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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 33 : एक यात्रा संतों की नगरी -पंढरपुर की // उर्मिला शुक्ल

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प्रविष्टि क्र. 33 एक यात्रा संतों की नगरी -पंढरपुर की उर्मिला शुक्ल यॅू तो पंढरपुर महाराष्ट्र का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। पर हम तीर्थ यात्री...

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प्रविष्टि क्र. 33

एक यात्रा संतों की नगरी -पंढरपुर की

उर्मिला शुक्ल

यॅू तो पंढरपुर महाराष्ट्र का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। पर हम तीर्थ यात्री नहीं थे और हमारी यात्रा भी वारकरी जैसी कोई धार्मिक यात्रा नहीं थी।  हम तो साहित्य से जुड़े लोग थे और हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के पुणे अधिवेशन में भाग लेने आये थे। साहित्य का हर विद्यार्थी संत साहित्य की डगर से होकर ही हिंदी साहित्य के पथ पर अग्रसर होता है । एक समय था,जब संत साहित्य की स्त्रोतस्विनी ने पूरे भारत को आप्लावित कर लिया था और पंढरपुर तो उसमें समा ही गया था। तभी तो पंढरपुर संत समागम का क्रेंद्र बन गया था । सो जब हमें हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के पूना यानि पुणे अधिवेशन का आमंत्रण मिला तो मन में एक चाह उठी थी कि काश पंढरपुर जाने का सुयोग भी मिल जाता ,तो हमारी ये साहित्यिक यात्रा और सार्थक हो जाती। और हमें वो सुयोग मिल गया था। अधिवेशन के बाद हमारे पास एक दिन का अतिरिक्त समय था और पुणे के आस पास घूमने के ऐसे अनेक स्थान थे जिन्हें हिन्दी फिल्मों ने बहुत प्रस़िद्ध कर दिया है जैसे खंडाला। मगर हमने पंढ़रपुर जाने का निर्णय लिया ,कारण खंडाला तो कभी भी जाया जा सकता था ,पर संतों की नगरी पंढरपुर जाने का ऐसा संयोग शायद ही मिल पाता । सो पंढरपुर जाना ही उचित था।

संतों का जीवन तो हमेशा से ही समाज को समर्पित रहा है। उनके लिये सब बराबर रहे हैं । अपना पराया, उॅच नींच का भेद उन्हें छू तक नहीं पाता था। उन्हें संसार की कोई भी चीज बॉध नहीं पाती थी ,तभी तो उनका कोई एक निवास स्थान तक नहीं होता था और उनका जीवन रमता जोगी बहता पानी की कहावत को चरितार्थ करता रहा है। हमारे देश में संतों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है और संत साहित्य हमारे जीवन का आधार। मैं आजकल के ढोंगी संतों की बात नहीं कर रही हूँ । मैं तो उन संतों की बात कर रही हूँ ,जिन्होंने भारतीय साहित्य को एक ऐसी थाती दी ,जो साहित्य के साथ साथ जीवन को भी उदात्त बना देती है। ऐसे ही संतों की नगरी है पंढरपुर। पंढरपुर! जहाँ ज्ञानदेव, एकनाथ, नामदेव, गोरा कुम्हार, विजय दास ,पुरंदर दास, गोपाल दास , तुकाराम और जगन्नाथ दास जैसे संतों का वास रहा । इन्होंने मराठी साहित्य के साथ-साथ हिन्दी साहित्य को भी समृद्ध किया। ऐसे संत कवियों की पावन भूमि के दर्शन से हम वंचित नहीं रहना चाहते थे । सो हम सब पंढरपुर की निकल पड़े ।

छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभी सदस्य रवि श्रीवास्तव ,संतोष झांझी ,वरिष्ठ साथी प्रभाकर चौबे और हमारे अध्यक्ष ललित सुरजन जी हम सब पंढरपुर की यात्रा पर निकल पड़े । यॅू तो हम पंढरपुर रेल या बस से भी जाया जा सकते थे पर बस या रेल का अपना निर्धारित समय होता है और हमारे पास समय कम था । सो हमें टैक्सी अधिक सुविधाजनक लगी। चूंकि हम दर्जन भर लोग साथ थे सो हमने चार टैक्सियॉ लीं। हम जैसे-जैसे शहरी सीमा से आगे बढ़े अंगूर के खेत नजर आने लगे थे। ये इलाका अपने अंगूरों के लिये देश भर में ख्यात है। दूर-दूर तक हदे निगाह तक अंगूर के खेत ही खेत नजर आ रहे थे । मार्च का महीना था, सो खेतों में अंगूर गदराये हुये थे। काले और हरे हरे अंगूरों से भरे खेतों के किनारे किनारे ताजे और रसीले अंगूरों की असंख्य खोखे भी थे, जिनमें लटकते अंगूरों के गुच्छे हमें लुभा रहे थे। सो रूककर हमने अंगूर खरीदने का विचार किया। हम रुके तो सड़क के दोनों फैले खेतों में लटकते अंगूरों के काले हरे गुच्छों ने हमें इस कदर लुभाया कि मन किया कि उन्हें छूकर देखें । मगर खेत की मालकिन ने अंगूरों को न छूने की सख्त मनाही के साथ खेत प्रवेश करने की अनुमति दी थी। वो बाकायदा हमारे पीछे तैनात थी ताकि हम अंगूरों को छू न सकें । फिर भी मानव स्वभाव ही है कि जिस काम की मनाही होती है उसे करने का मन करता ही है । सो हमारे एक साथी ने उसकी नजरें बचाकर लटकते अंगूरों को छूना चाहा तो उसने तुरंत बरजा-''ये रे भाउ अइसा नई करने का। ''

उसकी इस तरह सजगता ने हमें प्रभावित किया। हम सब खेत से बाहर आ गये। मैंने देखा बाकी खेतों के पास भी रूकी हुई थीं। लोग अंगूर के खेतों को देख रहे थे। उनके साथ भी खेतों की मालकिनें थीं । उनकी वेशभूषा अभी भी पारंपरिक ही थी । मराठी स्त्रियों पहचान बन चुकी वही नवारी साड़ी और उसे पहनने का वही पुराना तरीका, बिलकुल पुरूषों की धोती की तरह लॉग मारकर पहनी गयी साड़ी। गले में तिलरी और काली पोत । माथे पर सिन्दूर की बड़ी सी गोल बिंदी। कुछ कम उम्र की महिलाओं ने आधुनिक तरीके की मराठी साड़ियां पहनी थीं और अर्द्धचन्द्राकार स्टीकर बिंदियॉ भी लगायी हुई थीं । जब हम अंगूर खरीद रहे थे तब हमारे एक साथी ने मोल भाव करने की कोशिश की ,हम सब ही चाह थी कि खेत से खरीद रहे हैं ,तो कुछ सस्ता मिलें। मगरे''इहाँ एकिच भाव मिलता । लेने का त ले । नई त आगू देखो। ''कहकर उसने हमारी बोलती ही बंद कर दी थी।

''बड़ी तेज है ''कहकर भुनभुनाते हुये उन्होंने पैसे दिये तो''तुम्हारा जईसा के संग अईसच करना पड़ता । ''कहकर उसने करारा जवाब दिया तो मुझे याद आयीं वो औरतें जो मुझे गोवा जाते हुये रात की ट्रेन में मिली थीं। बिलकुल अकेली । अपने दम खम पर यात्रा करतीं वो औरतें । यात्रियों से लड़ झगड कर,अपने लिये जगह बनाती उन औरतों देख कर मुझे भी लगा था कि ये कितनी तेज हैं । मगर उनकी बातचीत से जब मैंने जाना कि वे रोज रात को ट्रेन से अकेली मुंबई से गोवा जाती हैं। वहाँ से मछली ,फेनी ,काजू और भी कई चीजें लेकर, दूसरे दिन मुंबई आ कर उन्हें बेचती हैं । इस आने जाने और उनके अपने व्यवसाय के चलते बदनियत व्यापारियों और से उनका अक्सर सामना होता रहता है,जिनसे उन्हें अकेले ही निपटना होता है । सो उनके लिये जबान की कठोरता अनिवार्य है। शायद इसीलिये कर्कशता उनकी स्वभाव का स्थायी भाव बन गयी है। दरअसल महाराष्ट्र में जीवन कभी भी बहुत आसान नहीं रहा और यहाँ पुरूषों के साथ साथ महिलायें भी घर बाहर की समस्याओं से जुझती रहीं । जीवन यापन के लिये किये गये उस कठोर संघर्ष ने ही इन्हें जुझारू और कठोर बना दिया,जिसे बाहरी व्यक्ति नहीं समझ ही पाता है और इन्हें तेज या लड़ाका करार देता है। यहाँ अंगूर के इन खेतों में भी तो दिन रात परिश्रम करती होंगी ये। हर रोज न जाने कैसे कैसे लोगों से सामना होता होगा। शायद इसीलिये इनकी बोली इस तरह रूखी हो उठी है । वरना स्त्री तो .......। सोचते हुये मैंने उसे देखा जो कभी रूखाई दिखाकर तो कभी सहज होकर अंगूर बेचने में संलग्न थी।

अंगूर बहुत ही मीठे थे। मैंने इससे पहले इतने ताजे और इतने मीठे अंगूर नहीं खाये थे। दरअसल हम जैसे शहरी कहलाने वाले लोगों का अब ताजगी से तो कोई रिश्ता ही नहीं रहा । पहले गांवों से किसानों से उनके उत्पाद सीधे हम तक पहुंचा करते थे। छोटे किसान तो खुद ही अपना सामान शहर लाकर बेचा करते थे । मगर अब तो बिचौलियों का जमाना आ गया है और किसान की हताशा उसे आत्महत्या की ओर ले जा रही ही है। मॉल कल्चर ने तो ताजगी से हमारा कोई वास्ता ही नहीं रहने दिया। और बची खुची कसर सड़कों के चौड़ी करण ने पूरी कर दी है सारे पेड़ काट डाले गये। अब तो लगता है कि हमें हवा भी खरीदनी पड़ेगी। देर तक इन्हीं विचारों से घिरी मैं बहुत कुछ सोचती रही । कार अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी । मैंने खिड़की से बाहर देखा । अब अंगूर पीछे छूट चले थे और प्याज के खेत नजर आने लगे थे। प्याज के खूबसूरत फूल। प्याज को देखकर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता कि इसमें इतने खूबसूरत फूल भी खिलते होंगे। जहंा तक निगाहें प्याज के फूल ही फूल नजर आ रहे थे। कहीं कहीं तो फसल तैयार हो चुकी थी सो उनमें प्याज की खुदाई का काम भी चलरहे था।

पुणे से पंढरपुर ,लगभग दो सौ चौदह कि. मीटर है सो वहाँ पहुंचते पहुंचते दोपहर ढल चली थी। पंढरपुर के बारे में बहुत पहले पढ़ा था,संभवतः बचपन में। हमारे घर में भक्तमाल नाम की एक किताब थीं। उसे पढ़ते हुये मैंने संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम और नामदेव की जीवनियां पढ़ी थीं। फिर हिंदी साहित्य की अघ्येयता होने पर संत साहित्य की कुछ और भी जानकारियॉ मिलीं। दूर से पंढरपुर की बसाहट नजर आ रही थी । भीमा नदी के किनारे बसे पंढरपुर को संतों की नगरी कहा जाता है । इस नगर के इर्द गिर्द बहने वाली भीमा नदी का बहाव यहाँ अर्द्धचंद्राकार है इसलिये इसे चंद्रभागा भी कहा जाता है । मराठी संत कवि संत ज्ञानेश्वर , नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, गोरा कुम्हार, पुरंदरदास गोपालदास और जगन्नाथ जैसे संतों के निवास के कारण ही इसका नाम संतों की नगरी पड़ गया। इनमें से बहुत से संतों का जन्म अलग अलग समय में हुआ था। ये सभी समकालीन नहीं थे। मगर इन सबका सम्बंध पंढरपुर से रहा और बिठोबा इनके इष्ट थे। यहाँ बिठोबा को विष्णु का अवतार माना जाता है। पंढरपुर में वर्ष में चार बार बिट्ठल से जुड़े त्योहार मनाये जाते हैं। आषाढ़ी और कार्तिक एकादशी को यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है। दूर दूर से लोग इस मेले में आतं हैं।

अब पंढरपुर करीब आ गया था और मंदिर का ऊपरी भाग नजर आने लगा था। कभी ये मंदिर बस्ती से दूर एकांत में रहा होगा मगर अब ये सघन बसाहट के बीच है। यॅू भी पंढरपुर अब घना बसा शहर बन चुका है और एक सुविख्यात तीर्थ भी। संतों को भले ही धार्मिक आडंबरों से परहेज रहा होगा , मगर हर तीर्थ की तरह यहाँ भी धर्म का बाजार गर्म नजर आ रहा था। सो होटल के एजेंट बस स्टैंड से पहले ही घेरने आ पहुंचे थे, पर हमें उनकी जरूरत ही नहीं थी। वहाँ हमारे साहित्यकार मित्र रहते थे । उन्हें हमारे आने की सूचना थी । सो हमारे पहुंचते ही उन्होंने हमारा स्वागत किया और हमें भोजन के लिये आमंत्रित किया। मराठी स्वाद में पगा भोजन तो बहुत स्वादिष्ट था, पर मिर्च की अधिकता से भोजन करते हुये हमारी नाक और ऑख से पानी बह चला था। मिर्ची भी महाराष्ट्र की प्रमुख फसलों में शामिल है। यहाँ की सूखी लाल मिर्च ,कश्मीरी मिर्च की तरह सिर्फ देखने में ही लाल नहीं होती ,वो खाने वाले का चेहरा लाल कर देने का माद्दा भी रखती है। ''आप लोगों को मिरच का आदत नई होयेंगा ,सोच के मय कमीच मिरच डाला। '' गृह स्वामिनी ने कहा तो हमने एक दूसरे की ओर देखा और मन ही मन सोचा अगर ये मिर्च कम है तो ज्यादा होती तो क्या गुल खिलाती । पर हमने कहा कुछ नहीं ,बस सी सी करते हुये पानी के सहारे हमने परोसा गया भोजन समाप्त किया।

भोजन के बाद हम मंदिर देखने गये। सबसे पहले हम मुख्य मंदिर बिठोबा रूक्मणी मंदिर गये। हमारे स्थानीय साथी हमारे साथ थे उन्होंने ही हमें बताया कि अब ये महाराष्ट्र ही नहीं देश का भी प्रसिद्ध तीर्थ बन गया है। आषाढ़ और कार्तिक एकादशी को दर्शन की परंपरा ही रही है। इसे 'वारी ' कहा जाता है। 'वारी 'यानि विट्ठल के दर्शन की यात्रा। इसी 'वारी ' से संतों के एक संप्रदाय ' वारकरी संप्रदाय ' शुरूवात भी हुई और नामदेव के नेतृत्व में वारी के लिये आये संत वारकरी संप्रदाय के संत कहलाने लगे। चॅूकि विट्ठल को विष्णु का रूप माना जाता है,शायद इसीलिये मंदिर के भीतर कृष्णावतार की झॉकियॉ सजायी गयी हैं और बाहर प्रवेश द्वार पर बालक कृष्ण को यमुना पार कराते वासुदेव की विशाल प्रतिमा स्थापित है। फिर भी ये मंदिर मुझे अन्य मंदिरों से कुछ अलग लगा ,कारण इस मंदिर परिसर में संत ज्ञानेश्वर , तुकाराम और नामदेव जैसे संतों की मूर्तियॉ हैं और दीवारों पर इनके द्वारा रचित पद भी अंकित हैं। मुझे स्मरण हो आया भारतीय साहित्य का इतिहास। किस तरह देश भर में संत परंपरा का विकास हुआ था और उस जमाने में जब संचार के तीव्र गामी साधन भी नहीं थे देश भर में एक साथ एक विचारधारा उठी और उसकी एक सुदीर्घ परंपरा कायम हुई । ये किसी चमत्कार से कम तो नहीं था। और इससे भी बड़ा आश्चर्य ये कि इनमें अधिकांश चाहे वे रैदास हों या नामदेव,गोरा या फिर कबीर ये सब निम्न वर्ण कहलाने वाली जातियों से ही थे। जबकि उस समय भी समाज में ,धर्म में तथाकथित उच्च वर्ण का ही वर्चस्व था।

ऐसे समय में संत परंपरा के इन कवियों ने समाज में ऊंच नीच के भेद और बाह्य आडंबरों को मिटाने की कोशिश की थी। ये महज एक संयोग था या कि भारतीय समाज व्यवस्था से उपजा आक्रोश कि देश भर का निम्न वर्ग इस तरह समाज विरोधी हो उठा था। शायद इसीलिये इन्होंने तथाकथित उच्च वर्ण के पूजा पाठ के तरीकों का तिरस्कार करते हुये ,अपने लिये अलग मार्ग चुना। और उनके आडंबरों को धता बताते हुये केवल नाम स्मरण को ही अपनी भक्ति का आधार बनाया। इतना ही नहीं ,संतों के विषय में तो न जाने कितनी चमत्कारी जन कथायें प्रचलित हैं,जो ये दर्शाती हैं कि भगवान ने पंडितों की वैभव भरी पूजा और अर्पण ठुकराकर संतों की भाव भरी भेंट स्वीकार की। जैसे रैदास की कथा के साथ जुड़ा ये प्रसंग जिसके अनुसार गंगा ने रैदास का सिक्का स्वीकारा। ऐसी ही कथा नामदेव के विषय में भी प्रचलित है,जिसके अनुसार भगवान की मूर्ति ने उनके हाथ से दूध पिया था। इस संदर्भ में उनकी ये पंक्तियॉ भी बहुचर्चित हैं-

'' दूध पियाई भगतु घर गइआ। नामे हरि दरसन भइआ। ''

उन्हें महसूस हुआ कि दूध पीते हुये हॅंस रहे हैं और उन्हें हॅंसता देख नामदेव के मुख से ये पंक्तियॉ फूट पड़ीं-''एक भगत मेरे हिरदय बसे। नामे देख नरायन हॅंसे। ''

संत साहित्य में ये उल्लेख मिलता है कि संत नामदेव ने पूरे भारत का भ्रमण किया था । खासकर उत्त्र भारत का तो व्यापक भ्रमण किया था। तभी तो इनकी रचनायें मराठी और हिंदी के साथ साथ पंजाबी में भी मिलती हैं। हम देर तक मंदिर परिसर में घूमते रहे फिर नामदेव 'पयरी 'की ओर चल पड़े। 'पयरी 'यानि द्वार । मैंने देखा लोग बड़ी श्रद्धा से उसे नमन कर रहे थे । कोई कौई तो उस 'पयरी 'को दण्डवत भी कर रहा था। ये समय किसी पर्व का नहीं था फिर भी मंदिर में पर्याप्त भीड़ थी। लोग बिट्ठल और बिठोबा के नाम के जयकारे लगा रहे थे। हमने भी बिट्ठल के दर्शन किये ,नामदेव ' पयरी 'पर माथा टेका और इन संत पुरूषों को याद करते हुये लौट चले पुणे की ओर जहाँ साहित्यिक संगोष्ठी हमारा इंतजार कर रही थी।

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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 33 : एक यात्रा संतों की नगरी -पंढरपुर की // उर्मिला शुक्ल
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 33 : एक यात्रा संतों की नगरी -पंढरपुर की // उर्मिला शुक्ल
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