कहानी - गंगा की गोद में // अर्चना अग्रवाल

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प्रातःकाल का समय नवीन शीत ऋतु की मंद समीर मेरे पत्तों को हिलाकर हवा में सुरसुरी सी पैदा कर रही थी मैं अक्षयवट वृक्ष गंगा के किनारे अनेकानेक पीढ़ियों का साक्षी रहा हूँ राम ,राम ,राम कहती कस्तूरी गंगा की सीढ़ियों पर उतरती जा रही थी , मैं देख रहा हूँ इसे चालीस वर्षों से अखंड नित्य कर्म ये इसका ,सुबह पाँच बजे का गंगा स्नान और वहीं बैठकर राम नाम की माला जपना । सोलह वर्ष की छोटी उम्र में ही ब्याही आ गईं थी वो हरिद्वार

में । प्रारंभ में सास के साथ बाद में स्वयं स्नान-ध्यान का ये क्रम नहीं छोड़ा था उन्होंने । नयनाभिराम गंगा आरती देख ब्रह्मकुंड के मंदिरों की प्रदक्षिणा कर मन प्रसन्न हो जाता था उसके बाद ही घर गृहस्थी संभालती वो । पति यहीं की एक फैक्टरी में सुपरवाइज़र थे , सर्वप्रथम घाट पर इसकी पायल की रूनझुन ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया था । नमित नयन , काँपते लजाते हाथों से ढाक के हरित पत्र में रखी गुलाब की पत्तियों व प्रज्ज्वलित जोत को प्रवाहित करते हुए बुदबुदा कर अपनी सुखी गृहस्थी की कामना की थी उसने , जानता हूँ मैं ये सब ।

यदि पत्थर पर घटनाएँ लिखीं जा सकती तो जाने कितनी ही बातें हम गंगा की हर सीढ़ी पर पढ़ सकते । अतीत के सुर को सुनने की इच्छा यदि बहुत बलवती है तो पानी की लहरों की ओर कान लगाए रहो , बहुत सी भूली बातें सुनाईं देंगी ।

ऊपर तक भरी हुई है गंगा बस चार सीढियाँ पानी के ऊपर जाग रही हैं , जल के साथ धरा की गलबहियाँ हो रही हैं ।

राम - राम के गान के साथ मल्लाहों ने नावें गंगा में उतार दी हैं । छोटी नावें तो हंस के समान तैरती प्रतीत हो रही हैं ।

हाँ , तो मैं कस्तूरी के विषय में बता रहा था । अपनी संगी साथी सहेलियों के साथ आती रही वो गंगा किनारे , जाने कितने सुख - दुख , हँसी - ठिठोली ,रूदन बाँटे मेरे सामने आपस में उन सभी ने ।

बहुत समय तो नहीं पर लगभग पंद्रह साल पहले एक वज्रपात ने कस्तूरी को समूल हिला दिया था । हरिद्वार की ही एक फैक्टरी में काम करते हुए उसके पति मोहन के सीधे हाथ की निर्मम बलि चढ़ गई थी । शादी के कई वर्षों बाद मन्नतों से पाए जुड़वाँ पुत्र भी अभी छोटे ही थे , कच्ची गृहस्थी के खर्च और उस पर मुआवजे के लिए काटने पड़े लेबर कोर्ट के चक्कर ।

इन चक्करों में युगल दम्पत्ति के जूते ही नहीं पैरों के तलवे भी घिस गए थे ,बच्चों की स्कूल की फीस भरनी भी मुहाल थी उन दिनों ।

देखता था मैं कस्तूरी बहुधा सायंकाल घाट पर आकर चुपचाप बैठ जाती । सीधे पैर के नाखून से घाट की सीढ़ियाँ कुरेदती रहती और बिना आवाज़ के ढेर सारा रोकर गंगा जल से मुँह धोकर धोती के किनारे से पोंछ लेती ।

पति मोहन भी आत्मविश्वास से शून्य घंटों निरूपाय बैठा रहता मेरी छाँव में मैं देखने में भले ही वृद्ध सा हो गया हूँ पर मेरा अन्तर अभी भी पल्लवित है । मेरी खोहों में अनेक मेंढकों , झींगुरों ने आश्रय पा लिया है और किट्टो गिलहरी तो सारा दिन उछल कूद मचाए रखती है ।

जो बात मैं कहना चाहता हूँ वो तो कही जाती नहीं , एक बात कहता हूँ तो दूसरी स्त्रोत में बह जाती है ।

हाँ तो , घर के खर्च चलाने के लिए साड़ियों पर फॉल लगाना , छोटा मोटा क्रेच चलाना सब किया बेचारी अल्पशिक्षिता कस्तूरी ने । घर का बाहर का कमरा तीर्थयात्रियों के लिए किराए पर उठाया जाने लगा ।

यूँ ही घिसटते हुए दिन बीत रहे थे फीके - फीके से

पर कहते हैं ना दुर्दिनों में भी कुछ विशेषता अवश्य होती है जैसे काई से आच्छन्न जल पर भी सूर्य की किरणें कच्चे सोने के रंग की लगती है , चम्पा के फूल के समान ।

इन दिनों ने कस्तूरी ताई को खूब मिलनसार बना दिया , घर-घर काम की तलाश में जाती , छोटा मोटा काम मिल ही जाता तो बच्चों की गुज़र होती रहती रूखा - सूखा खाकर ।

दोनों पुत्रों में से प्रतीक अत्यंत मेधावी निकला , उसने हर बार वजीफा लाकर शिक्षा को सुगम बना लिया । वो मेडिकल में तो छोटा भाई विदित इंजीनियरिंग में आगे निकल गया ।

उत्तराखंड के टॉपर्स में नाम अंकित कर दोनों पुत्र राजहंस बन गए । पुरस्कार वितरण समारोह में लाला किशोरी दास ने सहर्ष दोनों की शिक्षा का समग्र व्यय भार वहन करने की उद्‌घोषणा की । वही किशोरी दास जिनके हर की पौड़ी पर अनेक लग्ज़री होटल हैं जिनमें विदेशी सैलानी ठहरते हैं उनसे मोटा किराया वसूल कर वो एक अंश अपनी धर्मार्थ धर्मशालाओं पर व्यय करते हैं जहाँ चौबीसों घंटे ,बारहों महीने गरीब तीर्थयात्रियों के ठहरने व लंगर की व्यवस्था रहती है ।

साक्षी हूँ मैं कि देवभूमि कही जाने वाली हरिद्वार की पतित पावनी गंगा सभी को आश्रय देती है बिना किसी संकोच के ।

प्रतीक के एमबीबीएस फाइनल में तो कस्तूरी दसियों बार मनसा देवी के मंदिर गई माथा रगड़ने और मन्नत का धागा बाँधने ।

धोती के पैबंद भी मुस्कुरा उठते जब प्रतीक स्टेथोस्कोप लगाकर जांचता माँ को ।

विदित भी सिविल इंजीनियरिंग के साथ ही हरिद्वार के फ्लैट बिल्डर के पास काम करने लगा था ।

कुछ - कुछ बासंती बयार बहने लगी थी जीवन में ।

पढ़ाई पूरी होते ही प्रतीक किसी प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका गया तो वहीं का होकर रह गया

हाँ हर महीने एक मोटी रकम ज़रूर भिजवा देता बैंक के ज़रिए ।

लाला किशोरी दास की धर्मशालाओं में निर्माण कार्य भी करवाया उसने प्रतिदान स्वरूप ।

एक साल उपरांत विदित ने भी उसकी राह पकड़ी I

दुखी नहीं थे मोहन और कस्तूरी , बच्चों की उन्नति सदैव ललाट को गौरवान्वित करती है पर उम्र का ढलान और अकेलापन भी खाने लगा था दोनों को ।

. कस्तूरी तो फिर भी सहेलियों संग घाट पर अपने मन की कह सुन लेती पर मोहन तो अब जैसे पत्थर ही हो गया था । दो साल बीतते - बीतते बुखार ने ऐसा जकड़ा उसे कि फिर उठा ही नहीं बिस्तर से ।

मेरे सामने ही है अस्थि प्रवाह घाट जहाँ विसर्जन क्रिया की गई मोहन की । दोनों बेटों ने अमेरिका से आकर क्रियाकर्म समापन पश्चात्‌ बहुतेरी जिद की कि माँ भी साथ चले विदेश पर वो गंगा का किनारा छोड़ने को तैयार ही न थी । परदेस की धरती पर मेरा साँस छूट जाए तो मुझे कैसे मुक्ति मिलेगी , उसकी ऐसी (दकियानूसी ?) सोच ने पराजित कर दिया बेटों को , चले गए वो सजल नयन लिए वापिस खाली हाथ ।

घाट पर सिंदूर पोंछ , पहने रंगीन कपड़ों का प्रवाह कर कस्तूरी फीकी ,रंगहीन सूती धोतियाँ पहनने लगी अब ।

बूढ़ा हूँ मैं पर उमंगों को पहचानता हूँ मैं , कैसे यह नवयौवना धीर-गंभीर वृद्ध नारी में परिवर्तित होती चली गई सब देखा है मैंने , मेरी पत्तियों ने , शाखाओं ने । यादें , बातें आती हैं चली जाती हैं , उन्हें थामकर तो नहीं रख सकता । सारी कहानियाँ सुनाने लगूँ तो सदियाँ बीत जाएँगी यूँ ही आपकी मेरी छाँव तले ।

हाँ , तो मैं कह रहा था आते सोमवार लाला किशोरी दास के सबसे कनिष्ठ प्रपौत्र का विवाह है , नगर में धूम मची है इस राजसी शादी की । ज़ोर -शोर से तैयारियाँ की जा रही हैं । कस्तूरी भी प्रसन्न हो अपनी सूती साड़ी में कलफ लगाकर तैयारी कर रही है ब्याह में जाने की ।

बड़े घरानों के रिवाज़ के अनुसार भेंट में देने के लिए चाँदी की जड़ाऊ सिन्दूरदानी भी खरीद लाई है । ये आजकल की निगोड़ी बहुएँ क्या जाने , हलधात क्या होता है और बन्ने को बान कैसे बैठाते हैं  ? कैसे तेल चढ़ाया जाता है और कैसे ब्याह की रात चीती जाती है ?

ब्रह्ममुहूर्त में कंगना बाँध कर शुभ विवाह का पुख्ता इंतज़ाम कैसे करते हैं , ये सब कस्तूरी ही तो बताएगी ।

अब वही वयोवृद्ध महिला है यहाँ बाकी सब या तो परलोकगामिनी हुईं या बेटों के वश होकर दूसरे शहरों में चली गईं ।

पूरे शहर में न्यौता बाँटा गया पर शायद कस्तूरी की चौखट का पता ही भूल गए किशोरी दास के परिवार जन । सुबह से शाम हुई फिर गहरी रात । भव्य घुड़चड़ी की गई हरिद्वार में पर कस्तूरी की कलफ की हुई साड़ी अलमारी में ही टंगी रह गई । वो अपने सूने घर में अँधेरे कोने में बैठी जाने क्या गुनती रही ।

          .        अरे ! ये क्या इतनी रात को थके - थके कदमों से गंगा किनारे कौन आ रहा है , कस्तूरी .......   ! आज उसकी बूढ़ी कमर और अधिक झुकी लगी । घाट के पत्थर का सहारा ले गहरी साँस भर वो बैठी तो देर रात झींगुरों की तेज़ आवाज़ होने पर भी ना उठी । मैं बोल पाता तो पूछता कुशल क्षेम पर मैं इस भयावह मौन का साक्षी बना देखता रहा ।

लगभग पूरी रात बैठी रही वो निःशब्द । ब्रह्म मुहूर्त के साथ ही एक ओर लुढ़क गई उसकी निर्जीव देह । इस षोडशी कन्या कस्तूरी को जिसने गंगा किनारे अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया  , श्रान्ति के समय यही पतितपावनी गंगा हाथ बढ़ाकर उसे गोद में न लेती तो और कौन लेता ?

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