गले में फंसी सिसकी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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वह मशीन को तेज तेज चलाने लगी, जिससे कि उसकी सोच पीछे रह जाये। अचानक उसे महसूस हुआ कि उसका बाबीन का धागा खत्म हो गया है और उसके बाद भी वह मश...


वह मशीन को तेज तेज चलाने लगी, जिससे कि उसकी सोच पीछे रह जाये। अचानक उसे महसूस हुआ कि उसका बाबीन का धागा खत्म हो गया है और उसके बाद भी वह मशीन चलाती जा रही थी। उसने मशीन बंद कर दी। मशीन का शोर खत्म होने से एकदम शांति छा गई। उसने दीवार पर लगे इलेक्ट्रिक घड़ी की ओर देखा। दोनों कांटे बारह के करीब जाकर पहुंचे थे। उसे रात के अकेलेपन का अहसास हुआ। अगर कोई चोर घर में घुस आए तो वह अकेली क्या करेगी!

उसने सोचा, डरपोक तो वह बचपन से ही है। नानी ने मुझे जिन्न भूतों की कहानियां सुना सुनाकर इतना डरा दिया था कि रात के वक्त अपनी परछाईं से भी डरती हूं। मैंने यह बात आसिफ को भी बताई थी। उसे पता है कि मैं कितनी कमजोर दिल हूं। लेकिन वह ऐसा क्यों कर रहा है? वह मुझे जान बूझकर टार्चर क्यों कर रहा है? अगर ऐसी कोई बात है तो मुझे बताता क्यों नहीं? मैं तो पूछ पूछकर तंग आ गई हूं। कहता है कि कोई बात नहीं है, तुम्हारा भ्रम है। ठीक है, मैं वहमी हूं। लेकिन उसका रवैया काफी वक्त से बदला हुआ है। जानबूझकर थोड़ा ही बात करता है, वो भी जब मैं इतनी माथापच्ची करती हूं। क्या मुझे आंखें नहीं जो देखूं कि वह कितना परेशान होता रहता है। बराबर खाना भी तो नहीं खाता। दो-तरन निवाले खाकर उठ खड़ा होता है। मैं पूछती हूं, ‘‘क्यों जान, क्या बात है? खाना अच्छा न लगा क्या?’’ तो वह बेमन से कहता है, ‘‘नहीं, मुझे भूख नहीं।’’ रोज भूख नहीं! तीनों वक्त भूख नहीं! फिर चलता कैसे है? नहीं, मैं जानती हूं कि वह कहीं बाहर से खाकर आता है। अब तो रात को भी देर से घर आता है। पलंग पर मुंह फिराकर लेट जाता है। मैं उसे गले लगाना चाहती हूं तो चिढ़कर मेरी बांहें खींचकर पीछे ढकेल देता है, जैसे कि मुझसे घिनक् आती हो। अगर उसका बस चले तो मेरे साथ सोता ही नहीं। लेकिन डबल बेड जो है। पूरा महीना हो गया है और उसने मुझे प्यार ही नहीं किया है। प्यार जाए खड्डे में, लेकिन वह ऐसा क्यों कर रहा है! इतना बदल क्यों गया है!

सरिया को याद आया है कि बाबीन का धागा टूट गया है और उसने कितनी देर तक सीया न था, उसने ठुठ्ठी मशीन पर रखी और मुंह हथेली पर टिकाकर सोच में गुम हो गई।

वह मुझे कितना चाहता था! शादी की रात उसने मुझसे कहा था, ‘‘सरिया, तुम शायद विश्वास नहीं करोगी, लेकिन तुम मेरी जिंदगी में पहली और आखिरी औरत हो। तुम विश्वास करो कि मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से भी ज्यादा चाहूंगा,’’ और मैं उससे चिपक गई थी। मैंने उसकी बांहों की छाया को कबूल कर लिया था। पर मुझे पता न था कि यह छाया टेम्प्रेरी छाया है। कोई वक्त आएगा जब मैं रात के अकेलेपन से डरती रहूंगी और कोई भी छाया नहीं होगी मेरे लिए। आसिफ कहता है कि मैं वहमी हूं, मैंने तो पहली रात को दिल की गहराइयों से उसकी बातों का विश्वास किया था। मैंने सुना था कि मर्द शादी की रात इस प्रकार की बातें करते हैं, लेकिन मैंने तो उस पर सर्वस्व निछावर कर दिया था। अभी एक साल ही हुआ है और ये सभी बातें हवा हो गई हैं। उसे कभी याद आता होगा कि उसने पहली रात को क्या कहा था! वह तो सब भूल चुका है। अब तो जब भी घर से बाहर निकलता है तो मुझे भी भूल जाता है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि जैसे वह घर में मेरे वजूद से ही बेखबर है। आखिर उसे हो क्या गया है? ऐसी कौन-सी बात है जो वह मुझे बताना नहीं चाहता? कल जब मैंने उसे बहुत कुछ कहा तब केवल इतना कहा, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं। लेकिन अगर हो भी तो उससे तुम्हारा कोई संबंध नहीं है।’’ ठीक है। माना, उस बात का संबंध मुझसे न भी हो, लेकिन उसकी जो परेशानी है उसे मैं शेअर करना चाहती हूं। आखिर वह ये बात समझता क्यों नहीं? क्या उसे यह बात मालूम नहीं कि वह ही मेरा सर्वस्व है। अगर वह परेशान है तो मैं कैसे खुश रह सकती हूं। मेरे भगवान! वह समझता क्यों नहीं...

सरिया ने माथे को जोर से रगड़ा। उसे सर में सख्त दर्द होने लगा।

वह इतना परेशान क्यों है? उसकी परेशानी ने उसे मुझसे काटकर अलग कर दिया है। मैं उसके होते हुए भी अकेली और अलग हूं और उससे कटी कटी हूं। नहीं, यह मेरी सहनशक्ति से बाहर है। उसकी ऐसी हालत हो और मुझे कुछ पता न हो और मैं उसके लिए कुछ न कर पाऊं! मेरे हाथों से, बांहों से, होंठों से, शरीर से वह शक्ति खत्म हो चुकी है जो उसे सहारा दे सके, उसका मन बहला सके। मैं तो उसका बच्चे की तरह ख्याल रखती हूं। उसे देखती हूं तो मन के अंदर कितनी खुशी भर जाती है। चाहती हूं कि उसे देखती रहूं। उसे चलते, बैठते, खाना खाते देखकर मन खुश हो जाता है। मैं उसे कितना चाहती हूं... कितना चाहती हूं... उसका उसे कोई अंदाजा भी नहीं है शायद!

अचानक दरवाजे की घंटी बजी और सरिया हड़बड़ाकर उठ बैठी। दरवाजे पर जाकर उसने पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैं हूं... आसिफ!’’ वह जैसे क्रोध में खड़ा था।

सरिया ने दरवाजा खोला और एक उम्मीद से उसके मुंह की ओर देखा। वह वैसे ही था, उलझा उलझा परेशान। आसिफ उसकी ओर देखे बिना अंदर चला गया। सरिया दरवाजा बंद करके उसके पीछे गई, आसिफ बेडरूम में जाकर सोफा पर बैठ गया।

‘‘जान, तुम कपड़े बदल लो, तब तक मैं खाना गरम करके ले आती हूं,’’ सरिया ने कहा।

‘‘नहीं, तुम तकलीफ मत कर,’’ आसिफ की डूबी हुई आवाज उभरी। उसने जैसे कोशिश करके वह पंक्ति कही थी।

‘‘क्यों?’’ सरिया को यह पंक्ति बहुत मुश्किल लगी। ‘‘तकलीफ तो परायों के लिए करते हैं। तुम मुझे पराया...’’

‘‘ओ सरिया, प्लीज!’’ आसिफ ने हाथ उठाकर उसे और कुछ कहने से रोक लिया।

‘‘तुम खाना खाकर आए हो कहीं से?’’ सरिया ने अपने क्रोध को दबाते हुए कहा।

‘‘नहीं, मुझे भूख नहीं।’’

सरिया ने निचले होंठ को काटा। उसे डर था कि कहीं वह अपना आपा न खो बैठे और अगर बात शुरू हो गई तो फिर पता नहीं क्या क्या बोल जाएगी।

‘‘तुम यहां आकर बैठो,’’ आसिफ ने उसे अपने पास बुलाया। ‘‘मुझे तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं,’’ आसिफ दीवार की ओर देख रहा था।

सरिया ने उसकी ओर गौर से देखा और फिर नीचे कालीन पर रखी मशीन पर बैठ गई। आसिफ चुप रहा। सरिया उसकी ओर देखती रही। वह कितना कमजोर हो गया था और कितना परेशान लग रहा था। सरिया के दिल में उसके लिए बेहद हमदर्दी की लहर उठी। उसने चाहा कि उठकर उसके पास जाकर बैठे और उसका सर अपनी गोद में रखकर उसके बालों में उंगलियां फिराती रहे। लेकिन वह उठ न पाई और उसने कहा, ‘‘तुम इतना परेशान क्यों हो?’’

सरिया को पता था कि उसके इस रटे प्रश्न का उत्तर रटा हुआ ही मिलेगा : ‘नहीं, ऐसी कोई खास बात नहीं है।’ लेकिन आसिफ चुप रहा। उसने केवल सरिया की ओर एक बार देखा और फिर उंगलियों को मरोड़ने लगा।

सरिया को विचार आया कि वह चीखकर सर दीवार से टकराए और कहे : ‘मेरा क्या दोष है जो तुम मुझे इतना टार्चर कर रहे हो!’

‘‘सरिया!’’ आसिफ ने धीरे से कहा और एक बार उसकी ओर देखकर नजरें हटाकर नीचे देखने लगा।

‘‘मुझे पता है कि मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया है। मैं चाहता था कि समस्या का कोई हल निकल आए, लेकिन मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। मैं भी परेशान रहूं और तुम्हें भी परेशान करूं , इससे अच्छा है कि बात एक बाजू हो जाए...’’ वह चुप हो गया।

सरिया को एक अनजान डर महसूस हुआ। उसकी दिल जोर से धड़कने लगी। दिल डूबने लगा।

‘‘सरिया, हम दोनों के लिए यही अच्छा है कि हम एक दूसरे से अलग हो जाएं। जिन हालात में हम साथ रह रहे हैं, इससे तो न रहना ही अच्छा है। तुम्हें मुझसे परेशानियों के सिवा शायद और कुछ न मिल सके... मुझे दुख है लेकिन मैं... मैं किसी को चाहता हूं, उसके बिना जिंदा नहीं रह पाऊंगा, ऐसी हालत में...’’ वह चुप हो गया।

चीख सरिया के गले में आकर अटक गई। उसे लगा उसे हाथों और पैरों से जान निकल गई है। फिर भी पता नहीं कैसे वह उठ खड़ी हुई।

‘‘तुम खाना खाकर नहीं आए होगे। मैं तुम्हारे लिए खाना गरम करके लाती हूं,’’ वह एक ही बार में कह गई और उसे अपने आप पर आश्चर्य हुआ।

आसिफ ने उसे हाथ के इशारे से रोका।

‘‘नहीं, तू बैठ, मुझे तुमसे बात करनी है।’’

वह बैठी रही। उसकी टांगें सूखकर लकड़ी बन गई थीं।

‘‘अच्छा होगा कि हम शराफत से एक दूसरे से अलग हो जाएं। मेरा मतलब है कि अलग होना ही है तो बेकार के गिले शिकवे से क्या हासिल! बात बढ़ेगी तो उससे कुछ भी प्राप्त न होगा। वैसे, तुम्हें जो कुछ चाहिए तुम ले सकती हो, और भी जितना कुछ हो सकेगा मैं जरूर करूं गा और...’’

‘‘तुम... तुम... मैं तुम्हारे लिए खाना लाती हूं...’’ सरिया ने जल्दी में उसकी बात काटी और फिर जल्दी कमरे से बाहर निकल गई। वह रसोईघर में चूल्हे के पास आकर खड़ी हो गई। उसने मासिच उठाकर तीली जलाई और जली हुई तीली चूल्हे के बर्नर के करीब लाई। चूल्हा भड़ककर जल उठा। सरिया के गले में अटका उबाल अचानक निकल आया। उसकी सांस जैसे अटक गई थी और फिर वह दहाड़ें मारकर रोने लगी।

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रचनाकार: गले में फंसी सिसकी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
गले में फंसी सिसकी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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