दो महापुरुष - स्वामी विवेकानंद व स्वामी दयानंद // डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री

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दो महापुरुष

(डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री, पी/ 138, एम आई जी, पल्लवपुरम-2, मेरठ 250 110)

agnihotriravindra@yahoo.com


13 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन और महाशिवरात्रि को स्वामी दयानंद का ऋषि बोधोत्सव मनाया जाता है जो इस वर्ष 13 फरवरी को है । इस अवसर पर दोनों महापुरुषों के कतिपय विचारों का एक अध्ययन प्रस्तुत है ।

0.0 परिचय

19 वीं शताब्दी में स्वामी दयानंद सरस्वती (1825 - 1883) और स्वामी विवेकानंद (1863 – 1902)  के रूप में दो ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया जिनके क्रांतिकारी विचारों और कार्यों ने अपने युग की दशा और दिशा बदल दी । उनका प्रभाव इतना दूरगामी हुआ कि बाद के अनेक महापुरुषों को ही नहीं, अनेक पीढ़ियों को उनके विचारों से प्रेरणा मिली और वे आज भी हमारे लिए प्रकाश - स्तम्भ का काम कर रहे हैं। स्वामी दयानंद ने भारत में (विशेषरूप से देश के उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी भाग में) प्रचार कार्य किया और इसके लिए उन्होंने दो भाषाओँ का प्रयोग किया – एक तो संस्कृत का (जो उस युग में भारतीय विद्वानों की तो भाषा थी ही, विदेशी विद्वान भी उसे उत्साह से सीख रहे थे) और दूसरा हिंदी का जो आम जनता की भाषा थी । अतः उनका सन्देश संस्कृत जानने वाले भारतीय एवं विदेशी विद्वानों के साथ – साथ हिंदी जानने वाले सामान्य जन तक भी पहुंचा । वैचारिक क्रांति उत्पन्न करने के अपने प्रयास उन्होंने किसी एक पंथ (धर्म) तक सीमित नहीं रखे, अतः उनका प्रभाव सभी पंथों के अनुयायियों पर पड़ा । उधर स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका तथा यूरोपवासियों को उनकी भाषा अंग्रेजी में हिंदू धर्म से परिचित कराया । भारत में उन्होंने विशेष प्रचार कार्य नहीं किया, फिर भी जितना किया वह बांग्ला और अंग्रेजी में किया। अतः उनका सन्देश मुख्य रूप से बांग्ला और अंग्रेजी शिक्षित लोगों में पहुंचा । दोनों सरस्वती के वरद पुत्र थे, बहु-पठित थे, वाणी के साधक थे, कुशल वक्ता थे, कुशाग्र बुद्धि संपन्न थे, अतः शीघ्र ही उनका प्रभाव समाज पर पड़ा और वे सामाजिक जगत पर छा गए ।

1.0 समानताएं एवं विषमताएं -:

1.1 क्या संयोग है कि दोनों अपने माता - पिता की ज्येष्ठ संतान थे। दोनों का सम्बन्ध संपन्न परिवारों से था । अतः उनके बचपन सुख - सुविधाओं में बीते । दोनों के परिवारों में पढ़ने – लिखने का माहौल था ( दयानंद के परिवार में संस्कृत का, और विवेकानंद के परिवार में अंग्रेजी का ), अतः दोनों को अध्ययन करने का भरपूर अवसर मिला । दयानंद ने बचपन में ही यजुर्वेद, निरुक्त, निघंटु, धर्मशास्त्र आदि पढ़ लिए, तो विवेकानंद ने बी. ए. तक की अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की ।

1.2 दोनों की रुचि सामान्य व्यक्ति की भांति विवाह करके गृहस्थी बसाने में नहीं थी, अतः इससे बचने के लिए दोनों ने अपने परिवारों का त्याग किया । दयानंद ने जब लगभग 21 वर्ष की अवस्था में (सन  1846 में ) गृहत्याग किया, तो उनके सामने दो स्पष्ट उद्देश्य थे (1) मूर्तिपूजा की निस्सारता वे अनुभव कर चुके थे, अतः वे “ सच्चे शिव “ अर्थात ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहते थे । (2) बहुत प्रेम करने वाली अपनी बहन एवं चाचा के निधन से उपजे वैराग्य के कारण मृत्यु पर विजय पाने के उपाय खोजना चाहते थे । घर छोड़ने के बाद स्वामी दयानंद ने लगभग 23 वर्ष की आयु में (1848 में) विधिवत संन्यास तो ग्रहण कर लिया, पर इसका उपयोग उन्होंने अध्ययन जारी रखने के लिए किया।

उधर विवेकानंद ने लगभग 21 वर्ष की आयु में (1884 में) जब बी. ए. पास किया, उसी वर्ष दुर्भाग्य से उनके पिता का देहांत हो गया । परिणामस्वरूप परिवार आर्थिक संकटों में घिर गया । सबसे बड़ी संतान होने के नाते आर्थिक स्थिति संभालना उनकी जिम्मेदारी तो थी, पर उनकी रुचि इस ओर नहीं थी । वे अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करने में ही लगे रहे । गृह-त्याग करते समय दयानंद के मन में जैसे दो स्पष्ट उद्देश्य थे, वैसे उद्देश्य विवेकानंद के मन में नहीं थे । गृहत्याग का कारण उन्होंने बाद में यह बताया कि देशाटन करने की मेरी इच्छा थी । अमेरिका जाने का उद्देश्य बताते हुए भी यही कहा कि “ मैंने सम्पूर्ण भारत की यात्रा की थी, और मैं दूसरे देशों की यात्रा करना चाहता था ( विवेकानंद साहित्य संचयन, पृ. 295 : आगे इसे संचयन लिखा है ) । स्वामी विवेकानंद लगभग 25 वर्ष की युवावस्था में (1888 में) परिव्राजक बन गए, और दो वर्ष बाद 1890 में भारत यात्रा पर निकल पड़े ।

1.3 अपने मन को सन्तोष देने वाली सही दिशा की तलाश में दोनों को भटकना पड़ा (स्वामी दयानंद को कुछ अधिक - लगभग 14 वर्ष) । इस भटकन के दौरान स्वामी दयानंद का इस देश में उस समय प्रचलित विभिन्न मत-मतान्तरों से परिचय हुआ, संबंधित मठाधीशों के वास्तविक ज्ञान को परखने का अवसर मिला, उनके अहंकार, उनके आडम्बर, उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों की वास्तविकता, मठों में व्याप्त अनाचार-व्यभिचार आदि से साक्षात्कार हुआ,पर साथ ही कुछ सच्चे योगियों से योग की क्रियाएं सीखने का सुअवसर भी मिला। फिर भी उनकी जिज्ञासाओं का अधिकतम समाधान तब हुआ जब उन्हें मथुरा में (1860 से 1863 तक, लगभग ढाई वर्ष) वैदिक साहित्य एवं संस्कृत व्याकरण के अद्वितीय विद्वान प्रज्ञाचक्षु (नेत्र-हीन) स्वामी विरजानंद (1778 – 1868 ) जैसे गुरू से अध्ययन करने का सौभाग्य मिला और वहीँ उन्हें सार्वजनिक जीवन में उतर कर भारतीय समाज को सुधारने की प्रेरणा भी मिली ।

उधर स्वामी विवेकानंद को तत्कालीन भारत की राजधानी कलकत्ता जैसे महानगर का बौद्धिक समाज मिला, कालेज में बी. ए. की पढ़ाई के द्वारा अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का और अपनी रुचि के अनुरूप विज्ञान, दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र आदि से संबंधित यूरोपीय विद्वानों के ग्रन्थ पढ़ने का तो अवसर मिला, पर वेद और वैदिक साहित्य पढ़ने का विशेष अवसर नहीं मिला। उन्होंने स्वयं कहा, " खेद है कि बंगवासियों ने वेद के अध्ययन की अत्यंत उपेक्षा की, यहाँ तक कि पिछले कुछ वर्षों के पहले बंगाल में पतंजलि के महाभाष्य का शिक्षक प्रायः मिलता ही नहीं था (संचयन, पृ. 388 )।“ संस्कृत के कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने बाद में यायावरी के दौरान किया ; जैसे, अष्टाध्यायी का अध्ययन जयपुर में, महाभाष्य का खेतड़ी में, दर्शनों का पोरबंदर में ।

1.4 बंगाल उस समय अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई धर्म प्रचार के द्वारा अंग्रेजियत का गढ़ बन चुका था । स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, कलकत्ता “ पाश्चात्य भावों से उन्मत्त हो रहा था जो भारत के सब शहरों की अपेक्षा विदेशी भावों से अधिक भरा हुआ था (संचयन, पृ. 256) । “ राजा राममोहन रॉय (1772-1833) और उनके सहयोगियों ने मिलकर सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध जागृति लाने के लिए जिस संस्था (पहले ‘ आत्मीय सभा ‘ और फिर ' ब्रह्म समाज ') की स्थापना की थी, उसके मूल में भी ईसाइयों से मिली प्रेरणा काम कर रही थी। बाद में आपसी मतभेदों के कारण ब्रह्मसमाज अनेक शाखाओं में विभाजित हो गया । उसकी जो शाखा आचार्य केशवचन्द्र सेन (1838– 1884) के नेतृत्व में सक्रिय थी, उसमें ईसाइयत इतनी अधिक आ चुकी थी कि मैक्समूलर (1823 – 1900) ने एक पत्र लिखकर सुझाव दिया, “ आप अपने को खुले आम ' क्रिश्चियन ' और अपने संगठन को नेशनल चर्च ऑफ़ क्राइस्ट क्यों नहीं कहते (....why the Brahmo did not frankly adopt the name Christian and did not organize itself as a National Church of Christ ?) उसी शाखा के संपर्क में आने का विवेकानंद को अवसर मिला। इस परिवेश ने उनके मन में ईसा मसीह और ईसाई पंथ के प्रति ऐसा अनुकूल भाव विकसित कर दिया कि आजीवन जो दो पुस्तकें उन्होंने अपने साथ रखीं, उनमें एक थी हिंदू धर्म से संबंधित गीता और दूसरी थी ईसाई धर्म से संबंधित The Imitation of Christ (कैथोलिक ईसाइयों में बाइबिल के बाद यही पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है)। उन्होंने अपने जीवन में किसी वेद, उपनिषद, गीता या किसी अन्य ग्रंथ का अनुवाद नहीं किया, पर The Imitation Of Christ के प्रारंभिक छह अध्यायों का बांग्ला में अनुवाद भी किया । जहाँ तक उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का संबंध है, उनका अधिकतम समाधान उन्हें रामकृष्ण परमहंस ( 1836 – 1886 ) के सान्निध्य में (प्रथम भेंट 1881 में ) मिला जिन्हें “विद्वान“ तो कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि वे “अपना नाम तक लिखना नहीं जानते थे (संचयन, पृ. 256)”, (कुछ लोग उन्हें निरक्षर नहीं, अल्पशिक्षित बताते हैं), पर उनकी बातें रहस्यमयी होती थीं जिससे कुछ जिज्ञासु आकर्षित हो जाते थे ।

1.5 दोनों युवावस्था में संन्यासी तो बन गए, पर स्वामी दयानंद सार्वजनिक क्षेत्र में लगभग 40 वर्ष की परिपक्व आयु में उतरे ; जबकि स्वामी विवेकानंद लगभग 27 वर्ष की युवावस्था में भारत यात्रा पर निकल पड़े और उनका सार्वजनिक जीवन भी शुरू हो गया ।

1.6 इस परिवेश का दोनों के विचार प्रवाह पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और उसी के अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा मिली । सभी महापुरुष अपने समय की समस्याओं को दूर करने और समाज को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं । इन महापुरुषों ने जो प्रयास किए उन पर एक नजर डालना उपयोगी होगा क्योंकि उनमें से कतिपय समस्याएँ इतनी जटिल और गहरी हैं कि अभी भी मुंह बाए खड़ी हैं । यहाँ हम कतिपय धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं की चर्चा करेंगे । पहले धर्म की बात करें क्योंकि एक ओर तो इन महापुरुषों के नाम धार्मिक नेता के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं, दूसरी ओर मानव समाज में सर्वाधिक विवाद एवं अंधविश्वास इसी क्षेत्र में हैं और इन विवादों/अंधविश्वासों ने अनेक सामाजिक समस्याओं को भी जन्म दिया है ।

2.0 धार्मिक और सामाजिक पतन का मूल कारण है वेदों की उपेक्षा :

दोनों ही महापुरुषों ने अनुभव किया कि हमारे धार्मिक और सामाजिक पतन का मूल कारण है - वेदों की उपेक्षा । दोनों ही विद्वानों ने मानवमात्र को याद दिलाया कि मानव समाज में धर्म की प्रतिष्ठा वेदों से हुई है (वेदोSखिलो धर्ममूलं ; मनुस्मृति 1/6)। वेद सार्वभौमिक हैं, केवल हिंदुओं के नहीं, विश्व में प्रचलित सभी धर्मों के आदि स्रोत हैं । “ वेद के पश्चात इस संसार में जहाँ कहीं जो भी धर्म भाव आविर्भूत हुआ, उसे वेद से ही गृहीत समझना चाहिए (संचयन, पृ. 327)। " उन दिनों पौराणिक पंडितों ने यह प्रचारित कर रखा था (और कुछ पंडित तो आज भी कहते हैं) कि वेद केवल सतयुग के लिए थे, कलियुग के लिए तो पुराण हैं, पर इन दोनों महापुरुषों ने स्पष्ट किया कि वेद सार्वकालिक (अर्थात हर काल, हर युग के लिए) हैं, फिर चाहे वह सतयुग हो या कलियुग । कुछ लोग कहते थे कि वेदों का अध्ययन करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों का है, अन्य लोगों का नहीं, स्त्रियों एवं शूद्रों के लिए तो वेद मन्त्र सुनना तक मना है (शंकराचार्य ने भी यही कहा ; ऐसा प्रतीत होता है कि कतिपय मंदिरों में स्त्रियों / दलितों का प्रवेश निषिद्ध होना ऐसी ही मान्यता के कारण है ) ; पर इन महापुरुषों ने इस धारणा का खंडन करते हुए बताया कि वेद ज्ञान सार्वलौकिक (अर्थात सब लोगों के लिए) है । " भारत का अधः पतन उसी समय से शुरू हुआ, जब ब्राह्मण पंडितों ने ब्राह्मणेतर जातियों को वेदपाठ का अनधिकारी घोषित किया, और साथ ही स्त्रियों के सभी अधिकार छीन लिए “ (संचयन , पृ . 307, 327, 392, 430, 453 – 454 ; ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पृ. 249 - 362 : आगे इसे केवल भूमिका लिखा है; सत्यार्थप्रकाश 68 -71, 189 -194 : आगे इसे स.प्र, लिखा है)। विवेकानंद जी ने वैदिक कालेज खोलकर वेदों के अध्ययन की उपयोगिता बताते हुए कहा, “इससे अंधविश्वासों का उन्मूलन होगा” (विवेकानंद – एक जीवनी, पृ.371) ।

3.0 वेद केवल धर्मग्रंथ नहीं, ज्ञान-विज्ञान के स्रोत :

स्वामी दयानंद तो वेदों के विद्वान थे, पर स्वामी विवेकानंद को वेदों का व्यवस्थित अध्ययन करने का अवसर नहीं मिला, उन्होंने विदेशी विद्वानों के (अधकचरे, भ्रामक) ग्रंथों से ही इस संबंध में कुछ ज्ञान प्राप्त किया । संभवतः इसी कारण उन्होंने वेदों को केवल धर्म संबंधी मान्यताओं की विवेचना के लिए आवश्यक माना, जबकि स्वामी दयानंद ने इससे आगे बढ़कर मानव सृष्टि में वेदों को ही ज्ञान-विज्ञान का मूल स्रोत बताया । यह भी बताया कि वेदों से ही भारत में और फिर विश्व में विभिन्न प्रकार का ज्ञान-विज्ञान फैला । यह भी स्पष्ट किया कि ज्ञान अनन्त है, अतः अभी भी वेदमन्त्रों में असीम संभावनाएं छिपी हुई हैं । वेदों में विभिन्न प्रकार के ज्ञान-विज्ञान (जैसे, समाज-व्यवस्था, अर्थ-व्यवस्था, राजनीति, शिल्प, सूर्य-पृथ्वी आदि का परिभ्रमण, गुरुत्वाकर्षण , सृष्टि विद्या, गणित विद्या, वायुमंडल के भेद, जल और आकाश में तीव्र गति से चलने वाले यान आदि) से संबंधित कतिपय वेदमंत्र प्रस्तुत करके उन्होंने शंकाग्रस्त लोगों / विरोधियों को चकित कर दिया (भूमिका, पृ. 363-394, 447-459) । उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की जैसी खोजें आज हुई हैं, वैसी और उनसे भी उच्चतर अनेक खोजें भारत में भी पहले हो चुकी हैं। महाभारत में वर्णित अस्त्र-शस्त्र इसके उदाहरण हैं (स.प्र. पृ. 260-261)। दयानंद के इन विचारों से प्रेरित होकर ही भारतीय वैज्ञानिक शिवकर बापूजी तलपदे ने (हवाई जहाज के आविष्कारक माने जाने वाले अमरीका के राइट ब्रदर्स से आठ साल पहले) सन 1895 में मरुत्सखा विमान बनाया और मुंबई में उड़ा कर दिखा दिया । स्वामी विवेकानंद के सामने यह उदाहरण आ चुका था, फिर भी उनका ध्यान वेदों की इस भूमिका की ओर नहीं गया ।

4.0 वेद अपौरुषेय, अतः स्वतः प्रमाण :

स्वामी दयानंद की दृढ़ मान्यता है कि वेद किसी मनुष्य का नहीं, ईश्वर का दिया ज्ञान है । इसीलिए प्राचीन ऋषि उन्हें अपौरुषेय कहते आए हैं और स्वतः प्रमाण मानते आए हैं ; दूसरे ग्रंथों की वे ही बातें मानने योग्य हैं जो वेदों के अनुकूल हैं (स.प्र. 189 – 194)। स्वामी विवेकानंद ने भी स्वामी दयानंद की भांति वेदों को “पूर्णतः अपौरुषेय “(संचयन पृ. 239) कहा है और उन्हें स्वतः प्रमाण बताया है ; “ धार्मिक व्यवस्थाओं में मतभेद होने पर एकमात्र वेद ही सर्वमान्य प्रमाण है। पुराणादि......भी प्रमाण में ग्रहण किए जाते हैं, किन्तु तभी तक जब तक वे श्रुति के अनुकूल कहें, अन्यथा नहीं (संचयन पृ. 453) ।“ “ स्मृति और श्रुति में यदि विरोध हो तो श्रुति को ही प्रमाण स्वरूप ग्रहण करना होगा (संचयन पृ. 238)। " "  पुराणादि अन्यान्य शास्त्र वहीँ तक ग्राह्य हैं जहाँ तक वे वेद से अविरोधी हैं (संचयन, पृ. 327 )।

इतना सब कहने के बावजूद स्वामी विवेकानंद ने यह भी कहा कि, “वेदों के केवल उन्हीं अंशों को प्रमाण मानना चाहिए जो युक्ति - विरोधी नहीं हैं (संचयन 327) । “ इससे प्रतीत होता है कि वेदों की अपौरुषेयता के प्रति स्वामी विवेकानंद के विचार अस्पष्ट हैं क्योंकि यदि वेदों को अपौरुषेय / स्वतः प्रमाण माना जाए तो फिर उनकी सामग्री को युक्ति-विरोधी कैसे कहा जा सकता है ? विवेकानंद ने इसका कोई समाधान नहीं दिया है ।

5.0 वेद का अर्थ :

" वेद " किसे कहते हैं - इस विषय पर भी दोनों विद्वानों में मतभेद है । स्वामी दयानंद ने तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को ही वेद माना है (इन्हें संहिता या श्रुति भी कहते हैं), और अपने मत के समर्थन में प्राचीन ग्रंथों / विद्वानों के मत उद्धृत किए हैं,(स.प्र., पृ. 192 – 193 ; भूमिका पृ. 259 – 260, 325 – 333) जबकि स्वामी विवेकानंद ने कहीं तो इन्हें ही वेद माना है "  अलौकिक ज्ञान राशि का सर्व प्रथम पूर्ण और अविकृत संग्रह होने के कारण,  आर्य जाति में प्रसिद्ध वेद नामधारी, चार भागों में विभक्त अक्षर समूह ही सब प्रकार से सर्वोच्च स्थान का अधिकारी है, समस्त जगत का पूजार्ह है तथा आर्य एवं म्लेच्छ सबके धर्म ग्रंथों की प्रमाण भूमि है ( संचयन, पृ. 453 - 454 )” ; पर कहीं वेदों की व्याख्या में लिखे गए ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों आदि को भी वेद माना है, “वेदों के इस भाग का नाम है उपनिषद ” (संचयन पृ. 200) ; उन्होंने “ श्रुति “ का अर्थ कहीं “ वेद “ तो कहीं केवल “ उपनिषद “ बताया है (संचयन पृ. 100, 200, 201, 383, 419) । इसीलिए वे “वेद” की बात करते हुए उपनिषद आदि के उदाहरण देते हैं (संचयन 78) ।

6.0 वैदिक धर्म ही मानवधर्म :

दोनों विद्वानों का मानना है कि वेद ही एकमात्र मानवधर्म है, क्योंकि यह मनुष्य जाति के कल्याण के लिए परमात्मा द्वारा दिया ज्ञान है, यह ज्ञान-विज्ञान के अनुरूप है, अतः तर्कसंगत है। दोनों का मानना है कि पांच हजार वर्ष पूर्व तक यही मानव जाति में प्रचलित था । स्वामी दयानंद ने बताया है कि महाभारत युद्ध के आसपास वेदों के अध्ययन की परम्परा शिथिल होने लगी, और वेदों की उपेक्षा होने लगी जिससे अविद्या का अंधकार फैलता गया और मनुष्यों की बुद्धि भ्रमित हो गई । फलस्वरूप जिसके मन में जैसा आया उसने वैसा मत चलाया । अब यही उचित है कि सब लोग पहले वेदमत को समझें, सत्य–असत्य का यथावत निर्णय करना सीखें, प्रचलित विभिन्न मतों का अध्ययन करें और फिर अपनी समझ के अनुसार सत्य मत स्वीकार करें (स.प्र., पृ. 257, 378, 444) ।

वेद को मानव धर्म का मूलस्रोत बताने के बावजूद स्वामी विवेकानंद ने “ वेदान्त “ पर बल दिया, और लिखा, “ ....हम वेदान्त को ही संसार का एकमात्र सार्वभौम धर्म कहने का दावा कर सकते हैं और यह संसार का एकमात्र वर्तमान सार्वभौम धर्म है क्योंकि यह व्यक्तिविशेष के स्थान पर सिद्धांत की शिक्षा देता है । व्यक्तिविशेष के चलाए हुए धर्म को संसार की समग्र मानव जाति ग्रहण नहीं कर सकती .......समस्त संसार का एकमात्र आदर्श मुहम्मद, बुद्ध अथवा ईसा मसीह ऐसा कोई एक व्यक्ति कैसे हो सकता है (संचयन 240) ? “ “धर्म और विचार में अद्वैत ही अंतिम शब्द है और केवल उसी के दृष्टिकोण से सब धर्मों और संप्रदायों को प्रेम से देखा जा सकता है। हमें विश्वास है कि भविष्य के प्रबुद्ध मानवी समाज का यही धर्म है (संचयन, पृ. 531) ।“ “वेदान्त सब धर्मों का बौद्धिक सार है वेदान्त के बिना सब धर्म अंधविश्वास है ; इसके साथ मिलकर प्रत्येक वस्तु धर्म बन जाती है (संचयन, पृ. 297) ।“ (यह ध्यान देने योग्य है कि “वेदांत” शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होने लगा है – एक तो है महर्षि व्यास कृत वेदांत दर्शन, जिसे उत्तर मीमांसा भी कहते हैं, और दूसरा है वेदांत संप्रदाय जिसमें बादरायण कृत ब्रह्म सूत्र, उपनिषद और गीता को “ प्रस्थानत्रयी ” कहा जाता है; स्वामी विवेकानंद ने प्रायः इसी की चर्चा की है ।)

7.0 समस्याओं का समाधान और वेद :

वेद के संबंध में इस स्थूल सैद्धांतिक सहमति के बावजूद जब विभिन्न समस्याओं के समाधान की बात आती है, तो दोनों विद्वानों के विचारों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है ।

7.1 दयानंद ने इस सिद्धांत को व्यवहार में भी दृढता से अपनाया, और इसे तर्कों से भी पुष्ट किया। उन्होंने वैदिक सिद्धांत स्पष्ट किए और उनके आलोक में केवल हिंदुओं के नहीं, सभी पंथों (धर्मों) की मान्यताओं की समीक्षा की (क्योंकि जैसा बता चुके हैं, वेद सार्वलौकिक हैं, मानवमात्र के लिए हैं) ; वहीँ विवेकानंद सिद्धांत और व्यवहार में एकरूपता नहीं बनाए रख सके। समीक्षा तो उन्होंने किसी की भी नहीं की , केवल प्रसंगवश टीका-टिप्पणियां कीं। हिंदुओं की समस्याओं के संबंध में भी उन्होंने वैदिक सिद्धांतों को आदर्श बताने के बावजूद व्यवहार में अनेक ऐसी परम्पराओं का समर्थन किया जो वेदों के विपरीत हैं, और (उनके ही शब्दों में) पुराणों पर आधारित हैं (भारतीय नारी, पृ. 62) । इस विसंगति के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, यहाँ केवल दो उदाहरण प्रस्तुत है ।

7.2 मूर्तिपूजा वेदानुकूल नहीं है, अतः स्वामी दयानंद ने इसका विरोध किया और इसे छोड़ने की प्रेरणा दी (स.प्र., पृ. 289–309), पर स्वामी विवेकानंद ने कहीं तो मूर्तिपूजा का विरोध किया और कहीं समर्थन । उन्होंने एक ओर तो मूर्तिपूजा को “ निम्न स्तरीय विचार “ “ निम्नतम जड़ पूजा ” बताया जिससे “ मोक्ष नहीं मिल सकता “, “ सबसे बड़ा आदर्श निर्गुण ब्रह्म “ बताकर “ सब मूर्तियों को तोड़ डालने “ तक की सलाह दे डाली (संचयन पृ. 6, 17, 192, 324, 329, पत्रावली, भाग 2, पृ. 200), पर दूसरी ओर उसकी भरपूर प्रशंसा करते हुए “ अविकसित मन के लिए उच्च आध्यात्मिक भाव ग्रहण करने का उपाय ” बताया और कहा कि " मन में किसी मूर्ति के बिना आए कुछ सोच सकना उतना ही असंभव है जितना श्वास लिए बिना जीवित रहना (संचयन, पृ. 16)।” उसे अद्वैत ज्ञान की उपलब्धि का ऐसा साधन बताया जो मनुष्य को मुक्ति दिला सकता है (संचयन, पृ. 16, 18, 246-247, 329)। एक स्थान पर तो उन्होंने मूर्तियों में अंतर बताते हुए यहाँ तक कहा कि, " यदि प्रतिमा किसी देवता या किसी महापुरुष की सूचक हो, तो ऐसी उपासना भक्ति प्रसूत नहीं है और वह हमें मुक्ति नहीं दे सकती । पर यदि वह ' एक परमेश्वर ' की सूचक हो तो उस उपासना से भक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त हो सकती हैं ( भक्ति योग, पृ. 55 ) । "  मूर्तिपूजा के पक्ष-विपक्ष में इतना कुछ कहकर अपना निर्णय देने के बजाय उन्होंने कह दिया , “  मैं ऐसे प्रश्नों में अपने को उलझाना नहीं चाहता कि मूर्तियाँ रहें या न रहें (संचयन 493) । “

7.3 ऐसा ही एक उदाहरण बाल विवाह का देखिए । दयानंद ने बाल विवाह को वेद विरुद्ध परम्परा बताते हुए उसका विरोध किया और चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से भी प्रमाण दिए (स.प्र. 74 – 79) ; पर विवेकानंद ने एक ओर तो बाल विवाह के दोष बताते हुए उसका विरोध किया (संचयन, पृ. 447; भारतीय नारी , पृ. 33) पर दूसरी ओर समर्थन करते हुए कहा, कि बाल विवाह से “ जाति अधिक नीतिवान तथा पवित्र बनती है (भारतीय नारी, पृ. 53) । ” इतना ही नहीं, उन्होंने तो बाल विवाह को ऐसा उपाय बताया जिसने “ हिन्दू जाति को सतीत्व धर्म से विभूषित किया है (संचयन, पृ.121) । ”

8.0 विधर्मियों के प्रति भाव :

यह एक ऐतिहासिक वास्तविकता है कि पिछली अनेक शताब्दियों से इस देश में ऐसे-ऐसे मतों के अनुयायी रहते आए हैं जिनमें से कुछ का विकास स्वदेश में तो कुछ का विदेश के भिन्न परिवेश में हुआ । इन मतों /संप्रदायों को हम धर्म कहने लगे हैं और अपने समाज को बहु-धर्मीय । ऐसे समाज में समरसता बनाए रखने के लिए अंतर-धर्मीय सार्थक संवाद की जितनी आवश्यकता है, वास्तविकता में वह हमारे समाज से उतना ही गायब है। ऐसे संवाद के लिए अनिवार्य है कि सभी लोग एक-दूसरे के मत /संप्रदाय के बारे में जानें, और समरसता के लिए आवश्यक है कि हर मत/संप्रदाय के प्रबुद्ध लोग (किसी एक के नहीं) ईमानदारी से एवं स्पष्ट रूप से अपने मत/संप्रदाय की कमियों / सीमाओं को स्वीकार करके उन्हें दूर करने का प्रयास करें ।

8.1 इन सिद्धांतों का पालन करते हुए स्वामी दयानंद ने कहा कि “ जैसे मैं मनुष्य जाति की उन्नति के लिए पुराणों, बौद्धों - जैनियों के ग्रंथों, बाइबिल और कुरान को प्रथम ही बुरी दृष्टि से न देखकर उनमें से गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग करता हूँ वैसे ही सबको करना उचित है (स.प्र., पृ. 8)। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि हमें पहले अपनी और फिर इन सबकी मत विषयक पुस्तकों को पढ़ना चाहिए और तब अपने विवेकानुसार निश्चय करना चाहिए (स.प्र. पृ. 257, 378, 444)। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा, “ जो-जो सर्वमान्य सत्य विषय हैं, वे तो सबमें एक से हैं, झगड़ा झूठे विषय में होता है (स.प्र., पृ. 445)। “ उन्होंने स्वयं विभिन्न मतावलंबियों के ग्रंथों का अध्ययन किया और सत्य के प्रति आग्रह रखते हुए असंगत बातों की आलोचना की । यह आलोचना उन्होंने संबंधित मतों के विद्वानों के सामने ही प्रेमपूर्वक इस रूप में की जिससे वे स्व-विवेकी बनकर सत्य के अनुयायी बनें। इसी कारण उनके व्याख्यान सुनने विभिन्न मतावलंबी आते थे । इनमें सामान्य लोग भी होते थे, और विद्वान भी । कलक्टर, कमिश्नर, जज आदि सरकारी अधिकारी भी आते थे और आम जनता भी । अन्तर-धर्मीय संवाद के लिए उन्होंने अपने जीवनकाल में दो बार विभिन्न धर्माचार्यों को एक मंच पर इकट्ठा करने का भी प्रयास किया ताकि सब मिलकर अवैज्ञानिक, तर्कहीन, अंधविश्वास पर आधारित, संकीर्णता फैलाने वाले, भेदभाव उत्पन्न करके समाज की समरसता को बिगाड़ने वाले साम्प्रदायिक सिद्धांतों को छोड़कर ऐसे सिद्धांत स्वीकार कर लें जो सर्वमान्य हों, और फिर सब धर्माचार्य केवल उन्हीं सिद्धांतों का प्रचार करें। उनके प्रेमपूर्ण व्यवहार और सत्य के प्रति आग्रह का ही यह परिणाम था कि इन संगोष्ठियों में तत्कालीन सभी प्रमुख धार्मिक नेताओं ने (जैसे, आचार्य केशवचन्द्र सेन, डा. टी. जे. स्काट , पादरी नोबेल, दारुल उलूम, देवबंद के संस्थापक मौलवी मोहम्मद कासिम, सर सैयद अहमद खां आदि ने) भाग लिया ।

8.2 दयानंद के उपदेशों का अन्य मतावलंबियों पर भी भरपूर प्रभाव पड़ा । यह दयानंद की प्रेरणा का ही परिणाम था कि देवबंद मदरसे के संस्थापक मौलवी मोहम्मद कासिम ने अपने मदरसे के पाठ्यक्रम में संस्कृत को भी शामिल किया और पुस्तकालय में वेद भी रखे जो आजतक वहां मौजूद हैं । मुंबई में देश की प्रथम आर्यसमाज की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाने वाले और फिर उसके प्रथम प्रधान एवं मंत्री पद का दायित्व संभालने वाले क्रमशः गिरधरलाल दयालदास कोठारी और पानाचंद आनंदजी पारेख जैन परिवार से थे। सरदार अर्जुन सिंह जी (शहीद भगतसिंह के दादा) यों तो सिख पंथ के अनुयायी थे, पर महर्षि दयानंद की शिक्षाओं से प्रेरित होकर वे अपने परिवार में प्रतिदिन यज्ञ करने लगे और उन्होंने अपने दोनों पोतों (जगत सिंह और भगत सिंह) का ' उपनयन संस्कार ‘ किया। अनेक स्थानों पर स्वामी दयानंद द्वारा गठित आर्यसमाज की स्थापना भिन्न मतावलंबियों के आवासों पर हुई – जैसे, मुंबई में पारसी सज्जन डा. माणेक जी अदेर जी, लाहौर में खान बहादुर डा. रहीम खान, अमृतसर में मियां मुहम्मद जान आदि की कोठियों में। मुंबई स्थित देश की प्रथम आर्यसमाज के भवन में कुछ और निर्माण करने के लिए 1938 में सर्वाधिक दान पांच हजार रु. मुंबई के एक मुस्लिम व्यापारी सेठ हाजी अलारखिया रहमतुल्ला सोनावाला ने दिया। विभिन्न मतावलंबियों पर दयानंद के विचारों का जो प्रभाव पड़ा था, यह उसकी बानगी है ।

8.3 स्वामी विवेकानंद भी विभिन्न मतावलंबियों को निकट लाना चाहते थे, पर उनकी कार्यशैली भिन्न प्रकार की थी । दयानंद ने जहाँ निडर होकर सबकी व्यवस्थित समीक्षा की और मानव मात्र को धर्म के वैदिक स्वरूप को अपनाने की प्रेरणा दी, वहीँ विवेकानंद ने किसी की भी व्यवस्थित समीक्षा नहीं की, बस, यत्र-तत्र टिप्पणियां कीं जो कभी प्रशंसात्मक हैं तो कभी निंदात्मक । जैसे, ईसा को उन्होंने “ ईशदूत (संचयन, पृ. 258)“ कहा और प्रायः प्रशंसा ही की है, ईसा को “ ईश्वर के समान आराधना “ के योग्य बताया (संचयन, पृ. 267), और उनके बारे में प्रचलित चमत्कारों / अंधविश्वासों को “ अक्षरश: सत्य “ बताकर उनकी पुष्टि भी की है (संचयन. पृ. 259) । जिस वेदान्त को उन्होंने “ सब धर्मों का बौद्धिक सार “ और जिसके “ बिना सब धर्म अंधविश्वास “ बताया (संचयन, पृ. 297) , उसी के संबंध में जब एक मुस्लिम युवक को पत्र लिखा तो कहा, “ हमें दृढ़ विश्वास है कि वेदान्त के सिद्धांत कितने ही उदार और विलक्षण क्यों न हों, परन्तु व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना मनुष्य जाति के महान जनसमूह के लिए वे मूल्यहीन हैं। ........ हमारी मातृभूमि के लिए इन दोनों विशाल मतों का सामंजस्य – हिंदू धर्म और इस्लाम – वेदान्ती बुद्धि और इस्लामी शरीर – यही एक आशा है (संचयन 532)। “ विभिन्न मतावलंबियों को निकट लाने की ऐसी इच्छा के बावजूद उन्होंने विधर्मियों को “ शत्रु “ भी कहा, “ हिन्दू धर्म में से जो एक व्यक्ति बाहर जाता है , उससे हमारा एक व्यक्ति केवल कम ही नहीं होता, वरन एक शत्रु भी बढ़ता है (संचयन : 303) ।“

9.0 राजनीतिक एवं आर्थिक समस्याएँ :

9.1 स्वामी विवेकानंद ने तो राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं की उपेक्षा की, पर स्वामी दयानंद ने इन पर न केवल गंभीर चिंतन किया, बल्कि क्रांतिकारी विचार दिए । द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो ( 1848) के द्वारा साम्यवादी विचारधारा का प्रसार करने वाले कार्ल मार्क्स (1818 – 1883) / फ्रेडरिक एंगिल्स (1820 – 1895) और महर्षि दयानंद यद्यपि समकालीन थे, पर एक दूसरे से सर्वथा अपरिचित थे, इसके बावजूद उनके आर्थिक – राजनीतिक विचारों में बहुत-कुछ समानता दिखाई देती है ।

9.2 जब भारत के तत्कालीन दूसरे नेतागण विदेशी शासन का प्रशस्तिगान कर रहे थे, उसके अजर – अमर होने की कामना कर रहे थे, तब दयानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विदेशी राज्य कभी पूर्ण सुखदायी नहीं होता, स्वदेशीय राज्य ही सर्वोपरि उत्तम होता है (स.प्र., पृ. 213)। उन्होंने तो “तच्चक्षुर्देवहितं... (यजु. 36/24); इषे पिन्वस्वोर्जे....(यजु. 38/14) जैसे वेदमंत्रों का अर्थ करते हुए पूरे विश्व के लिए प्रार्थना की कि कोई किसी के अधीन न रहे, सब स्वतंत्र रहें, कभी पराधीन न हों, (लघुग्रंथ संग्रह, पृ. 23, 208) । अपने ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश में, और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में भी उन्होंने राज्य व्यवस्था पर पूरे–पूरे अध्याय लिखे जिनमें वेद तथा अन्य शास्त्रों के आधार पर राज-व्यवस्था, शासन-व्यवस्था, न्याय-व्यवस्था , दंडनीति, कूटनीति आदि की विवेचना की और यह सिद्ध किया कि वेद ज्ञान-विज्ञान के ग्रंथ हैं ।

9.3 अपने को किसानों, मजदूरों, गरीबों आदि का हिमायती बताने वाले साम्यवादियों से भी आगे बढ़कर महर्षि दयानंद ने किसान आदि परिश्रम करने वालों को ' राजाओं का राजा ' और राजा को उनका ' रक्षक ' बताया है । राजा शब्द सुनते ही हमें प्रायः कहानियों में सुने वंशानुगत राजा की याद आती है, पर दयानंद ने ऋग्वेद के मन्त्र “ त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि ....(3/2/24/1) की व्याख्या करते हुए लिखा, “ तीन प्रकार की सभा को ही राजा मानना चाहिए, एक मनुष्य को कभी नहीं (भूमिका पृ. 477 – 478; स.प्र., पृ. 128)। “ इसीलिए उन्होंने राजा को ‘ सभापति ‘ कहा है और उसे तीनों ‘ सभाओं के अधीन ‘ बताया है । साथ ही इन ‘ सभाओं को प्रजा के अधीन ‘ रखने की बात कही। इस प्रकार उन्होंने उस जनतंत्र का समर्थन किया, आज की भाषा में जिसके स्तंभ हैं - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और (इन सबको जनता के अधीन रखने वाला) लोकपाल / मीडिया । उन्होंने सभाओं वाली इसी व्यवस्था पर बल दिया । यजुर्वेद के अपने भाष्य में लिखा  " प्रजाजन यह देखें कि उनका देश अकेले व्यक्ति से नहीं, अपितु सभाओं से प्रशासित हो। “ शतपथ ब्राहमण की चर्चा में भी कहा कि “ राज्य के लिए एक को राजा कभी नहीं मानना चाहिए, क्योंकि जहाँ एक को राजा मानते हैं वहां सब प्रजा दुखी और उसके उत्तम पदार्थों का अभाव हो जाता है । इससे किसी की उन्नति नहीं होती । जैसे सिंह वा मांसाहारी (व्यक्ति) हृष्ट पुष्ट पशु को मार कर खा लेते हैं, वैसे स्वतंत्र राजा प्रजा का नाश करता है (भूमिका, पृ. 495 - 496; स.प्र., पृ. 129)। राजा को भी सलाह दी है कि “अपने मन से एक भी काम न करे जब तक कि सभासदों की अनुमति न हो (स.प्र., पृ. 146) ।

9.4 उन्होंने अर्थ-व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिया। कर-प्रणाली (Tax System ) ठीक करने तथा भारतीय अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कृषि एवं गोपालन की व्यवस्था सुधारने के उपाय भी बताए। उन्होंने गाय एवं अन्य दुधारू पशुओं की उपयोगिता अर्थशास्त्र की दृष्टि से बताने के लिए ' गोकरुणानिधि: ' नामक एक पुस्तक पृथक से भी लिखी , जिसमें गाय, भैंस, ऊंट, बकरी आदि दुधारू एवं कृषि के लिए उपयोगी पशुओं की उपयोगिता आर्थिक दृष्टि से सिद्ध की है (लघुग्रंथ संग्रह, पृ. 73-76) । उन्होंने इन पशुओं से मिलने वाले दूध, मल, मूत्र आदि (और मरने के बाद चमड़ा, हड्डी आदि ) के मूल्य का भी आकलन किया है । ऐसे पशुओं की हत्या बंद करने के लिए उन्होंने गवर्नर जनरल के एजेंट कर्नल ब्रुक से मिलकर बात की, और महारानी विक्टोरिया को पत्र भी लिखा ।

9.5 नमक पर कर लगाने और वनों से प्राप्त होने वाले ईंधन पर कर लगाने को उन्होंने आर्थिक शोषण का प्रतीक बताया ; और इसके लिए अँगरेज़ सरकार की कटु आलोचना की। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की भी प्रेरणा दी । यूरोपियनों की स्वदेश भक्ति का उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा कि वे अपने देश के बने हुए जूते को तो ऑफिस और कचहरी में जाने देते हैं, इस देशी जूते को नहीं । इतने ही से यह समझ लो कि स्वदेशी वस्तुओं का क्या महत्व है ।

9.6 उन्होंने 30 वर्ष तक धर्मपूर्वक राजसेवा करने वाले व्यक्ति को शेष जीवन आधा वेतन पेंशन देने, युद्ध में शहीद हुए व्यक्ति की पत्नी एवं बच्चों को समर्थ होने तक पूरा वेतन देने, बच्चों के समर्थ हो जाने पर उन्हें यथायोग्य नौकरी देने एवं पत्नी को योग-क्षेमार्थ यथोचित धनराशि, जब तक वह जिए, तब तक देने का सुझाव (1882 में) तब दिया जब अपने को सभ्यता और संस्कृति में अग्रणी मानने वाले देशों में कोई इस दिशा में सोचता भी नहीं था (महर्षि दयानंद सरस्वती का महत्वपूर्ण पत्रव्यवहार : परोपकारिणी सभा, अजमेर, 2016 ; पृ. 467) ।

9.7 वर्तमान समय में तकनीकी और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यूरोपीय देशों की प्रगति देखकर उन्होंने योजना बनाई कि भारतीय युवकों को जर्मनी में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भेजा जाए जो उस समय प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यूरोप में अग्रणी माना जाता था । उन्होंने इसके लिए प्रो. वाइज़ को पत्र भी लिखे, पर दुर्भाग्य से उनका अकस्मात स्वर्गवास हो गया और यह योजना खटाई में पड़ गई ।

9.8 स्वामी विवेकानंद ने इन विषयों से यह कहकर छुट्टी पा ली कि, “ राजनीतिक या सामाजिक उन्नति अनावश्यक तो नहीं, पर धर्म ही मुख्य विषय है (संचयन. पृ. 172) । “ “भारत की विशिष्टता धर्म है । समाज सुधार और अन्य सब बातें गौण हैं (संचयन पृ. 296) ।“ इसके बावजूद कुछ लोग उन्हें स्वतन्त्रता आंदोलन का अग्रदूत सिद्ध करना चाहते हैं । ऐसे लोगों को स्वामी विवेकानंद के वे शब्द याद रखने चाहिए जो उन्होंने सितम्बर 1894 में कहे थे, ” मेरे लेखन को गलती से भी कभी कोई राजनीतिक महत्व ना दिया जाए। “ एक वर्ष बाद फिर लिखा, ” राजनीति में मैं विश्वास नहीं करता । मेरे लिए तो संसार में परमात्मा और सत्य ही राजनीति हैं । बाक़ी सब चीजें बकबास हैं। (“ Let no political significance ever be attached falsely to my writings.” " I do not believe in Politics. God and truth are the only politics in the world. All else is trash ( Biography, P. 232)."

10.0 निष्कर्ष :

संक्षेप में कहा जा सकता है कि कतिपय विषयों में दोनों महापुरुषों के विचार समान हैं, पर उन्हें क्रियान्वित करने के बारे में मतभेद है ।

10.1 दोनों महापुरुषों का मानना है कि वेद अपौरुषेय हैं, स्वतः-प्रमाण हैं, सार्वकालिक और सार्वजनीन हैं। वे ही मानव धर्म का मूल आधार हैं । उनकी उपेक्षा करने के कारण ही मानव जाति का पराभव हुआ है ।

10.2 इस स्थिति को ठीक करने के लिए स्वामी दयानंद ने वेद का अध्ययन करने और वैदिक परम्पराएं अपनाने पर बल दिया ; पर स्वामी विवेकानंद ने केवल वेदान्त का प्रचार किया और यदा-कदा वैदिक आदर्शों का सैद्धांतिक गुणगान करते हुए भी व्यवहार में पौराणिक परम्पराओं का ही समर्थन किया ।

10.3 स्वामी दयानंद ने जहाँ गर्भ से लेकर मृत्यु पर्यंत अर्थात पूरे मानव जीवन के (धार्मिक,आर्थिक, राजनीतिक आदि) विभिन्न पक्षों पर विचार किया और उन्हें बेहतर बनाने की प्रेरणा दी, वहां स्वामी विवेकानंद ने अपने को धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रखा ।

10.4 स्वामी दयानंद ने प्रचार कार्य भारत में किया, संस्कृत और हिंदी में किया, और हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। स्वामी विवेकानंद ने प्रचार कार्य प्रमुख रूप से विदेशों में किया, अतः अंग्रेजी में किया। भारत में उन्होंने जितना भी प्रचार कार्य किया, वह बांग्ला और अंग्रेजी में किया । वस्तुतः अंग्रेजी में व्याख्यान देने वाले वे पहले संन्यासी थे । अंग्रेजी की यह परम्परा स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों में आगे भी चलती रही ।

10.5 स्वामी दयानंद ने खुले मैदान में एक ओर तो हिंदू-ईसाई-मुसलमान आदि सभी पंथों के विद्वानों से शास्त्रार्थ करके उन्हें शास्त्रीय आधार पर संतुष्ट करने का प्रयास किया तो दूसरी ओर सामान्य जनता से वार्तालाप करके, उसकी शंकाओं का समाधान करके, प्रवचन-भाषण देकर उसके भ्रम दूर करने का प्रयास किया और वेदमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी । इसलिए तर्कशील, विवेकशील जिज्ञासु लोगों में वे जितने लोकप्रिय हुए, कट्टर रूढ़िवादियों में उतने ही अलोकप्रिय हुए (कुछ रूढ़िवादी तो उनके प्राणों के प्यासे बन गए, उनकी हत्या करने के 17 बार प्रयास किए गए) ; स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म की कतिपय विशेषताओं की चर्चा अमरीका और यूरोप के देशों में गोष्ठियां आयोजित करके की। इससे वहां नए विषय जानने के इच्छुक लोगों की जिज्ञासा संतुष्ट हुई। अतः विदेश में जिज्ञासुओं के बीच, और स्वदेश में रूढिवादियों के बीच वे लोकप्रिय हुए।

10.6 स्वामी दयानंद के विचारों में जहाँ तार्किकता है, दृढ़ता है, गहनता है, परिपक्वता है, वहीँ स्वामी विवेकानंद के अनेक विचारों में अस्थिरता एवं अपरिपक्वता है । इसी कारण उनकी अनेक बातें परस्पर विरोधी हैं। संभवतः इसका कारण यह है कि उन्होंने जो कुछ भी अध्ययन किया, उसके बाद सम्यक चिंतन किए बिना ही वे सार्वजनिक क्षेत्र में उतर पड़े। एडगर वेज्ले थाम्प्सन (Edgar Wesley Thompson; 1871 – 1963) ने टिप्पणी की है, “ विवेकानंद संसार में ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें परस्पर विरोधी बात कहने में कोई हिचक नहीं थी ।“ “ यह तो उनका स्वभाव था..........यदि उनका आज का कथन कल के कथन के विपरीत होता तो भी उन्हें इसकी ज़रा भी परवाह नहीं होती थी (“Vivekanand was the last person in the world to worry about formal consistency “ “ That was his nature …… and he was supremely indifferent if his words today seemed to contradict those of yesterday.”


सन्दर्भ ग्रंथ

1. स्वामी दयानंद सरस्वती कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका , दयानंद ग्रंथमाला द्वितीय खंड ; श्रीमती परोपकारिणी सभा, अजमेर; द्वितीय आवृत्ति, 1983.

2. स्वामी दयानंद सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश; वैदिक पुस्तकालय, अजमेर; 35 वाँ संस्करण 1971.

3. दयानंद लघुग्रंथ संग्रह, श्री घूड़मल प्रहलाद्कुमार आर्य धर्मार्थ न्यास, हिंडौन सिटी, (राज.) ; तृतीय संस्करण, 2008 .

4. डा. वेदपाल (सं.) : महर्षि दयानंद सरस्वती का महत्वपूर्ण पत्र व्यवहार ; परोपकारिणी सभा, अजमेर, प्रथम संस्करण, 2016.

5. विवेकानंद साहित्य संचयन ; रामकृष्ण मठ, नागपुर ; 1987.

6. भारतीय नारी ; श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर ; सप्तम संस्करण ; 1969.

7. स्वामी निखिलानंद, विवेकानंद – एक जीवनी ; अद्वैत आश्रम, कोलकता ; नवम पुनर्मुद्रण ;

8. Edgar Wesley Thompson, Teaching of Swami Vivekanand ; M E Publishing House, Madras ; 1898.

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