया।

‘अकेलेपन में इतना डर क्यों है? मैं हमेशा से ही भीड़ से दूर भागने वाली हूं। अकेलापन चाहते हुए भी कभी कभी ऐसा लगता है कि अकेलापन राक्षस की तरह मुझे निगलती जा रही है। नहीं नहीं, मैं कोई साधु संन्यासी नहीं हूं जो अकेली रहूं लेकिन अगर मैं गौतम बुद्ध के दौर में होती तो शायद भिक्षु बन जाना ज्यादा पसंद करती। लोग बड़े ज़लील हैं। दुनिया बड़ी ज़लील है और मैं बड़ी ज़लील हूं जो ज़लील दुनिया में जी रही हूं। वह अभी तक आया क्यों नहीं है? उसे आना चाहिए था। कम से कम आज... आज तो ज़रूर आए। अगर आज आया तो मैं उसकी बात मान जाऊंगी। एकदम हां कर दूंगी। मैंने हमेशा खुद को दो नावों पर सवार पाया है। तभी मुझे लगा कि मैं अब कि अब गिरी, एक बड़ी खाही में। हवा तो जोरदार है लेकिन पैर बेसुध हैं। जम ही गए हैं।’ कंवल को हंसी आ गई। सिगरेट का धुआं बाईं आंख में घुस गया और आंख में आग भर गई। दोनों आंखों में आंसू आ गए।

‘अकेलापन कितना मौतमार है...कितना खतरनाक है... कितना घोंटू है... और जॉनी कितना ज़लील है। मेरा अकेलापन...इतने सारे रेगिस्तान जैसे अकेलेपन का कुछ अहसास ही नहीं है। लेकिन अभी तक आया क्यों नहीं। आज तो आए। आज तो कैसे भी करके आना चाहिए। जॉनी...जॉनी... ज आ आ नी... ज आ आ आ आ न...’ उत्तर की तेज ठंडी हवा बाहर आंगन में सरसरा रही थी। उसकी चीखें सर्दी में जमी बर्फ बन गईं।

कंवल की उंगलियां जलने लगीं। उसने टोटा ऐश ट्रे में फेंक दिया। ऐश ट्रे सिगरेटों से भर चुकी थी और नीचे फर्श पर भी सिगरेट बिखरे पड़े थे। उसने नई सिगरेट जलाई। अचानक उसे महसूस हुआ कि बाहर की कुंडी खड़क रही है। वह बिना चप्पल बाहर दौड़ती गई और बिना पूछे दरवाजा खोला। बाहर कोई न था। एक कार सरसराती रास्ते से गुजर गई। सख्त सर्दी थी। कंवल दरवाजा बंद करके लौटकर कमरे में कुर्सी पर आकर बैठी और जल्दी जल्दी सिगरेट पीने लगी। उसे विचार आया और वह सिगरेटों का पैकेट और माचिस लेकर बाहर आंगन में आकर बैठी।

‘पूरी रात यहीं खड़े रहकर जॉनी का इंतजार करूंगी। चाहे कुछ भी हो जाए। चाहे सर्दी में जमकर बर्फ बन जाऊं। कमरे में बैठकर इंतजार करना अब मेरी सहनशक्ति से बाहर है। हर पल ऐसा लग रहा है, जैसे कि जॉनी बाहर सर्दी में दरवाजे पर खड़ा है। हो सकता है वह अब सर्दी में बाहर निकला हो। मुझे पता न था कि प्यार में इतनी पीड़ा भी है। इतनी तकलीफ! वह कौन पागल कलाकार था, जिसने अपनी प्रेमिका के बाप को यह दिखाने के लिए कि उसे उसकी लड़की से कितना प्यार है; जलती हुई मोमबत्ती पर अपना हाथ रखकर जलाया था। आखिर क्यों? क्यों? क्यों? क्या यही प्यार है? यह कैया पागलपन है... क्या जॉनी भी ऐसा ही महसूस करता होगा, जो मैं महसूस कर रही हूं? हो सकता है वो अब न आए। मेरा आखिरी उत्तर सुनने के लिए ही तो दरवाजे पर खड़ा रहा था। वह अब नहीं आएगा। ऐसा होना ही था। हम जब दोबारा मिले थे तब मुझे महसूस हुआ था कि हम फिर से दोबारा अलग होने के लिए मिले हैं। ठीक है। मैं भी खुद को गिरा नहीं सकती। मैंने जॉनी के लिए ऐसा कभी नहीं सोचा है कि मैं उसे खुद के पास बांधकर बिठा दूं। मैंने उसे कभी मजबूर नहीं किया है कि वह अपनी पत्नी और बच्चा छोड़कर केवल मेरे पास ही टिका रहे। अगर वह पहले की ही तरह फिर से चला जाए तो क्या मैं उसे रोक सकूंगी! रोक तो मैं उसे पहले भी न सकी थी। तब वह कैसे बुजदिली दिखाकर चला गया था।’ कंवल के मन में उबाल आया। एक सूखा पत्ता उड़कर उसके मुंह पर आकर लगा और खड़खड़ाता नीचे गिर गया। कंवल को अपने पैर बेसुध और मृत महसूस हुए।

सिगरेट खत्म हो चुकी थी। उसने टोटा फेंककर नया सिगरेट निकालने के लिए पैकेट खोला। बाकी दो सिगरेट बचे थे। उसने दोनों सिगरेट निकालकर उनको जमी उंगलियों में मरोड़कर नीचे फेंक दिये। उसके बाद सुन्न पैरों को खींचते अंदर कमरे में आई और बत्ती बुझाकर पलंग पर लेट गई।

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0 टिप्पणी "आँखों में टंगे सपने // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी"

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