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कहानी // कोचिंग क्लास // अनामिका शाक्य

कैमिस्ट्री के प्रवक्ता जुलाई में रोज स्कूल जाते थे। स्कूल में वे ग्यारहवीं और बारहवीं के नयें छात्र-छात्राओं को प्रभावशाली भाषण देते थे। वे एक दिन भी कैमिस्ट्री की किताब नहीं उठाते थे और केवल आदर्शवादी बनकर आदर्शों का पाठ पढ़ाते थे। वे छात्रों को अपनी घर की कोचिंग में पढ़ने पर मजबूर करते थे। अगर, छात्र-छात्राएँ मजबूर हो जाते तो ठीक वरना दूसरे दिन डराते। अगर फिर भी डरते नहीं तो तीसरे दिन उनसे कोई मतलब नहीं रखते। जितने छात्र कोचिंग में स्कूल से समेट लाते उनसे दस बारह जुलाई से कोचिंग में क्लास लगाना शुरू कर देते थे। फिर पूरी जुलाई भर कोचिंग में आदर्शों की आदर्श क्लास चलाते। अगस्त में वे छात्रों को विशेष और अति महत्वपूर्ण शिक्षा देते हुये कहते, ‘‘स्कूल मत जाया करो।’’

छात्र-छात्राएँ स्कूल जाना बन्द कर पाते मास्टर जी उससे पहले ही जाना बन्द कर देते थे। अपना कॉलेज कितना गन्दा लगता था उन्हें। कोई गलती से भी पूछ बैठता तो गर्व से उत्तर देते, ‘‘कॉलेज में क्या ब्लैक बोर्ड को पढ़ायें, बच्चे कभी आते ही नहीं।’’ अगर कोई छात्र उनकी बराबरी करे तो उसे हर तरह से परेशान करवाते थे।

अगस्त के महीने में काम हल्का हो जाता तो छात्र-छात्राओं को वे अपने रंग में रँगते थे। वे छात्र-छात्राओं द्वारा पता लगवाते कि फलाँ कोचिंग में फलाँ मास्टर के पास कितने बच्चे हैं। विद्यालय में केवल महीने में एक बार जाकर पूरे महीने की उपस्थिति झटपट चढ़ाकर लौट आते। सितम्बर में पता लगाते कि कौन सी लड़की का किस लड़के के साथ चक्कर चल रहा है। वे कई सुन्दर लड़कियों को देखकर खुद उनके चक्कर में चक्कर लगाते। अक्टूबर में खुद खूब सज धज कर कम उम्र के लड़के जैसा बनकर आते और ज्यादा से ज्यादा लड़कियों के हीरो बनने की कोशिश करते। समय की बहुत कमी है कहकर छात्रों को बीस मिनट पहले ही छोड़ देते थे।

नवम्बर में मास्टर जी अपने नोट्स से बोल-बोल कर बच्चों को लिखाते तथा दिसम्बर में डन्डा लेकर खड़े होकर रटाते। एक साल क्वाण्टम संख्यायें पढ़ाते दूसरे साल आई.यू.पी.ए.सी. पद्धति समझाते। यही समझाते-समझाते, उनकी के कैमिस्ट्री पूरी हो जाती। दिसम्बर में वे अपनी डायरी लेकर चिल्लाते, ‘‘अपनी अपनी फीस जमा करो।’’ वे लड़कियों के ज्यादा हितैषी बनते थे इसलिए उनकी अलग से और क्लास लगाते थे। जनवरी-फरवरी में वे कोचिंग में ही प्रेक्टिकल करना सिखाते थे। सड़े स्कूल की सड़ी लैब का जंग लगा ताला उन्होंने कभी नहीं खोल पाया था इसलिए छात्र-छात्राओं से अलग से पैसे लेकर कोचिंग में ही प्रेक्टिकल की व्यवस्था कर दी थी। उन प्रेक्टिकल को सीखकर करना भी क्या था क्योंकि प्रेक्टिकल की परीक्षा में अंक तो वही दिलाते थे।

मास्टर जी जब प्रेक्टिकल सिखाते थे तो खासकर लड़कियों के बीच में घुसकर खड़े हो जाते थे। लड़कियाँ कहीं नुकसान दायक कैमीकल हाथों पर न गिरा लें इसलिए परखनली और साथ ही उनका हाथ पकड़कर सिखाते थे। वे लड़कियों की इतनी चिन्ता रखते थे कि जब उनके बीच में घुसकर खड़े हो जाते तो फिर निकलने का नाम नहीं लेते। एक ही बात को हजार बार समझाते ताकि उनकी समझ में अच्छी तरह आ जाये। वे फरवरी के आखिरी दिनों में पता लगाते कि कौन सा छात्र हमसे ट्यूशन नहीं पढ़ा है। ट्यूशन पढ़ने वाले छात्रों का नाम प्रेक्टिकल में नम्बर न दिलवाने वाली और पेपरों में पेरशान करने वाली लिस्ट में लिख लेते थे। मार्च में वो नकल कराने के और ज्यादा पैसे लेते थे और फिर उसी हिसाब से नकल की योजना बनाते थे। जैसे ही पेपर शुरू होते बचे हुये आदर्शवाद को भी गिरवीं रखकर जमकर नकल कराते। जो बच्चे उनसे ट्यूशन नहीं पढ़े होते थे केवल उनको ही गर्दन नहीं घुमाने देते थे। उनके पास बाहर से आये हुये तलाशी लेने वाले फ्लाइंग स्क्वाड तथा अन्य शिक्षकों को यह कहकर कि ये नकल तो नहीं कर रहे हैं खड़ा करते और खुद भी उन गिने चुने बच्चों की निगरानी करते। जून में सारे बच्चे पास हो जाते और अंक तालिका लेने आते तो खुशी की वजह से मास्टर जी मिठाई तो खाते ही उनसे सौ दो सौ रुपये भी ले लेते। और इस तरह सत्र की समाप्ति हो जाती। जुलाई से फिर वही कहानी दोहराई जाने लगती जिसका कथानक तो वही रहता था सिर्फ पात्र बदल जाते थे और इस तरह शोषण का नाग निरंतर फुंकारें मारता रहता था।

- अनामिका शाक्य

एम.एस-सी. (रसायन शास्त्र)

ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर जिला मैनपुरी-205261

ईमेल- harishchandrashakya11@gmail.com

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